सोशल मीडिया से कौन डरता है

सोशल मीडिया से कौन डरता है? सरकार या मुख्यधारा की मीडिया? जिस इंटरनेट का टेक्नॉलजी के लोकतांत्रिकरण के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में हुआ था उसके मैदान पर घास की तरह पसरते सोशल मीडिया पर लगाम लगाने के कानून दुनिया भर के कई देशों में तेज़ी से क्यों बन रहे हैं? क्या सोशल मीडिया ने हमारी सामूहिक सोच और अभिव्यक्ति को पूरी तरह बदल दिया है? क्या सोशल मीडिया ने मुख्य धारा की मीडिया से निर्भरता कम कर दी है? क्या सोशल मीडिया किसी भी तरह की जवाबदेही से मुक्त एक ऐसा सार्वजनिक मंच है जिसे हमेशा ही किसी प्रकार के सरकारी नियंत्रण से मुक्त लेकिन इसे पैदा करने वाली माता कंपनियों की छाती से चिपके रहने को ही स्वतंत्रता समझता रहेगा? क्या सोशल मीडिया तभी तक ठीक है जब तक लोग इस पर नानी से कहानी की यादें और बारिश में जामुन के किस्से ही बांटते रहे? सोशल मीडिया अपनी हदे लांघ रहा है या सरकार और मुख्य धारा की मीडिया की हदों को तोड़ कर एक ऐसा स्पेस यानी स्थल का निर्माण कर रही है जहां ट्रैफिक के नियम लागू ही नहीं हो सकते।
इन सब सवालों का जवाब हम अनुमानों और पूर्वागर्हों के आधार पर देने लगते हैं। हमारे देश में सोशल मीडिया को लेकर प्रमाणिक शोध की घोर कमी है। इसीलिए जो हो रहा है उसी की रनिंग कमेंटी सब किये जा रहे हैं। सोशल मीडिया ने सार्वजनिक होने की तमाम पुरानी मान्यताओं को ध्वस्त करना शुरू कर दिया है। पहले मीडिया और सरकार के बीच कोई नहीं था। सरकार की मीडिया थी और उसके बरक्स उसके आदेशों पर चलने वाली बाज़ार नियंत्रित मीडिया थी। इन दोनों के बीच आपसी टकराव, समझौते और आज़ादी का खेल और भ्रम चलता रहा। दोनों एक दूसरे से धूप छांव का खेल खेलते रहे। आपातकाल में मीडिया पर लगाम लगाने की राजनीतिक कोशिश हुई तो बाज़ारकाल में मीडिया को दूसरे रास्ते से ख़रीदने या प्रभावित करने की। अब इन दोनों के बीच एक नया खिलाड़ी आ गया है। जिसके मैदान में करोड़ों लोग एक साथ खेल रहे हैं। एक सूचना साझा होते होते पल भर में लाखों लोगों की सूचना हो जाती है। इसकी रफ्तार निजी टेलीविज़न की रफ्तार को बेमानी कर दिया है। रफ्तार का खेल भी पहले टीवी और अखबार के बीच चला लेकिन अब टीवी और अखबार मिलकर इस सोशल मीडिया से मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं। ज़ाहिर है तीनों के बीच टकराव के पर्याप्त कारण मौजूद हैं। तीनों के बीच प्रभुत्व की लड़ाई चल रही है। क्योंकि सोशल मीडिया ने मीडिया के जमे जमाए प्रभुत्व और साख की धज्जियां उड़ा दी है। विज्ञापन के मामले में भी मुख्य धारा की मीडिया को होड़ दे रहा है। जिसकी फिराक़ में चालाक सरकार और मुख्य धारा की मीडिया अपने आप भी सोशल मीडिया बन रही हैं। बात साफ है अगर आप सोशल मीडिया नहीं हैं तो आप मीडिया नहीं हैं।
लेकिन प्रभुत्व और प्रसार के खेल के बीच एक परिवर्तन और हो चुका है। हमारे बीच कई लोगों को लग रहा है कि परिवर्तन हो रहा है बल्कि यह कई साल पहले ही हो चुका था उसका अहसास अब हो रहा है। न्यूज़ यानी ख़बर प्रसार माध्यमों की तुलना में सोशल मीडिया के विभिन्न रूपों से पहुंच जा रहा है। संवाददाता ख़बरें टीवी चैनल पर ब्रेक करने से पहले ट्वीट कर देता है और पल भर बिना टीवी सेट ऑन किये वो ख़बर सैंकड़ों से लेकर करोड़ों लोगों के बीच पहुंच जाती है। यह किसी रोमांच से कम नहीं है। सोशल मीडिया ने मुख्य धारा की बनाई भाषा को भी खारिज कर दिया है। उसकी अपनी भाषा और शैली है। पहले लोग संपादक के नाम चिट्ठी के ज़रिये अख़बार से बात करते थे फिर टीवी में वाक्स पाप के ज़रिये छटांक भर जनता की आवाज़ लाखों लोगों के बीच पहुंचती थी,फिर एस एम एस के ज़रिये टीवी ने जनता को हिस्सेदार बनाना शुरू किया, फिर टीवी स्क्रीन और अखबारों में फेसबुक और ट्वीटर के कमेंट जगह पाने लगे। इस प्रक्रिया को कोई रोक नहीं सकता था। जो न्यूज़ चैनल और अख़बार स्वतंत्र मीडिया बन कर उभरे थे वो अब एक नए माध्यम के सहारे हो गए। हर अखबार और टीवी चैनल की वेबसाइट है और ट्वीटर अकाउंट है। हर पत्रकार का अपना माध्यम है जो उसके संपादक से स्वतंत्र है। हर आदमी खुद को पत्रकार की भूमिका में ले आ रहा है। सूचना और सार्वजनिक मंच के माध्यम जब इस तरह से उलट पुलट हो जाते हैं तो स्वाभाविक है कि सब इस पर कब्ज़ा चाहेंगे और सब एक दूसरे से लड़ेंगे। आज अमिताभ बच्चन को ट्वीटर पर किसी भी एक न्यूज़ चैनल के ट्वीटर अकाउंट या दैनिक हिट्स से ज्यादा लोग अनुसरण करते हैं। वो अब प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते। वो सीधे बात कर रहे हैं लोगों से। मीडिया अब माध्यम नहीं रहा। फिर अंग्रेज़ी के कुछ नामचीन पत्रकार राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त को लाखों लोग क्यों फालो करते हैं। जबकि वही लोग उनके चैनल को भी फॉलो करते हैं।
यही नहीं दुनिया भर में सोशल मीडिया न्यूज़ चैनल को बदल रहा है। अब न्यूज़ चैनल ख़बरें देने के माध्यम के रूप में सिमटते जा रहे हैं। ख़बरों ने अपना अलग मदारी ढूंढ लिया है। तो क्या मुख्य धारा की मीडिया खत्म हो जाएगी? ऐसा नहीं होगा। हर तरह का माध्यम किसी न किसी रूप में कायम रहेगा। अब न्यूज़ चैनलों का काम यह होगा कि तमाम तरह की सूचनाओं में से प्रमाणिक सूचनाओं को देना। पिछले साल अगस्त में लंदन में दंगा हुआ। जब वहां दंगों के कारण और सोशल मीडिया की भूमिका की जांच के लिए कमेटी बनी तो उसने एक रिपोर्ट दी है। आफ्टर द रायट्स नाम से इस रिपोर्ट को आप गूगल में ढूंढ सकते हैं। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि दंगों या तनाव की स्थिति में लोग सोशल मीडिया पर कम निर्भर थे। वे स्थानीय रेडियो और टीवी पर ज़्यादा भरोसा कर रहे थे लेकिन रेडियो टीवी यह कर रहे थे कि वे सोशल मीडिया की अफवाहों को भी ख़बर बनाने लगे थे। उन्हें बदलना होगा। इस रिपोर्ट ने बताया कि कैसे दंगों के वक्त म्यूनिसिपल पुलिस के ट्वीटर अकाउंट पर लोगों की संख्या दस गुनी बढ गई।  यानी सूचनाओं के मामले में मीडिया की भूमिका अब भी है। लेकिन हो यह रहा है कि ट्वीटर और फेसबुक के लोग अब न्यूज़ रूम के संपादकों को सरकार या बाज़ार से ज़्यादा प्रभावित कर रहे हैं। उनकी दलीलें चैनल की लाइन बन जाती है। यह एक गंभीर चुनौती है। जिसे आप सोशल मीडिया की आलोचना से नहीं बल्कि अपने पेशेवर नियमों की सख्ती से ही सामना कर सकते हैं।
 हां सोशल मीडिया में अभिव्यक्ति की आज़ादी का ग़लत इस्तमाल भी हो रहा है। राजनीतिक और सांप्रदायिक संगठन अफवाहों को फैला रहे हैं। ऐसे दल तो सोशल मीडिया से पहले भी कर रहे थे। असम में पांच लाख विस्थापित हुए। सरकार की वजह से या सोशल मीडिया की वजह से। बंगलुरू में एस एम एस से घबराहट फैली उसके पीछे दंगों या तनाव के वक्त सरकार या प्रशासन की खराब भूमिका का इतिहास कारण नहीं रहा होगा। दिल्ली से लेकर गुजरात के दंगों तक कब प्रशासन ने लोगों को हिफाज़त की है। इसलिए माध्यम को टारगेट करने का खेल ट्वेंटी ट्वेंटी का गेम है। मानसिकता से लड़ाई लंबी है और लंबे समय तक लड़नी पड़ेगी। हम अभी भी सोशल मीडिया को समझ नहीं पा रहे हैं। इसे एक भूत बना लिया है।
 इस लेख को लिखने से पहले अभी अभी प्रकाशित एक किताब पढ़ रहा था। जिसका नाम है- म्यूज़िक ऑफ द स्पिनिंग व्हील, महात्मा गांधी मेनिफेस्टो फॉर द इंटरनेट एज। किताब अंग्रेज़ी में है और लिखा है खुद को बीजेपी का कार्यकर्ता कहने वाले सुधींद्र कुलकर्णी ने । अभी पूरी नहीं पढ़ी है लेकिन इसलिए इसके वैचारिक पक्ष पर टिप्पणी नहीं कर रहा हूं लेकिन यह किताब इंटरनेट के युग में गांधी के चरखों को ढूंढती हुई दलील दे रही है कि इंटरनेट ही गांधी का चरखा है। एक ऐसी तकनीक जो पूरी तरह से लोकतांत्रिक और अहिंसक। हालांकि अहिंसक बात से सहमत नहीं हूं मगर इंटरनेट वो चरखा तो है ही जिसे सब आसानी से चला सकते हैं। इसलिए सोशल मीडिया एक ऐसा समाज बना रहा है जो मीडिया से पहले का मीडिया भी हो सकता है। जब अख़बार और टीवी नहीं थे तब सूचनाएं कैसे पहुंचती थीं। बस रफ्तार पहले जैसी नहीं है। यही वो खूबी है जो सोशल मीडिया को उपयोगी और खतरनाक बनाती है। यहां पर हर दिन एक नया मीडिया अमीबा की तरह पैदा होता है जो अगले चंद दिनों में बिखकर नया अमीबा यानी नया मीडिया बन जाता है। आप इसे कब तक और किस किस कानून से रोकेंगे। इसका जवाब नहीं है मेरे पास। जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कई तरह के अगर मगर के साथ मिली है तो अभिव्यक्ति का कोई ऐसा मंच हो सकता है जो किसी अगर मगर के बग़ैर हो। यह बहस का विषय है। बौखलाहट में कदम उठाने का विषय नहीं है।
(यह लेख राष्ट्रीय सहारा के हस्तक्षेप में प्रकाशित हो चुका है)

हिन्दी पत्रकारिता का बानर काव्य भोलुम थ्री- मौलिक कवि रवीश एंकर टीभी वाले

बनरी लगती बोर है ,
बनरवा भाविभोर है,
ईद मुबारक केतना बोले,
ख़बर नहीं फिर भी बकते,
एंकरिया बोली ब्रेकिंग ब्रेकिंग,
एंकरवा बोला आयं आयं ,
केन्ने चल गया धायं धा़यं,
नूझ रूम में मची भगदड़,
एंकरिया बोली ऐज एन वेन कमिंग इन,
वी आर अपडेटिंग एवरीथिंग,
एंकरवा घुड़का चल बसंती ब्रेकिंग ब्रेकिंग,
बानर बनरी झूमे रे,
बकलोलवन दर्शक देखे रे,
का हो गया गान्ही के नेशन में ,
भगदड़ मच गई स्टेशन में,
टीभी पर चढ़ गया एंकर ,
लइका खानी बोला भयंकर,
आवे दे रेस्पोसिंबिल को,
गाड़ेंगे हम सबमर्सिबिल को,
सूखी गंगा हम नहीं सूखे,
सेव द नेशन टीभी स्टेशन,
बनरी बोली बुआ को,
ऐ काकी देखो हमको,
एंकरिया बन बन नाचूं मैं,
कान खुजाऊं लात लगाऊं,
ख़बरों की तो भात बनाऊ,
एंकरवा बन गिया एडिटर,
एंकरिया का बिगड़ा जूपिटर,
नो जस्टिस है नूझ रूम में ,
बाबू जस्टिस है कोर्ट रूम में,
एंकरवा गाया पार्टी राग,
दाँत चियारा मुँह बिगाड़ा,
तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा,
करते हैं ये चेंज प्रोफेशन,
भाड़ में जाए अपना नेशन,
यू आर वाचिंग टीभी नूझ,
वी आर टोकिंग नथिंग नूझ।
आ गए देखो मदारी मामा,
बजा के डमरू लजा के लबरू,
वही बाढ़ है वही खाज है,
मानवता पर बड़ी लाज है,
प्रजेंट इनडिफनिट में एंकरिया बोली,
पास्ट परफेक्ट में एंकरवा,
कहत कबीर सुनो भाई दर्शकू,
साधु मरिहन जोगी मरिहन,
मरिहन संत कबीर,
बेलमुंड ज्योतिष कहलन,
कबीरा मर गिया बाज़ार में,
बनके टीभी मरीज़।
मरिहन संत कबीर, ( हिन्दी पत्रकारिता का बानर काव्य भोलुम थ्री- मौलिक कवि रवीश एंकर टीभी वाले )

हिन्दी पत्रकारिता का लांग बानर काव्य- मौलिक कवि रवीश एंकर

एंकर बोला को-एंकरिया से,
ख़बरे नाच रहीं बिन सावन के,
कहीं डूबी है मुंबई,
ख़ूब सुखी है दुबई,
भागलपुर में मर गए चार,
औरंगाबाद में सब बर्बाद,
दे जवाब दे जवाब,
सोई साली उठ सरकार,
एंकरिया झूमी चारो ओर,
कैसा माहौल है यारा बोल,
ठीक ठाक है मुल्क बेहाल,
खंडन निंदा सब बेकार,
चल करते हैं भाएं भाएं,
भौंक भौंक के ख़बर सुनाए,
मोटका फोंटवा छरपत है,
पतरकी खबरवा सरकत है,
एंकरिया रूठी आन स्क्रीन,
वाय आम लुकिंग डल एंड थिन
मान मेरी एंकरिया जान,
बोला लंपट एंकरवा महान,
चल खेंले अब सवाल सवाल,
मिलके करें हम बवाल-बवाल,
बंट गया बक्से में इंसान,
एक बक्से से झांककर बोला,
ये पोलटिसन बड़ा बड़बोला,
एंकरी टपकी तड़ से बोली,
आय मीन आय मीन लिसन टू मी,
उस बक्से से झांकी मुंडी,
बोली दैड्स व्हाट आय वांट टू से,
एंकर कूदा भड़ भड़ से,
बट लेगें एक छोटा सा ब्रेक,
एंकरिया मुस्काई धीमे से,
नीचे ताकी हल्के से,
एंकरवा बोला झटके से,
बोल रे नेशन क्या है जवाब,
एंकरिया बोली नो जवाब नो जवाब,
ज़ोर का झटका धीरे से,
स्क्रीन पर टपका बिग कोच्चन,
क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों,
धर दीन्ही चदरिया ज्यों का त्यों
बंदर मामा फटा पजामा,
टीभी देखने आए थे,
लैनल चैनल लैनल चैनल,
टपकट टपकत पहुंचे थे,
हर चैनल पर कोच्चन है,
हर लैनल पर टोच्चन है
इस मुंडी को खींचे वो,
उस मुंडी को पहले दो,
भारी भरकम एंकर भयंकर,
हल्की फुल्की स्लिम एंकरिया
देख के बोली प्यारी बंदरिया
ए उस्ताद मुझको देख,
टीभी पर भी जमती हूं,
बनरा बोला मैं भी हूं,
दोनों लड़ गए आपस में,
बनरवा पकड़ा बनरिया को,
बनरिया नोची बनरवा को,
बक्से से निकली मुंडी,
बोली नो वन टौंकिंग टू मी,
चल बेटा ले ले ब्रेक,
एंकरवा बोला बट द कोच्चन इझ ग्रेट,
एंकरवा बोला मेरा आइडिया,
टीभी को हो गया डायरिया,
डायरिया से फिर मलेरिया,
एक ही मच्छर सबको काटा,
सब एंकरवा झाड़ा फिरता,
बहस बहस बहस बहस,
तहस नहस तहस नहस
आय अम आस्किंग ऐसा कोच्चन,
पूछ न सके जो जावेद बच्चन,
मैं हूं एंकर सबसे महान,
मुंडी मुंडी भर दी दुकान,
आओ मदारी तुम भी देखो,
तुमरे बानर तुमरे गान,
लल्ला लल्ला लल्ला लल्ला,
एंकरिया बोली,
हह्हा हह्हा हह्हा हह्हा,
( हिन्दी पत्रकारिता का लांग बानर काव्य- मौलिक कवि रवीश एंकर, कौमा का प्रयोग इसलिए किया गया है ताकि पंक्तियां आपस में मिल न जाएं. कोच्चन का मतलब क्वेश्चन है. मैंने न्यूज़ चैनल कभी नहीं लिखता। मुझे ये नूझ लैनल ही दिखाई सुनाई देते हैं। )

पुरानी जीन्स और हथियार...

क्या आपको नीले रंग वाली जीन्स पतलून से डर लगता है? क्या जीन्स को लेकर आप भी आधुनिकता को गंदा या भद्दा समझते हैं? क्या जीन्स को लेकर आपने भी कभी न कभी सोचा है कि यह लड़कियों के लिए नहीं है। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो ज़रूरी नहीं कि आप बिल्कुल खाप मानसिकता के ही है लेकिन यह ज़रूर है कि आप एक ऐसे कपड़े का विरोध कर रहे हैं जिसे पहनने के बाद लड़कियों की आज़ादी खास रूप से नज़र आने लगती है जो आपको खाप में बदल देती है। पहनावा एक ऐसा आखिरी मुकाम है जिसपर आप प्रतिबंध के नाम पर आधुनिकता को यानी लड़कियों को काबू में रखना चाहते हैं। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो कुछ भी ग़लत नहीं क्योंकि आपको किसी ने बताया ही नहीं कि आपकी सोच में बुनियादी गड़बड़ी है। हमारे देश में कपड़ों का रिश्ता जाति,त्योहार से लेकर इलाका और मौसम सबसे रहा है। ऐसे में जीन्स एक ऐसा कपड़ा है जो इन सब सीमाओं या खांचे को पार करता हुआ हर तबके के पहनावे के रूप में कायम हो जाता है। जीन्स सिर्फ एक आधुनिक कपड़ा नहीं बल्कि असामनता को विशेष रूप से उभारने वाले इस आधुनिक दौर में बराबरी का एक ऐसा रूपक है जो अमीर से लेकर ग़रीब सबके बदन पर है। यही नहीं यह एक ऐसा कपड़ा है जिसका कोई जेंडर यानी लिंग नहीं है।

जीन्स का उदय अमरीका में हुआ। उन्नीसवीं सदी के मध्य में यह पहनावे के रूप में प्रचलित होने लगी। १८५० के आस पास कैलिफोर्निया में सोने की खदाने मिलने से वहां एक किस्म की भगदड़ सी मची । जिसे गोल्ड रश के नाम से जाना जाता है। यहां के खान मज़दूरों को विशेष कपड़े की ज़रूरत थी। इसी दौरान एक जर्मन नौजवान वहां पहुंचता है और कैनवस के कपड़ों से पतलून बनाने लगता है। १८७३ में लेवी स्त्रास ने अपनी डेनिम जीन्स का पेटेंट करा लिया और कंपनी कायम कर दी। १३९ साल के सफर में डेनिम जीन्स ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं। १९५० के दशक में अमरीका के स्कूलों में भी जीन्स पहनने पर रोक लगी थी। वहां भी जीन्स का विरोध हो रहा था। लेकिन १९६० तक आते आते यह विरोध धीमा पड़ने लगा। उसी दौरान एक फिल्म रिबेल विदाउट काज़ आती है और जीन्स फैशन में आ जाता है। मज़दूरों का कपड़ा पर्दे के नायक का कपड़ा बन जाता है। हमारे हिन्दुस्तान में जीन्स का आगमन यहां के उन कुलीनों के ज़रिये होता है जो महानगरों के खास इलाकों तक ही सिमटे रहे। अमेरिका में जीन्स मज़दूरों से मालिकों और युवाओं तक पहुंची। हिन्दुस्तान में जीन्स मालिकों से मज़दूरों तक पहुंची। इसमें दिल्ली के मोहनसिंह प्लेस और करोलबाग का बड़ा योगदान रहा है। कनाट प्लेस स्थित मोहनसिंह प्लेस सस्ती जीन्स का खदान बन गया। वहीं से उन लोगों ने जीन्स पहनने का तज़ुर्बा किया जो ब्रांड वाली महंगी जीन्स नहीं खरीद सकते थे। बदलते शहर,काम की प्रकृति के कारण हिन्दुस्तान भर से आए प्रवासी छात्रों और मज़दूरों को जीन्स की शरण लेनी पड़ी। जीन्स उनके आधुनिक होने की पहचान बन गई।

लेकिन क्या हमारे समाज में जीन्स का विरोध हुआ ही नहीं। ऐसा नहीं है। जीन्स को लेकर हमेशा से तकरार होती रही है। हमारे ही मित्र जीन्स अपने मां बाप से छिप कर पहनते थे। नब्बे के दशक में जब हम बिहार से दिल्ली आ रहे थे तब कई छात्रों के माता पिता ने कहा था कि जीन्स मत पहनना। लोफर पहनते हैं। शायद जिप्सियों पर बनी हरे रामा हरे रामा जैसी फिल्मों ने जीन्स की छवि ऐसे लोगों में बिगाड़ दी होगी। ऐसी चेतावनी मुझे भी मिली थी। लड़कियों को भी जीन्स पहनने पर ऐसी टिका टिप्पणी सुननी पड़ी है। आप चाहें तो जीन्स पहनने के अपने निजी प्रसंगों को इस लेख के साथ याद कर सकते हैं। यह एक छिटपुट विरोध भर था। हमारे देश एक तबके में जीन्स बागी प्रवृत्ति वाले नौजवाने से कम, बिगड़ैल प्रवृत्ति के युवाओं से जोड़ कर देखा गया है। बाद में यह आसानी से स्वीकृत भी होता गया। आज के सभी हीरो जीन्स ही पहनते हैं। अमिताभ,जीतेंद्र,मिथुन के दौर में पतलून का चलन था। इसलिए हर दर्जी उनकी पतलून की कापी करता था। पतलून की जेब से लेकर मोहरी तक फैशन बन जाया करती थी। बेल बाटम्स से लेकर पतली मोहरी का चलन हो जाता था। जीन्स में कापी करने के लिए कुछ नहीं है। आप सलाम नमस्ते या काकटेल देखने के बाद चाहें तो जीन्स का कोई भी ब्रांड खरीद ले। इतनी भयंकर समानता किसी और प्रकार के कपड़े में नहीं है। इसीलिए जीन्स का ब्रांड महत्वपूर्ण होता है। जीन्स ब्रांड के नाम से ही अलग दिखती है।

जीन्स के कपड़े की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह किसी भी प्रकार के अंतर को समाप्त कर देती है। हुआ यह है कि गांव गांव से महानगरों में पहुंचे मज़दूरों ने बड़ी संख्या में दर्ज़ी की बनाई पतलून या फैक्ट्री की सिली हुई पतलून को त्याग दिया है। अब आप ईद या होली के मौके पर दर्ज़ियों के पास जाकर देखें। पतलून की सिलाई कितनी कम हो गई है। ज्यादातर टेलर लेडीज टेलर होकर रह गए हैं। इन मज़दूरों के साथ गांव गांव में जीन्स पहुंचा है। सस्ती और टिकाऊ होने के कारण मर्द ही इन्हें अपने इलाके में लेकर गए हैं। गांवों में लड़कियों तक जीन्स मर्दों के ज़रिये पहुंचा है। इसी चस्के ने जीन्स का देसी बाज़ार तैयार किया और नकली ब्रांड वाले जीन्स मेले से लेकर ठेले तक पर बिकने लगी। इस कपड़े ने गांवों की सीमा के भीतर लड़के और लड़कियों के बीच पहनावे के अंतर को समाप्त कर दिया है। यह कैसे हो सकता है कि वो हर चीज़ों में लड़के लड़कियों के बीच अंतर करें और पहनावे का भेद इतनी आसानी से मिट जाए।

जिस तरह से जीन्स शहरों में वक्त,परिवहन के संसाधन, पानी की उपलब्धता आदि कारणों से सुलभ हुई,गांवों में भी इन्हीं कारणों से प्रचलित हो रही है। हमारे समाज में लड़कियों को मारा जा रहा है तो दूसरी तरफ लड़कियां लड़कों से कई मामलों में तेज़ी से बदल भी रही है। उनकी गतिशीलता से गांव के बुजुर्ग या लड़के परेशान होने लगे हैं। वो अब बहाने ढूंढ रहे हैं। मोबाइल और जीन्स नए बहाने हैं जिनके ज़रिये लड़कियों पर नियंत्रण की कोशिश हो रही है। जीन्स उन्हें चुनोती दे रही है। जीन्स का विरोध और बुर्के पहनने पर ज़ोर एक ही मानसिकता की देन है। जिस्म का कोई हिस्सा न दिखें। इस बात पर कोई ज़ोर नहीं कि देखने का वैसा नज़रिया कपड़े की सिलाई से आता है या दिमाग़ की किसी बुनावट से। तभी तो सिर्फ लड़कियों के जीन्स पहनने पर रोक लगी। लड़कों पर नहीं।

इसलिए आसान है कि जीन्स को जला दें। मुज़फ्फरनगर के दूधाहेड़ी गांव में जीन्स की होली जलाई गई। गांव की सरपंच की पोतियां ही कहती मिलीं कि हम तय करेंगी कि क्या पहने। लेकिन वहां पुरुषों का दबाव इतना कि सारी लड़कियों को जीन्स देनी पड़ी होलिका दहन के लिए। लेकिन उन्होंने अपनी आज़ादी नहीं सौंपी है। वो कह रही हैं कि नौकरी की ज़रूरत के मुताबिक हम कपड़े पहनेंगे। बंगलौर या दिल्ली जायेंगे तो ये हमें बतायेंगे कि क्या पहनें। ज़रूरी है कि हम कपड़े की मानसिकता को भी पहने। जीन्स जल गई लेकिन आज़ादी और बराबरी की चाहत बाकी है जो जगह बदलने या वक्त गुज़रने के साथ पूरी कर ली जाएगी। यानी जीन्स की संभावना अब भी गांवों के लिए बची है।

लेकिन हैरानी हुई कि हमारा आधुनिक समाज जो पश्चिम की आधुनिकता को बेशर्मी से जीता है उसके विरोध के नाम पर अभी भी ढोंग करता है। स्वदेशी आंदोलन के वक्त विदेशी कपड़े जलाए गए थे। वो सिर्फ कपड़े का विरोध नहीं था बल्कि उस मानसिकता का विरोध था जो हमें उस सत्ता का उपनिवेश बनाती थी जिसकी गुलामी हम पहनकर चल रहे थे। गांधी ने हमें उस मानसिकता से आज़ाद कर दिया था। लेकिन क्या अब जीन्स को उस नज़र से देखा जा सकता है। क्या यह विदेशी कपड़ा है? नहीं है। यह देसी कपड़ा भी है। इसके पहनने से कोई अच्छा बुरा नहीं होता। खादी का क्या करेंगे। खादी पहनने वाले कई लोग लाखों करोड़ों का घोटाला कर जाते हैं। क्या अब खादी की भी होली जलेगी इस देश में? जीन्स एक शानदार और बराबरी का पहनावा है। आपके पास कोई पुरानी जीन्स हो तो निकालें और पहनें।
(शुक्रवार को यह लेख राजस्थान पत्रिका में छपा था)

मैं देश को गुजरात का नमक खिलाता हूं- नरेंद्र मोदी

(शाहिद सिद्दीकी चार दलों में रह चुके हैं। पूर्व सांसद हैं। साप्ताहिक उर्दू अख़बार के संपादक भी हैं। उन्होंने नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू किया है। सवाल जवाब शुरू होने से पहले इंतनी लंबी प्रस्तावना लिखी है। शायद उन्हें विवाद का अहसास होगा। उससे ज़्यादा यह अहसास होगा कि उनकी नीयत पर भी सवाल उठेंगे। इसलिए ये सारी बातें लिखीं हैं। छह पेज का इंटरव्यू है इसलिए टाइप करने में वक्त लगेगा मगर धीरे धीरे करके यहां डालता जाऊंगा ताकि आप हिन्दी में इस महत्वूपूर्ण इंटरव्यू को पढ़ सकें।)


दो हफ्ते पहले की बात है मैं हेमा की बेटी की शादी में शिरकत के लिए मुंबई गया था। शाम को हम बांद्रा के एक फ्लैट में बैठे थे। हमारे साथ महेश भट्ट,सलमान ख़ान के वालिद सलीम ख़ान और सनतकार(उद्योगपति) ज़फ़र सरेसवाला थे। बातों बातों में गुजरात का तस्करा(ज़िक्र) निकल आया। मोदी के ज़ुल्मों सितम की, गुजरात के मुसलमानों से नाइंसाफियों की बातें निकल आईं। सलीम ख़ान कहने लगे कि शाहिद साहब आपने दुनिया भर के लोगों का इंटरव्यू किया है, कभी नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू नहीं लिया। मैंने कहा कि मोदी हमें कभी इंटरव्यू नहीं देगा। नई दुनिया मोदी का सबसे बड़ा मुख़ालिफ़(विरोधी) है और मैं हर टीवी चैनल पर उसके ख़िलाफ़ बोलता हूं। महेश भट्ट बोले कि कोशिश कीजिए क्योंकि हमारे सामने मोदी की राय सामने नहीं आई है। नरेंद्र मोदी भी मीडिया से दूर भागता है और मीडिया भी मोदी की बात नहीं सुनना चाहता। मैंने ज़फ़र से कहा कि कोशिश करके देख लो और राज़ी हो जाएं तो मुझे कोई एतराज़ नहीं है। मैंने १९७७ में इंदिरा गांधी का इंटरव्यू उस वक्त किया था जब आपातकाल के ख़ात्मे के बाद सब उन्हें नफ़रत की निगाह से देखते थे। इंदिरा गांधी क्या सोचती थी, क्या चाहती थी यह पहली बार दुनिया के सामने मैंने पेश किया था। मैंने अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी का भी इंटरव्यू लिया। ये तो सहाफ़ी(पत्रकार) का फ़र्ज़ है। ख़ासतौर से जो मुख़ालिफ(विरोधी) है, बदनाम है, जिसकी राय से इख़्तलाफ़(असहमति) रखते हैं उसकी सोच तो हमारे सामने आनी चाहिए।

एक हफ्ता बाद मुझे संजय बावसर का फोन आया, जो नरेंद्र मोदी के सचिव हैं। उन्होंने मुझे मोदी का इंटरव्यू करने की दावत दी। मैंने कहा कि मेरी शर्त पर। पहले यह कि मोदी मेरे हर सवाल का जवाब देंगे। दूसरे ये कि मैं जो चाहूंगा उनसे सवाल करूंगा । मोदी के बारे में जानता हूं कि उन्होंने कई बार टीवी चैनलों को इंटरव्यू देते हुए किसी सवाल से नाराज़ होकर बीच में ही इंटरव्यू ख़त्म कर दिया। मैं जानता था कि मेरा इंटरव्यू कड़ा होगा,मेरे हर सवाल हिन्दुस्तान के सेकुलर इंसान के ज़हन में उठने वाले सवाल होंगे। क्या नरेंद्र मोदी इन सवालों को बर्दाश्त करेंगे। अगले दिन फिर संजय का फोन आया कि मोदी जी राज़ी हैं। आप कब आयेंगे। मेरे दिन में कशमकश थी कि मैं मोदी का इंटरव्यू करूं या न करूं। आख़ारकार मैंने फ़ैसला किया कि अपने सवाल रखने में क्या हर्ज़ है।

गांधीनगर में वज़ीरेआला की रिहाइश बहुत खामोश और पुरसकून इलाके में हैं। मोदी की रिहाइश में आम नेताओं वाली गहमा गहमी नहीं थी। हर चीज़ बहुत सिस्टम से थी। मोदी ने मेरी इंटरव्यू की वीडियो फिल्म बनाने का फैसला किया था। उसे टेप करने का फैसला किया था ताकि मैं उनकी कही बातों में कोई मिर्च मसाला न लगाऊं। आधी आस्तीन के गुलाबी कुर्ते में नरेंद्र मोदी मेरे सामने बैठे थे। एक शख़्स जिसे डिक्टेटर कहा जाता है, हिटलर भी, मुस्लिम दुश्मन और फ़िरकापरस्त भी। मोदी के होठों पर मुस्कुराहट थी। मगर उनकी आंखें नहीं मुस्कुरा रही थीं। मोदी ने वादे के मुताबिक मेरे तमाम सवालों के जवाब दिये। मगर बहुत से सवाल वो टाल गए,अपना दामन बचा गए। मोदी बहुत मंझे हुए सियासतदान और निहायत तज़ुर्बेकार खिलाड़ी की तरह मेरे हर बाउंसर से बचने की कोशिश कर रहे थे। मैं मोदी के बहुत से दलायल(दलील) से कत्तई सहमत नहीं हुई, उनके जवाबात से मुतमईन नहीं हूं मगर इनका इंटरव्यू जैसा है वैसा पेश कर रहा हूं ताकि आप मोदी की सोच और उसके ज़हन से वाक़िफ़ हो सकें। इंशाअल्ला अगले हफ्ते मोदी के इंटरव्यू पर अपना विश्लेषण पेश करूंगा। मोदी के सच और झूठ को बेनकाब करूंगा और फिलहाल आप नरेंद्र मोदी का पहली बार किसी उर्दू अख़बार को दिया गया तफ़्सीली इंटरव्यू मुलाहिज़ा फरमायें।

हिन्दू राष्ट्र-

शाहिद सिद्दीकी- नरेंद्र मोदी जी आपका हिन्दुस्तान का तसव्वुर क्या है। क्या आप हिन्दुस्तान को एक हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं, अगले पचास बरस में आप कैसा हिन्दुस्तान बनाना चाहते हैं ?

नरेंद्र मोदी- हम खुशहाल भारत देखना चाहते हैं। एक मज़बूत भारत देखना चाहते हैं। इक्कसवीं सदी भारत की सदी हो यह हमारा सपना है जिसे साकार करना है।

शाहिद-कहा जाता है कि आप गुजरात को हिन्दूराष्ट्र की तज़ुर्बागाह की तरह इस्तमाल कर रहे हैं। अगर आप मरकज़ में पीएम बन कर आ गए तो आप भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहेंगे। इसमें मुसलमानों और दूसरे अक्लियतों की क्या जगह होगी?

मोदी- पहली बात तो यह कि आज गुजरात में अक्लियतों की जो जगह है वो पूरे मुल्क के मुकाबले ज़्यादा अच्छी है। दूसरे और बेहतर होने की गुज़ाइश इतनी ही है कि जितनी किसी हिन्दी की। मुसलमानों को भी आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए जितना किसी हिन्दू को। अगर नफ़रत हो तो एक घर भी नहीं चल सकता। एक बहू अच्छ लगे और दूसरी न लगे तो घर में सुकून नहीं हो सकता।

शाहिद-मान लीजिए कि घर में चार बच्चे हैं। इनमें से किसी वजह से एक कमज़ोर है। पिछड़ा है तो क्या इस पर ज़्यादा तवज्जो नहीं होनी चाहिए। क्या आगे बढ़ने के बेहतर मौके नहीं मिलने चाहिए

मोदी- ये तो हमारे आईन ने भी कहा है।जो कमज़ोर है, पिछड़ा है,उसे अलग से सहारा मिलना चाहिए। अगर समाज इसकी ज़िम्मेदारी नहीं उठायेगा तो कौन उठायेगा। मान लीजिए एक ज़हनी तौर पर कमज़ोर बच्चा है तो उसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ मां बाप की नहीं बल्कि पूरे समाज की है। अगर हम ये कहें कि तुम्हारे घर पैदा हुआ सिर्फ तुम संभालो तो यह ग़लत होगा।

मुसलमानों के लिए रिज़र्वेशन-

शाहिद- इस मुल्क में जितने सर्वे हुए हैं चाहे सच्चर या रंगनाथ कमीशन, सबका कहना है कि खासतौर पर मुसलमान ज़िंदगी के हर मैदान में खुशुसन तालीम में, इक्तसादी मैदान में बहुत सी वज़ूहात के बिना पर पिछड़ गए हैं। आपके ख़्याल में इन्हें आगे लाने के लिए,इनका हक़ दिलाने के लिए क्या कदम उठाने चाहिए। क्या इन्हें रिज़र्वेशन नहीं मिलना चाहिए। जबकि पचास फ़ीसदी नौकरियां रिज़र्वेशन में चली गईं हैं। बाकी पचास फीसद में मुसलमान पीछे रह जाते हैं। इसके लिए सभी दरवाज़े बंद हैं। इसे आगे लाने के लिए क्या करना चाहिए?

मोदी-ऐसा नहीं है। गुजरात में ओबीसी में छत्तीस मुस्लिम बिरादरियां हैं ऐसी हैं जो पिछड़ों में आती हैं। उन्हों वो तमाम रियायतें मिलती हैं जो दूसरे पिछड़ों को मिलती हैं, मैं भी पिछड़ी जाति से हूं। हमें रास्ता ढूंढना होगा। इसमें सबको हिस्सेदारी मिले। जैसे आज स्कूल है, टीतर हैं इसके बावजूद लोग अनपढ़ हैं। इसका हल हमने गुजरात में ढूंढा। हमने तहरीक चलाई कि गुजरात में सौ फीसद लड़कियों को तालीम मिले। सौ फीसद का मतलब सौ फीसद। जून के महीने में जब बहुत गर्मी होती है तो सारे अफसर सारे वज़ीर सारी सरकार एक हज़ार आठ सौ गांवों में घर घर जाते हैं ये देखते हैं कि सारी लड़कियां पढ़ रही हैं। आज ९९ फीसद से ज्यादा लड़कियां स्कूल में हैं। इसमें हर मज़हब की लड़की है। पहले ड्राप आउट चालीस फीसद था। आज वो मुश्किल से दो फीसद रह गया है। अब इसका फायदा किसको मिल रहा है। मेरी हिन्दू मुस्लिम फिलासफी नहीं है। मैं तो यह देखता हूं कि गुजरात में रहने वाले हर बच्चे को इसका फायदा मिले। मेरी दस साल की कोशिश में सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है जब मैं किसी हिन्दू स्कूल में वाल्दैन की मीटिंग बुलाता हूं तो वहां साठ फीसदी वाल्दैन आती हैं। अगर मैं किसी मुस्लिम इलाके में मीटिंग करता हूं तो सौ फीसद वाल्दैन आती हैं और इसके अलावा और भी लोग आ जाते हैं।

मुसलमान ज़्यादा जाग रहे हैं-

शाहिद- आपने मुस्लिम इलाकों में ऐसी मीटिंगे की?

मोदी- बिल्कुल, ढेर सारी। बल्कि मेरा तज़ुर्बा यह है कि आज मुसलमान तालीम के ताल्लुक से ज़्यादा जागे हुए हैं। अभी आपको बताऊं कि दाता के पास एक गांव में गया, वो सत्तर फीसद मुस्लिम आबादी का था, तीन बच्चियों ने कहा कि हमें अलग से बात करनी हैं। मुझे पता नहीं था कि वो किस मज़हब से हैं। सातवीं आठवीं की बच्चियां थीं। मैंने सबको बाहर निकाल कर इनसे बात की। वो तीनों मुसलमान लड़कियां थीं। उन्होंने कहा कि हम आगे पढ़ना चाहते हैं। मगर हमारी वाल्दैन अनुमति नहीं देती हैं। आप इन्हें समझाइये। इसी बात ने मेरे दिल को छुआ कि मेरे सूबे में तीन लड़कियां ऐसी हैं जो आगे तालीम हासिल करने के लिए सीएम तक से कहने  और मदद लेने में झिझक नहीं रही हैं। मैंने इनके मां बाप को कहलवाया कि मान जायें। ये दो साल पहले की बात है। मगर ये दोनों लड़कियां आज पढ़ रही हैं।

शाहिद- आप ठीक कहते हैं कि पिछड़ों में मुसलमान को हिस्सा तो दिया गया है मगर मंडल के आने के बाद से पिछले बीस बरस में यह बात सामने आई है कि मुसलमान को इसमें इनका हक नहीं मिलता। मिसाल के तौर पर दस नौकरियां हैं और अप्लाई करने वाले पांच सौ।

मोदी- भारत के आईन बनाने वालों ने गहराई से जायज़ा लिया था कि मज़हब के बुनियाद पर कोई रिज़र्वेशन नहीं होना चाहिए। ये ख़तरनाक होगा । उस वक्त आर एस एस और बजरंग दल वाले नहीं थे।

शाहिद- मुस्लिम लीडर यहां तक कि मौलाना आज़ाद ने भी धर्म के नाम पर मुख़ालफ़त की थी, पिछले चौंसठ बरस के तुज़ुर्बे से यही सीखना भी चाहते हैं। चौंसठ बरस बाद रिज़र्वेशन देते हैं तो इसमें आपको क्या परेशानी है
मोदी- नहीं नहीं, ये वो बदलाव नहीं है। ये एक बुनियादी बात है। आईन के बुनियादी ढांचे में कोई तब्दिली नहीं हो सकती है। मगर मैं दूसरी बात कहता हूं । जिन सूबों को आप तरक्की पसंद और सेकुलर कहते हैं वहां नौकरियों में मुसलमान दो चार फीसद हैं। गुजरात में मुसलमान आबादी का नौ फीसदी और नौकरियों में बारह तेरह फीसद।

शाहिद- गुजरात में मुसलमान पहले से ही आगे थे , आपने ऐसा कोई कारनामा नहीं किया

मोदी- चलिये आपकी बात मान ले। पिछले बीस बरस से गुजरात में बीजेपी की हुकूमत है। अगर हम इन्हें बर्बाद कर रहे होते तो क्या वो इतने आगे होते। अगर हमारा रवैया मुस्लिम मुख़ालिफ़ था तो बीस बरस में पिछड़ जाते। सच्चर का सर्वे हैं। वो तो तब हुआ जब यहां मेरी हुकूमत थी। गुजरात में ८५ से ९५ कत सरकारी नौकरियों में भर्ती बंद थी। भर्ती तो मेरे ज़माने में हुई। कुल छह लाख सरकारी नौकरियों में से तीन लाख मेरे दौर में भर्ती हुए।

शाहिद- क्या आपके ज़माने में जो भर्ती हुए उनमें दस फीसद मुसलमान थे

मोदी- नहीं मैंने हिसाब नहीं लगाया। ये मेरी फिलासफ़ी नहीं है। न ही मैं हिन्दू मुसलमान के बुनियाद पर हिसाब लगाऊंगा। मेरा काम है बिना किसी भेदभाव के सबको मौका देना। अगर वो मुसलमान हैं तो उसे मिलेगा। हिन्दू है या पारसी है तो उसे मिलेगा। अगर आप सच्चर की हर बात पर यकीन करते हैं तो फिर सच्चर ने मेरे ज़माने की गुजरात पर जो रिपोर्ट दी है इस पर भरोसा क्यों नहीं करते।

दंगों में क्या हुआ-

शाहिद- अब हम गुजरात फ़सादात की तरफ़ आएं, इस दौरान क्या हुआ, गोधरा में जो लोग जले उनकी लाशों को अहमदाबाद क्यों लाया गया, क्या आपको अंदाज़ा नहीं था कि इसके नतीजे क्या होंगे ?

मोदी-इस सवाल का जवाब मैंने एस आई टी और सुप्रीम कोर्ट को भी विस्तार से दिया है। कोई भी लाश होगी तो उसे वापस तो देना होगा। जहां सबसे ज़्यादा तनाव है,वहां कोई लाश ले जा सकता है? तनाव गोधरा में था। इसलिए वहां से जली लाशें हटानी ज़रूरी थीं। ये पैसेंजर कहां जा रहे थे, ये ट्रेन अहमदाबाद जा रही थी। इनके लेने वाले सब अहमदाबाद में थे। आप बताइये, आपके पास इनके ख़ानदान की लाशें हवाले करने का क्या तरीका था?

शाहिद- आप किसी अस्पताल में लाकर खामोशी से रिश्तेदारों को हवाले कर देते, उन्हें घुमाया क्यों गया

मोदी- आप सच्चाई सुन लीजिए। इतनी लाशें रखने की गोधरा में जगह नहीं थी, लाशें वहां से हटानी थी, इंतज़ामिया(प्रशासन) ने सोचा कि रात के अंधेरे में लाशें हटाईं जाएं,उन्हें उसी रात वहां से हटाया गया, अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में ला सकते थे, वो भीड़ भाड़ का इलाका था, वहां तनाव पैदा होता। ये इंतज़ामिया की समझदारी थी कि तमाम लाशों को शोला के सिविल अस्पताल में लाया गया। शोला उस वक्त अहमदाबाद के बाहर था, जंगल था, आज तो वहां ज़िंदगी पैदा हो गई है, शोला से कोई जुलूस नहीं निकला। लाशें खामोशी से रिश्तेदारों के हवाले कर दी गईं थीं। इनमें से १३-१४ लाशें थीं जिनकी पहचान नहीं हो सकी, इनका भी खामोशी से शोला अस्पताल के पीछे दाह संस्कार कर दिया गया। इतनी एहतियात बरती गई मगर अब झूठ चल पड़ा है।

दंगे क्यों नहीं रूके?

शाहिद- इसके बाद पूरे गुजरात में दंगे भड़क उठे, लोग मारे जा रहे थे, घर जलाये जा रहे थे, आप गुजरात के वज़ीरे आला थे, आपको ख़बर तो थी कि अहमदाबाद में क्या होरहा है। आपने इस ख़ून ख़राबे को रोकने के लिए क्या कदम उठाए

मोदी- इसके लिए सबसे पहला काम हमनें लोगों को अमन शांति बनाए रखने की अपील की, ये काम मैंने गोधरा से ही किया, इसके बाद अहमदाबाद आकर शाम को रेडियो टीवी से अपील की(क्या कहा गया इसकी कापी मुझे दी गई) मैंने इंतज़ामिया से कहा कि जितनी पुलिस फोर्स है, सबको लगाओ। हालांकि इतना बड़ा वाकया था कि पूरे मुल्क में पहले ऐसा नहीं हुआ था, एक वक्त वो था कि पहले वाक्या होता था, तो अखबार में दूसरे दिन खबर आती थी। फोटो आने में दो दिन लग जाते थे। इतने में एहतियाती कदम उठाने का मौका मिल जाता था। फोर्स भेजने का मौका मिल जाता था। आज टीवी पर वाकये की चंद मिनटों में ख़बर आ जाती है। तस्वीरें दिखाईं जाने लगती हैं। प्रशासन को आज टीवी के स्पीड से मुकाबला करना पड़ता है। अहमदाबाद से बड़ौदा फोन तो मैं चंद मिनटों में कर सकता हूं मगर पुलिस फोर्स भेजनी हो तो दो घंटे तो कम से कम लगेंगे। पुलिस फोर्स टीवी न्यूज़ से मुकाबला नहीं कर सकती। दूसरे मुल्क के दंगों से मैं इसका मुआज़ना(तुलना) करूंगा, जायज़ ठहराने के लिए नहीं। मैं इस बात में यकीन नहीं रखता कि १९८४ में दिल्ली में जो हुआ,इसलिए हमारे यहां हुआ, तो आखिर बात क्या है, मैं इस सोच में यकीन नहीं रखता । दंगा दंगा है। देखिये १९८४ का दंगा हुआ, एक भी गोली नहीं चली, एक भी लाठी चार्ज नहीं हुआ, लाठी चार्ज उस जगह हुआ जहां इंदिरा गांधी की डेड बाडी रखी थी, वहां इतनी भीड़ जमा हो गई थी कि उसे कंट्रोल करने के लिए लाठी चार्ज हुआ। दंगा रोकने के लिए पुलिस का इस्तमाल नहीं हुआ। गुजरात में २७ फरवरी को ही कितनी जगह गोली चली, कर्फ्यू लगाया गया लाठी चार्ज हुआ, कार्रवाई हुई।
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शाहिद सिद्दीक़ी- कहा जाता है कि आप मुल्क़ के वज़ीरे आज़म बनने की तैयारी कर रहे हैं, आप गुजरात से निकल कर कौमी सियासत की ज़िम्मेदारी संभालना चाहते हैं। अगर मुल्क़ के वज़ीरे आज़म बनें तो पांच अहम काम क्या करेंगे।

नरेंद्र मोदी- देखिये मैं बुनियादी तौर पर संगठन का आदमी हूं। कुछ ख़ास हालात में वज़ीरे आला बन गया। ज़िंदगी में मैंने कभी किसी किसी स्कूल के मोनिटर का भी चुनाव नहीं लड़ा। मैं तो कभी किसी का इलेक्शन एजेंट भी नहीं बना। मैं तो इस दुनिया का आदमी भी नहीं हूं। न हीं मेरा इस दुनिया से कोई लेना-देना है। आज मेरी मंज़िल है ६ करोड़ गुजराती । उनका सुख,उनकी भलाई। मैं अगर गुजरात में अच्छा काम करता हूं तो यूपी बिहार के दस लोगों क नौकरी लगती है। मैं हिन्दुस्तान की सेवा गुजरात की तरक्की के ज़रिये करूंगा। गुजरात में नमक अच्छा होगा तो सारा देश गुजरात का नमक खायेगा। मैंने गुजरात का नमक खाया है और सारे देश को गुजरात का नमक खिलाता हूं।

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शाहिद सिद्दीकी- आप देश के मुसलमानों को क्या पैग़ाम देना चाहेंगे ?

नरेंद्र मोदी-भाई मैं तो बहुत छोटा इंसान हूं । मुझे किसी को पैग़ाम देने का हक़ नहीं है । ख़ादिम हूं । ख़िदमत करता हूं । मैं अपने मुस्लिम भाइयों से कहना चाहूंगा कि वो दूसरे के लिए वोट बैंक बनकर न रहें । आज हिन्दुस्तान में मुसलमान को एक वोटर बना दिया गया है । हम इन्हें जीते जागते इंसान के रूप में देखना चाहते हैं । मुसलमान ख़्वाब देखें ...। उनके ख्वाब बच्चों के ख़्वाब पूरे हों । वो वोटर रहें और अपने वोट का खुलकर इस्तमाल करो मगर इसके आगे एक इंसान एक भारतीय के रूप में देखा जाए । उनकी तकलीफ को समझा जाए । मैं अगर उनके किसी काम आ सकता हूं तो आऊंगा मगर उन्हें भी खुले दिमाग़ से सोचना होगा, देखना होगा ।

हम भी अगर गट्टू होते....

गट्टू एक ऐसी फिल्म है जो हमारे भीतर के गट्टू को खोजती है। उससे मिला देती है। खोया बचपन लौटा देती है। जो आज के बच्चे हैं उन्हें एक ऐेसे बचपन से मिला देती है जिससे वो अपार्टमेंट की कैद दुनिया के कारण अनजान हो चले हैं। उनके जीवन में कोई पड़ोस नहीं है। उनके जीवन में कोई छत नहीं है। उनके जीवन में वो सब कबाड़ नहीं है जिनके चुरा लेने और उड़ा लेने से खेल बन जाता था। पतंग उड़ाना सबसे सरल और रचनात्मक काम है। यह फिल्म हमारे जीवन में पतंगों को ले आती है जो अब भी देश के कई अंचलों और महानगरों के ख़ास मोहल्लों में बची है। पतंग सिर्फ आसमान की खोज नहीं कराती बल्कि आसमान की तरफ देखती आंगन की तरह पसरी छतों से भी रिश्ता बनाती है।

गट्टू फिल्म देख रहा था तो खुद की गट्टू काल की यादें ताज़ा होने लगीं। पतंग उड़ाने की चाह में न जाने कितनी बार धूल उठाकर हवा का रुख़ पता करने की कोशिश की होगी। फिल्म देखने से पहले आज वही करने लगा। एसी चलाना था लेकिन नीचे किसी की प्राडो कार खड़ी होती है और उन्हें शिकायत होती है दसवीं मंज़िल से उतरती बूंदें उनकी कार के शीशें की शोखियां ख़राब कर देती हैं। फिल्म जाने से कुछ घंटे पहले धूल उठायी और हवा में छोड़ दी। फिर जाकर एसी चलाया। पर्दे पर यह काम देखकर इतना मज़ा आया कि पूछिये मत। पटना के कदमकुआं में मंझा और पतंग की दुकानें होती थीं। बब्बू वहीं से लाता था और बाज़ी मार ले जाता था। जब पता चला तो हम भी सायकिल से कदमकुआं गए थे। एक्जीबीसन रोड होते हुए। गांधी मैदान में भी जाकर पतंग उड़ाने की कोशिश। खुले आसमान की चाह पतंग उड़ाने की बेकरारी से पनपी होगी। उसी क्रम में मोहल्ले के पास के एक स्कूल की छत पर चले गए। चपरासी ने देखा तो सब कूद पड़े। हम भी कूदे। पहली मंज़िल की इमारत थी। गुरुत्वाकर्षण के बारे में तब पता नहीं था। न्यूटन पांचवी या सातवीं क्लास में हमारा इंतज़ार कर रहे थे। उससे पहले ही मैं छत से कूद गया। बाकी तो कूद कर खड़े हो गए लेकिन मैं कुछ देर के लिए धंस गया। कपार ऐसे झन्नाया कि लगा कि हम भूकंप के संपर्क में आ गए हैं। पीठ और रीढ़ बराबर। मोटी घास की परत के कारण उठ खड़े होने के काबिल हुए और दर्द छुपाते हुए घर। घईली और रूमाली तिलंगी पसंदीदा रही हैं। कई नाम भूल गया। पतंग शब्द बाद में आया। हम तो इसे तिलंगी ही जानते थे। गट्टू की बेकरारी समझ रहा था। काली पतंग को काटने की चाह किस पतंगबाज़ में नहीं होगी। लेकिन इस पतंगबाज़ी के बहाने जो कहानी बुनी गई है वो शानदार है।

यह फिल्म स्कूल सिस्टम और ग़ैर स्कूल सिस्टम के बीच टकराव की कहानी नहीं बनाती। यह फिल्म दोनों के बीच ऐसा रास्ता बनाती है जिसके बारे में हमारे सिस्टम वाले कभी सोच नहीं पाते। गट्टू वो बच्चा है जिसकी संख्या इस देश में लाखों है। वो स्कूल की दीवार पार नहीं कर पाते क्योंकि चपरासी गेट पर बैठा है। भला हो उस ऊंघते चपरासी का और उन योजनाओं का जिसके तहत कई स्कूलों के बच्चों की मिलावट की जाती है ताकि वे एक दूसरे से सीखें। सरकार की यही योजना गट्टू को मौका देती है स्कूल में दाखिल होने की। जहां वो सारे जहां से अच्छा सुनकर अकबका जाता है। किस हिन्दुस्तान को सारे जहां से अच्छा बता रहे हैं। फिर भी वो टकराव की स्थिति में कम, अचरज से हालात का मुकाबला करता है।


यहां क्लास रूम का सीन ज़बरदस्त है। गट्टू का बस्ता और बाकी स्कूल सिस्टम के बच्चों का बस्ता एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक बन जाते हैं। प्रेमचंद की कहानी ईदगाह कैसे कतरन में बदल गई है वो ब्लैक बोर्ड पर नज़र आती है। गट्टू की किताब वफादार जासूस और बाकी छात्रों की किताबें अदल बदल हो जाती हैं। चोरी से ही सही। जिसे हम चोरी कहते हैं दरअसल वो बचपन की स्वाभाविक करतूतें हैं। जिनकी पहचान स्कूल सिस्टम चोरी के रूप में ही करता है जबकि गट्टू के लिए यह चोरी नहीं है। जब वह गुरुत्वाकर्षण यानी ग्रेभिटी सीखकर निकलता है तो वहीं जाता है जहां उसके बाकी दोस्त कूड़ा बिन रहे होते हैं। वो उन्हें ग्रेभिटी बताता है। फॉरमल और नॉन फॉरमल नॉलेज के बीच एक रिश्ता बनाता है। वो भी आसानी से। फिल्म आंखें खोल देती है।

इन सबके बीच काली पतंग को काटने की चाह गट्टू की मासूमियत छीन लेती है। जिस सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान से वो अकबका जाता है अचानक वो आतंकवाद, बारूद और एसीड की बात करने लगता है। कहानी फिर भी कहानी होती है। उसे हम सरकारी की फाइल की किसी नीति के अनुसार नहीं देख सकते। गट्टू की वफादार जासूस वाली टीम योजना बनाती है और उस छत को हासिल कर लेती है जहां से काली पतंग को मात देने की लड़ाई आखिरी चरम पर पहुंचती है। ये वो छत है जिसे वो बच्चे भी हासिल कर लेते हैं जिन्हें स्कूल सिस्टम से वंचित कर दिया था। यहां दोनों सिस्टम के वंचित बचपन का ऐसा मैदान बनता है जो ऊपर आसमान के ठीक बराबर है। यह क्षण दुर्लभ लगता है।

गट्टू कमाल की फिल्म है। कहानी बेहद सरल और संपादन कच्चा पक्का। ताकि लगे कि आप रावन जैसी कोई महंगी फिल्म नहीं देख रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो गट्टू कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाता। कैमरे ने पतंग को देखा है ज़बरदस्त है। निर्देशक को बधाई। पतंग को लेकर जो रोमांच रचा गया है वो सत्यजीत रे की किस्सागोई सा है। सोनार केल्ला की याद आई। संगीत भी उसी तरह की रहस्यवादी। स्लम डाग मिलेनियर की तर्ज़ पर गट्टू को दीवार पर टंगी सत्यमेव जयते की याद आती है और उसे धिक्कारती है कि झूठ क्यों बोला। गट्टू फिर सच बोलता है। अपने दोस्तों को बचा लेता है और आसानी से उस सिस्टम का पार्ट हो जाता है जिसके लिए हमारा स्कूल सिस्टम तरह तरह की योजनाओं के ज़रिये तमाम बचपनों को एक सिस्टम में कैद होने के लिए बुला रहा है। पता नहीं उसके बाद गट्टू कितना गट्टू रह पाएगा। मैं यह भी नहीं जानता कि गट्टू काइट रनर की प्रतिलिपि है या नहीं । हो भी तो कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिए लिखा कि किसी ने ट्वीट पर पूछा था कि कहीं ये काइट रनर से प्रेरित तो नहीं है।

हम ऐसी फिल्मों को बाल फिल्म क्यों कहते हैं। यह तो पूरी फिल्म है। उनकी फिल्म भी है जो कभी बाल थे मगर उनके सर पर बाल नहीं रहे। अभिनय बालक का सहज है। किसी किरदार का अति अभिनय है। बहुत ही सरल है। एक्टिंग के पैकेजिंग के इस दौर में हम भूल जाते हैं कि कहानी भी कोई चीज़ होती है। गट्टू में एक्टिंग कहानी की है। इसलिए हो सके तो देख आइये । हो सके तो यह अफसोस कीजिए कि हम भी अगर गट्टू होते.....

नेशनल नहीं ये ल्युटियन जर्नलिज़्म है

हम पत्रकारिता की चुनौतियों पर बात करने की सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम बात करने में भी ईमानदारी नहीं बरतते। ठीक है कि संस्थान का मालिक कैसा चाहता होगा वैसी ही पत्रकारिता होती होगी लेकिन बाज़ार और मालिक के बीच एक कड़ी के रूप में पत्रकारों की दुनिया है जिनके अपने पेशेवर अंतर्विरोध भी कम इस पेशे की लानत मलामत नहीं करा रहे हैं। आप पत्रकारिता की चुनौतियों पर होने वाली तमाम मासिक,वार्षिक संगोष्ठियों में बनने वाली मंच की तस्वीर याद कीजिए। ज़्यादातर वही लोग होते हैं जो दिल्ली या अपने राज्य की राजधानियों में सत्ता प्रतिष्ठान का भौगोलिक ज्ञान रखने के कारण वहां मौजूद होते हैं। ये कौन लोग होते हैं, क्यों यही बोलते हैं और पत्रकारिता में इनका अपना योगदान क्या होता है? सिर्फ पेशे के भीतर के पावर स्ट्रक्चर के शीर्ष पर होने के कारण क्या कोई इस बात का अधिकारी हो जाता है कि पत्रकारिता के संकट पर वही सबसे प्रमाणिक जानकारी रखता होगा। जबकि संकट का जन्मदाता वह ख़ुद है।

अगर हमारे भीतर पेशे की बीमारी को समझने की ज़रा भी ईमानदारी बची है तो जान लेना चाहिए कि हिन्दी पत्रकारिता को तीन नंबर बनाने का काम(अगर यह तीन नंबर का मान लिया गया है तब) राजनीतिक पत्रकारिता करने वाले छोटे बड़े पत्रकारों का है। पत्रकारिता के पावर स्ट्रक्चर के शीर्ष को कब्ज़ाने का सबसे अच्छा मार्ग यही है कि आप पत्रकारिता में आएं तो सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक पत्रकारिता करें। क्योंकि राजनीतिक पत्रकारिता करने भर से आप संपादक हो सकते हैं। आप के हाथ में तथाकथित दिशाहीन होती पत्रकारिता को दिशा देने के उपायों पर भाषण देने का हक भी मिल जाता है। हालांकि टीवी में कुछ लोग राजनीतिक पत्रकारिता के बग़ैर भी शीर्ष पर पहुंचे हैं क्योंकि डेस्क टीवी की कलाबाज़ी में आंतरिक रूप से शक्तिशाली होता चला जाता है। मगर फिर भी आप पूरे पत्रकारिता के स्ट्रक्चर को देखें तो ज़्यादातर ल्युटियन दिल्ली के पांच किमी क्षेत्र में रहने वाले मकानों में बसे कोई सात सौ सांसदों के यहां चक्कर लगाने वाले पत्रकारों को ही सारा इनाम इकराम मिलता रहा है। उसमें से भी ये तथाकथित राजनीतिक पत्रकार पांच दस पचीस सांसदों के घर चक्कर लगाकर ही बाल सफेद कर भयंकरावस्था में दिखने लगते हैं। अब इन मकानों के बीच दस पांच दफ्तर भी आते हैं जिनका चक्कर लगाने से आप ब्यूरो चीफ बनते हैं।

यही भौगोलिक ढांचा कमोबेश राजधानियों को भी रहा है। इनमें से कुछ ने विगत सालों में अपनी प्रतिष्ठा ज़रूर हासिल की। बारीक समझ और तटस्था को बचाते बचाते । लेकिन बाकी ने क्या हासिल किया। क्या दिया पत्रकारिता को। राजनीतिक समझ को ही कहां से कहां पहुंचा दिया? उसकी हालत देखिये। चंद महासचिवों के बदले जाने की पहली खबर या फिर उनके यहां से वहां पहुंचने की ब्रेकिंग न्यूज़ देकर ही हमारे राजनीतिक पत्रकार थक जाते है। किसी को उनके द्वारा किये गए इंटरव्यू पर शोध करना चाहिए। शोध में देखा जाए कि वो किस तरह से सवाल कर रहे हैं, क्या पूछ रहे हैं, उनकी देह भाषा क्या है और क्या बोला गया है। उनके द्वारा फाइल की हुई राजनीतिक स्टोरी की गुणवत्ता और समझ को भी शोध में शामिल किया जाना चाहिए। सब कुछ पहले और अभी कर देना ही राजनीतिक पत्रकारिता हो गई है। फिर भी शोध हो तो हमें पता चलेगा या फिर कम से कम बहस ही तो पता चलेगा कि जिन लोगों ने पीछे लकीर बनाई हैं वो कैसी है।

चलिए मैं इस सवाल को दूसरे तरीके से पूछता हूं। आज किस हिन्दी के पत्रकार की राजनीतिक गलियारे में विश्वसनीयता या प्रखरता की धमक है। बाइट लेकर कूदने की बात नहीं कर रहा मैं। ऐसा क्यों होता है कि अरुण जेटली तक का इंटरव्यू इकोनोमिक टाइम्स में छपता है। ऐसा क्यों होता है सारे बड़े राजनीतिक इंटरव्यू अंग्रेजी अखबारों से होते हुए हिन्दी अखबारों में पहुंचते हैं। ऐसा क्यों होता है कि सारे बड़े इंटरव्यू बरखा,अर्णब और राजदीप को ही मिलते हैं। शुरूआत में इन्हें हिन्दी के ही पत्रकारों से ही चुनौतियां मिलती थीं। वो कहां चले गए। क्या हमारी पत्रकारिता ने कोई बड़ा राजनीतिक पत्रकार पैदा किया। कौन सी बड़ी राजनीतिक खबर है जो पहले हिन्दी में छपी, जिसे नेता ने पहले हिन्दी के पत्रकार को बुलाकर बात की हो। तुकबंदी और फटे ढोल की तरह बजने वाले बयानों की बात नहीं कर रहा हूं। हमारी राजनीतिक पत्रकारिता जिसने पत्रकारिता को चलाने वाले नियंता दिये वो इतनी फूंकी हुई क्यों लगती है। जबकि हमारा सारा समय उन्हीं के गलियारे में गुज़रता है। हम तो उनके गांव तक का नाम जानते हैं मगर पेशेवेर आधिकारिकता में हम कहां हैं। मैं अपवाद को शामिल नहीं करता। जो बारात है आप उसकी तरफ देखिये। आप देखिये कि कौन सा राजनीतिक पत्रकार है तो लिखने में माहिर है, कौन सा राजनीतिक पत्रकार है जो अपनी समझ को टीवी के माध्यम के हिसाब से उजागर करने में कारगर है। कौन है। क्या हम कभी ईमानदारी से इसकी समीक्षा कर पायेंगे। नहीं कर पायेंगे। हम यह कभी नहीं पूछ पायेंगे कि आपका पेशेवर कौशल क्या है। क्योंकि यही मायने रखता है कि अंग्रेजी अखबारों और टीवी को इंटरव्यू मिलने के बाद हिन्दी में हमको पहले मिला है। हद है। एकाध मामलों में हुल्लड़बाज़ी और नेता को रगेद देने के उदाहरणों को भी शामिल करना बेकार है यहां।


इसीलिए मेरी अब यह समझ बनने लगी है कि हिन्दी पत्रकारिता में संकट है तो इसलिए इसकी बागडोर कमोबेश तथाकथित राजनीतिक पत्रकारों के हाथ में रहती है। राजनीतिक पत्रकारिता को ही आप मुख्य पत्रकारिता मानते हैं और इसी के बरक्स पत्रकारिता की धाराओं की स्थितियां तय की जाती हैं। तब उस राजनीतिक पत्रकारिता फुटपाथी क्यों नज़र आती है। अगर राजनीतिक पत्रकारिता ही मुख्य है तो इसकी गुणवत्ता पर निर्ममता से बात होनी चाहिए। क्योंकि यही हमारे पेशे की सत्ता का सबसे ताकतवर केंद्र है. कार्यपालिका से नज़दीकियों के कारण सत्ता का लाभ हानि भी इसे ही उठाना पड़ता है। हमारी पत्रकारिता तथाकथित बुरे बाज़ार और मालिकों के चलते फटीचर हुई है तो इसमें राजनीतिक पत्रकारिता के पतन का भी उतना ही योगदान गिना जाना चाहिए। पूछा जाना चाहिए कि आपने इस पेशे का सबसे ज़्यादा लाभ लिया तो क्या मानक गढ़े। मुलाकाती ख़बरों और भीतरघाती ख़बरों को ब्रेक करने के अलावा। अगर आप संपर्क में ही माहिर थे तो उस संपर्क से पेशे को फायदा क्या पहुंचाया। ये बहाना नहीं चलेगा कि सत्ता की भाषा अंग्रेज़ी है तो अंग्रेज़ी के पत्रकार आगे हैं। हिन्दी भी सत्ता और संपर्क की भाषा है। जब आप मुख्यमंत्री तक पहुंच ही रखते हैं तो ऐसा क्यों है कि अखिलेश यादव का पहला विस्तृत इंटरव्यू टाइम्स आफ इंडिया में छपता है। क्या हमने अपना स्तर इतना गिरा दिया है। क्या हम नेताओं के सिर्फ काम ही आते रहेंगे। क्यों ऐसा है कि सभी तीन नंबर के नेता हिन्दी टीवी स्टुडियो में हैं और सभी एक नंबर के नेता अंग्रेज़ी स्टुडियो में। क्या इस सवाल का जवाब हमारी राजनीतिक पत्रकारिता के ढांचे में आई लुंज पुंजता में मिलेगा?

राजनीतिक संपादकों और राजनीतिक पत्रकारिता ने ही हिन्दी पत्रकारिता की ताकत कमज़ोर कर दी है। जनता से दूर कर दी है। हम हमेशा पत्रकारिता को सरोकारी बनाने पर लाखों शब्द और घंटों वक्त ख़र्च कर देते हैं। लेकिन कभी यह समझने की कोशिश की है अगर पूरा पेशा सिर्फ और सिर्फ एक और झुका हो तो क्या वो स्वतंत्र हो सकेगा। क्या वो सिस्टम की पूंछ नहीं बन जाएगा। जब सारे बड़े और प्रभावशाली पत्रकार राजनीतिक पत्रकारिता में ही समय गंवा देंगे और उसमें से भी पेशे को कुछ नहीं देंगे तो कौन सरोकार की बात करेगा। ल्युटिन दिल्ली की राजनीतिक पत्रकारिता से सरोकार की पत्रकारिता निकलती है क्या? सरोकार की पत्रकारिता निकलती है जनता के बीच से जहां राजनीतिक पत्रकार कभी नहीं जाता। वो चुनावों में जाता है और संसदीय क्षेत्रों का राजनीतिक देशाटन करके लौट आता है। अगर पत्रकारिता के पावर स्ट्रक्चर में एक संतुलन होता तो फिर भी पत्रकारिता की जनपक्षधरता बची रह पाती। राजनीतिक पत्रकार जनता से नहीं मिलता है। जनता के प्रतिनिधियों से संपर्क बनाते बनाते संपादक तक हो जाता है। राज्य सभा भी पहुंच जाता है। कभी आपने सुना है कि फीचर रिपोर्टिंग करते करते कोई राज्य सभा पहुंचा। और ये नामकरण जो किया गया है वो पेशे के भीतरी ढांचे में अपनी वर्चस्वता बनाए रखने के लिए किया गया है। क्या ये ढांचा बदल सकता है। नहीं। आप कब तक राष्ट्रपति चुनाव के पर्चे की खबर दिन भर देखते रहेंगे। कौन कहता है कि महत्वपूर्ण नहीं है लेकिन यही महत्वपूर्ण है यह इसलिए भी मान लिया गया है क्योंकि पत्रकारिता के ढांचे के भीतर इसे कभी चुनौती नहीं दी गई है। क्योंकि यह फैसला संपादक लेता है जो मूल रूप से राजनीतिक पत्रकार होता है। इसीलिए ऐसी तथाकथित महत्वपूर्ण खबरों के चलते रहने पर किसी को अजीब नहीं लगता है। स्टुडियो में मुर्गा युद्ध होने लगा है। उससे पहले के राजनीतिक पत्रकारों की रिपोर्टिंग देखिये। उसमें भी मुर्गा युद्ध ही होता था। यहां से बयान लिया वहां से बयान लिया और फिर आखिर में अपना बयान दिया। जिसे मैं ल्युटिन जर्नलिज़्म कहता हूं। अशोक रोड से बयान लेकर निकले, अकबर रोड वाले से बयान लिया और फिर विजय चौक पर अपना बयान दर्ज कर दिया कि अब देखना है कि आने वाले दिनों में भाजपा कांग्रेस का या कांग्रेस भाजपा का क्या जवाब देती है।


ये ढांचा ही ऐसा है जो कभी सरोकारी नहीं हो सकता है। ल्युटियन दिल्ली में जनता नहीं रहती है। जनता रहती है कहीं और जहां कोई राजनीतिक पत्रकार नहीं जाता है। वहां कोई छुटभैया समझे जाने वाला, अपना करियर बना रहा पत्रकार जाता है। करियर बन जाने के बाद वो भी वही करता है जो राजनीतिक पत्रकार करते हैं। उसे भी लगता है कि कब तक सिटी बीट करेगा। पोलिटिकल बीट कब मिलेगी। पोलिटिकल बीट प्रमोशन की सबसे ऊंची मंज़िल है। उसमें भी महिला पत्रकार हाशिये पर ही हैं। पहले राजनीतिक पत्रकारिता के अपने ढांचे के भीतर का जेंडर असंतुलन ही ठीक हो जाए। इस पर कोई बात क्यों नहीं करता। क्यों लड़कियां फीचर रिपोर्टिंग करती मिलती हैं। क्यों फीचर रिपोर्टिंग करने वाला खुद को असुरक्षित महसूस करता है। उसके हिस्से दो चार अवार्ड न हों तो वो भी नसीब नहीं। कुछ ल्युटियन पत्रकार तो इसमें भी शातिर हैं। साल में दो चार दिन के लिए निकलते हैं और दिल्ली से दूर जाकर खबर कर आते हैं और फिर अवार्ड भी ले लेते हैं।


प्रभाष जोशी को याद करने के संदर्भ में ऐसा क्यों कह रहा हूं। इसलिए कह रहा हूं कि प्रभाष जोशी पत्रकारिता में आए इस असंतुलन का जवाब हैं। वो एक संतुलन का प्रतिनिधित्व करते थे। उनका रेंज देखिये। राजनीति, धर्म, समाज,जनपक्षधर आंदोलन,समाज खेल किस विषय पर एकाधिकार से नहीं लिखा है। वो जाकर लिखते थे। पता करके नहीं लिखते थे।प्रभाष जोशी दिल्ली में ही नहीं रहते थे। प्रभाष जोशी का भी आलोचनात्मक मूल्यांकन होना चाहिए। वो भी नहीं चाहेंगे कि कोई उनके पीछे सिर्फ तारीफ ही करता रहे। लेकिन वो नर्मदा पर भी लिखते थे और यमुना पर भी। वो अनुपम मिश्र पर भी लिखते तो सुनील गावस्कर पर भी और उसी एकाधिकार से अटल बिहारी वाजपेयी को भी लपेट देते थे। वो नीचे से दिल्ली को देखते थे। बाकी दिल्ली से दिल्ली ही देखते रह जाते हैं।
(यह लेख प्रभाष जोशी की स्मृति में पाखी पत्रिका के विशेष अंक के लिए लिखा गया था।)

वासेपुर की बंगालन

इस फ़िल्म में बंगालन का किरदार अनायास नहीं आया है। धनबाद कोलकाता जैसे बड़े महानगर के एक्सटेंशन के रूप में काम करता रहा है। आसनसोल उसको सहोदर खदान है। धनबाद और आसनसोल एक सहज विस्तार का हिस्सा है। इसीलिए सरदार ख़ान के जीवन में बंगालन आती है। दुर्गा। इस फिल्म में बंगालन के किरदार को कोई और ठीक से व्याख्या करे तो अच्छा रहेगा मैं अपनी स्मृतियों के सहारे एक व्याख्या करने की कोशिश करता हूं। हिन्दी भाषियों के मन में बंगाल और बंगालन का वजूद अभी तक एक्सप्लोर नहीं किया गया है। हमारे सामाजिक मन में बंगालन हमेशा से एक आज़ाद ख़्याल वाली औरतें रही हैं। आज़ाद ख्याल पर विशेष ज़ोर देना चाहता हूं। जड़ हिन्दी भाषी मर्दसोच में बंगालन उस आज़ादी का प्रतिनिधि करती है जिसकी तलाश में वो भटकता रहता है। बंगालन की यह वो ख़ूबियां हैं जो वो अपनी पत्नी या सामाजिक लड़कियों में नहीं देखना चाहता। इस आज़ादी का अंग्रेज़ी का एक समकक्ष शब्द लूज़ बैठता है। आप इस बात को तब तक नहीं समझेंगे जब तक आप बिहार यूपी के हिन्दी भाषी नहीं होंगे।

अनुराग ने अपनी फिल्म में दुर्गा का किरदार उसी मानसिक इलाके की तलाश में रचा होगा। कहानीकार ने बारीक निगाह से इस किरदार के बारे में सोचा होगा। वर्ना ऐसा नहीं था कि दुर्गा के बिना वासेपुर की कहानी पूरी नहीं होती। सरदार को अगर चरित्रहीन मर्द के रूप में ही दिखाना था तो दुर्गा का प्रसंग एक रात के लिए होता। मगर वो हम हिन्दी भाषियों के मानसिक मोहल्ले में पूरी फिल्म के दौरान आखिर तक मौजूद रहती है। वो एक स्वतंत्र महिला है। कम बोलती है। बिना किसी सामाजिक दबाव के सरदार से संबंध कायम करने का फैसला करती है। एक दृश्य है जब सरदार नहा रहा होता है। दुर्गा टाट के पीछे बैठकर सरदार को देखती है। वो उसके करीब आ जाती है। बंगाल की लड़कियां काला जादू कर देती हैं। फंसा लेती हैं। ऐसी बातें हम सबने कही होंगी और सुनी भी होंगी। दुर्गा की साड़ी और ब्लाउज़ को हिन्दी आंखों की हवस और सोच के हिसाब से बनाया गया है। बंगाल की औरतों के कपड़ों को सर से पांव तक ढंकी हिन्दी भाषी प्रदेशों की औरतों और उनके मर्दों ने ऐसे ही देखा है। जलन से और चाहत से। सरदार का दिल तो आता है लेकिन अंतत दुर्गा फंसा लेती है। वो उसे अपने पास रख लेती है।

धनबाद के रंगदारों को रखैल रखने और किसी की रखैल हो जाने का सुख बंगाल से ही मिलता होगा। सोनागाछी उनका पसंदीदा और नज़दीक का ठिकाना रहा होगा। बिहार और यूपी के लोगों के संपर्क में पहले बंगाल ही आया। बंबई दूर था। बंगाली औरतों ने बिहारी यूपी मर्दों को अपना भी बनाया। कम किस्से हैं कि यूपी बिहार का भइय्या बंबंई गया और मराठी लड़की के प्रेम में पागल हो गया। हो सकता है कि मेरी जानकारी में ऐसे प्रसंग न हो लेकिन आप भोजपुरी गानों को सुने तो बंगालन का ज़िक्र एक खास अंदाज़ में हो ही जाता है। उसी का विस्तार है बंगालन का किरदार। बिहारियों ने उनकी सेक्सुअल स्वतंत्रता को विचित्र रूप से तोड़मरोड़ कर देखा है और मुहावरों से लेकर अपनी कल्पनाओं में सजाया है। तभी सरदार ख़ान उसे बंगालन जानते ही उपलब्ध समझने लगता है। वहां उसके बोलने का लहज़ा भी क्लासिक है। फुसला रहा है। गोरे गाल को दबोच लेता है। गाल का दबोचना भी हिन्दी प्रदेशों के सामंती मन में मौजूद कई दृश्यों को खोलता है।

बंगालन घर बर्बाद कर देने वाली औरतों के रूप में देखी जाती रही हैं। उनके संपर्क में आईं हिन्दी भाषी औरतों ने जब थोड़ी सी स्वतंत्रा का इस्तमाल किया तो उन्हें बंगाली कहा जाने लगा। यह मैं अपने बाप दादाओं के वक्त के सामाजिक अनुभव से लिख रहा हूं। तभी जब सरदार ख़ान का बेटा दुर्गा के दरवाज़े पर पत्थर मारता है तो उसका दोस्त भी मारने लगता है। ऐसे दोस्त मिल जाते थे जो बिना मतलब के दोस्त के काम आ जाते थे। मगर पत्थर मारने के उस दृश्य को यूं ही नहीं छोड़ा जा सकता। नारीवादी विमर्श में इसकी प्रशिक्षित व्याख्या होनी चाहिए जो शायद मैं नहीं कर पा रहा हूं।

हां एक दृश्य और है। जब दुर्गा खुद सरदार खान के साथ हमबिस्तर होने आती है। उसके चीखने में एक पूरा विमर्श है। एक मुसलमान और बंगालन का हमबिस्तर होना एक सामान्य फिल्मी दृश्य नहीं है ये। मैं लिखना नहीं चाहता क्योंकि अच्छा होगा जब ये सवाल कोई अनुराग से पूछे और जवाब भी वही दें। मेरा इशारा काफी है। ऐसे सेक्सुअल पूर्वाग्रहों को भी समझने की ज़रूरत है। इसीलिए वासेपुर में बंगालन का किरदार उसके रहने की जगह,उसका पहनावा और उसकी चुप्पी सिर्फ एक जगह वो बंगाली बोलती है जब वो पत्थर मार रहे लड़कों को दौड़ाती है, मुझे विशेष रूप से आकर्षित कर गया। आश्चर्य है किसी की नज़र क्यों नहीं पड़ी।

गैंग्स आफ वासेपुर-गुंडई का नया महाकाव्य

 (चेतावनी- स्टाररहित ये समीक्षा काफी लंबी है समय हो तभी पढ़ें, समीक्षा पढ़ने के बाद फिल्म देखने का फैसला आपका होगा )

डिस्क्लेमर लगा देने से कि फिल्म और किरदार काल्पनिक है,कोई फिल्म काल्पनिक नहीं हो जाती है। गैंग्स आफ वासेपुर एक वास्तविक फिल्म है। जावेद अख़्तरीय लेखन का ज़माना गया कि कहानी ज़हन से का़ग़ज़ पर आ गई। उस प्रक्रिया ने भी दर्शकों को यादगार फिल्में दी हैं। लेकिन तारे ज़मीन पर, ब्लैक, पिपली लाइव,पान सिंह तोमर, विकी डोनर, खोसला का घोसला, चक दे इंडिया और गैंग्स आफ वासेपुर( कई नाम छूट भी सकते हैं) जैसी फिल्में ज़हन में पैदा नहीं होती हैं। वो बारीक रिसर्च से जुटाए गए तमाम पहलुओं से बनती हैं। जो लोग बिहार की राजनीति के कांग्रेसी दौर में पनपे माफिया राज और कोइलरी के किस्से को ज़रा सा भी जानते हैं वो समझ जायेंगे कि गैंग्स आफ वासेपुर पूरी तरह एक राजनीतिक फिल्म है और लाइसेंसी राज से लेकर उदारीकरण के मछलीपालन तक आते आते कार्पोरेट,पोलिटिक्स और गैंग के आदिम रिश्तों की असली कहानी है।

रामाधीर सिंह, सुल्तान, सरदार जैसे किरदारों के ज़रिये अनुराग ने वो भी दिखा दिया है जो इस फिल्म में नहीं दिखाई गई है। हिन्दू मुस्लिम अपराधिकरण के इस गठजोड़ का इस्तमाल राजनीति में सांप्रदायिकरण की मिसालों के रूप में खूब हुआ है। मगर उसके पहले तक यह गठजोड़ सिर्फ धंधा पानी में दावेदारी तक ही सीमित था। गैंग्स आफ वासेपुर एक राजनीतिक दस्तावेज़ है। इस फिल्म को इसलिए नहीं देखा जाना चाहिए कि किस समीक्षक ने कितने स्टार दिये हैं। इस फिल्म को इसलिए भी देख आइये कि ऐसी फिल्में बनने लगी हैं और सेंसर बोर्ड उन्हें पास भी करने लगा है( सेंसर बोर्ड के अफसरों को बधाई,पंकजा ठाकुर से मिला हूं तो उनका नाम लेकर लेकिन बाकी को भी बधाई)। गालियों के लिए नहीं बल्कि उन दृश्यों के लिए जिनके बिना यह फिल्म वास्तविक नहीं बन पाती। बड़े बड़े मांस के लोथड़ों के कटने की जगह से जो आपराधिक मिथक बनते हैं,यह सीन अगर सेंसर बोर्ड काट देता कि लोगों की भावना आहत हो सकती है तो फिल्म आइना बनने से रह जाती। संवादों में कोइलयरी की राजनीति और अपराधिकरण में टाटा थापर का नाम लेकर उस प्रक्रिया को बता देना आसान फैसला नहीं होगा। नूझ लैनल( मैं न्यूज़ चैनल नहीं कहता क्योंकि मुझे ये लैनल ही लगते हैं) में यह औकात है तो बता दीजिए।

अच्छा निर्देशक वो होता है जो अपनी कहानी के समय और उसके रंग को जानता हो। कैमरे की लाइटिंग, दिन और रात के शेड्स,बारिश के क्लोज अप्स,मोहल्ले की गलियां,गलियों के ढलान, कोने, पुराने अखबारों की कटिंग,धूल,बाल इन सबको एक निरंतरता में रखते हुए दृश्य रचता हो। अनुराग मिलते तो पूछता कि मनोज वाजपेयी के लिए गमछा तो मिल गया होगा लेकिन ईनार(कुआं) पर नहाने के वक्त जो अंडर वियर पहना है वो ब्रांडेड है या पटरी से खरीदा था। ईनार पर बाल्टी में फुले हुए कपड़े और गमछा लपेट कर मनोज का चलना कमाल का है। कट्टा का विवरण और चित्रण बेजोड़ है। फट के फ्लावर हो जाता है। ये संवाद रिसर्च से ही आ सकता है। गुल और ज़र्दे के डिब्बे में बम बनाना और फेंकना वास्तविक है। लुंगी पहनने का तरीका और पीछे फंसी हुई लुंगी को हल्के से खींचना यह सब डिटेलिंग पर्दे के दृश्यों को यादगार बनाते हैं। कलाकार को अभिव्यक्ति देते हैं। जिसने भी इस फिल्म की लाइटिंग की है वो कमाल का बंदा या बंदी होगी। अंधेरा कितने शेड्स में उभरता है,लाजवाब है।

मैं कहानी में नहीं जाना चाहता। कसाई के मोहल्लों के बहाने अनुराग ने  पीयूष मिश्रा के नैरेशन से ज़ाहिर कर दिया है कि एक समय था जब ये बस्तियां ठेकेदारों के गुर्गों की खदानें हुआ करती थीं। जिनका नब्बे के दशक में सांप्रदायिक अफवाहों में इस्तमाल किया गया। बिना इस डायनमिक्स के आप इस फिल्म को नहीं पढ़ सकते। फिल्म बनती है वासेपुर में। आज़ादी के पहले से, अंग्रेज़ों के आने और जाने के बीच, ट्रेन के लूटने का लंबा सीन, सरदार के बाप का मरना, सरदार का बनना,उसकी शादी,बच्चे। वो एक सामान्य मर्द है। मनोज वाजपेयी ने ऐसे किरदारों को अपने समाज में खूब देखा होगा,सुना होगा। सत्या में मनोज अपने बेहतरीन अभिनय से काल्पनिक हो जाते हैं तो वासेपुर में अपने शानदार अभिनय से वास्तविक। गिरिडिह गिरिडिह बोलने का अंदाज़, नली वाला मटन पीस चूसना, लड़की को ताकना,कुएं पर दुर्गा के साथ कपड़े धोते वक्त ताल से ताल मिलना,बंगालन का राजनीति में आना यह सब बिहार यूपी के आपराधिक होते समाज के वास्तविक किस्से हैं। आप इन्हें बिंदेश्वरी दूबे, सत्यदेव सिंह सूरजदेव सिंह बीपी सिन्हा जैसे असली नामों में सुन सकते हैं(जिसकी बेहतरीन चर्चा रंजन ऋतुराज ने अपने फेसबुक स्टेटस में की है) या फिर आप अपने स्थानीय मोहल्लों में उभरे ठेकेदारों और उनके गुर्गे की सुनी सुनाई कहानियों में खोज सकते हैं। कोयला माफिया के पनपने की प्रक्रिया के भीतर कितने उप-वृतांत हैं।

सरदार का अभिनय कमाल का है। मनोज वाजपेयी ने जितना बेहतरीन गुंडई के किरदार को उभारने में किया है उससे कहीं ज्यादा उनका अभिनय औरतों के सापेक्ष एक मर्दाना कमीनगी में दिखता है। मनोज को काफी फोलो किया है। लेकिन इस बार मनोज ने अपने कारतूस से वही निकाले जो हम सब देख चुके हैं। अगर नया वाजपेयी उभरता है तो वो सिर्फ नगमा और दुर्गा के बीच के संबंधों में फंसा मक्कार मनोज है। दानिश को गोली लगते वक्त और अंतिम दृश्य में ठेले पर गिरने का अभिनय काफी अच्छा है। कुएं के पास वो जिस तरह से दुर्गा से बात करते हैं और घर की सफाई करते वक्त जिस तरह से नगमा से बात करते हैं उसका सांस्कृतिक अध्ययन कोई फिल्म वाला करता रहेगा लेकिन हम जिस भोजपुरी समाज से आते हैं उसे देखकर गदगद हो गए। निश्चित रूप से दुर्गा और नगमा के बीच के अवसरों पर मनोज वाजपेयी ने अपने अभिनय को नया मुकाम दिया है। एक सीन में जिस सफाई से मनोज पांव उठाते हुए उठ खड़े होते हैं पता चलता है कि फिल्म में अभिनेता नहीं निर्देशक अभिनय कर रहा है। और बहुत सारे गुमनाम सहायक निर्देशक अपने निर्देशक के साथ खड़े हैं, तैयारी के साथ।

सरदार और औरतों के बीच के संबंध को अलग से देखा जाना चाहिए। नगमा और पीयूष मिश्रा के बीच जो संबंध होते होते रह गया और उससे जो फैज़ल पर असर पड़ा उसके लिए अनुराग ने कैसे आसानी से वक्त निकाल लिया है, शाबासी देने का मन करता है। बिना उस दृश्य के फैज़ल का किरदार पैदा ही नहीं हो सकता था जो शायद दूसरे हिस्से में उभरेगा। मनोज वाजपेयी के पिता का किरदार जिसने भी किया है उसका अभिनय भी नोटिस में लिया जाना चाहिए। कहानी में शुरूआती जान वही डालता है। कोइलरी में पत्थर से मारपीट का सीन प्रभावशाली है।

कसाइयों के मोहल्ले का सुल्तान इस फिल्म में जम गया है। यहां कबूतर भी एक पंख से उड़ता है का संवाद कितनी आसानी से बिना किसी विशेष भाव भंगिमा के उतार देता है। चप्पल उतारकर दांत पीसते हुए दौड़ा कर मारने का सीन। उफ कैसे बताऊं कि एकदम वास्तविक है। मेरे पिताजी ठीक इसी तरह चप्पल खींच लेते थे मारने के लिए। हमारे गांव समाज में चप्पल निकालने का सामंती चलन कैसे आया होगा इसका ज़िक्र करूंगा तो सामंतवाद और जातिवाद में उलझ जाऊंगा। खैर मनोज वाजपेयी ने भी ऐसे वास्तविक दृश्य अपने गांव घरों में देखे होंगे।

सुल्तान को मैंने पहली बार रीमेक वाली अग्निपथ में नोटिस किया था। इस कलाकार का भविष्य उज्ज्वल है। भोजपुरिया ज़ुबान में कहूं तो खंचड़़ा गुर्गा लगा है। इसका किरदार बहुत उभरा नहीं क्योंकि सरदार की बराबरी में नहीं था। सरदार की बराबरी रामाधीर से हो रही थी। क्या आप उस प्रसंग को भूल सकते हैं जब सुल्तान रामाधीर के घर जाता है। पत्नी चीनी मिट्टी वाले बर्तन की बात करती है। मुसलमान आया है। तभी मैं कहता हूं कि इसे आपराधिकरण और सांप्रदायिकरण के बीच की यात्रा के प्रसंगों के रूप में देखा जाना चाहिए। सुल्तान ने क्या एक्टिंग की है।

आप समझ रहे होंगे कि मैं समीक्षा लिख रहा हूं या किताब। कुछ फिल्मों को ऐसे भी देखना चाहिए। इस फिल्म में पीयूष मिश्रा का किरदार बहुत नहीं उभरा। उनकी आवाज़ और गाने ने कमाल का अभिनय किया है। अनुराग पीयूष को और क्रूर बना सकते थे लेकिन शायद स्कोप नहीं रहा होगा। पीयूष का किरदार मनोज के साथ जो लड़का मार काट करता है, वो होना चाहिए था। लेकिन क्या पीयूष के नैरेशन के बिना यह फिल्म पूरी हो पाती। नहीं। हो सकता है कि अनुराग ही पीयूष के रोल को ठीक से समझ न पाये हों। गुलाल में उनके लिए पूरा प्लान था लेकिन गैग्स आफ वासेपुर में पीयूष को लेकर कोई योजना नहीं दिखती है। नगमा और दुर्गा का अभिनय लाजवाब रहा है। दीवार का प्रंसग देखकर लगा कि अनुराग ने सिनेमा के भीतर सिनेमा का इस्तमाल ओम शांति ओम टाइम के भौंडे गाने रचने से हटकर किया है। मुकद्दर का सिकंदर का गाना आहा। सिनेमा देखने की चाह और चाह में बनते किरदार। वाह।

लिखते हुए सोच रहा हूं कि कुछ छूट तो नहीं रहा है। बहुत कुछ छूट रहा है। गानों पर बिल्कुल नहीं लिखा। लेकिन यह फिल्म इसलिए विवाद नहीं पैदा करेगी क्योंकि घटना के समय से बहुत बाद में बनी है। फिर इसका जवाब भी फिल्म में ही है। कैसे माफिया का काम कोयले का चूरा चुराने वाली महिलाएं करने लगीं और माफिया आखिरी दिनों में मछली मारने लगे और रंगदारी के धंधे में आ गए। कुछ नहीं हुआ तो उस रामाधीर सिंह का जिसके पास राजनीतिक सत्ता बची रह जाती है। वही रामाधीर सिंह आज रेड्डी ब्रदर्स लेकर ए राजा तक में बदल गया है।

माफी चाहता हूं बोर समीक्षा के लिए। इस तरह से कोई समीक्षा करे तो फिल्म ही न देखने जाए। मगर आप इस फिल्म को देखिये। काफी मनोरंजन है इसमें । मैं कमज़ोर दिल का आदमी हूं। सोचा था कि बहुत गोली चलेगी तो सिनेमा हाल से चला आऊंगा। बड़ा कलेजा कांपता है महाराज। लेकिन हत्या और गोलीबारी के दृश्य क्रूरतम तरीके से नहीं फिल्माये गए हैं। क्रूरतम से मेरा मतलब वल्गर भी है। सबसे बड़ी बात है कि पूरी फिल्म अनुराग कश्यप की है। निर्देशक ने कहानी पर बराबर की पकड़ बनाए रखी है। किसी किरदार को ज्यादा जगह नहीं दी है। इसीलिए इस फिल्म से आप मनोज वाजपेयी या नवाज़ या पंकज चतुर्वेदी नहीं चुन पायेंगे। जब भी चुनेंगे फिल्म को ही चुनेंगे। अनुराग ने कहानी की ज़रूरत को बहकने नहीं दिया है। हाथ और दिल पर नियंत्रण रखा है। जिसने संपादन किया है उसका नाम तो कोई नहीं जानेगा। उसके परिवारवाले भी स्क्रीन पर नहीं पढ़ पायेंगे मगर वो तारीफ के काबिल है। शायद उसका नाम श्वेता है। इसीलिए कहता हूं कि गैंग्स आफ वासेपुर फिल्म निर्देशकों के लिए चुनौती है। ऐसी बात नहीं है कि इस स्तर की फिल्में नहीं बनी हैं। बनी हैं। मगर आज के मोड़ पर यह फिल्म प्रस्थानबिंदु है। पाथब्रेकिंग।

मार्केट में जाति-वैदिक,ब्राह्मण और बसपा

इस लेख में सुधार किया गया है। मैंने यहां चार तस्वीरें लगाई थी। एक तस्वीर चमड़िया हींग गोली की थी । मुझे लगा कि इसका संबंध दलित चमड़िया जाति से है। लेकिन मेरे कई मित्रों ने बताया कि मारवाड़ी भी चमड़िया होते हैं। मारवाड़ियों में एक टाइटल सुल्तानिया का भी होता है। मैं तस्वीर को हटा तो नहीं रहा लेकिन लेख बदल रहा हूं। ताकि आपको भी पता चले कि मुझसे ग़लती कहां हुई थी। भूल सुधरवाने के लिए मित्रों का शुक्रिया। अजीब है यादव भी जाटव होते हैं और चमड़िया भी मारवाड़ी।

पहली तस्वीर में पं अमरपाल शर्मा ब्राह्मणों के नेता बन गए हैं। मैं जहां रहता हूं उस मोहल्ले में और ठीक इसी जगह पर जहां उनकी परशुराम सम्मेलन वाली होर्डिंग लगी है, कई नीली होर्डिंग देखे हैं। तब बसपा का राज था। अमरपाल शर्मा को बसपा ने टिकट भी दिया था। शर्मा सर्वजन सरकार का नारा मायावती की तस्वीरों के साथ होर्डिंग में लगाते दिखते थे। सरकार जाने के बाद ब्राह्मणवाद का दामन पकड़ लिया है। जैसे जात एक गंजी भी है। वक्त आने पर कमीज़ उतार कर हम डालर,लक्स,ऑन,वीआईपी। दूसरी तस्वीर में परशुराम सेना में भर्ती का विज्ञापन है। आटो में लगा है। यह भी मेरे ही इलाके में दिखा था।



 सौ मीटर के इलाके के भीतर इनकी तस्वीरें उतारी हैं मैंने।यह मार्केट फ्रैंडली जातिवाद है।