प्रगति का कॉलर ट्यून है शांघाई।

शांघाई। जय प्रगति,जय प्रगति,जय प्रगति। राजनीति में विकास के नारे को कालर ट्यून की तरह ऐसे बजा दिया है दिबाकर ने कि जितनी बार जय प्रगति की आवाज़ सुनाई देती यही लगता है कि कोई रट रहा है ऊं जय शिवाय ऊं जय शिवाय । अचानक बज उठी फोन की घंटी के बाद जय प्रगति से नमस्कार और जय प्रगति से तिरस्कार। निर्देशक दिबाकर स्थापित कर देते हैं कि दरअसल विकास और प्रगति कुछ और नहीं बल्कि साज़िश के नए नाम हैं। फिल्म का आखिरी शाट उन लोगों को चुभेगा जो व्यवस्था बदलने निकले हैं लेकिन उन्हीं से ईमानदारी का इम्तहान लिया जाता है। आखिरी शाट में प्रसनजीत का चेहरा ऐसे लौटता है जैसे आपको बुला रहा हो। कह रहा हो कि सिस्टम को बदलना है तो मरना पड़ेगा। लड़ने से कुछ नहीं होगा। उससे ठीक पहले के आखिरी शाट में इमरान हाशमी को अश्लील फिल्में बनाने के आरोप में जेल भेज दिया जाता है। कल्की अहमदी पर किताब लिखती है जो भारत में बैन हो जाती है। अहमदी की मौत के बाद उसकी पत्नी चुनावी मैदान में उतर आती है। अहमदी को मारने वाला उसकी पत्नी के पोस्टर के नीचे भारत नगर की पुरानी झुग्गियों को ढहाता हुआ एक फिर से हत्या करने में जुट जाता है। झुग्गियों का टूटना और शांधाई का बनना ही तय है। अहमदी की मौत के वक्त का फ्रेम लाजवाब है। एक नज़र में लगता है कि सब स्टिल हो गए हैं। मगर कैमरे की बजाय अभिनय से स्तब्धता का जो स्टिल माहौल रचा है वो पूरी कहानी को फिर से रिवाइंड करती है। हमारी स्मृतियों पर ज़ोर देती है कि यही होता है। होता कुछ नहीं है। लड़ाई एक व्यर्थ प्रयोजन है। बस इसी यथार्थ की स्वीकृत पोजिशन को साबित कर देने के बाद एक बहुत अच्छी फिल्म पहले बनी फिल्मों की तरह लगने लगती है। फिल्म हमारे भीतर की राजनीतिक निराशा का आईना है। हीरो पैदा नहीं करती। नए राजनीतिक आदर्शों और विकल्पों की तलाश में चलताऊ नहीं होती। सारे विराट दृश्यों को आस पास का बना देती है।

दिबाकर ने कोई नया प्रयोग नहीं किया है। बल्कि अपने दौर में साहस किया है कि राजनीति के इस क्रूर चेहरे को पर्दे पर उतारने का । हम अपने शहर के बसने और उजड़ने की राजनीति को नहीं समझते। यही बता रहे हैं दिबाकर कि कितना आसान है इस पोलिटिक्स को देख पाना। शांघाई कोई ग्रैंड फिल्म नहीं है। फिल्म अपने दृश्यों या कहें तो फ्रेम के लिहाज़ से भी नए मानक नहीं बनाती। ऐसे मसले पर बनी पहले की फिल्मों से चली आ रही दृश्यों को नए तरीके से संयोजित ही करती है। एक कुनबे और एक मोहल्ले की लड़ाई के बीच की राजनीति का सीमित संदर्भ है। अगर इसे पोलिटिकल थ्रिलर कहा गया है तो मैं सहमत नहीं हूं। इसमें कुछ भी थ्रिल करने लायक नहीं है।

जो कमाल है वो इसकी स्थिरता में है। इसके सामान्य होने में है। एक प्लाट पर शांघाई बसाने के लिए मुख्यमंत्री और विरोधी का अंदरखाने हाथ मिलाये रखना रोज़मर्रा की सियासत है। दिबाकर ने उस सियासत को जस का तस धर दिया है। इसीलिए जब वो मुखर होने लगता है तब दर्शक आनंद लेने लगते हैं। उनकी राय बदल जाती है जो इंटरवल के पहले इसे डाक्यूमेंट्री बताकर हंसने लगे थे। चटने लगे थे। बाद में जब समझ आती है तो कुर्सी की हैंडिल पकड़ लेते हैं। आज के शहरीकरण के दौर के इतने शेड्स हैं। उसकी राजनीति की क्रूरता के टूल बदल चुके हैं। लेकिन फिल्म में नेताओं के टट्टू भी वही हैं और वैसे ही हैं जो कई भारतीय फिल्मों की यात्रा करते करते शांघाई तक पहुंचे हैं। मतलब कुछ भी नहीं बदला है। हम सब टट्टू ही बने रह जाते हैं। अफसरों के बीच की राजनीति की कहानी भी नई उत्सुकता पैदा नहीं करती है। अभय देओल के शानदार अभिनय के अलावा उस प्लाट में ऐसा कुछ भी क्रांतिकारी नहीं है जो फिल्म को सत्यमेव जयते से अलग करती हो। बस सादगी और नाटकीयता का फर्क रह जाता है। अभय देओल के अभिनय की जितनी तारीफ करें कम हैं। फारूख़ शेख का अभिनय अच्छा है लेकिन ऐसा अभिनय तो वो करते ही रहते हैं। वो सिर्फ रोल में शूट करते हैं। उनका पात्र और अभिनय आपके भीतर कोई नया शेड्स नहीं बनाता। कल्की का अभिनय साधारण भर है। वो एक करप्ट बना दिये गए या करप्ट बाप की एक बेटी है जो ईमानदारी के रास्ते पर चल निकली है। लेकिन उसका इस यथार्थ से कोई संघर्ष नहीं है। अंग्रेजी सीखने की तमन्ना रखने वाला टैंपो ड्राइवर ने आकांक्षाओं की उड़ान की अच्छी पैरोडी की है। इमरान हाशमी में बहुत संभावनाएं हैं। शांघाई उनकी यादगार फिल्म होगी।

इसीलिए दिबाकर की शांघाई कई बार सत्तर अस्सी के दशक में बनी फिल्मों जैसी लगने लगती है। कोई तो है जो दोहराने का साहस। दोहराना भी पोलिटिक्स है। कुछ संवाद बेहतरीन है। कुछ फ्रेम बहुत अच्छे हैं। लेकिन मैं इसे महान फिल्म नहीं मानता। महानता इसी में है कि इसने फार्मूले का सहारा नहीं लिया लेकिन जिस पैमाने का सहारा लिया है उस पर ऐसी कई फिल्में पहले भी बन चुकी हैं। पिछले एक साल में पाकिस्तान फिल्म बोल के समानांतर हमारे यहां एक भी फिल्म नहीं बनी है। जिसे देखते वक्त आपका दिमाग झन्ना जाएं। आपका सीना कमज़ोरी महसूस करने लगे। फिर आप तुरंत एक आनंद के लम्हों में तैरते हुए फिल्म देखने लग जाएं। आप पहले बोल देख लीजिए।

शांघाई नहीं चल पाएगी तो मुझे हैरानी नहीं होगी। यही हमारा दर्शक संस्कार है। लेकिन निर्देशक जब जोखिम उठाता है तब दर्शक को भी जोखिम उठाना चाहिए। एक बार कुछ दर्शकों से बातचीत में उलझा था। सब मीडिया से उम्मीदों की लंबी लंबी सूची गिना रहे थे। मैंने एक ही सवाल किया। आप तो हमसे बहुत उम्मीद करते हैं ये बताइये हम आपसे क्या उम्मीद करें। सब चुप। तभी एक दर्शक जो डाक्यूमेंट्री बताकर खारिज कर रहा था बाद में टायलेट में कहता है कि राजनीति इससे अच्छी थी। शांघाई बड़ी फिल्म होती तब जब इसकी कहानी की राजनीति कोई ग्रैंड नैरेटिव पेश करती । इस फिल्म का एक ही संदेश है। इतना सबकुछ होने के बाद भी हम देखते रह जाते हैं। वो भी ठीक से नहीं देखते। अहमदी मारा जाता है तो अपनी व्यक्तिगत लड़ाई में मारा जाता है। जनता तो उसी राजनीति की गुलाम है। टट्टू है जो जय प्रगति जय प्रगति के नारे लगाते हुए अपना टैंपो को कर्ज मुक्त करने के मकसद से उसका हथियार बनती है और फिर उसी हथियार से मारी जाती है।

काश मैं इस फिल्म को देश के तमाम झुग्गी बस्तियों में ले जाकर दिखा पाता। क्योंकि जिनके लिए यह फिल्म बनी है वही नहीं पहुंच पायेंगे। जिनके लिए नहीं बनी है जो समीक्षा और स्टार देखकर या इस लेख की तरह ज्ञान बांटकर खुश हो लेंगे। शांघाई ज़रूर देखिये। अच्छी फिल्म है। लेकिन यह मत बताइये कि ऐसी फिल्म बनी ही नहीं है। बन गई है मैं तो इसी से खुश हूं। दिबाकर पहले हिस्से को और बेहतर कर सकते थे। बेहतर से मेरा मतलब बस इतना ही है कि कहानी जब शुरू होती है तभी सभी को जोड़ ले तो अच्छा है। शायद यही वजह थी कि कुछ मूर्खों को यह डाक्यूमेंट्री लगी थी।

चिड़िया चिड़िया चिड़िया

चिड़िया चिड़िया चिड़िया
उड़ उड़ के आई चिड़िया
घूर घूर के देखे गुड़िया
कहाँ से आई चिड़िया
पंखों से उड़ती चिड़िया
बिस्तर पे रोती गुड़िया
चिड़िया चिड़िया चिड़िया
इधर से उड़ के आई
उधर से उड़ के आई
पंख हैं कि पुड़िया
सोचे है मेरी गुड़िया
हंसती है मेरी गुड़िया
उड़ती है देखो चिड़िया
आसमां की रानी है
बादल इनकी नानी है
चंदा इसका मामा है
सूरज इसका चाचा है
तारों की है सहेलियां
बतियाये सारी रतिया
चिड़िया चिड़िया चिड़िया
(बस गुनगुनाने लगा उसे मनाने के लिए तो हिन्दी साहित्य में भूल वश योगदान हो गया। मेरी चंद्रावती,रामदुलारी,प्रेमदुलारी,भगवती,केसरपति,चंद्रकला,सुमनलता इन तुकबंदियों को सुनकर झूमती रही। तभी मुझे अहसास हुआ कि यह कोई सामान्य रचना नहीं है। इसे तुरंत साझा किया जाना चाहिए। आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आलोचक भी इसे सराहेंगे। नहीं सराह सकते तो अपने घर का पता दे दें..आकर समझाता हूं।)

ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या पर प्रतिक्रियाओं का समग्र पाठ

आज सुबह ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद फेसबुक पर तरह तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। सोचा कि ज्यादातर को एक जगह किया जाए और उन्हें फिर से देखा जाए। नायक खलनायक के बीच बहुत सी बातें हुई होंगी जो आज की पीढ़ी को शायद ही पता चलें। इन्हें देखकर आप और जानने को उत्सुक होंगे। एक व्यक्ति की हत्या से कितनी अलग अलग तरह की आवाज़ें आने लगीं हैं।
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Ranjan Rituraj-
ब्रह्मेश्वर मुखिया नहीं रहे ! शहीद हो गए ! आरोप थे उनपर 'नरसंहार' का ! मामला कोर्ट में था ! पर् मुझे नहीं लगता रणवीर सेना राष्ट्र विरोधी थी - यह मेरी व्यक्तिगत राय है !
पर् जिस तरह की प्रतिक्रया फेसबुक पर् दी जा रही है - वो गलत है ! वरिष्ठ पत्रकार जातिगत रंग देकर लोगों की घृणित प्रतिक्रिया का लुफ्त उठा रहे हैं - मै इसकी निन्दा करता हूँ ! मिथिला में बैठा आदमी 'शाहाबाद' की जमीनी हकीकत नहीं समझ सकता... है !
मै उस क्षेत्र से नहीं हूँ जहाँ नक्सलवाद है - पर् पटना में पढ़ने के दौरान मेरे कई साथीओं को गंगा पार ले जाकर निर्मम हत्या कर दी गयी थी क्योंकी वो जहानाबाद के थे - कुछ समझ में नहीं आया - बस बुत की तरह दोस्तों की लाश देखता रह गया था - सबके चेहर मुझे आज भी याद है ! 'बारा' के ५२ लोगों की हत्या एक रात में हुई थी - मुझे याद है ! मै भी एक इंसान हूँ ! फिर 'सेनारी' में हत्याएं हुई ! तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती राबड़ी देवी ने जातिगत आधार पर् टिका टिपण्णी की थीं ! हत्याएं दूसरी तरफ से भी की गयीं वो भी घोर निंदनीय है ! पर् हम आप लालू दौर के सभी घटनाओं को जिम्मेदार दो , अन्ने मार्ग में रहने वाले उस राजगुरु को नहीं ठहरा सकते थे जो सुबह होते ही 'जातिगत' विशेष को गाली देते हुए अपने दिन की शुरुआत करता था - अगर यह सच है - फिर बिहार कोई कई और दसक लगेंगे ! दिल्ली / न्यूयार्क / लंदन में बैठ कर भी आप और हम एक दूसरे के लिये इतने नीचे स्तर पर् जा कर जातिगत आधार पर् गाली गलौज देंगे या उसको बढ़ावा देंगे - फिर शर्म आती है !
जहाँ तक वरिष्ठ पत्रकार और बाकी के लोग जातिगत आधार पर् टिका टिपण्णी दे रहे हैं - वो बहुत गलत है ! अगर आपके जातिगत टिका टिपण्णी को उचित मान लिया जाए तो भी - एक भाई के कमज़ोर होने से तत्कालीन तो आपका फायदा होगा - पर् अन्तोगत्वा आप ही कमज़ोर होंगे - इस् बात को याद रखियेगा !
"मै भूखा मर जाउंगा - पर् अपने बच्चों के खून में चीन के चंदे से और माओवाद / नक्सल के भीख से मिले पैसों का नमक नहीं मिलने दूँगा " !
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Rajeev Kumar Jha
आपने किसानों को बचाने के लिए "रणवीर सेना" संगठन बनाया जिसकी खूनी भिड़ंत अक्सर नक्सली संगठनों से हुआ करती थी. लेकिन सरकार ने आपको निजी सेना चलाने वाला उग्रवादी घोषित कर के प्रताड़ित किया. बाड़ा में नक्सली संगठनों ने हमारे 37 लोगों को मारा था जिसके जवाब में आपने बाथे नरसंहार को अंजाम दिया और उनके 58 पिल्लों को मार गिराया. 277 लोगों की हत्या से संबंधित 22 अलग अलग आपराधिक मामलों (नरसंहार) में आप अभियु...क्त बनाये गए जिसमें से 16 मामलों में आपको साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया. बाकी 6 मामलों में आप जमानत पर थे. आप पर पांच लाख का ईनाम था और आपने नौ साल जेल में गुज़ारे. आप नपुंसक नक्सलों के नाक में दम करने वाले जाबांज थे. आप जुबां से नहीं, बन्दूक से बोलते थे. बर्मेसर मुखिया, आप तोप थे, बिहार के लाल थे. आपकी आत्मा को शांति तब मिलेगी जब आपकी लडाई आपके जाने के बाद भी जारी रहेगी.
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Prakash K Ray
JD-U leader and MP Shivanand Tiwari calls Mukhiya with respectable 'Ji'. I am reminded of Digvijay Singh calling Osama bin Laden with 'Ji'.
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Shaishwa Kumar
एक भयानक सच्चाई का अंत...रणबीर सेना के ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या
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Awesh Tiwari
अंततः मार दिया गया मौत का मसीहा ब्रह्मेश्वर मुखिया ! यह वह व्यक्ति था ,जिसने 22 बार दलितों और पिछड़ों को मौत के घाट उतारा। इसके इशारे पर बिहार में दलितों और पिछड़ों की बच्चियों के साथ बलात्कार किया गया। सैंकड़ों मासूमों का गर्दन एक झटके से उड़ा देने वाले रणवीर सेना का मास्टरमाइंड ब्रह्मेश्वर मुखिया खुलेआम कहता था कि दलितों और पिछड़ों के बच्चों को मारकर उसने और उसके साथियों ने कोई गलती नहीं की ,क्योंकि बड़े होने पर वे नक्सली ही बनते।
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Ranjan Rituraj
Shaheed Ko Naman !!!
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Prakash K Ray via Ashutosh Kumar
नरपिशाच बरमेश्वर मुखिया की कहानी.....
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Sushil Jha
जातिगत लड़ाई का एक अध्याय खत्म माना जा सकता है क्या.....
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Kumar Alok
लालू यादव को पानी पीकर कोसने वाले ब्रहेश्वर मुखिया उनके राज में महफूज रहे...उनकी हत्या के बाद हालात को सामान्य बनाने की बडी जिम्मेदारी होगी नीतिश सरकार पर ।
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Prakash K Ray
संजीवना रे संजीवना, तू मुखियवा को काट के दामुल पर काहे नहीं चढ़ा रे संजीवना.. -'दामुल' (प्रकाश झा, 1985) का एक संवाद.
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Abhishek Srivastava
मुखिया तो गयो... आइए इस मौके पर अदम को एक बार फिर याद कर लें...
...हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, ज़ार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये...
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Prashant Priyadarshi
उसे ऐसे ही जाना था, वे ऐसे ही गए. कहते हैं तलवार कि धार पर जीने वाले तलवार की धार से ही मरा करते हैं.
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अविनाश दास-
ब्रह्मेश्‍वर मुखिया का मारा जाना हिंसा-अहिंसा की बहसों से ऊपर एक स्‍वाभाविक घटना है। यह न तो कोई चौंकाने वाली खबर है, न ही ब्रेकिंग न्‍यूज। हत्‍यारे मारे जाएंगे। बेबस के हाथों। वंचितों के हाथों।
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Dilip Khan लालू किस तरह ब्रह्मेश्वर की हत्या पर वह लाइन लेंगे जो आप सोच रहे हैं। उसके पास उस दिशा में जाने का कोई हक नही है। लालू बार-बार अपने बयान में ये कहते रहे कि किसानों-मज़दूरों को आपा नहीं खोना चाहिए। ऐसा लग रहा था गोया ब्रह्मेश्वर सिंह (मुखिया) ही किसान-मज़दूरों के प्रतिनिधि हो। लालू जैसे नेता के जमाने में ब्रह्मेश्वर ने सबसे ज़्यादा खून बहाया। लक्ष्मणपुर बाथे राबड़ी के शासन में हुआ (1 दिसंबर 1997) और बथानी टोला (11 जुलाई 1996) लालू के। क्या कर लिया था लालू ने? पूरे मसले पर लालू का बयान सिर्फ़ नीतीश को घेरने तक ही सीमित रहा।
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Sushil Kumar
सैकड़ों हत्याओं एवं नरसंहारों का आरोपी और प्रतिबंधित रणवीर सेना का मुखिया ब्रह्मेश्‍वर सिंह आखिरकार आज तडके मौत के घाट उतार दिया गया | उन चालीस गोलियों की गूंज में क्या कोई सन्देश छिपा है ? कहीं ये "लोक " का "तंत्र" से उठते विस्वास की गूंज तो नहीं ?
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रजनीश के झा
उम्मीद जग रही है, बिहार शायद फिर जलेगा. जाति का घनघोर अँधेरा एक बार फिर बिहार में सर पसार रहा है. मुफ्तखोरों की तादाद बढ रही है और हम अपनी हिफाजत करेंगे. अपनी माटी की हिफाजत खून से करना होगा तो रंग लेंगे अपनी माँ को अपने रक्त से .
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Vijai Pratap
बह्मेश्वर मुखिया को किसी ने नहीं मारा.....अपने हत्यारों का नाम बताने के लिए वह जिंदा नहीं रहा...कोर्ट ने बथानी टोला के फैसले में कहा था कि मौत की असली गवाह तो मरने वाला ही हो सकता है....
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Awesh Tiwari
जिन दिनों एम.एल के नेतृत्व में खेतिहर मजदूरी से सम्बद्ध जातियां राजनीतिक रूप से चेतस हो रही थीं, संगठित हो रही थीं, उन्हीं दिनों बिहार की राजनीति में मध्य जातियों ने सवर्ण वर्चस्व को समाप्त कर दिया था. यह जातीय तनाव का दौर था-सामजिक -आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्व को बनाये रखने के लिए सवर्ण जमींदार आक्रोश मिश्रित छटपटाहट में थे . धीरे-धीरे मध्य जातियों ने पूरी तरह सत्ता स्थापित कर ली थी, सवर्ण जमींदार उनसे लम्बे दौर तक टकराने की स्थिति में नहीं थे, इसलिए सारा आक्रोश और अपने को पुनर्जीवित करने का लक्ष्य हाशिये पर जीती जातियां बन गई,
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Manish Kumar Neurosurgeon
क्या रणवीर सेना को सभी अगडे / पिछड़े / दलित बड़े और मंझोले किसान का समर्थन नहीं हासिल था ? अगर आप घोर नक्सल हैं और आपके बच्चे के खून में नक्सल के चंदे का नमक मिला है फिर भी आपका दिल कहेगा - रणवीर सेना राष्ट्र विरोधी नहीं बल्की किसानों का संगठन था -
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Ranjan Rituraj
मैंने देखा नहीं है पर् मुझे बताया गया है की NDTV ने स्क्रोल किया - " Butcher of Bihar Killed " -
आग उगलने के लिये आप स्वतंत्र हैं - आग में घी डालेंगे - बच के ..बाबा ..आग की लपट बड़ी तेज ...धोती गायब कर देगी !
क्या किसी कसाई की हत्या के बाद एक शहर नहीं पूरा क्षेत्र उबल सकता है ? अगर रणवीर सेना किसी एक खास जाति की संगठन... थी फिर उस जाति की संख्या कितनी है - बिहार में ? मात्र तीन प्रतिशत ! दस करोड़ के जनसँख्या में तीस लाख लोग - वो भी पुरे बिहार / भारत में फैले हुए - क्या कोई अल्पसंख्यक जाति किसी पुरे क्षेत्र को अपने कब्ज़े में ले सकती है ? मै किसी चम्पारण वाले से या मिथिला वाले से कुछ नहीं पूछना चाहता - पर् मै शाहाबाद के लोगों से पूछना चाहता हूँ - की क्या रणवीर सेना सिर्फ एक जाति की सेना थी ? क्या रणवीर सेना को सभी अगडे / पिछड़े / दलित बड़े और मंझोले किसान का समर्थन नहीं हासिल था ? अगर आप घोर नक्सल हैं और आपके बच्चे के खून में नक्सल के चंदे का नमक मिला है फिर भी आपका दिल कहेगा - रणवीर सेना राष्ट्र विरोधी नहीं बल्की किसानों का संगठन था - जिसके बैनर के तले भी हिंसा हुई है ..वैसे संगठन पर् प्रतिबन्ध लगाना शासन का काम है !
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Chandan Mishra
Those who are lauding the murder of chief of Ranvir Sena Brahmeshwar Mukhiya I have one thing to say them, ''even the murder of a murderer can not be justified.'' But, Ranvir Sena killed 50 people, during the 1995 state elections. They killed 10 workers in Haibaspur on the 23 March 1997. They wrote the name of the organisation in blood on the village well before they left. On 11 July 1996, 21 Dali...ts were slaughtered by the Ranvir Sena in Bathani Tola, Bhojpur in Bihar. Among the dead were 11 women, six children and three infants. On 1 December 1997, they killed 61 Dalits, which includes - 16 children, 27 women and 18 men with guns. The same night,disfigured and shot to death 5 teenage girls.[2] Ranvir Sena said about the killings: ''We kill children because they will grow up to become Naxalites. We kill women because they will give birth to Naxalites." On 25 January 1999, there was a massacre of 22 dalit men, women and children by Ranvir Sena in the village of Shankarbigha, Jehanabad due to their alleged Naxalite allegiance. There was another massacre two weeks later in the neighbouring village of Narayanpur, where Ranvir Sena killed twelve lower-caste people. And Now In April of 2012, members of the Ranvir Sena were acquited of Bathani Tola massacre in Bihar. Now I have question can all these be justified. My colleagues are saying the fight of Mukhiya and Ranvir sena was the fight of ''Astitava''. People are saying you can not understand the ground reality and the cause of the rise of Ranvir Sena. How Ranvir Sena came into existence it's all before everyone, but making him a ''martyr''. What a nonsense?
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Prakash Singh क्या जिन भूमिहार परिवारों की हत्याएं हुई। हत्या करने वाले उन नक्सलियों और आतंकियों को सजा मिली है। क्या मुखिया जी यूं ही शौक से हत्याएं करने लगे। क्या किसी की जमीन पर कब्जा करना जाएज है। अपनी जमीन को बचाने के लिए लड़ना नाजायज है।........
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vaibhav sinha-
रणवीर सेना के सरगना रहे ब्रह्मेशवर मुखिया की मौत शायद इसी तरह से ही हो सकती थी। हथियार बंद दस्ते के हाथों, क्योंकि वह खुद सबसे बड़ी सामंती अराजकता का प्रतीक था। जब अप्रैल 1997 में लक्ष्मणपुर-बाथे (जहानाबाद) जनसंहार हुआ था, तब कुछ दोस्तों के साथ मैं भी वहां फैक्ट फाइंडिंग टीम के सदस्य की तरह पहुंचा था। सोन नदी के रास्ते से आए हत्यारों ने गांव में कहर बरपाया था.. झोपड़ी की मिट्टी की दीवारों पर हर तर...फ गोलियों के निशान और जमीन पर खून के धब्बे। 58 लोगों की हत्या। उसी समय वहां अटल बिहारी वाजपेयी भी दौरे पर थे। लोग डरा रहे थे कि रणवीर सेना के लोग हमपर निगाह रख रहे हैं, वाजपेयी से सवाल किए तो वे पटना तक पहुंचने नहीं देंगे, रास्ते में ही मारे जाओगे। उस समय भाजपा का पूरा हाथ रणवीर सेना पर था, वाजपेयी हमेशा की तरह घड़ियाली आंसू बहाने पहुंचे थे। सेना के लोग भाजपा से लिए प्रचार करते रहे हैं। पर भाजपा वह दल है जो आज शायद सबसे पहले अपने इस गुर्गे की हत्या पर खुश हुआ होगा।
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If Brahmeshwar Singh is a martyr I can't help it. Of course, all tyrants are martyrs for some people. Is this the reason that we should not celebrate their deaths? Yesterday I met a Bhumihar and he was abusing Maoists and ML. I have no clue how to differentiate between political violence and political struggle.
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Ashok Kumar Pandey
रणबीर सेना के मुखिया की मौत जश्न की खबर हो न हो...मुझे कोई दुःख तो नहीं ही है इसका. बहुत संभव है यह ह्त्या उनके अपने किन्हीं आतंरिक विवाद के कारण हो...लेकिन क़ानून के पंजे (?) से सबूतों के अभाव में बच कर निकल जाने के बावजूद उनकी आपराधिक गतिविधियों के बारे में शायद ही किसी को संदेह हो. वंचित जन के खिलाफ उनका हिंसात्मक आंदोलन आज़ाद भारत के इतिहास के कुछ सबसे भयावह हत्याकांडों का जिम्मेदार रहा है. आज जब कुछ राजनीतिक दलों के लोग उनकी लगभग प्रशस्ति गा रहे हैं, तो समझ लेना चाहिए कि सामाजिक न्याय की बात करते-करते वे किस पाले में पहुँच चुके हैं...
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ए गुड़िया तू कैसी है

ए गुड़िया तू कैसी है
रानी जैसी लगती है
राजमहल तो है नहीं
फिर काहे को रानी है
दुनिया एक कहानी है
न राजा है न रानी है
सुख दुख की रवानी है
फिर काहे को रोती है
फिर काहे को हंसती है
चाँद के जैसे निकलती है
रात भर घटते बढ़ती है
चंदा मामा तेरा दुष्टू है
तारा मामी तेरी बुद्दू है
क्यों इनसे बातें करती है
क्या क्या इनसे कहती हैं
सूरज ही तेरा भैया है
रात के डर से छुपता है
दिन के साथ निकलता है
तब तो तू बस सोती है
ऐ गुड़िया तू कैसी है
गोद में मेरी रोती है
कंधे पे मेरे सोती है
उचक उचक कर हंसती है
जाने क्या क्या कहती है
घर ऐसा भी कहीं होता है
तेरा हर कोई पहरा देता है
बिस्तर कितना छोटा है
तकिया कितना मोटा है
काजल कितना काला है
सांवली है तू कि गोरी है
पर गुड़िया बड़ी प्यारी है
छोटा सा संसार तुम्हारा
प्यारा सा घर-बार तुम्हारा
तू तो एक कहानी है
गुड़िया बड़ी सयानी है
फिर काहे तू रोती है
फिर काहे तू सोती है
((आजकल अपने बेटी को गोद में लिये लिये कुछ गुनगुनाने लगता हूं। फिर टाइप कर देता हूं। जब वो बड़ी होगी तो दिखाऊंगा।))

लक्ष्मी आई है, बधाई हो

पता नहीं क्यों इस बार अच्छा नहीं लगा। जब भी किसी ने कहा कि लक्ष्मी आई है तो मन उदास हो गया। समझने की कोशिश कर रहा था कि क्यों कहा जा रहा है? बेटी आई है। लक्ष्मी कैसे आ गई? क्या ये सात्वंना में कहा जा रहा है? बेटा आता है तो क्या कहा जाता है? बेटा लक्ष्मी है या बेटी लक्ष्मी है। किसी के नीयत पर शक कैसे कर लूं। क्या पता कोई सचमुच उसी ईमानदारी से बधाई दे रहा हो। मेरी नन्ही सी जान का स्वागत कर रहा हो। चलिए कोई नहीं लक्ष्मी आई है। जैसे ही किसी वाक्य के बीच से चलिये सुनाई देता फोन पर कान ठिठक जाते। दो दो लक्ष्मी हो गई। क्या किसी ने ताना दिया? उसे मेरे बारे में मालूम नहीं। अभी भी कॉलर पकड़ने में दो मिनट नहीं लेता। शायद इसी वजह से कई लोगों ने कुछ नहीं कहा। मगर कुछ था जो मोबाइल के उस पार से आ रही आवाज़ों में खटक रहा था। वो वही कह रहे थे जो मेरे डर से नहीं कहना चाह रहे थे। लक्ष्मी आई है।

दरअसल जो भाषा हमें विरासत में मिलती है वो कई पीढ़ियों की सोच से बनी होती है। जिसमें हम इतना सहज हो जाते हैं कि लगता ही नहीं कि कुछ ग़लत है। कई बार यही सहजता नीयत ठीक होने के बाद भी वो चूक करा देती है जो शायद हम नहीं करना चाहते हो। उसी भाषा की संरचना में हम नहीं चाहते हुए भी जातिवादी सोच को व्यक्त कर देते हैं, नहीं चाहते हुए हम और भी कुछ कह देते हैं। एक ऐसे समाज में जहां लड़कियों को इसलिए नहीं आने दिया जाता है कि दहेज कहां से देंगे, उसे वारिस कैसे बना देंगे,उस समाज में लड़कियों का स्वागत लक्ष्मी कह कर किया जा रहा है। कितना अजीब है। दूसरी बेटी के आने से जो भावनात्मक और पारिवारिक समृद्धि हुई है वो मौद्रिक समृद्धि से कहीं ज्यादा है। बल्कि महंगे अस्पताल का बिल चुकाने के बाद लक्ष्मी तो चली ही गई। फ्री में नहीं आई है। दरअसल खूब समझता हूं बेटियों को दुर्गा और लक्ष्मी कहना। ये उसी पुरुषवादी सोच की देन है जो सीधे तंज नहीं करना चाहती तो इन दो देवियों के नाम पर करती है। दुर्गा और लक्ष्मी होंगी अपनी जगह मगर मेरी बेटियां इन दोनों का रूप न ही बनें तो अच्छा । कितना दरिद्र है ये समाज। बेटियों को बराबरी देने का स्वांग रच रहा है लेकिन उनके स्वागत की कोई स्वतंत्र शब्दावली भी नहीं है।

संतान का बंटवारा हमने समाज और संपत्ति से किया है। उसी के तहत हम लिंग के आधार पर इस बंटवारे को आगे बढ़ाते रहते हैं। मुझे मालूम है कि बेटियां अब हर तरह से वारिस हैं। तब भी वारिस हैं जब पिता के पास बेटे हैं और तब भी वारिस हैं जब पिता के पास बेटा नहीं है। मुझे यह भी मालूम है कि समाज की सच्चाई नहीं बदली है। मैं ऐसे चिरकुट लोगों की सोच पर मीलों लिख सकता हूं। लक्ष्मी कहना सामंती सोच है। फिलहाल वो मेरी बच्ची है। प्यारी सी। जिसे देख कर ही ऐसी खुशी मिलती है जितनी लक्ष्मी और दुर्गा की मूर्ति को देखकर कभी नहीं मिली होगी। वो आई है तो मेरी बेटी बनकर। मिथकों से उतर कर मिथकों में नहीं आई है। हमने कभी उसकी नाक, उसकी आंख, कान का मिलान दुर्गा लक्ष्मी से नहीं किया। बल्कि ललाट मिलाया बुआ से, कान मिलाया नानी से, नाक मिलाया पापा से, आंखें उसकी अम्मा से,हाथ मिलाया दीदी से। लक्ष्मी से तो कुछ नहीं मिला। फिर क्यों लक्ष्मी आने की बधाई। बेटी हुई है उसे सीधे बधाई दीजिए। दायें बायें मत कीजिए। मेरी बेटी राज करने नहीं आई है। जीने आई है।
( ये मैं उसके लिए गाता रहता हूं। खुद लिखा हूं।)
दूर गगन से आई हो
चांद चमन से आई हो
किस दुनिया से आई हो
किस दुनिया में आई हो
जिस दुनिया में आई हो
एक छोटी सी दीदी है
एक प्यारी सी मम्मी है
एक अखड़ूं से पापा हैं

ये छोटी सी दुनिया है
तुम छोटी सी मुनिया हो
तुम छोटी सी गुड़िया हो
हम खेल रहे हैं तुमसे खूब
तुम झेल रही हो हमको खूब
दूर गगन से आई हो...

लघु प्रेम कथा-लप्रेक

1) स्पाइडरमैन की तरह मेट्रो पर सवार जब वह आनंद विहार उतरा तो मर्दानापन दुरुस्त करने के डाक्टरों के दावों से घिर गया। वहां से नज़र हटी से मशहूर चाट की दुकानों से होती हुई की रिंग,छोले,तरह तरह के मोजों के बीच से टर्न लेती हुई उस आटो स्डैंट पर टिकी जहां वो आई तो सही समय पर लेकिन दुप्पटे का नकाब उतारना भूल गई। उस वक्त आटो से ऐसी कई नकाबपोश लड़कियां उतरीं थीं। बाइक सवारों की पिछली सीट पर भी ऐसी ही लड़किया गुज़री थीं। शिखर और राजश्री गुटखा की लड़ियों से बचते हुए आनंद विहार की आवाजाही में उसकी चिल्लाहट खो गई। कोई सुन ही नहीं रहा था। सब कानों में ईयर पीस ठूंसे सीढ़िया चढ़े जा रहे थे। यहां सब एक दूसरे से पराये हैं। बुदबुदाते हुए जब उसने मोबाइल का कॉल बटन दबाया तो एक जैसे कई रिंग टोन बजने लगे। एक जैसे दुपट्टे, कालर ट्यून और ईयर पीस के दौर में हमारा इश्क भी आनंद विहार जैसा है। अराजक चौराहा।

2)मेट्रो ने अचानक उनकी गली को बदल दिया। अनजाने लोग आने जाने लगे। दोनों ने दस बाई दस के कमरे के ख्वाब को दुकान में बदल दिया। खुद महफूज़ जगह की तलाश में मेट्रो से दिल्ली घूमने लगे। वो लेडिज़ कूपे में बंद हो गई और ये जेन्ट्स कूपे में। उनका सफर ऐसे बंट गया जैसे खाप आ गया हो। उसकी शिकायतें बढ़ने लगीं। जब कहीं पहुंचकर उतरने के बाद ही मिलना हो तो फिर सफर का झंझट क्यों? यही तो तुम नहीं समझती हो। कुछ तो हो जीवन में कि तुमसे मिलने की बेकरारी बढ़ती जाए। भोजला पहाड़ी की ऊंचाई से भी चितली कबर के चौराहे की भीड़ में तुमको पहचानने लगा था। बात सफर की नहीं है,बात अनजाने रास्तों पर सफर की है। इश्क़ में अजनबी न रहे तो इश्क नहीं रहता। )

दुष्चक्र के भंवर में भोजपुरी

हम रउवा सब के भावना समझतानी। तमिल भाषी और उच्च स्तरीय अंग्रेज़ी बोलने वाले गृह मंत्री पी चिदंबरम ने भोजपुरी की इस एक पंक्ति को बोलने के लिए कितना अभ्यास किया होगा । चिदंबरम ने हिन्दी के लिए कभी अभ्यास नहीं किया। चिदंबरम की छवि या सियासी मंशा की विवेचना हो चुकी है। संसद में भोजपुरी बोलने वाले कितने सांसद हैं लेकिन किसी ने भोजपुरी में कभी भाषण दिया होगा इसका इल्म मुझे नहीं हैं। मैं अपने प्राइम टाइम शो में भोजपुरी के वाक्य बोल देता हूं। पंद्रह साल पहले नहीं बोल पाता। अब शायद इसलिए कि सदियों से विस्थापित होकर अपने श्रम से दाल रोटी कमाने वाला भोजपुरी समाज कहीं न कहीं बराबरी की स्थिति में आता जा रहा है। यह ठीक है कि भोजपुरी का साहित्य मराठी या बांग्ला की तुलना में कुछ भी नहीं है लेकिन भोजपुरी पहचान बनने की भाषा बनने लगी है। श्रम की भाषा तो हमेशा से रही है। देश के पहले राष्ट्रपति देशरत्न राजेंद्र प्रसाद भोजपुरी बोलते थे। उनके ही प्रयास और प्रेरणा से भोजपुरी की पहली फिल्म गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो बनी थी। आज भोजपुरी फिल्मों का अपना बाज़ार है। दिल्ली में लाखों लोग भोजपुरी बोलते मिल जायेंगे। दौर ही कुछ ऐसा है। बाज़ार मिल जाता है तो सरकार पाने की चाहत होने लगती है।
 भोजपुरी भाषी राजनीतिक समाज जातिगत पहचान का सर्वोच्च मानता रहा है। अब कहीं न कहीं वो भोजपुरी को भी इस पहचान में जोड़ना चाहता है। हिन्दी के समानांतर पहचान की चाहत नज़र आने लगी है। अब जब वो महानगरों में अपनी आर्थिक घुसपैठ से राजनीतिक घुसपैठ की दिशा में बढ़ने लगा है उसकी मांगे कुलीन होने लगी हैं। भाषा को आठवीं अनुसूचि में शामिल करने की मांग कुलीन मांग है। इससे भाषा समाज को व्यापक फायदा नहीं होता लेकिन राजनीतिक पूंजी ज़रूर बन जाती है। पी चिदंबरम उसी राजनीतिक पूंजी को हासिल करने के लिए भोजपुरी प्रेम का प्रदर्शन कर रहे थे।
 भोजपुरी भाषी भी तो यही चाहते हैं। दिल्ली से लेकर मुंबई तक में उनकी भाषा की ताकत स्वीकार की जाए। जिन इलाकों में भोजपुरी बोली जाती है वहीं भोजपुरी की क्या हालत है? कांवेंट स्कूलों की चाहत क्या भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में डालने से कम हो जाएगी? क्या भोजपुरी के गानों में जो अश्लीलता और लंपट तत्वों की भरमार है, वो दूर हो पाएगी? भोजपूरी के पास क्लासिकल संगीत का खजाना है। उसे हिन्दी और अंग्रेजी का कुलीन तबका पाल रहा है। क्या हम चौपाई,ठुमरी और कजरी को भोजपुरी में फिर से स्थापित कर पायेंगे? सरकार या प्रवेश परीक्षा में भाषा को शामिल कराकर उछलने से पहले सोचना होगा कि जब हिन्दी ही अंग्रेजी होते इस समाज सरकार में सरकती जा रही है तो भोजपुरी कैसे टिकेगी।
 मेरा मतलब भाषा के वजूद के मिटने से नहीं है। मेरा सवाल है कि क्या आठवीं अनुसूची में किसी भाषा को शामिल करने से यथार्थ की चुनौतियां मिट जाती हैं? क्या यह सिर्फ भोजपुरी समाज के भीतर पैदा हुए कुलीन तबके की चाह नहीं है, जिसे वो महफिलों में शान से बता सके कि हमारी भोजपुरी भी कम नहीं है। महफिलों में भोजपुरी बोलने से कौन रोक रहा है। मुंबई की फिल्मों में हमारी शारदा सिन्हा जी उच्च स्तरीय भोजपुरी गीत गाकर चली आती हैं। अश्लील गाने से मना कर देती हैं। भोजपुरी के सम्मान के लिए जो लोग इस तरह से संघर्ष कर रहे हैं उन्हें आठवीं अनुसूची के सहारे की ज़रूरत नहीं है। देखना होगा कि भोजपुरी जातिगत वोट बैंक का दूसरा नाम तो नहीं है। अगर ऐसा है तो हासिल कुछ नहीं होने वाला। ये और बात है कि चिदंबरम को भोजपुरी बोलते सुना तो मैं भी उछलने लगा । कौन नहीं चाहेगा कि उसकी बोली उसकी भाषा सत्ता और समाज की हर देहरी और शिखर पर बोली जाए।
लेकिन यह मौका भोजपुरी को संकीर्णता के दायरे में धकेलने का नहीं है। हिन्दी का साम्राज्य बढ़ेगा तो दरकेगा भी। कोई भी साम्राज्य जब बहुत फैल जाता है तब टूटन होने लगती है। मैथिली और भोजपुरी की मांग उसी दिशा में देखा जाना चाहिए। फिर भी हिन्दी का वर्चस्व रहेगा। आज सत्ता प्रतिष्ठान अंग्रेज़ीमुखी चुके हैं। मध्यप्रदेश में उद्योगपतियों ने मांग की है कि अधिकारियों को अंग्रेजी आनी चाहिए तभी वो निवेश कर सकेंगे। इस हालत में जब हिन्दी के लिए लड़ने वाला नहीं है तो भोजपुरी के लिए कौन लड़ेगा। जैसे जैसे हम हिन्दी और बोलियों को अलग करेंगे, हम हर लड़ाई हारेंगे। छोटी लड़ाई की जीत, बड़े युद्ध में मिली हार से कभी बेहतर नहीं हो सकती।
 हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हम भाषा को सांकेतिक महत्व ही देते हैं। बाज़ार और समाज के दम पर हमारी बोलियां और भाषाएं टिकी रही हैं। हो सकता है मैं संविधान के आठवें अनुसूचि के क्रांतिकारी प्रभाव से अवगत नहीं हूं लेकिन सतर्क ज़रूर रहना चाहता हूं। चंद संस्थाओं के बनने और फंड के लूट खसोट से कुछ नहीं होता। भोजपुरी भाषी लोग श्रम और जीने के बेहतर अवसर के अभिलाषी हैं। उनमें चाह होगी तो वो भाषा को खुद बचा लेंगे। जैसे उन्होंने मोबाइल फोन में भोजपुरी गानों को अपलोड कर बचा लिया है। ये और बात है कि वो भोजपुरी अश्लीलता से इतनी घिरी हुई है कि आप उसे आठवीं अनुसूची के बाद भी महफिलों में प्रदर्शित नहीं कर पायेंगे। पेज थ्री कभी नहीं हो पायेंगे। लोक गीत तो रहे ही नहीं अब।
(मंगलवार को दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है)

अकेले पड़ते ईमानदार लोग

यह हो सकता है कि एस पी महांतेश नाम के अधिकारी के बारे में आपने नहीं सुना हो। कर्नाटक के चीफ जस्टिस के घर के सामने इस अधिकारी की धारदार हथियारों से मार कर हत्या कर दी गई। जब तक यह अधिकारी अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से लड़ता रहा कर्नाटक के मुख्यमंत्री जो उसी विभाग के मंत्री हैं देखने तक नहीं गए। महांतेश कर्नाटक के कापरेटिव ऑडिट महानिदेशालय में उपनिदेशक थे। इनके आते ही कर्नाटक में ढेरों कोपरेटिव घोटालों का पर्दाफाश होने लगा। कई बार मारने और डराने की कोशिशों के बाद भी महांतेश का इरादा कमज़ोर नहीं हुआ। लेकिन अब यह अधिकारी हमारे बीच नहीं है क्योंकि हमारे कल के ईमानदार भविष्य के लिए लड़ते हुए मार दिया गया है। मुझे नहीं मालूम कि आप नीमच,शिवपुरी,बंगलोर,कोलकाता,गंगानगर और अलवर में महांतेश के बारे में पढ़ते हुए क्या सोच रहे होंगे। शायद यही कि सिस्टम से कौन लड़े। कोई नहीं लड़ सकता। गनीमत है कि महांतेश ने हमारी तरह नहीं सोचा। हमारी सहानुभूति की भी परवाह नहीं की। अपनी और अपने परिवार की ज़िंदगी दांव पर लगाकर एक के बाद एक घोटाले का पर्दाफाश करते चले गए।
 अप्रैल के महीने में दिल्ली में रवींदर बलवानी की हत्या हो गई। पुलिस दुर्घटना बताती रही है। परिवार के लोग हर दूसरे दिन हाथ में बैनर लिये खड़े रहते हैं कि आर टी आई कार्यकर्ता रवींदर बलवानी की हत्या हुई है। उनकी बेटियां समाज और सरकार से गुहार लगाती फिर रही हैं मगर सौ पांच सौ लोगों के अलावा किसी का कलेजा नहीं पिघलता। जुलाई 2010 में गुजरात हाई कोर्ट के करीब आर टी आई कार्यकर्ता अमित जेठवा की गोली मार कर हत्या कर दी गई। ईमानदार अफसरों के सिस्टम से लड़ने और मारे जाने की घटनाएं 2003  में शैलेंद्र दूबे हत्याकांड और 2005 में एस मंजूनाथ हत्याकांड के बाद से मीडिया में जगह तो पा जाती हैं मगर सरकारों पर असर नहीं पड़ता। ईमानदारी का बिगुल बजाने वाले अफसरों को सुरक्षा देने का कानून अटक-लटक कर ही चल रहा है। अगर हम अपने ईमानदार सिपाहियों के प्रति इतने ही सजग होते तो एक मज़बूत कानून बनने में दस साल न लगते।
 संसद में व्हिसिल ब्लोअर विधेयक पड़ा हुआ है। इसमें शिकायत करने वाले को सताए जाने के लिए कोई सज़ा नहीं दी गई है। यहां तक कि बिल में सताने यानी उत्पीड़न को भी विस्तार से नहीं बताया गया है। गुमनाम शिकायत को स्वीकार न करने की बात कही गई है और भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाने वाले को पीड़ित करने वाले अफसरों के लिए दंड की कोई व्याख्या नहीं की गई है। इस कानून की खामियों पर कई बार सार्वजनिक चर्चा हो चुकी है। दरअसल किसी बिगुल बजाने वाले को सुरक्षा देने के लिए कानून का इंतज़ार करना भी ठीक नहीं है। 2004 में ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कानून बनने से पहले भी सुरक्षा का प्रावधना होना चाहिए। इसके बाद भी एस पी महांतेश को कोई सुरक्षा नहीं दी गई।
 यह सबक हमने सीखा है शैलेंद्र दूबे और मंजूनाथ की हत्या के बाद। लोगों के भावनात्मक उबाल का फायदा उठाने के लिए सरकारें उस वक्त तो वायदे कर देती हैं मगर जल्दी ही भूल जाती हैं। उन मामलों का भी पता नहीं चलता जिनके बारे में खुलासा करते हुए ये अफसर जान देते हैं। कुछ मामलों में अपराधियों को पकड़ कर सज़ा तो दे दी जाती है मगर बड़ा ओहदेदार पकड़ा नहीं जाता है। क्या आप जानते हैं कि शैलेंद्र दूबे ने स्वर्णिम चतुर्भुज योजना में तीस हज़ार करोड़ रुपये के घोटाले की बात कही थी। क्या आपको पता है कि उन आरोपों का क्या हुआ? कौन लोग थे जिन्होंने तीस हज़ार करोड़ रुपये का घोटाला किया? क्या शैलेंद्र दूबे की मौत का इंसाफ सिर्फ इसी बात से मिल जाता है कि कुछ लोगों को पकड़ा गया और उन्हें आजीवन कैद की सज़ा दिला दी गई। हमारे सिस्टम ने ऐसा क्या किया जिसके चलते किसी शैलेंद्र दूबे को जान जोखिम में डालने की नौबत ही न आए।वही हाल गुजरात के अमित जेठवा मामले की है। खनन माफियों की कारस्तानियों को उजागर करने वाले उनके आरोपों की जांच पर अभी तक कोई फैसला नहीं आया है। शहेला मसूद का मामला कहां अटका है सबको पता है।
 इतना ही नहीं हमारा ध्यान ऐसे लड़ाकों पर तभी जाता है जब वो मार दिये जाते हैं। मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जिन्होंने बैंक से लेकर कापरेटिव तक के बड़े घोटाले ज़ाहिर किये हैं मगर उनके विभाग ने तरह तरह से प्रताड़ित कर मानसिक रूप से विक्षिप्त कर दिया है। आर टी आई ने बिगुल बजाने वालों को हथियार तो दे दिया मगर भ्रष्टाचार के इस जंग में जान बचाने का कोई सेफगार्ड नहीं दिया। जो भ्रष्ट हैं वो बुलेटप्रूफ जैकेट में चल रहे हैं और जो भ्रष्टाचार से लड़ रहे हैं वो दिन दहाड़े मारे जा रहे हैं। दरअसल अब मान लेना चाहिए कि भ्रष्टाचार को लेकर समाज और सियासत का पक्का गठजोड़ है। जब तक इस गठजोड़ को नहीं तोड़ा जाएगा, महांतेश और मंजूनाथ मारे जाते रहेंगे।
 ब्हिसिल ब्लोअर यानी बिगुल बजाने वाला, सचमुच सिस्टम से लड़ना किसी जंग के एलान से कम नहीं है। मध्यप्रदेश में ही लोकायुक्त के ज़रिये ढाई सौ करोड़ से अधिक की संपत्ति ज़ब्त हो चुकी है। जिस स्तर के अधिकारी पकड़े गए हैं उससे पता चलता है कि भ्रष्टाचार की लूट में सिस्टम के कौन कौन लोग शामिल हैं। जब नीचे के स्तर पर यह हाल है तो ऊपर के स्तर पर भ्रष्टाचार का क्या हाल होगा। और एक सवाल खुद से कीजिए। क्या आपको पता नहीं कि यह सब हो रहा है। क्या आप अपने सामाजिक जीवन में ऐसे भ्रष्ट लोगों से नहीं मिलते हैं। आपकी सहनशीलता तब क्यों नहीं टूटती जब ऐसे लोग सामने होते हैं। तब आप सवाल क्यों नहीं करते। तभी क्यों करने का ढोंग करते हैं जब एक युवा आईपीएस अफसर नरेंद्र कुमार कुचल कर मार दिया जाता है क्योंकि वो खनन माफियाओं पर लगाम लगाना चाहता था।
 दरअसल हम ईमानदारों के इस जंग में ईमानदारी से शामिल नहीं हैं। यह कैसा समय और समाज है कि नरेंद्र कुमार और महांतेश के मार दिये जाने के बाद कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं है। कोई चित्कार नहीं है। राजनीति भी तो इसी समाज से आती है। तभी तो व्हिसिल ब्लोअर्स को सुरक्षा देने वाला विधेयक लोकसभा में पास हो जाने के बाद राज्य सभा में पेश होने का इंतज़ार ही कर रहा है। जल्दी न राजनीति को है न समाज को। हम अपनी पसंद के दल के भ्रष्टाचार से आंखें मूंद लेते हैं और विरोधी दल पर सवाल करते हैं। अपना बचाकर दूसरे का दिखाने से सवाल का जवाब नहीं मिलता। नरेंद्र कुमार और महांतेश का अपराधी कौन है? समाज या सरकार? अगर समाज नहीं है तो उसने सरकार से जवाब मांगने के लिए क्या किया? हम आईपीएल जैसे तमाशे में पैसा देकर भीड़ बन जाते हैं मगर इन अफसरों के लिए सड़कों पर नहीं निकलते। हमारे इसी दोहरेपन की दुधारी तलवार पर ईमानदार अफसरों की गर्दनें कट रही हैं।
 (आज के राजस्थान पत्रिका में छपा है)

मीडिया का काट्जू काल

मेरी नज़र उस शख्स पर टिक जाती है जो चांदनी चौक के फव्वारे के नीचे बैठे लाल किला पर लहराते तिरंगे को देखे जा रहा है। ये वो शख्स है जो उन्नीसवीं सदी से वहां बैठा है। उसने इन रास्तों से मिर्ज़ा ग़ालिब को निकलते देखा है। उसने ग़ालिब से सौ साल पहले फ्रांस में पैदा हुए वोल्तेयर के बारे में सारे किस्से सुन चुके हैं। वोल्तेयर से भी सौ साल पहले पैदा हुए महान अकबर को भी गहराई से जानता है। यह शख्स उन तमाम सदियों की चिन्ताओं के साथ आज़ादी के चौंसठ साल बाद आधुनिक होते भारत पर भड़क उठता है। आस-पास से गुज़रने वाले इस शख्स का नाम जस्टिस मार्कण्डेय काट्जू बताते हैं जो चांदनी चौक के फव्वारे से कुछ किमी दूर मौजूद सुप्रीम कोर्ट से अपनी कलस से इंसाफ़ करता था। लेकिन कई सदियों से बंद पड़ा फव्वारा ही उसका घर है। सर और चेहरे पर कई सदियों की धूल की परतें जमीं हैं। जो हवाओं के कोर से टकराने से उघड़ती रहती हैं। पता नहीं कब कौन सी सदी की परत उघड़ आए और यह शख्स उस दौर को साफ साफ देखने लगे। बकने लगे। उसी बड़बड़ाहट में यह शख्स मांग करता है कि ऐ उर्दू के चाहने वालों,उठो और मिर्ज़ा ग़ालिब के लिए भारत रत्न की मांग करो।

मुझे जस्टिस काट्जू एक दिलचस्प व्यक्ति लगते हैं। एक अच्छा सा इंसान जिसके भीतर कई किताबों ने जज़्बातों का ऐसा निचोड़ पैदा कर दिया है जिसके दम पर वह हमारे समय की समस्याओं का इलाज करना चाहता है। यह जज ब्लागर भी है। जहां उसके कई फैसले पढ़े जा सकते हैं। जो इस बात का प्रमाण है कि इंसाफ लिखते वक्त इस शख्स ने साहित्य,धर्म और इतिहास की चुनिंदा बेहतरीन किताबों का अध्ययन किया है। उसने १९४३ में बंगाल के भीषण अकाल पर निखिल चक्रवर्ती की रिपोर्टिंग भी देखी है और मिरातुल अखबार और संवाद कौमुदी जैसे अखबारों की भूमिका का भी ज़िक्र किया है। यह जज अपने फैसलों में कम्पैशन शब्द की मार्मिक व्याख्या करने के लिए आक्सफोर्ड चैंबर्स जैसे शब्दकोशों का ज़िक्र करता है।  वेश्यावृत्ति पर फैसला देते वक्त दोस्तोयेवस्की,शरत चंद्र चट्टोपाध्याय और साहिर लुधियानवी की मदद लेता है। पर सवाल यह है कि इक्कीसवीं सदी के भारत में जस्टिस काट्जू उन्नीसवीं सदी के बचे हुए एकमात्र शख्स की तरह बातें क्यों करते हैं है।

जस्टिस काट्जू ने अतिरेक के लहज़ें में मीडिया को ललकारा है। उनकी बातें सही हैं। मैं उनकी कई बातों से इत्तफाक रखता हूं। कोई तो है जो खुद को मूर्ख समझे जाने का जोखिम उठाते हुए भारतीयों की बौद्धिकता को फटकार रहा है। लेकिन वो झकझोरने की कोशिश में अन्ना की आलोचना करते हुए खुद अन्ना जैसे क्यों बाते करने लगते हैं।

समाज में विमर्श फैसले की शक्ल में नहीं किये जाते हैं। क्या काटजू ने वोल्तेयर और रूसो को पढ़ते वक्त यह महसूस नहीं किया है। ज्यादातर हिन्दुओं और मुसलमानों को सांप्रदायिक बताकर वे उस समाजिक राजनीतिक प्रक्रिया को अनदेखा कैसे कर सकते हैं जिसने सांप्रदायिकता को बार-बार परास्त किया है। अपने फैसलों में महान अकबर के सुलह-अ-कुल और वाजिद अली शाह का संदर्भ देने वाला जज कैसे भूल जाता है कि गंगा जमुनी तहज़ीब भी इसी समाज देन है।  वो खुद कहते हैं कि भारत सामंती समाज से आधुनिक समाज की तरफ बढ़ रहा है। पुरानी मान्यताएं चरमरा रही हैं। फिर वही कहते हैं कि नब्बे फीसदी लोग अंधविश्वासी हैं। तो फिर वे इस संक्रमण का प्रामाणिक आधार  क्या दे रहे हैं। काट्जू यूरोप की मीडिया की ऐतिहासिक भूमिका तो बताते हैं लेकिन तमाम विसंगतियों के बीच भारतीय मीडिया के शानदार पहलुओं को अपनी ऐतिहासिक व्याख्या का हिस्सा क्यों नहीं बनाते हैं। यह सवाल भी है कि क्या वो सही नहीं कह रहे हैं कि हमने अपने बौद्धिक प्रयासों में वैज्ञानिक सोच को जगह नहीं दी है। सरकार ने सांप्रदायिक सोच के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया। मीडिया अपनी भूमिका से भटका है। क्या यह सही नहीं है कि मीडिया ने बाबाओं की शरण ली है। क्या यह सही नहीं है कि सार्वजनिक राजनीतिक और साहित्यिक समाज से गंभीर विमर्श गायब हो रहे हैं। जो बचे हैं उसे मीडिया या राजनीति किनारे लगा देती है।

समस्या यह है कि जस्टिस काट्जू ने इतना पढ़ लिया है कि सब गडमड हो गया है। गांव देहात में ऐसे लोग होते थे जो एम पास करते करते गड़बड़ा जाते थे। लोग उनका मज़ाक उड़ाने लगते थे। तब भी जबकि वो कभी-कभी सही बातें करने लगते थे। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम भी उनकी सही बातों को छोड़ उन बातों को पकड़ रहे हैं जो मज़ाक उड़ाने के लायक ही हैं। नब्बे फीसदी आबादी को मूर्ख बताकर वो अपनी बात कहेंगे तो मूर्खों का क्या है वे तो काटजू साहब को मूर्ख ही कहेंगे न। एक पागल दूसरे को भी पागल ही कहता है। फिर भी मैं खुश हूं कि कोई तो है कि पढ़ने की बात कह रहा है। क्या हमारे समाज में ज़्यादा पढ़ने वाले को पागल नहीं कहा जाता है। तो क्या हम पढ़ने को ही गलत करार देंगे? जस्टिस काटजू सही बात कह रहे हैं लेकिन वो गंभीर विमर्श पैदा नहीं कर रहे। उन्हें अपने संदर्भ और लहज़े में बदलाव करना चाहिए। एक ही साथ और एक बयान में सारे समस्याओं का ज़िक्र और समाधान पेश करेंगे तो वो भी बाबाओं की तरह लगने लगेंगे।
(शुक्रवार पत्रिका में यह लेख छपा था। काट्जू साहब पर विशेषांक इकला है)

वीर्योत्पादन एक वैज्ञानिक कर्म है और विकी डोनर शानदार फिल्म है

मुझे तो सारा वर्ल्ड स्पर्म नज़र आता है। डॉ चड्ढा की निगाह से सचमुच दुनिया टपकी हुई वीर्य बूंद लगने लगती है। लालची वीर्य, कंजूस वीर्य से लेकर वीर्यों का ऐसा सामाजिक विवरण साहित्य में भी नहीं सुना था। विकी डोनर देखते वक्त लगा कि यह हमारे समय की सामाजिक फिल्म है या वैज्ञानिक फिल्म। या फिर रूढ़िवादी या पुरातन हो चुकी आधुनिकता के बीच नई आधुनिकता या उत्तर आधुनिकता के लिए स्पेस बनाती हुई फिल्म है। स्पर्म डोनर। दरियागंज की उन दुकानों में जहां लोग हिचकिचाते अपना चेहरा छुपाते जाते हैं निर्देशक शुजीत सरकार ने उसे आम मोहल्ले की दुकान में बदल दिया। औलाद चाहिए टाइप की नारेबाज़ियों को ऐसी कथा में बदल दिया कि आप पहली बार उन दुकानों और उनमें बैठे चड्ढे भल्ले की शक्लों को भी देखने लगे। अचानक आपकी शर्मसार सी होने वाली हैरानी एक ऐसी कथा में बदल जाती है जिसके साथ आप भी खुलने लगते हैं। मेरे सीट की बगल में बैठी तीनों महिलाओं एक दूसरे के कंधे पर लोट पोट होने लगती हैं। विकी डोनर खूबसूरत फिल्म की तरह सामने चलने लगती है।


सिनेमा में दिल्ली के आगमन ने कैसे कैसे किस्सों को जगह दी है। कई शहरों, गांवों, बोलियों और संस्कृतियों से आए लोगों से दिल्ली बसती चली जा रही है। ज़ाहिर है इसके किस्से में इंसानी ज़िंदगी के भावनात्मक उतार-चढ़ाव ही होंगे। लाजपत नगर फोर और सी आर पार्क के बीच बनती प्रेम कथा, रोहिणी की दुकान, दरियागंज, डीवीडी के ज़रिये आर्यपुत्र का वीर्योत्पादन,निराकार भाव से नौकरी करती डॉ चड्ढा की क्लिनिक में बैठी वो महिला। जिसके सामने सबकुछ एक रोज़मर्रा के दफ्तरीय कर्मकांड की तरह गुज़रता चला जा रहा है। विकी डोनर का जन्म सिनेमा की कहानी के आधुनिकतम नायकों का जन्म है। सास बहू का साथ शराब पीना और दहेज़ के सामान के साथ सास के लिए ब्रीफकेस न आने का दर्द आज भी तमाम घरों में बचा हुआ है लेकिन पहली बार किसी ने इस दर्द को दारू की बोतलों के साथ साझा करवाने की कोशिश में सास बहू की बराबरी के पुराने पड़ चुके सारे पैमानों को तोड़ दी है।

लाजपत नगर के भीतर भी सी ब्लाक टाइप मेंटालिटी की मौजूदगी और उसका ज़िक्र बताता है कि हम बिना पूर्वाग्रहों के नहीं रह सकते। बी ब्लाक और सी ब्लाक टाइप पूर्वाग्रहों की खोज आधुनिकतम है। इसी के साथ पूर्वाग्रहों का पुराना नैरेटिव भी मौजूद है। बंगाली बनाम पंजाबी । दारू नहीं तो मछली नहीं। बंगाली मर्द नहीं होते तो बंगालियों की फटती है। एक उत्तर आधुनिक दादी की मौजूदगी बता रही है कि अब हमारे घरों में ऐसी पीढ़ी बुढ़ा रही है जिसने आधुनिकता का मज़ा चखा है और वो इसे नई पीढ़ी के साथ बांटना चाहती है। सी आर पार्क के बंगाली बाबा, बंगाल की उस शानदार आधुनिकता का प्रतिनिधित्व करते हुए पुरातन दिखने लगते हैं, एक ऐसा किरदार है जो इस फिल्म में फिर से अपनी आधुनिकता को परिभाषित करता है। खोजता है। विभाजन की बची खुची स्मृतियां गुरुद्वारा रकाबगंज और दुर्गापूजा के पंडाल में घुलने मिलने लगती हैं। पगड़ी बिना सरदार और संस्कृति बिन बंगालन की दिल्ली अतीत से पूरी तरह मुक्त हो चुकी है।

पहली बार यह फिल्म दिल्ली के पूर्वाग्रहों की पोल खोल देती है। चड्ढा ने अरोड़े का भी धंधा कर लिया। भल्ले चड्ढे अरोड़े। धंधे में सब एक दूसरे के सामान हैं। हम समझते थे कि धंधा करने का इनके पास कोई सामाजिक प्रशिक्षण यानी आइडिया है। पर विकी डोनर ने अरोड़े को भी चड्ढे का कस्टमर बना दिया। विकी डोनर आधुनिक घोषित हो चुकी दिल्ली की मानसिकता में आधुनिकता की नई गुज़ाइशें खोजती है। डा चड्ढा को वाकई हर शख्स स्पर्म की तरह दिखता है। हमारी जीन्स में ही नौटंकी है। इस फिल्म में सबलोक जाना किसी शर्मनाक गली से गुज़रना नहीं है बल्कि उस शर्म के पीछे मौजूद किस्सों को पर्दे हटा कर देखना है। प्राचीन विज्ञान। जिस शहर के मंदिरों ने अपनी पहचान प्राचीन शब्द से बनाई हो वहां वीर्यदान कैसे आधुनिक वक्त की खोज होकर मान्य हो सकता है। उसे भी प्राचीन तो होना ही था। महाभारत के टाइम्स से।

इतने जटिल प्रसंगों को सरलता से आपके दिलों तक उतारत देती है यह फिल्म। और हां आशिमा रॉय की सादगी पर लुट आया हूं। दिल्ली में प्रेम कहानियां ऐसे ही बनती हैं। मेरे लप्रेक की तरह। सी आर ब्लाक और लाजपत नगर फोर के बीच की प्रेम कहानी। काफी संयमित अभिनय है। उसका अलग होना सूटकेस बांध कर भयंकर ड्रामेबाज़ी का एलान नहीं है बल्कि विकी डोनर की कहानी को नया मोड़ देना है। हर फ्रेम में वो अच्छी लगती रही। मालूम नहीं कि वो दिल्ली टाइप लगी कि नहीं मगर कहीं न कहीं सी आर पार्क कोलकाता और लाजपत नगर के बीच इतने पलायन के बाद भी उस सादगी के बचे रहने का भी दस्तावेज़ है जो बच जाता है। हमारे लाख तथाकथित आधुनिक हो जाने के बाद भी। जितनी अच्छी फिल्म लगी है उतनी अच्छी आशिमा राय। असली नाम क्या है मालूम नहीं। मगर मार्डन दादी के शब्दों में मुनमुन सेन से भी खूबसूरत। अंशुमान ने भी सहज अभिनय किया है। एक ऐसा दिल्ली वाला जो अपने स्पेस में खुश है। अंशुमान का ही लिखा है पानी दा रंग वाला गाना। कंपोज़ भी किया और गाया भी है। लंबे संघर्ष के बाद विकी डोनर ने अंशुमान को ऐसी अनेक नई कहानियों का दावेदार नायक तो बना ही दिया है।


 तो इस फिल्म को ज़रूर देखियेगा। हमारी आधुनिकता के सामने नए सवालों का सामना करने की चुनौती देती है। अब तक मैं इस बात से इंकार करता रहा कि दिल्ली से मेरा कोई रिश्ता नहीं है। रिश्ता हो नहीं सकता। विकी डोनर को देखते हुए लगता रहा कि कुछ तो है मेरे भीतर जो दिल्ली है। मेरे फेसबुक स्टेट की लघु प्रेम कथाएं सचमुच कहीं न कहीं घट रही हैं। कोई रोहिणी वाला किसी जनकपुरीवाली से मिलने के लिए निकल पड़ा है। ऑटो लेकर,कनाट प्लेस। विकी डोनर एक शानदार फिल्म है।