त्वरितर के अनुचर- मीडिया बनते शोहरतमंद

जब बरखा दत्त को साढ़े चार लाख से अधिक और राजदीप सरदेसाई को पौने चार लाख से ज्यादा लोग ट्वीटर पर फॉलो कर रहे हों तो क्या आप इस सवाल से टकराना चाहेंगे कि व्यक्तिगत फॉलोअरों की संख्या ख़बरों की दुनिया की मान्यताओं को कैसे बदल रही है? क्या प्रसार या दर्शक संख्या के बाद अब फॉलोअर संख्या का भी कोई पेशेवर और व्यापारिक औचित्य हो सकता है? क्या ट्वीटर ख़बरों और संवाद को अख़बार,रेडिया,टीवी,वेबसाइट,एजेंसी जैसी संस्थाओं से निकाल कर व्यक्तिगत मीडिया में बदलता जा रहा है? क्यों पत्रकारिता के बड़े नाम ट्वीटर पर हर पल ख़बरों और क्रायक्रमों को अपडेट करते हैं बल्कि उन कार्यक्रमों के वीडियो लिंक भी देते हैं?

हिन्दुस्तान में राजदीप और बरखा मिलकर करीब साढ़े आठ लाख लोगों तक पहुंच रखते हैं। सीएनएन के एंकर एंडरसन कूपर को दुनिया भर में उन्नीस लाख लोग फॉलो करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय चैनलों की तुलना में हमारे भारतीय पत्रकार कम हैं मगर इनकी संख्या इनके चैनलों के फॉलोअरों से ज़्यादा है। सीएनएन को इकसठ लाख लोग ट्वीटर पर फॉलो करते हैं तो बीबीसी को साढ़े चौबीस लाख और न्यूयार्क टाइम्स को करीब तैंतालीस लाख। जो खबर बरखा, राजदीप, विक्रम,सागरिका, भूपेंद्र चौबे टीवी पर ब्रेक करते हैं,कई बार टीवी से पहले ट्वीटर पर ब्रेक कर देते हैं। यह नई प्रवृत्ति चैनलों के प्रति निष्ठा को भी नए सिरे से बदल रही है। पहले हम अपने चैनल पर ख़बर चलने से पहले किसी को भनक नहीं लगने देते थे अब चैनल से पहले ट्वीट कर देते हैं। शायद इस उम्मीद में कि ट्वीट देखने के बाद कोई टीवी या चैनल ऑन करेगा। हमारे पास कोई भी शोधपरक प्रमाण नहीं हैं कि ट्वीटर की फॉलोओर संख्या मशहूर एंकरों के कार्यक्रमों की टीआरपी या लोकप्रियता के बीच कोई सीधा रिश्ता है या नहीं। फिर हम सब ट्वीटर के ज़रिये दर्शक जुटाओं अभियान में शामिल हो चुके हैं। यह काम पहले संस्था का था अब व्यक्तिगत रूप से पत्रकार भी कर रहा है। मैं इसके गुण दोष पर टिप्पणी नहीं कर रहा मगर इस प्रवृत्ति को नज़रअंदाज़ भी नहीं कर सकते। टीवी के दर्शकों की अनुमानित संख्या तो टैम रिकार्ड करता है और उसका मार्केटिंग मतलब भी होता है। ट्वीटर पर फॉलोअर की संख्या का भी कभी मार्केटिंग मतलब ज़रूर होगा। ख़बर ट्वीट होते ही प्रतिक्रियाओं की भरमार लग जाती है। मैं खुद अपने कार्यक्रम के ज़रिये दर्शकों से संवाद करने से पहले ट्वीटर पर भिड़ चुका होता हूं। इस तरह जो हंगामा टीवी देखकर मचना चाहिए था वो हलचल टीवी के पत्रकार टीवी से दूर ट्वीटर की दुनिया में पैदा कर रहे होते हैं। अब पहले से पता होता है कि अमुक दर्शक क्या सोच रहा है।



पहले न्यूज़ एजेंसी के मार्फत ख़बरें फ्लैश की तरह आती थीं अब हर कोई फ्लैश कर रहा है। यहां तक कि पीटीआई और यूनीआई भी ट्वीट कर रहे हैं। अखबार, टीवी और पत्रकार सब फ्लैश करने के काम में लगे हैं। दुनिया भर में मशहूर रॉयटर न्यूज़ एजेंसी को चौदह लाख लोग ट्वीटर पर फॉलो करते हैं। न्यूज़ एजेंसियां भी संस्थानों को किराये पर ख़बर देने के अलावा अपने फॉलोअर में फ्री की बांट रही हैं। मोबाइल फोन पर ट्वीटर ख़बरों का बड़ा माध्यम बनने लगा है। ट्वीटर पुराने माध्यमों से होड़ करता हुए एक नए माध्यम के रूप में स्थापित हो चुका है। जो काम वेबसाइट, यू ट्यूब या फेसबुक नहीं कर सके, न्यूज़ के मामले में ट्वीटर ने कर दिखाया है। कई लोग तो ऐसे भी हैं जो वेबसाइट से ख़बरों को उठाकर ट्वीटर पर लिंक भेजते रहते हैं। एक नया पाठक और दर्शक वर्ग है जो किसी पत्रकार या चैनल के विशेष काम को उस तक पहुंचे बिना देख रहा है या सराह रहा है। बल्कि अब चैनल का दर्शक से सीधा रिश्ता कमज़ोर पड़ रहा है और उसके पत्रकारों का सीधा रिश्ता बन रहा है। वीडियो लिंक ट्वीट करने से हो सकता है कि फॉलो करने वाले लाखों लोगों ने उसे देखा हो मगर इस काम के लिए ये लोग उस चैनल पर नहीं गए हों। कुल मिलाकर खबरों के प्रति हमारी सोच को बदल रही है। जो हो रहा है उसे हम जल्दी देखना शुरू कर दें।


यह सब नए सवाल हैं जिनपर सोचा जाना चाहिए। ख़बरों की दुनिया बदल रही है लेकिन ध्यान रहे कि ख़बरों की मौत नहीं हो रही है। ट्वीटर ने ख़बरों की परिभाषा नहीं बदली है। ख़बरों का स्वरूप ज़रूर संक्षिप्त हो गया है। लोग तीन पंक्तियों में प्रतिक्रिया दे रहे हैं और इस तरह से टीवी पर चलने वाली लंबी बहसों और अख़बार में छपने वाले लंबे लंबे संपादकीय से आज़ाद विचारों की नई कड़ियां आपस में टकराने लगती हैं। निश्चित रूप से इसका हमारी विचार शैली पर असर पड़ रहा है। आखिर नेताओं और फिल्म अभिनेताओं ने ट्वीटर पर प्रेस कांफ्रेंस करना क्यों शुरू कर दिया है? सुष्मा स्वराज से लेकर शशि थरूर और अभिताभ बच्चन तक अपनी बात सीधे रख रहे हैं। अमिताभ बच्चन को उन्नीस लाख लोग फॉलो करते हैं। उन्हें प्रेस कांफ्रेंस की अब कितनी ज़रूरत रह गई होगी। इसलिए वे अपने ट्वीट के ज़रिये मीडिया की खिंचाई करने से नहीं चूकते। दिग्विजय सिंह को भले ही ग्यारह हजार लोग फॉलो नहीं करते मगर उनके ट्वीट की चर्चा ट्वीटर से लेकर टीवी और अखबार तक में होने लगती है। दलाई लामा को तीस लाख लोग फॉलो करते हैं। क्या ये लोग खुद में मीडिया नहीं बन रहे हैं? मीडिया ने आम लोगों को छोड़ खास किस्म के वर्गीय चरित्र वाले लोगों से सांठ गांठ की और अब यही कुलीन ट्वीटर के ज़रिये अपने आप में मीडिया बन गया है।कहीं ट्वीटर मदर मीडिया या मातृ-माध्यम तो नहीं बन रहा जिस पर तमाम तरह के माध्यम आकर अपना नया वजूद खोज रहे हैं। ट्वीटर जिसे हिन्दी में मैं त्वरितर कहता हूं, ख़बरों की रफ्तार और प्रतियोगिता को बदल रहा है।

क्या इससे टीवी के कंटेंट में बदलाव आ रहा है? लोग टीवी पर ख़बरों के लिए आ रहे हैं या किसी और चीज़ के लिए। टीवी की नई चुनौतियां सामने आ रही हैं। इसीलिए आप देखेंगे कि टीवी पर ख़बरों की जगह विचार-बहस के कार्यक्रमों की भीड़ बढ़ गई है। ये विचार बहस के कार्यक्रम कल को अखबारों के संपादकीय पन्नों के कंटेंट को कैसे बदलेंगे? वहां भी तो वही जाने पहचाने लोग लिख रहे हैं। जैसे टीवी में पांच दस लोग ही बोल रहे हैं। अखबारों के कोने में छपने वाली संक्षिप्त ख़बरें टीवी पर स्पीड न्यूज़ बनकर दौड़ रही हैं। स्पीड न्यूजड एक तरह से टीवी का ट्वीट बन गया है। ये और बात है कि अख़बारों में अभी भी रिपोर्टिंग हो रही है। ख़बरें गंभीरता और गहराई से छप रही हैं। लेकिन ट्वीटर ने रिपोर्टिंग को भी बदला है। ज़्यादातर रिपोर्टर अब अपने फॉलोअर के बीच ख़बरों को ब्रेक कर संतुष्टि पा रहे हैं। रिपोर्टरों के बीच पेशेवर प्रतियोगिता अब उनके चैनलों पर नहीं होती बल्कि ट्वीट पर होती है। मैं कोई निष्कर्ष नहीं दे रहा लेकिन लगता है कि मीडिया संस्थानों और व्यक्तिगत मीडिया के बीच एक जंग चल रही है।

इस पूरे बदलाव में हिन्दी धीमी रफ्तार से बढ़ रही है। कई फोन ऐसे हैं जो हिन्दी के फोन्ट को पठनीय नहीं बनने देते। लिहाज़ा रोमन में लिखना पड़ता है। हिन्दी में चैनलों और उनके एंकरों के फॉलोअर की संख्या चंद हज़ार ही हैं। टैम के आंकड़ों के मुताबिक हिन्दी के लोग गुमान में रहते थे कि अंग्रेजी से कई गुना हिन्दी के दर्शकों की संख्या है। मगर ट्वीटर ने इस धारणा को ध्वस्त कर दिया है। हिन्दी में शायद ही कोई एंकर है या चैनल है जिसके फॉलोअर की संख्या पचास हज़ार भी हो। इस बदलाव पर खुल कर सोचा जाना चाहिए। मेरी तरह क्या आप भी ट्वीटर पर ख़बरों को फॉलो करते हैं? अनुचरण बनने की होड़ मची है ट्वीटर पर तो बताइये आप लीडर हैं कि फोलोअर हैं?
(यह लेख दैनिक भास्कर में शनिवार को प्रकाशित हो चुका है)

मूर्तियों में जड़ मत करो विवेकानंद को

गौरव की मुद्रा में शांत भाव से बाजूबंद किये सामने देखते हुए विवेकानंद की मूर्तियां और तस्वीरों को किसने नहीं देखा होगा। इन मूर्तियों में ढाले गए विवेकानंद दुर्लभ साहस के प्रतीक बना दिये गए हैं। मूर्तियों की ऊंचाई ने विवेकानंद से हमारी दूरी और बढ़ाई है। वो श्रद्दा के ह्रदय स्थल में तो बने रहे लेकिन उनकी प्रासंगिकता सिर्फ याद कर लेने भर में नहीं हैं। जब से एक राजनीतिक विचारधारा ने उनको अपना प्रतीक बना लिया,उनके गेरूआ का रूतबा सियासी समझा जाने लगा। आज भले ही यह दुनिया विवेकानंद के विचारों से बहुत आगे निकल गई है लेकिन उनके विचार इसी दुनिया में विचरन कर रहे हैं। लेकिन जब तक हम विवेकानंद को उनकी विशालकाय मूर्तियों से निकाल कर एक सामान्य स्तर पर नहीं लायेंगे उनके विचार हमेशा असंभव या अप्रासंगिक जान पड़ेंगे। युवा जीवन में उच्चतम आदर्श की परिकल्पना में उनकी मूर्ति या तस्वीर भले ही पहले नंबर पर हो लेकिन यह भी तो सच है कि कितने लोग हैं जो विवेकानंद के आदर्शों पर चल निकलते हैं। गांधी की तस्वीर थाने में टांग देने से थाने अहिंसक नहीं हो जाया करते।

विवेकानंद होना क्या है? उनकी जीवन यात्रा पर नज़र डालें तो आप पायेंगे कि निरन्तर अपने चरित्र को परखते रहना ही विवेकानंद होना है। उन्होंने सन्यास को अपनाया मगर संसार को नहीं त्यागा। एक सन्यासी तमाम लोकों में भटकता रहा मगर अपने ख्यालों में मां की चिन्ता से कभी मुक्त नहीं हो पाया। अपने पिता की मृत्यु के बाद विरासत में मिले संयुक्त परिवार के मुकदमों से उबरने की चिन्ता बराबर बनी रही। कभी समझौतों के ज़रिये तो कभी दूसरी कोशिशों के ज़रिये नरेंद्रनाथ इन झंझटों से भिड़ते रहे। बस अपनी मां के लिए। वो अपनी मां के लिए सन्यास से संसार में बार-बार लौटते रहे बल्कि संसार में ही रहकर सन्यास धर्म को पूरा किया। वो पलायनवादी सन्यासी नहीं थे। शंकर की लिखी और पेंगुइन से हिन्दी में प्रकाशित किताब विवेकानंद जीवन के अनजाने सच के पन्ने एक सामान्य संयासी की अद्भुत यात्रा से परिचय कराती है। ईश्वरचंद विद्यासागर ने नरेंद्रनाथ को एक स्कूल में हेडमास्टर बनाया। लेकिन विद्यासागर के दामाद ने नौवीं और दसवीं क्लास के छात्रों के साथ मिलकर साज़िश रची। छात्रों ने आवेदन किया कि नरेंद्रनाथ यानी विवेकानंद को पढ़ाने नहीं आता। विद्यासागर ने उस आवेदन को देखते ही विवेकानंद को स्कूल से निकाल दिया तब जब उन्हें नौकरी की सख्त ज़रूरत थी।

विवेकानंद का कष्ट एक आज भी एक आदमी का कष्ट है। अपनी मां भुवनेश्वरी देवी का यह पुत्र दुनिया और भारत भ्रमण के तमाम शहरों में भी याद करता रहा। मां को कष्ट न हो इसलिए पैसे भेजता रहा। पैसों को बचाता रहा। इस सवाल से जूझते हुए कि सन्यासी तो सांसारिक मोहमाया का त्याग कर चुका होता है तो क्या मां का मोह करना संसार करना नहीं है। इस क्रम में विवेकानंद के मददगार दुनियाभर में फैले रहे। राजस्थान के खेतड़ी के महाराज अजित सिंह ने भी काफी मदद की। उनकी पूरी जीवन यात्रा में राजस्थान की मिट्टी और खेतड़ी के महाराज का बड़ा योगदान रहा है। अगर ये लोग विवेकानंद के आसपास न होते तो कभी वे अपनी मां के दुखों से चिन्ता मुक्त नहीं हो पाते। हुए भी नहीं। तभी सिस्टर निवेदिता ने कहा है कि वे आज के ज़माने के विवेकशील संयासी थे। कामिनी कंचन अति सहज ही त्याग दिया लेकिन वे प्यार और कर्तव्य कर्म के विसर्जन के लिए हरगिज़ राज़ी नहीं हुए। शंकर की शोधपरक किताब बता रही है कि विवेकानंद का जीवन सिर्फ शिकागों में दिया गया अतुलनीय भाषण नहीं है बल्कि वो यात्रा है जिसे पढ़ते हुए हम अपनी जीवन यात्रा से गुज़रने लगते हैं।

शंकर की किताब में एक और रोचक प्रसंग है। खेतड़ी के महाराज ने जिस जहाज़ में फर्स्ट क्लास की टिकट खरीदी थी उसी जहाज़ में जमशेदजी टाटा भी सफर कर रहे थे। टाटा माचिस के आयात के सिलसिले में जापान जा रहे थे। विवेकानंद ने उन्हें अपने देश में उद्योग स्थापित करनी प्रेरणा दी और विज्ञान और तकनीक शिक्षा की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था। बाद में जमशेदजी ने टाटा स्टील और इंडियन इस्टीट्यूट आफ साइंस की स्थापना की। यह रोचक प्रसंग बताता है कि सन्यासी विवेकानंद माया को समझने के लिए विश्व विचरन नहीं कर रहे थे। वो तमाम मुल्कों के खान पान पर भी गहरी नज़र रखते रहे। सेहत पर काफी ज़ोर दिया। एक सभा में जब उनसे किसी भक्त ने पूछा कि आपने ईश्वर को देखा है तो जवाब दिया कि मुझे जैसे मोटे इंसान को देखकर ऐसा लगता है क्या। इन प्रसंगों को जाने बिना हम विवेकानंद से प्यार नहीं कर सकते। वो हमारे देश की किसी राजनीतिक दल के प्रतीक नहीं हैं। वो हमारे देश के जन जन का जीवन हैं। जब तक हम उनके जीवन के पहलुओं के करीब नहीं जायेंगे उनके संघर्ष को समझना मुश्किल है।

आज जिसे देखिये भारत का गौरव गान करता हुआ उन्हीं पंक्तियों को दोहराता जा रहा है जो पहले कही जा चुकी हैं। मगर ज़रा एक पल को यह समझने की कोशिश कीजिए कि आज से एक सौ अठारह साल पहले कोई सन्यासी अपने भारत और वहां की परंपरा का पहली बार इतना बेजोड़ व्याख्यान दे रहा होगा तो उसे सुन कर और बाद में पढ़कर लोग किस कदर सिहर उठे होंगे। विवेकानंद ने कहा था कि अगर कोई यह सोचता है कि उसका ही धर्म सिर्फ बचा रहे और बाकी समाप्त हो जाए तो मुझे उस पर दुख होता है। पवित्रता या महानता किसी एक धर्म की देन नहीं है। सभी धर्मों और व्यवस्थाओं में महान चरित्रों ने जन्म लिया है। आप जल्दी ही सभी धर्मों के बैनर पर लिखा देखेंगे कि संघर्ष नहीं मदद, विनाश नहीं चाहिए, साथ चाहिए। दुनिया को विवेकानंद के इस भाषण से सीखना चाहिए था। उनके भाषणों के ठीक सौ साल बाद जब दुनिया में मज़हबी नफरत के बीज फलने लगे थे तो सोचा जाना चाहिए था कि एक सन्यासी बहुत पहले इसकी दवा बता गया है। शिकागों में दिया गया उनका भाषण हिन्दू धर्म का गौरवगान नहीं है। बल्कि उस भारत का गौरवगान है जहां तमाम धर्म एक हरे पौधे की तरह बागीचे को सुशोभित करते रहते हैं।विवेकानंद के विचार और जीनव से बिना गुज़रे हुए न तो उनके विचार को समझा जा सकता है और न ही उनके जीवन को। वो भारत के सन्यासी हैं। एक ऐसा सन्यासी जिसके जगत में भारत का स्वाभिमान है मगर दूसरों का आदर भी। विवेकानंद पूरब के वो सूरज हैं जो भारत में डूबता है तो उसी वक्त पश्चिम में निकल रहा होता है।
(published in rajasthan patrika)

कोई तुम्हें हांकता है गधे की तरह

प्रमोशन की आस में तुम्हारी हड्डियां जर्जर होने लगीं हैं
जमीर खंडहर, दिन ख़राब
दिल की धमनियों में मौसम नहीं दफ़्तर धड़कता है
कोई तुम्हें हांकता है गधे की तरह
बनाता है काबिल एक और गदहे की तरह
ताकि तय हो सके तुम्हारे दुखों की मंज़िल
जहां पहुंच कर तुम एक से विजयी दूसरे से ठगा महसूस करोगे
नौकरी में अफ़सर होकर भी नौकर ही रहोगे
उठो ख़ुद को खोजना शुरू करो
आलमारी में दुबकी किसी पुरानी कमीज़ की तरह बाहर निकल आओ
वीकेंड की शराब और फ़िर वही चेहरे
पुकारता है तुम्हे हर सोमवार
दफ़्तर काम करने की जगह है, होड़ की नहीं
वहॉं पड़े और तुम्हारी तरह जर्जर हो चुके तमाम प्राणियों पर तरस खाओ
जैसे तुम खा रहे हो ख़ुद पर
हम सब अपने भीतर के उस खंडहर में रहते हैं
जिसे दफ़्तर कहते हैं
इस दस्त से निकलने का रास्ता एक ही है
पीछे वाले के लिए छोड़ने का रास्ता
होड़ मत करो हड्डियां जर्जर हो जाएंगी और जमीर खंडहर ।
(यह गद्य शैली की कविता है ।)

रामधन एंड मूलधन इन यूपी इलेक्शन पार्ट-२

रामधन मूलधनवा को खोजते हुए भागे जा रहे थे। ए मूलधनवा चलबे न रे। राहुल भइया पांच साल मांगत हवन। कहत रहलन कि बाईस साल सभन के देनी हमन के तब मिलकर सब धान बाईसे पसेरी कई दिहलन सन। सब धान पसेरी हमनी कई दिहनी हो भइया। न रे मूलधन सपा बसपा और भाजपा के कहत रहलन राहुल भइया। इब यूपी के पांचे साल मे चमकाए दिहन। भोट देबे रे। धत रामधन भइया। उपी कबहूं न चमकिहें। उपी के टूपी पहिरावत बाड़न सब। मूलधन तोहरे लइकवा त कहत रहे कि काका इंग्लिश मीडियम में न पढ़ल न से न मालूम तोहरा राहुल भइया का कहतरान। टाइम टू चेंज मने बूझले रे। बदलाव का वक्त। बयार बह रहिस है राहुल के पक्ष में। अरे भइया तू कांग्रेसी हो गइला का हो। कुछ मिलल बा का? मिली। बेनी बाबू कहतरहलन के सभन जात बिरादरी के कल्याण होई। अरे भइया कल्याण छोड़ पोंटी भइया वाला दारू सस्ती भइल की न। अखिलेश भइया त कहत रहलन के सझियां काल जे न पी सकेला उ सपा में आ जाए। पोंटी भइया के वसूली से तंग आ गए। दाल महंगी हो गई हम कुछौ न कहनी। चाय महंगी हो गए हम कुछौ न कहनी। दारूओ महंगी हो जाए तो समझो घोरे कलयुग आ गएल बा। अखिलेश भइया पोंटी भइया के दारू में डिस्काउंट दिलावे के कहतारन। अरे मूलधनवा, पोंटी भइया भिजनेसमैन नू हैं। भिजनेसमैन सब पार्टी का होता है। अरे हमनी इंग्लिश पढ़िले रहतीं तो बूझतीं इ कुल बतिया। पोंटी भइया सभन के यार हऊअन। पत्रकारों सभन के यार हउअन। देखल न अखिलेश भइया सीधे उनकर नाम न लेलन। कहलन के आ जा दारू पियाइब। बाप रे। त भइया चलन पोंटी भइया के इहां चलल जाओ। दारुओ मिली और मौजे रही। एकनी के भोटवा दे के का होई। पोंटी भइया जेकरा के कहियन भोटवा दे देवल जाइ। उपी के बदले द। हमनी के का करेके बा। बदलिहें उपी ते तबो हमरा कोदो मिली।

अरे भाग रे मनहूस मूलधनवा। खाली जुगड़वे में रहिबे रे। भोट लोकतंत्र का अधिकार है नू। भइया त रखन बक्सा में आपन अधिकार। भाला खानी निकाल के दौड़त जा राहुल बाबा के पीछे। बोलिह कि बक्सा से अधिकार निकाल के ले आइन बाड़ी। ले ल हमर भोट। लेकिन मूलधनवा हथिया देख लीहिस त रे। त ओकरा ला एगो चदरा ले जो। देखा दिहे। चदरा देखते ही हथिया भाग जाइ। न रे मूलधना। बहिन जी मूर्ति त बनौली नू। बोल औकरा पहिले लखनऊ लखनऊ नियत लागे रे? अब देख बाकी पर्टियां त कमइल सन आ एगो मूर्तियों ने भेटाइल। इ त कम से कम मूर्ति तो बनवा देहली। देखे खाती। भतीजवा के बियाह होई तो हनीमून खाथी हाथी पार्क भेज दिहे। देख भइया। हमनी हइं भोटर। इ कुली पार्टी पोलिटिक्स में पड़ेके ना। कहे द जे जौन कहता। तू भोट के ले के बेसी कूद जन। तन पर लुंगी आ गंजी लेकर भोटवा के भाला नियत जे भांज तारा नूं उ बुझाइ चुनउवां बाद। नाचते रह जइब। हम त कहतानी कि दू पैग मार नहरिया किनारे। तब चल जाइये कमलिया के नाच देखे। ते नाच देखबे रे मूलधनवा। साला इ लोकतंत्र के जगाइ रे। ए भइया तहार कुछौ न होई। लोकतंत्र त ना जागी बाकी तू जगले रह जइब। जा तू भाग राहुल अखिलेश आ बहिन जी के रैली में। हम जात हईं कमलिया के नाच देखे। हा..तनी पोंटी भइया भेटइहन तो कहिअ कि मूलधनवा दारू मांग रहले।

जागी लोकतंत्र, मुई भोटतंत्र, कइसन कटारी चलइले रे कमलिया तू....बतइबे रे कमलिया तू....काहे नाचत हउवे रे कमलिया तू...तू न शीला तू न मुन्नी तू न चमेली, तू तो बस हमरी कमली....भइले जवान,रहबे जवान। ते कबऊ न बुढइबे रे। तनी इ भोट में चुम्मा त दे दे रे। मूलधन चिल्लाने लगता है। रोने लगता है। गाने लगता है और नहर के किनारे गिर कर सो जाता है। नेपथ्य से आवाज़ आती है। उठो मूलधन, मैं हूं...मैं कमली। तुम्हारे सपनों की रानी। देखो तुम्हारे भोट ने कितनों को ताज पहनाया। बस मैं ही रह गई। मुझे अपने भोट से छू लो मूलधन। मुझे भी वो ताज दे दो। राज दे दो। प्यार दे दो। फिर पर्दा गिर जाता है।

पुराने बरगद से दरकते मुस्लिम नेता

क्या उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति मुस्लिम मतदाता के प्रति अब तक के बने बनाए सभी नज़रिये को बदलने जा रही है? क्या यह पहला चुनाव होगा जो बाबरी ध्वंस,गुजरात दंगे के साये से निकलकर मुसलमान नए सिरे से मतदान करेगा? क्या सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा की रिपोर्ट मुस्लिम राजनीति के मैदान में नई प्रस्थान बिंदु के रूप में स्थापित हो चुकी है? क्या यह पहला चुनाव होगा जब मुसलमान बीएसपी की सरकार की इस दावेदारी को कम प्राथमिकता देगा कि पांच साल में दंगे नहीं हुए और अयोध्या विवाद के वक्त राज्य में शांति बनी रही? क्या मुस्लिम मतदाना इस चुनाव को अपनी नई आकांक्षाओं को ज़ाहिर करने के मौके के रूप में देख रहा है? क्या मुसलमान अब आरक्षण और हक के सवाल को ज़्यादा प्राथमिकता देने जा रहा है या भाजपा के ख़िलाफ किसी भी पार्टी के मज़बूत उम्मीदवार को वोट देने की रणनीतिक समझदारी को छोड़ किसी एक राष्ट्रीय पार्टी के पाले में जाकर अपनी भूमिका बदलना चाह रहा है? ऐसे बहुत से सवाल हैं जो इस बार उत्तर प्रदेश के चुनावों के संदर्भ में उठ रहे हैं।


ज़ाहिर है इन सब सवालों के जवाब के संदर्भ में मुस्लिम नेतृत्व को भी इस बहस के दायरे में लाना होगा। नब्बे के दशक से उत्तर प्रदेश और पूरे देश में मुस्लिम समाज की राजनीतिक आकांक्षाएं बदलने लगी हैं। लेकिन यह बदलाव काफी धीमा रहा है। इससे पहले सामाजिक और आर्थिक स्तर पर आए बदलाव ने नई ज़मीन तैयार की है। इसी ज़मीन पर पहली बार आम मुसलमान ने सच्चर की रिपोर्ट से हां में हां मिलाते हुए माना कि सचमुच मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर है। सच्चर की रिपोर्ट ने मुस्लिम मध्यमवर्ग को अपनी बादशाही अतीत को झटक कर मौजूदा हकीकत के आंगन में आकर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। वो राजनीतिक असुरक्षा के साये से निकलकर अपने हकों और परवरिश में बदलाव का रास्ता खोजने लगा है। ये और बात है कि इस ज़मीन पर मुस्लिम नेतृत्व के पुराने बरगद ही लहलहाते नज़र आ रहे हैं। कोई नया नेता नज़र नहीं आ रहा है जो मुसलमानों की नई आकांक्षा कों राजनैतिक नेतृत्व दे सके।

इसका सबसे बड़ा कारण है कि पार्टियों ने अपने भीतर किसी भी मुस्लिम नेता को स्थायी रूप से पनपने नहीं दिया है। उत्तर प्रदेश के मैदान में उतारे गए और बुलाकर लाए गए जितने भी प्रमुख मुस्लिम नेता हैं उन सबका राजनीतिक बायोडेटा इस बात की तस्दीक करता है। जब यह सवाल समाजवादी पार्टी छोड़ कर सीधे कांग्रेस कार्यसमिति में बिठाये गए रशीद मसूद से पूछ रहा था तो उन्होंने सख्त एतराज़ किया। कहने लगे कि उन्होंने कोई पार्टी नहीं बदली। पार्टियां बदल गई इसलिए उन्होंने नया ठिकाना ढूंढ लिया। रशीद मसूद कई दलों में रह चुके हैं। अब वो कह रहे हैं कि कांग्रेस में आने के बाद वो मुस्लिम दलितों को आरक्षण दिलायेंगे और केंद्रीय नौकरियों में अल्पसंख्यकों के लिए साढ़े चार प्रतिशत के कोटे को भी बढ़ायेंगे। वो यह अच्छी तरह जानते हैं कि दलित मुस्लिमों के आरक्षण के सवाल पर कांग्रेस ने ऐसा कुछ भी खुलकर नहीं कहा है। शायद वो अपने ठिकाने को उचित ठहराने के क्रम में दलील दे रहे थे। तब ऐसा लग रहा था कि आज भी मुस्लिम नेतृत्व उसी पुराने खांचे में फंसा हुआ है। वो पहले खुद की सोचता है बाद में कौम की। ये और बात है कि रशीद मसूद बार बार कहना चाहते हैं कि उन्होंने कभी मुस्लिम राजनीति नहीं की। वो हमेशा से सेकुलर राजनीति करते रहे हैं। मगर हम सब जानते हैं कि कांग्रेस में उनका आदर सत्कार किस वजह से हुआ और चुनाव के वक्त ही क्यों हुआ? रशीद मसूद को अगर खुद को मुसलमान नेता बनाए जाने से इतनी आपत्ति ही थी कि उन्होंने खुद के इस रूप में देखे जाने और बुलाये जाने पर मना कर देना चाहिए था। वो चुनाव के बाद भी कांग्रेस में जा सकते थे।


यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि ताकि मुस्लिम नेतृत्व में आ रहे तथाकथित बदलाव को आप समझ सकें। बाबरी ध्वंस के समय तक मुस्लिम रहनुमाई या वोटों की तथाकथित ठेकेदारी उन धार्मिक प्रमुखों के हाथ में रही जो तमाम दलों से अपने संबंधों या हैसियत हासिल करने के बदले हुंकार भरते थे कि किसे वोट देना है या नहीं देना। मगर मुस्लिम मतदाताओं ने चुपके से इन धार्मिक नेताओं को कहां गर्त में पहुंचा दिया आज पता ही नहीं चलता। मुस्लिम मतदाताओं ने सबसे पहले अपने मज़हबी नेताओं को सियासत के दायरे से निकालकर मज़हब के दायरे में समेट दिया। लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस समाजवादी पार्टी और बसपा ने नया मुस्लिम नेतृत्व खड़ा करने की कोशिश नहीं की। शायद यही वजह है कि चुनाव आते ही कई दलों के मुस्लिम नेताओं को बुलाया जाने लगा।

बीएसपी से राष्ट्रीय लोकदल में गए शाहीद सिद्दीकी समाजवादी पार्टी में आ गए हैं। शाहीद सिद्दीकी कांग्रेस सहित चार दलों में रह चुके हैं। समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्य आज़म ख़ा सपा में कल्याण सिंह के आने पर चले गए थे अब वे फिर से आ गए हैं। आज़म ख़ां ने उत्तर प्रदेश में सक्रिय मुस्लिम पार्टियों में अपना वजूद नहीं खोजा। वो जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में चार राजनीतिक दल एक सिस्टम के रूप में स्थापित हो चुके हैं। इसलिए कल्याण सिंह के बाहर जाने पर वो सपा में आ गए। लेकिन नेताओं की इतनी कमी है कि जिस हाजी याकूब खां को मायावती ने निकाल दिया उसे राष्ट्रीय लोकदल ने शामिल कर लिया क्योंकि शाहिद सिद्दीकी के जाने के बाद अजीत सिंह को कोई मुस्लिम नेता चाहिए था। इसी कमी को पूरी करने के लिए उन्होंने बीएसपी से निकाले गए एक और विधायक शाहनवाज़ राणा को अपनी पार्टी में ले लिया। रामपुर के नवाब काज़िम अली मुस्लिम हितों के लिए लड़ते लड़ते कांग्रेस से सपा और वहां से बीएसपी और फिर कांग्रेस में आ चुके हैं। गौर से देखें तो ये चंद नेता मुस्लिम राजनीति के प्रतीक कम पेशेवर ज़्यादा लगने लगे हैं। जो वक्त और पद के हिसाब से पार्टियों को बदलते हुए मुस्लिम नेता बने रहते हैं। यह भी समझिए कि पार्टियों को भी ऐसे ही पेशेवर मुस्लिम नेतृत्व की ज़रूरत है ताकि इनके चले जाने पर इतना ही समझा जाए कि एक व्यक्ति गया मगर मुस्लिम मतदाताओं का विश्वास पार्टी के प्रति बना हुआ है। यह बात तब समझ में आई जब यही सवाल राष्ट्रीय लोकदल के राज्य सभा सांसद मौलाना मसूद मदनी से कर दिया। उनका सख्त जवाब था कि आप मुस्लिम नेतृत्व की साख ख़राब कर रहे हैं। ज़ाहिर है कि वो मुस्लिम नेतृत्व को एक ऐसे क्लास या वर्ग के रूप में प्रतिस्थापित कर रहे थे जो पार्टियों से अलग है और पेशेवर है।

इन पुराने बरगदों के साये में मुस्लिम राजनीति की नई कोंपले पनप रही हैं। ये वो हैं जो जो बिना कोई बड़ा नाम बने हुए तमाम दलों के टिकट से जीत रहे हैं। तभी पिछली विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या 56 हो गई थी जो 1991 में 17 थी। चूंकि पार्टियों की पुरानी आदत जाती नहीं इसलिए वो अभी इन नेताओं को फेस वैल्यू के तौर पर खिदमत कर रहे हैं लेकिन जरा सा पर्दा हटा कर देखिये तो नज़र आएगा कि मुस्लिम मतदाता का मानस कैसे बदल रहा है। कैसे उसके बीच नए और पुराने मतदाता के हिसाब से विभाजन हो रहा है। कैसे उसके बीच मांग उठ रही है कि सच्चर की रिपोर्ट के बाद की योजनाओं से कब लाभ मिलेगा। वो यह हिसाब करने लगा है और वो यह काम मुस्लिम नेतृत्व के दायरे से अलग जाकर भी कर रहा है। बैकवर्ड कोटे में साढ़े चार फीसदी कोटे की राजनीति उसी आकांक्षा का प्रतीक है न कि किसी मुस्लिम नेतृत्व का जो हर चुनाव में पार्टी बदल लेते हैं।
(published in dainik bhaskar)

रामधन एंड मूलधन इन यूपी इलेक्शन

रामधन पगडंडी पर दौड़े चले आ रहे थे। मूलधन ने रोक लिया तो टोके जाने पर गरमा गये। काहें रे काहें टोक दिया हमको बीच रास्ते में। मूलधन भी गरम हो गया। अबहूं अपशकुन का भय सतावत है भइया। राजनीति तो हम गरीबों के लिए साजनीति है। सही से साज देती है। सीधा कर देती है। अरे काहें ऐसे बोलता है मूलधनवा। तुमको ब्याज नहीं मिला क्या अबकी चुनाव में। पौवा पर टैक्स बढ़ गया है। आधे बोतल दिया है। तीन रोज़ का खुराक। तो मस्त रह ओतने में। नहीं भइया। सुनत रहीं कि बाबू टिकटार्थी हमरे इंसाफ खातिर लखनऊ गएल रहलन। साले इंसाफ के गंजी अंडरवियर बनाके पहिरबे का रे। ज़मीन का मुकदमा है उ तो सगरो चुनाव में रहेगा। चुनाव बिला जाएगा मगर मुकदमा बिलाया है कभी। मूलधन गरम हो गया। एमबीसी हैं रामधन। हम एमबीसी हैं। हमरे जात के हैं सैम पित्रोदा। विश्वकर्मा की संतान। रामधन और गरम हो गया। बोला विश्वकर्मा की संतान है तो लोहा का समान काहे नहीं बनाइस। प्लास्टिक आ कचकाड़ा के कंप्यूटर बना दिया। आज तकला विश्वकर्मा दिवस को राष्ट्रीय अवकाश में बदलने का बात किया ऊ।

ये देश है वीर जवानों का अलबेलों का मस्तानों का....लाउडस्पीकर से आती आवाज़। मगर एक और आवाज़ तेजी से बढ़ती चली आ रही थी। यूपी बदनाम हुई, डार्लिंग तेरे लिए, अमिया से आम हुई डार्लिंग तेरे लिए, ओ वोटर रे ओ वोटर रे, तूं कहां छुप गया चीटर रे...नैनो कार पर अवधेश बाबू का प्रचार चल रहा था। कार छोटी है मगर सरकार हमारी होगी। मोस्ट बैकवर्ड की अब फ्रंटफुट पर खेलने की बारी होगी। अति पिछड़ा जागेगा और अति अगड़ा दौड़ा चला आवेगा। राहुल बाबा भी हमीं को खोज रहे हैं। हम सब अब तक चुनाव में लुकाइल बिलाइल थे,अब ताकत हैं। बीजेपी भी खोज रही है। नीतीश जी को नहीं लाना चाहती,कुर्मी नेता को तो कुशवाहा को ले आई। लोकल नेता चाहिए भोट खातिर। हमको भोट दीजिए। नेता हम नया ज़रूर हैं और अभी तक अपनी पार्टी के ही हुज़ूर हैं।

मूलधन चकरा गया। लगा खेत से गाजर उखाड़ने। आज शाम को उसे कुम्हार के यहां से घड़ा भी लाना था। सोचा तालाब से सिंघाड़ा लेते चले। तभी साइकिल से अखिलेश भैय्या की पार्टी वाले आ गए। कम्युनिस्ट क्रांति से उधार लेकर लाल लाल टोपी पहने उम्मीद की साइकिल चलाते हुए। रथ पर रथ। यात्रा पर यात्रा। ये छोटे सरकार हैं, यूपी के दावेदार हैं। नारे लग रहे थे। रथ प्राइवेट जिम की तरह है जिसकी छत पर सिंबल साइकिल खड़़ी है। मूलधन कहने लगा कि हम अति पिछड़ा हैं भैय्या। अखिलेश बोलने लगे तो काहें घबराता है। हम बनायेंगे न पिछड़ा में अगड़ा। दिल दिया है जान भी देंगे ए पिछड़ा तेरे लिए...कर्मा के गाने पर अखिलेश के रथ से आवाज़ आती है।

तभी कमल छाप हाथों में कीचड़ लिये चले आ रहे हैं। देखो यही है वो कीचड़ जिसमें कमल खिलता है और यही है वो फटीचर जिससे कीचड़ बनता है। बस तनाव फैल गया। पिछड़ों को इंसाफ दिलाने निकले कुशवाहा को कैसे कह दिया कि कीचड़ हैं। कटियार बोले कीचड़ नहीं इ तो विभिषण है। रावण को हराने का आभूषण हैं। ऊं स्वाहा स्वाहा कुशवाहा। आदतन भाजपा वाले बिना हवन के काम शुरू नहीं करते। उमा जी चुप। एमबीसी नेता की तलाश में,लुट गई बीजेपी बाज़ार में। ये नारा लगने लगा। कांग्रेसी मजा लेने लगे।

तभी फुर्सतगंज की रैली में राहुल बाबा आ गए। मुझे बहुत गुस्सा आता है। आपको नहीं आता? रैली में लोग चिल्लाने लगे कि आता है आता है हमें भी गुस्सा आता है। पर क्या करें किसी और पे नहीं, तुम पे भी जो आता है। राहुल बाबा बोलने लगे, क्रेंद्र सरकार ने ये दिया, वो दिया मगर आपने वोट नहीं दिया। इस बार देना। यूपी की ताकत लौटेगी। विधानसभा चुनाव ही प्रधानमंत्री बनवा देगा केंद्र में। आपका विकास नहीं है। बाइस साल में नहीं हुआ। हम नया मेथड लाए हैं। पांच साल में यूपी विकासशील भारत का विकसित राज्य बन जाएगा। कहते कहते राहुल बाबा चलने लगते हैं। चलते चलते कहने लगते हैं। एमबीसी और मुस्लिम खोजने लगते हैं। कुछ तो आ जाओ। कुछ तो टूटो। कुछ तो जुटो। तभी प्रचार गाड़ी गाने लगती है। तू छुपी है कहां, मैं तड़पता यहां...तेरे बिन सूना सूना है यूपी का जहां। तू छुपी है कहां। ये कौन एमबीसी भड़का, ये कौन मुस्लिम छटका, महफिल में ऐसी भगदड़ मची तो दिल है मेरा धड़का। नवरंग के गाने पर नौजवानों के गीत।

दे दे भोट दे भोट दे भोट दे रे..देदे भोट दे...मूलधन कपार पीट लिहिस। मुझे इंसाफ चाहिए। तो रामधन बोला फ्री में आता है क्या इंसाफ। दे अपना भोट इनको। पर सबने हमें ठगा है रामधन भैय्या। अरे मूलधन,मुकदमा लड़ने वक्त वकील की फीस का ध्यान नहीं रखते। भोट इनकी फीस है तुम्हारे इंसाफ की। दे दो।

सैम तुम बैकवर्ड हो

आपने सत्यनारायण गंगाराम पित्रोदा के बारे में तो सुना ही होगा। तीस सालों से जो भारतीय सत्ता के शिखर तबके में सैम पित्रोदा नाम से जाने जाते हैं। उत्तर प्रदेश के रमाबाई नगर की एक रैली में जब राहुल गांधी ने सैम पित्रोदा के नाम का असली विस्तार बताया तो वहां मौजूद भीड़ में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। राहुल उस भीड़ को बता रहे थे कि भारत में दूरसंचार क्रांति के लेखक सैम पित्रोदा हैं और सैम विश्वकर्मा जाति के हैं यानि अति पिछड़े वर्ग से आते हैं। मैं बचपन से सैम पित्रोदा के बारे में एक रहस्य की तरह पढ़ रहा हूं। जैसा कि हर स्कूली छात्र का मासूम मन होता है मैं भी सैम को एक ऐसे शख्स के रूप में जानता रहा मानो वो भारत की समस्याओं के कोई टेक्नो दैवी रूप रहे हों। अब मैं सैम को इस नज़र से नहीं देखा मगर हैरानी हो रही है कि मैंने अब तक सैम को सत्यनारायण गंगाराम पित्रोदा यानी विश्वकर्मा जाति के प्रतीक के रूप में क्यों नहीं देखा था। राहुल गांधी ने क्या इस चुनाव से पहले कभी सैम को देखा होगा? क्या उनके पिता राजीव गांधी ने सैम से दोस्ती किसी जातिगत राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर की थी? अगर ऐसा था तो राजीव कभी सैम को चुनावी सभाओं में नहीं ले गए। एकाध अपवाद हों तो माफी चाहूंगा मगर जो सैम टैक्नो क्रांति के गैर जातीय और गैर क्षेत्रीय प्रतीक रहे हों वो उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में विश्वकर्मा जाति के निकल आए तो इस सामान्य समझ कर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

यह खोज मौलिक रूप से राहुल गांधी की ही रही होगी। उत्तर प्रदेश में अति पिछड़ों की मदद से मायावती ने पिछली बार अपनी ज़बरदस्त जीत का जाल बुना था। राहुल इसमें सेंध लगाना चाहते हैं। इसलिए वो मंच पर मौजूद अति पिछड़े नेताओं की तरफ इशारा कर रैली में आए लोगों को बता रहे थे कि आप भी आगे बढ़ेंगे। वो मुलायम सिंह के गढ़ में भी घूमते रहे। जिनका पिछड़ी जातियों पर कब्जा रहा है। राहुल के ही इशारे पर कुर्मी जाति में पकड़ रखने वाले पूर्व समाजवादी नेता और कांग्रेस सांसद बेनी प्रसाद वर्ना को कबीना मंत्री भी बनाया गया। अब सवाल यह उठता है कि क्या एक नितांत गैर जातिवादी माहौल में पला बढ़ा यह युवा राजनेता राजनीति की व्यावहारिकता को समझने लगा है? राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के भीतर बदलाव के लिए निकले थे। युवा कांग्रेस में लोकतंत्र की बहाली के लिए एक किस्म की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कायम कर रहे हैं जिसका मूल इस बात में बताया जाता रहा कि जो ज़मीन के स्तर पर लोकप्रिय होगा वही चुनकर युवा कांग्रेस में नेता बनेगा। तो क्या यह राजनीतिक जानकारों की कमी थी जो यही देखते रहे कि राहुल गांधी प्रतिभा को मौका दे रहे हैं, पृष्ठभूमि को नहीं। क्यों यह माना जाने लगा कि यह युवा राजनेता बीसवीं सदी की जकड़नों में फंसी राजनीतिक समीकरणों से निकलने का कोई रास्ता ढूंढ रहा है? अगर ऐसा ही था तो क्या राहुल गांधी का विश्वास कमज़ोर पड़ रहा है? क्या वो मायावती और मुलायम सिंह यादव के जातिगत समीकरणों का काट उन्हीं के फार्मूले से देने लगे हैं?

दरअसल राहुल गांधी कई स्तरों पर बदल रहे हैं। वो समझ रहे हैं कि दिल्ली की जनता या ट्वीटर जमात को सबसे पहले भारतीय वाले नारे से खुश किया जा सकता है मगर वोट नहीं बटोरा जा सकता है। वोट बटोरने के लिए ज़रूरी है कि सैम पित्रोदा अब अति पिछड़े के रूप में आगे आएं। ये सैम पित्रोदा की नाकामी है कि उन्होंने जिस कांग्रेस पार्टी के नेताओं से नज़दीकी का लाभ लिया और कई काम अच्छे भी किये मगर खुद को विश्वकर्मा जाति के रूप में पेश नहीं किया जिससे वे कांग्रेस के काम आ सके। अच्छा राहुल गांधी बदल रहे हैं। सात साल से उत्तर प्रदेश की लगातार यात्राओं ने उनकी सोच बदल दिया है। वो लड़ रहे हैं और ज़रूरत पड़ने पर भिड़ रहे हैं। अपने गुस्से को ज़ाहिर करते हुए एंग्री यंग मैन की छवि देने की कोशिश करते हैं मगर गांव कस्बों के वोटरों के लिए जातिगत नायकों को ढूंढ रहे हैं।

सिर्फ जाति के आधार पर ही नहीं। राहुल गांधी बदायूं की आलिया कादरिया मदरसा पहुंच गए। नमाज़ी टोपी पहनकर छात्रों से गले मिलने लगे। लखनऊ में थे तो इस्लामी शिक्षा के केंद्र नदवातुल विश्वविद्लाय चले गए। यह सब वो केंद्र रहे हैं जो कई कारणों से बाबरी मस्जिद के खिलाफ चले राजनीतिक आंदोलन के दौरान चर्चा में रहे थे। हर जगह जाने के बहाने अलग हैं। कहीं शिक्षा के अधिकार के तहत मदरसों का मामला हो तो कहीं मुसलमानों को आरक्षण देने का मसला। राहुल यूपी के चुनावी मैदान में उसके सारे पुराने हथियारों से ही लड़ रहे हैं। उनके अभियान के बाद कांग्रेस के नेता खुल कर पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण देने के मसले पर बोल रहे हैं। वो फिर से उस पुराने कांग्रेस की जमीन खोज रहे हैं जिसने कांग्रेस को लंबे समय तक सत्ता दी। क्या यह मुमकिन है? देखना होगा कि एक साल कई कार्ड खेलते हुए राहुल गांधी कांग्रेस को यूपी की सत्ता में ला पाते हैं या नहीं? उनका एक्का तो यूपी के विकास का मुद्दा है मगर बाकी पत्तियों को वो उनकी चाल के मुताबिक ही फेंक रहे हैं।

राहुल गांधी क्या बेसब्र होते जा रहे हैं? उन्होंने खुद को उत्तर प्रदेश के चुनाव से इतना जोड़ लिया है कि अगर नतीजे नहीं आए तो उनकी व्यक्तिगत नाकामी समझी जाएगी । यह एक बड़ा जोखिम है जिसकी ज़रूरत नहीं थी। राष्ट्रीय मुद्दों से उनकी अनुपस्थिति उनका पीछा कर रही है और करेगी। लेकिन क्या राहुल गांधी खुद को विकास और जातिगत राजनीति के मिश्रण के मुताबिक ढालने लगे हैं। जो लोग राहुल गांधी से राजनीतिक कारणों से मिलते रहे हैं वो हमेशा ये बात कहते हैं कि इलाके के तमाम समीकरणों की वे पूरी जानकारी रखते हैं मगर वो इन समीकरणों से आजाद एक ऐसा स्थानीय लीडर ढूंढ रहे हैं जो उनकी फौज को नया चेहरा दे सके। राहुल अगर यूपी का मैदान जीत भी गए तो क्या वो राहुल गांधी होंगे जिसकी छवि उन्होंने खुद बनाई या वो राहुल गांधी होंगे जिसे आप एक नए मुलायम या नई मायावती का संस्करण के रूप में देख सकेंगे। ऐसे निष्कर्ष के लिए जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए मगर अगर ऐसा हो जाए तो हैरान भी नहीं होना चाहिए। राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में सोई हुई कांग्रेस को लड़ना तो सीखा रहे हैं मगर हथियार वही पुराने हैं जिसके वापस मिलने के इंतज़ार में कांग्रेस यूपी में हारती रही है। पिछले लोकसभा के नतीजों से उत्साहित राहुल गांधी के पास वक्त कम है और उत्तर प्रदेश की चुनौती बड़ी। याद रखियेगा उन छवियों को जिन्हें राहुल ने लोगों के घर पहुंच कर खुद बनाई। एक ऐसे नेता की छवि जिसके लिए जनता जाति या धर्म से ऊपर है। जिसके लिए कभी सैम पित्रोदा विश्वकर्मा जाति के नहीं हुआ करते थे।
(यह लेख राजस्थान पत्रिका में छप चुका है)

पत्रकारिता का बक्साबंद वक्तावृंद काल

यह साल स्पीड न्यूज़ और बक्साबंद वक्तावृंद का काल रहा है। अन्ना आंदोलन ने दर्शकों को भी उत्तेजित किया तो स्क्रीन दड़बेनुमा बना दिए गए। बहसें होने लगीं। बहस मुंडियों को दिखाने के लिए स्क्रीन पर दस दस बक्से बनने लगे। याद कीजिए सालों पहले आजतक ने चुनावी कवरेज के दिन अपने रिपोर्टरों का बक्सा बनाया था। तब संवाददाता हीरो की तरह नज़र आए थे। फिर सभी चैनलों में ऐसे बक्से रिपोर्टरों के ही बने। अब रिपोर्टर टीवी और बक्से से गायब कर दिये गए। उनकी जगह वक्ता और प्रवक्ता आ गये हैं। वो झांक रहे हैं। जिस तरह स्क्रीन के दड़बे से मुंडियां झांक कर बोलने लगी हैं अगर ऐसे ही इसकी बारंबरता बढ़ी तो जल्दी ही वक्तावृंदों की बीबीयां फोन कर पूछने लगेंगी कि चुन्नू के पापा आपके चैनल में है या आजतक में हैं? वो निकले तो थे हेडलाइन्स टुडे के लिए मगर एनडीटीवी इंडिया में कैसे दिख रहे हैं। उनकी बेटियां फोन करेंगी कि रवीश, पापा आपके साथ हैं, जरा फोन दीजिएगा उनको। उनसे कहना है कि एनडीटीवी के बाद आजतक से होते हुए जब ज़ी स्टुडियो जायेंगे तो नोएडा के अट्टा मार्केट से मिक्सी का ग्राइंडर लेते आएंगें उसके बाद ही टाइम्स नाउ जाएं।

बहस बढ़ी तो वक्ता भी बढ़ाये गए। कुछ वक्ताओं ने इस फारमेट को गंभीरता से लिया। वो संजीदगी से आते रहें और दर्शकों तक अपनी बात पहुंचाते रहे। इनकी वजह से बहस का स्तर अच्छा भी हुआ। पार्टी प्रवक्ताओं की कमी पड़ी तो कुछ हारे हुए नेताओं को ढूंढा गया। एक चैनल ढूंढ कर लाया तो सबने चलाया। इस क्रम में कुछ वक्ता ढूंढे जाने के बाद भी जल्दी ही ग़ायब कर दिये गए क्योंकि वो अच्छे नहीं थे। फिर सांसदों को ढूंढा गया। यह एक सकारात्मक पक्ष रहा। नए सांसदों के आने से पता चला कि वो बोल सकते हैं और बेहतर भी हैं। कुछ वक्ताओं ने खुद से तय कर लिया कि वो दिन भी दो चैनल या दो बहस करेंगे तो कुछ ने इतनी उदारता दिखाई कि सुबह नौ बजे से लेकर रात के ग्यारह बजे तक बोलते ही रहते हैं। इस क्रम में एक और विकास हुआ। कुछ वक्ताओं के घर में टू एम बी लाइन लगा दी गई। यह तकनीकी चीज़ है। आप बस इतना समझिये कि ओबी वैन भेजने की जगह कुछ वक्ताओं के घर यह व्यवस्था कर दी गई कि वो बस अपने ड्राइंग रूम की कुर्सी में बैठ जायें और भाषण शुरू कर दें। कुछ ने अपनी हैसियत इस तरह से बढ़ाई कि वो स्टुडियों में नही जाते, ओबी वैन मांगते हैं। यह बड़े वक्ताओं के बीच हैसियत का लैंडमार्क बन गया है। कई वक्ताओं ने यह भी तय करने की कोशिश की है कि वो फलां के साथ नहीं बैठ सकते क्योंकि वो उनकी बराबरी के नहीं हैं। कुछ वक्ता अंग्रेजी चैनल में कुर्सी लगाकर बैठ जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वहां क्लास है। काश कोई बताता कि अंग्रेजी चैनलों की दर्शक संख्या हज़ारों में होती है और हिन्दी चैनल के दर्शकों की संख्या लाखों में। फिर भी क्लास क्लास होता है इसलिए वो हिन्दी चैनल में जाना पसंद नहीं करते। पूरी प्रक्रिया में इमेज का भी खेल है। इसलिए कुछ तथाकथित बड़े वक्ता अंग्रेजी चैनल में नियमित हैं और कुछ तथाकथित छोटे वक्ता हिन्दी चैनल में नियमित हैं। मेरी राय में हिन्दी चैनल के वक्ताओं की हैसियत अंग्रेजी से काफी बड़ी है क्योंकि वो संख्या के लिहाज़ से ज्यादा लोगों तक पहुंचते हैं। एक स्थिति और है। नया वक्ता ढूंढ कर लाइये और वो कुछ दिनों बाद दूसरे चैनल पर ज्यादा दिखने लगता है। जो ढूंढ कर लाया है उसी को नहीं मिलता।

अब तो जिन लोगों की बाइट लेने हम पूरे शहर में दौड़ा करते थे वो हमारे एक स्टुडियो से निकल कर दूसरे स्टुडियों में भागते नज़र आते हैं। इसलिए गया गुज़रा साल टीवी में बाइट की मौत का साल था। जब तक रिपोर्टर बाइट लेकर ओबी वैन की तरफ दौड़ा आता है,तब तक बाइट देने वाला स्टुडियो में पहुंच चुका होता है या वहीं ओबी वैन पर बैठकर अपनी ऑडियो टेस्टिंग करवा रहा होता है। सारे वरिष्ठ संपादकों ने लेख लिखने बंद कर दिये और बोलने शुरू कर दिये। वो इस संकट से गुज़रने लगे कि स्टुडियो में जो बोल कर आये वही लिखे या कुछ नया। नया लिखें या जो सुन कर आयें हैं वो लिखें। कई रिपोर्टरों ने जुगाड़ निकाला। उन्होंने भी खुद को अपनी बीट का प्रवक्ता बना लिया। इससे यह होने लगा कि जब तक पार्टी के नेता जाम के कारण स्टुडियो नहीं पहुंच पाते, तब तक वो पार्टी की तरफ से बोलने लगे। इससे इन रिपोर्टरों ने खुद को स्क्रीन से गायब होने से बचा लिया और पार्टी के प्रवक्ताओं को भी कड़ी टक्कर देने लगे हैं। कई संपादकों ने अपने रिपोर्टरों को चमकते देख खुद को भी प्राक्सी के रूप में पेश कर दिया। तो इस साल पूरी लड़ाई स्क्रीन पर बने बक्से में खुद को भरने की रही। कमाल की बात यह रही कि विभिन्न क्षेत्रों से अलग अलग वक्ता ढूंढ कर निकाले गए। इस क्रम में प्रवक्ता की नई भूमिका बनी। प्रवक्ता सिर्फ पार्टी का ही नहीं होने लगा बल्कि मुद्दों का भी होने लगा। कई जानकार मुद्दों के प्रवक्ता के रूप में आने लगे। बुलाये जाने लगे। कुछ प्रवक्ताओं ने जानबूझ कर खुद को एक से अधिक मुद्दों का प्रवक्ता बनाए रखा ताकि उनकी पूछ बनी रहे। वो एक साथ क्रिकेट से लेकर राजनीति पर बोलने लगे तो कुछ संविधान से लेकर आंदोलनों पर। अखबारों में जो संपादकीय पन्ना था उसे टीवी ने टक्कर दी। खबर खत्म हो गई या कतरन बनकर स्पीड न्यूज़ की घराड़ी में घूमने लगी। स्पीड न्यूज़ ख़बरों की पेराई मशीन है। तेल निकल जा रहा है खबरों का।

यह साल मुद्दों और उत्तेजनाओं का साल था। अन्ना ने इतना उत्तेजित किया कि टीवी में हज़ारों की संख्या में इसी मुद्दे पर बहस आयोजित हुई। अब अगले साल उत्तेजित मुद्दों के अभाव में देखना होगा कि क्या होता है। फिलहाल मार्च तक तो ये बहस बक्से बने रहेंगे। बुद्धू बक्से को बहस बक्से में बदलने का काम कर गया साल। एक और बात है यह साल सवालों के खत्म होने का भी साल रहा। इससे पहले आपने देखा होगा कि हर मुद्दे के बाद न्यूज़ चैनल वाले कई सवाल पूछते थे। क्या सहवाग फार्म से बाहर हैं? क्या सहवाग थके हैं? क्या सहवाग डरे हैं? न्यूज़ चैनल की तरफ से पूछे जाने वाले पांच से पचीस सवाल अब बहस के सवाल बन गए। यहां भी इसकी मौत हो चुकी है। वो सिर्फ बक्से के ऊपर झालर की तरह लटका रहता है। जिसे दूसरे टिकर या दूसरे सवाल आंधी की तरह उड़ाते हटाते रहते हैं। जिस सवाल को लेकर बहस शुरू होती है वो सवाल पहले ही जवाब के साथ खत्म हो जाता है। तू तू मैं मैं की जगह अब वक्ताओं के बीच के संबंध हम भी तुम भी में बदलने लगे हैं। वो अब असहमत कम, सहमत ज़्यादा होते हैं। वो अब बहस में एक दूसरे को मित्र बताने में ही समय खपाने लगे हैं। लड़ाई होने के बाद वो एक साथ सीढ़ी से भी नीचे उतरते हैं। वहां पर कोई मारपीट नहीं होती। सभी अपना अपना कार्ड एक्सचेंज करते हैं। नंबर लेते देते हैं। यह भारत की लोकतांत्रिक विविधता के प्रति गहरा सम्मान है। हमारे देश में व्यक्तियों के बीच कभी लड़ाई नहीं होती। सिर्फ व्यक्तियों द्वारा बोले जाने वाली बातों और मुद्दों के बीच लड़ाई होती है।

एंकर के लिए भी सख्त सवालों की गुज़ाइश कम हो गई है। अगले दिन वक्ता के न आने का खतरा रहता है। कुछ एंकरों के उत्पात पर संसद में भी चर्चा हो चुकी है। नेता इन बहसों से और एंकरों से घबराये लगते हैं। साफ है एक मुद्दे को इतना मथा जाता है कि कुछ बात एक चैनल से छूट भी जाए तो दूसरे चैनल से पूरी हो जाती है। इससे दर्शक को लाभ हो रहा है। सिस्टम का पर्दाफाश हो रहा है। जागरूकता के साथ बेचैनी और बेचैनी के साथ जागरूकता आ रही है। कोई एंकर शायरी सुना रहा है तो कोई दलीलें छांट रहा है। एंकर भी अपने आप में एक प्रवक्ता बन गया है। कई एंकर मुद्दों के प्रवक्ता बन गए हैं। टू इन वन। कई एंकर बोलते वक्त इतने तनावग्रस्त हो जाते हैं कि अगर मैं डाक्टर होता तो उनके चेहरे की तमाम नसों को कंधे के पीछे शिफ्ट कर देता ताकि वो सामान्य दिखें। नसों के फटने का खतरा ही दिखता रहा मगर कभी फटीं नहीं। कुछ गले को इतना फाड़ना शुरू कर दिया है कि बोल बोल कर सच साबित करने का प्रयास होता दिख रहा है। कुछ तो इतना हिलने लगे हैं कि बीच बीच में फ्रेम से गायब ही हो जाते हैं।

इस क्रम में अगर मैं वक्तावृंदों को जुटाने वाले गेस्ट रिलेशन वालों की बात करना चाहता हूं। हालांकि मैं गेस्ट रिलेशन शब्द को स्वीकार नहीं करता। ये भी पत्रकार ही हैं। इन्हीं के कौशल के दम पर बक्साबंद बहसों की दुकान चल रही है। इनके कौशल और तनाव पर अलग से अध्धयन किया जाना चाहिए। सारे नेताओं के मोबाइल में अब रिपोर्टर के नंबर भले न हों मगर इनके ज़रूर होते हैं। कई नेता इन्हें एस एम एस भी कर देते हैं कि शहर में आ गया हूं बुला सकते हो। कई बार इन गेस्ट पत्रकारों को कई तरीके से झूठ का सहारा लेना होता है। एक गेस्ट को बदल कर दूसरे को लाना होता है। कई बार बदला गया गेस्ट उस वक्त टीवी देखकर फोन भी कर देता है कि तुम तो बोले थे कि टॉपिक चेंज हो गया है मगर टॉपिक तो वही है। अच्छा मेरी जगह उसे बुला लिया। फिर वो सॉरी सॉरी बोलते हुए अपनी नौकरी की दुहाई देता है। ये गेस्ट पत्रकार किसी न्यूज़ डे पर किसी प्रभावी मुद्दे पर बोलने वाले प्रभावी वक्ताओं के घर को घेर कर खड़े हो जाते हैं। सर पहले मेरे यहां तो मेरा यहां में समय का बंटवारा होता है। मैं इनके श्रम और जनसंपर्क कौशल का कायल हूं। ये जल्दी ही बिना कान के सुनने लगेंगे। जिस तरह से मोबाइल पर प्रवक्ता के फोन उठा लेने के लिए चिपके रहते हैं,उससे तो कान खराब होना ही है। किसी रिपोर्टर को इनसे सीखना चाहिए। इन्हीं को पहले पता होता है कि किस नेता के यहां लंच है और किसके यहां डिनर। रिपोर्टर के पहुंचने से पहले यही खाते भी दिख जाते हैं। ये अपने सच झूठ के बीच के रोज़ाना तनावों से गुज़रते हुए और शायद बहुत ही कम पैसा पाते हुए जो काम कर रहे हैं उसकी सार्वजनिक सराहना करता हूं। बल्कि एक बड़ा बदलाव यह आया है कि अब रिपोर्टरों के बीच चैनल को लेकर प्रतियोगिता नहीं होती, गेस्ट रिलेशन संपादकों पत्रकारों के बीच होती है। ये लोग ज़्यादा खबरी लगते हैं।

कुल मिलाकर पत्रकारिता के इस बहस काल की खूबियां भी हैं और कमियां भी हैं। कई शानदार वक्ताओं ने अपने सवालों और जवाबों से सरकार या विपक्ष की कमज़ोरियों को खूब उजागर भी किया है। इससे बहस में पारदर्शिता और नाटकीयता दोनों आई है। दर्शकों को एक साथ देखने का मौका मिला है कि कौन सही है या कौन नाटक कर रहा है। इस बहस काल ने पार्टी दफ्तर में होने वाली अलग अलग प्रेस कांफ्रेंसों को भी बेमानी कर दिया है। काहें को अलग से तीन बजे और चार बजे की प्रेस कांफ्रेंस करनी है जब रात को टीवी स्टुडियों में ही टकराना है। इससे एक लाभ और हुआ है। पार्टी दफ्तर में प्रेस कांफ्रेंस से दिन में सिर्फ एक ही प्रवक्ता को मौका मिलता था। अब एक बार मुद्दा आ जाए तो उसके बाद पार्टी सूची में मौजूद तमाम प्रवक्ताओं की बुकिंग शुरू होने लगती है। इस तरह बोलने वाले नेताओं की अच्छी ट्रेनिंग हो रही है। वो बारी बारी से भारी प्रवक्ताओं से टकरा रहे हैं और अपना प्रदर्शन अच्छा कर रहे हैं। बस अगर बहस वाले कार्यक्रम का दौर कहीं ठंडा न पड़ जाए, वर्ना पहले दूसरे नंबर के प्रवक्ताओं के बाद किसी का नाम याद भी नहीं रहेगा।

तो ये रही पिछले साल की टीवी की उपलब्धि बहसबंद वक्तावृंद काल की। आलोचना सिर्फ यही है कि बहुत ही ज्यादा होने लगा है। दाल भात की तरह। ऐसी बहसें होनी चाहिएं मगर प्लीज़ इनकी हालत ये न कीजिए कि जैसे टीवी पर देखने का सुख खत्म हो गया, कहीं टीवी पर सुनने का शौक भी कम न पड़ जाए। बल्कि एक आइडिया आ रहा है। एक टीवी ऐसा भी होना चाहिए जिसमें एक ही स्क्रीन पर बीस टीवी आ जाए। जब आप एक स्क्रीन पर दस बक्से देख सकते हैं और सबको एक साथ बोलते हुए सुन समझ सकते हैं तो एक स्क्रीन पर दस चैनल क्यों नहीं देख सकते? इससे रिमोट बदलकर टीआरपी गिराने बढ़ाने की समस्या खत्म हो जाएगी। सबकी बराबर रेटिंग आएगी। एक ही अफसोस रहा। स्पीड न्यूज़ और बक्साबंद बहसों ने रिपोर्टर की मौत का एलान कर दिया। ख़बरों में उनकी ज़रूरत तो बनी रही लेकिन न्यूज़ एजेंसी की खबरों से ज्यादा नहीं। एक पंक्ति का संवाददाता बना दिए गए रिपोर्टर।

(दोस्तों एक निवेदन है। इस लेख की कापी न करें और न ही प्रकाशित करें। मीडिया साइट वालों से भी निवेदन है कि अपनी साइट पर न लगायें। ऐसा करेंगे तो बड़ी उपकार करेंगे)

टैम युक्त और टैम विमुक्त दर्शकों की जंग में टीवी

(यह भाषण हाल ही में इंडिया हैबिटैट सेंटर में हुए समन्वय कार्यक्रम के लिए लिखा गया था। चूंकि सभी कुछ बोलने की शैली में है और एक बार में ही लिखा गया है इसलिए संभव है अशुद्धियां रह गईं होंगी। उन्हें सुधार कर भूल चूक माफ कर पढ़ियेगा।)

मैं जिस दुनिया से आता हूं वहां रोज़ दर्शक की तलाश होती है। इस हिसाब से उस दुनिया में अभी तक सभी प्रकार के दर्शकों को खोज लिया गया होगा या कुछ बाकी होंगे तो जल्दी ही खोज लिये जायेंगे। मेरी दुनिया में दर्शक दो तरह के होते हैं। एक टैम युक्त दर्शक यानी जिसके घर में टैम मीटर लगा होता है। वो संख्या में सात या दस हज़ार होगा मगर औकात काफी है क्योंकि साढ़े सात हज़ार टैम बक्से ही तय करते हैं कि दर्शकों की संख्या कितनी है। दूसरा दर्शक वो है जो टैम लेस है यानी टैम विहीन है। ये बेऔकात भौकाल दर्शक हैं। छटपटाते रहते हैं कि भई हम भी तो दर्शक हैं फिर हमारी क्यों नहीं सुनी जाती। टैम विहीन दर्शक आलोचक पैदा करते हैं और फिर बाद में निष्क्रिय दर्शक में बदलकर जो दिख रहा है देखने में लग जाते हैं। टैम युक्त दर्शकों का बर्ताव कुछ संसद जैसा लगता है कि भाई हमें चुना गया है। हम हीं सब तय करेंगे। टैम विहीन दर्शक अन्ना के समर्थक जैसे हैं कि भई हमारे बीच आकर आप कानून पर चर्चा क्यों नहीं करते हैं। जो टैम विहीन दर्शक है वो टैम युक्त दर्शक का बंधुआ है। टैम युक्त दर्शक ही ताकतवर है। इसीलिए टैम युक्त दर्शक के मिज़ाज को तत्क्षण पकड़ने के लिए बड़े बड़े लोग बिठाये गए हैं। इनकी आंखों में टीवी घुसेड़ देने के लिए कई तरह के कर्मकांड नित चलते रहते हैं।

आज कल ये टैम युक्त दर्शक स्पीड न्यूज़ ज़्यादा समझने लगा है। ये काफी तेज़ी से बदलता है। रेटिंग चार्ट के हिसाब से स्पीड न्यूज़ की स्वीकार्यता पिछले दो साल से बनी हुई है। यानी आपके पास समय नहीं है। आपका ध्यान क्षणभंगुर है। इधर उधर ताक झांक करते हुए टीवी देखते हैं और आप मल्टी टास्किंग दर्शक हैं। खिचड़ी बनाते हुए, लंगोट बांधते हुए, दाढ़ी बनाते हुए आप न्यूज़ भी सुनना चाहते हैं। इन्हीं सब दलीलों से स्पीड न्यूज़ की शुरूआत सुबह के वक्त शुरू हुई। अब लगता है कि जो दर्शक घर में है वो दिन भर कोई न कोई काम कर रहा है। कपड़े धो रहा है, सब्ज़ी ला रहा है परन्तु न्यूज़ के प्रति उसकी प्रतिबद्धता कम नहीं हो रही है। ध्यान क्षणभंगुर है फिर भी वो तीस मिनट में कई सौ ख़बरें सुन कर पचा ले रहा है। ऐसा ग़ज़ब का दर्शक मैंने नहीं देखा है। जिसकी ध्यान शक्ति बको ध्यानंम को पुष्ट करते हुए दनादन खबरों को सुन कर पत्रकारिता को बचा रहा है। ऐसे दर्शकों का सम्मान किया जाना चाहिए कि कम से कम वो न्यूज़ ही देख रहा है और आप यही चाहते भी थे कि न्यूज़ क्यों नहीं दिखा रहे हैं। अब देखिये। ऐसा लगता है कि कंवेयर बेल्ट पर गन्ना लदा है और तेजी से क्रैशर के नीचे कुचला जा रहा है। अब तो आप नहीं कह सकते न कि खबरें नहीं चलती या आप यह भी तय करना चाहते हैं कि खबरें कैसे चलें तो फिर आप टैम युक्त होने के सपने देखिये। जो टैम में नहीं है वो दर्शक मानता है तो मैं क्या कर सकता हूं।

कुलमिलाकर आप मेरी बातों को समझ गए होंगे। दर्शक कौन है हममें से किसी ने नहीं देखा। वो ईश्वर है मगर एक मामले में ईश्वर से अलग है। वो यह कि सचमुच देखता है। देखकर हर बुधवार को बता देता है कि क्या क्या देखा और कितनी देर तक देखा। क्योंकि रेटिंग का पैमाना ज्यादा देर तक देखने से भी छलकता है। यूं तो स्पीड न्यूज़ अंग्रेज़ी के न्यूज़ एट ए ग्लांस से आया मगर जल्दी ही ग्लांस एट ए न्यूज़ में बदल गया। हर भाषा में त्वरित खबरें हैं। हिन्दी का दर्शक समाज इतना सुपरफास्ट बना रहा तो जल्दी ही फिल्में भी स्पीड न्यूज़ की स्टाइल से बनेंगी और जल्दी ही आप लेखक भी इसी रफ्तार से रचनाएं रचेंगे। मालूम नहीं क्या होगा। दर्शक एक रहस्य है। इसकी तलाश में कल्पना शक्ति की बड़ी भूमिका होती है। दर्शकों को गढ़ लिया जाता है। तुम ऐसे ही हो। अगर आप रफ्तार से दर्शक की विवेचना करेंगे तो एक नए युग में प्रवेश कर जायेंगे। लेकिन शायद ही कोई इंकार कर सकता है कि स्पीड न्यूज़ का अवतार दर्शक की तलाश की देन है. अब सही है या नहीं यह बहस मैं आपके साथ नहीं करना चाहता क्योंकि आप टैम विहीन दर्शक हैं। टैम युक्त होते तो मंच छोड़ कर आपके कदमों में बैठा होता और पूछता कि बताइये क्या देखना चाहते हैं। यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि एक दर्शक के रूप में आप अपनी अहमियत को पहले समझिये फिर पत्रकारिता की प्रासंगिकता पर बहस कीजिएगा। अब मेरा पास कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है जिससे मैं साबित कर दूं कि आपका मिज़ाज भी टैम युक्त दर्शकों जैसा ही है। यानी आप के पास भी कम से कम आधा घंटा तो है जब आप पूरी एकाग्रता से उस आधे घंटे में कई सौ ख़बरें सुन कर समझने की शक्ति रखते हैं।

पर यह बदलाव क्यों हो रहा है, कैसे हो रहा है, क्या इसे तार्किक ढंग से हम कभी समझ पायेंगे। क्या हम यह जानते हैं कि चैनलों पर फार्मूले के तहत चलाये गए कितने प्रोग्राम पिट जाते हैं। फिर वो क्यों दोहराये जाते हैं। मैं आ रहा हूं आपके विषय पर। दर्शक का बर्ताव क्या पाठक के बर्ताव से अलग है? क्या एक पाठक के रूप में आप कुछ और हैं और एक दर्शक के रूप में कुछ और । या फिर जो दर्शक है वो पाठक नहीं है और जो पाठक है वो दर्शक नहीं है। हर नायिका आइटम गर्ल बनना चाहती है। उसकी मुक्ति आइटम होने में है तो टीवी पत्रकारिता का हर नायक आइटम क्यों न हो। दोनों का बाज़ार एक दूसरे से मिला जुला है। कम से कम दोनों माध्यमों के हथियार तो एक जैसे ही है। ऐसा नहीं है कि टीवी में अच्छे काम नहीं हो रहे हैं। हो रहे हैं। उन पर भी अलग से बात होनी चाहिए। एक महंगे माध्यम में खबरों को पेश करने का तरीका सिर्फ रेटिंग ही नहीं बचत का भी जुगाड़ है। यह भी समझना होगा। मगर समझ कर आप करेंगे क्या। शोध लिखेंगे या टीवी देखेंगे। यह आप तय कर लीजिए। जब एक माध्यम अपने मूल हथियार के खिलाफ काम करने लगे तो मुझे चिन्ता होती है। इतनी भी चिन्ता नहीं होती कि मर ही जाऊं। लेकिन होती है। उन चिन्ताओं के बीच जी तो रहा ही हूं। विज़ुअल ही नहीं है टीवी में तो फिर विज़न का मतलब क्या है। या तो मुंडी दिखती है या फिर जो दिखता है वो भागता हुआ दिखता है। तो क्या हमारा दर्शक कोई सुपर मदर वुमन टाइप का हो गया है क्या। क्या हम धीमी गति के समाचार युग से सुपर फास्ट समाचार युग में आ गए हैं। अगर यही हाल रहा कि मानव विकास के क्रम का ख्याल करते हुए सोचिये कि आज से पांच साल बाद ख़बरों की रफ्तार क्या होगी? क्या आप यह सोच पा रहे हैं कि कोई मशीन आधे घंटे में पांच सौ खबरें पढ़ देगी और आप सुन भी लेंगे। क्या टीवी सिर्फ सुनने का माध्यम बन कर रह जाएगा या फिर टीवी अपने टीवी होने के संकट को समझ ही नहीं पा रहा है या फिर जो समझ कर कर रहा है उसे हम महज़ा आलोचना के लिहाज़ से नहीं देख पा रहे हैं। हो सकता है कि रफ्तार वाली खबरें और दर्शक आज की हकीकत हों। इसे आप तभी चैलेंज कर सकते हैं जब आप टैम युक्त दर्शक हों। मैं किसी निष्कर्ष में यकीन करने वाला प्रवक्ता नहीं हूं। निष्कर्ष किसी भी बहस की संभावना को खत्म कर देता है। इसीलिए जो कहा वो एक सवाल के तौर पर कहा।

इसमें चिन्ता सिर्फ माध्यम और दर्शक की है। पत्रकारिता की नहीं है। यह मेरे लिए उतना बड़ा सवाल नहीं है। फिलहाल। अलग से विषय ज़रूर हो सकता है। सवाल यही है कि क्या हम अपने दर्शकों को जान गए हैं, क्या खोज पायें हैं, अगर आज खोज सकें हैं तो पिछले फार्मूले के मुताबिक जिन दर्शकों को खोजा था वो कहां चले गए। वो दर्शक कहां गए जो पाकिस्तान और आ रहा है तालिबान पर टीवी कार्यक्रम देखकर लट्टू हुए जा रहे थे. क्या वे सारे दर्शक अफगानिस्तान के पुनर्निमाण कार्यक्रमों के मज़दूर बनकर काबुल चले गए या यहीं भारत में है मगर टीवी देखना छोड़कर कुछ और कर रहे हैं। मालूम नहीं। ऐसा कोई
टैम युक्त दर्शक मिले तो बताइयेगा। या फिर दर्शक वही है मगर उसका स्वाद बदल रहा है।

यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि मैं जिस दुनिया से आता हूं वहां निराकार दर्शक कितना कुछ तय कर रहा है। वही तय कर रहा है या उसी के नाम पर तय हो रहा है दोनों बातें पूरी तरह ठीक ठीक हैं। क्या आपके पाठकों की दुनिया में ऐसा कोई पाठक वर्ग है। जो तय करता हो कि किताबों का बाज़ार कैसा होगा। व्यक्तिगत राय तो यही है कि बिल्कुल न हो वर्ना लिखना भी बाज़ारू बन जाएगा। वैसे लिखना हमेशा से बाज़ारू भी रहा है। तो मैं कह रहा था कि आपकी दुनिया में तो पाठक ही तलाश करता रहता है कि भाई लेखक किधर गया। कहां है। किताब कहां है उसकी। जिन लोगों को हिन्दी भवनों के सेमिनारों में जाने का मौका नहीं मिला और जो हिन्दी के छात्र नहीं रहे हैं उनमें से विरले ही होंगे जो अपने लेखक को स्टेशन पर देखते ही पहचान जाएं। कई लोग वैसे पहचान लिये जाते हैं लेकिन मैं कहना यह चाह रहा हूं कि क्या हमारे पाठक और लेखक के बीच रचनेतर यानी रचना के बाहर कोई संबंध है? वो संबंध कब और कहां बनता है? वो कहां अपने लेखक और पाठक को देख सकता है मिल सकता है चैट कर सकता है। क्या हमने नेट क्रांति को मिस कर दिया। अब पिछली बॉगी पकड़ कर ट्रेन चढ़ रहे हैं। मेरा साहित्य से कम नाता रहा है। फिर भी यह सवाल परेशान करता है कि मैं अपने लेखकों को क्यों नहीं पहचानता। यह मेरी ही कमी है या लेखक की भी है। क्या हमारा लेखक नए ज़माने के नए तरीकों से पाठक से संवाद करता है। क्या हमारा पाठक उन तरीकों का इस्तमाल करते हुए अपने लेखक को खोज पाता है। हिन्दी के कई बड़े लेखकों का इस मामले में लोहा मानता हूं कि बाज़ार के चाल चलन से दूर रहते हुए भी उन्होंने ख्याति और रचना के स्तर की ऊंची से ऊंची बुलंदी को छुआ है मगर क्या वो बुलंदी सार्वभौमिक है। अपने ही हिन्दी समाज में सार्वभौमिक है। सार्वभौमिकता से मेरा मतलब व्यापकता से है। अगर आप इतने ही बाज़ार विरोधी हैं तो दस हज़ार की पेशगी पर किताब क्यों लिखते हैं। पीडीएफ फाइल भेज दीजिए। अगर हमारा बड़ा लेखक भी दस या पचीस हज़ार की पेशगी पर लिखता है तो सरोकार के अलावा कुछ अन्य कारण रहे होंगे। जैसे प्रमोशन मठाधीशी वगैरह। मैं कौन होता हूं उनकी नीयत पर सवाल करने वाला। करना भी नहीं चाहिए क्योंकि मुझे इस दुनिया की वास्तविकता ठीक से नहीं मालूम। मगर इतना समझ सकता हूं कि दस हज़ार के रेट पर जो किताब लिख रहे हैं वो सचमुच सरोकारी क्रांतिकारी होंगे या फिर दूसरा यही होगा कि फालतू होंगे। हर भाषा का पाठक किताबों की कीमतें अनाप शनाप नहीं देता है। अंग्रेजी के किताबों की कीमत भी हिन्दी जैसी ही होती हैं। वहां भी पांच सौ की किताबें होती हैं यहां भी। उधर भी डेढ़ सौ वाली होती है इधर भी । जब हमारा लेखक इतने मन से और इतने सस्ते में प्रकाशक या रचना के प्रति समर्पित है तो प्रकाशक को निश्चित रूप से उसे बाज़ार के पैमानों से हट कर समझना चाहिए। अगर प्रकाशक ऐसा करता है तो ठीक ही करता है। दस हज़ार वाला या तो लेखक नहीं होगा या फिर वो बाज़ार को लेकर नासमझ होगा या फिर उसे शौक होगा कि घर आए मेहमान को बताए कि देखिये ये मेरी किताब है पढ़ लीजिए. कहां मिलेगी तो हमीं से ले लीजिए। प्रकाशक लाइब्रेरी को बेच कर खुश हो लेता है। लेखक भी खुश है कि उसने अपनी ज़िम्मेदारी की। इसमें कोई दिक्कत नहीं है। दिक्कत तभी है जब आप पाठक तलाशने लगते हैं। पाठक की तलाश का मतलब अगर मैं यही समझ रहा हूं कि किताब खरीदने वाला पाठक तो। जिस दिल्ली में हिन्दी के किताब की अच्छी दुकान नहीं है वहां आप बताइये पाठक लेखक को ढूंढेगा या लेखक को पाठक ढूंढने चाहिए या प्रकाशक को यह काम करना चाहिए। बिना मंडी बिना रेहड़ी पटरी के बाज़ार नहीं होता। अंसारी रोड के गोदाम कभी दुकान का विकल्प नहीं हो सकते। फिर भी जो पाठक चल कर आते हैं और खरीदते हैं उन्हें सलाम करना ही चाहिए। मगर इस वजह से भी पाठक दूर होते हैं। वो प्रकाशित को तुरंत पढ़ने के सौभाग्य से वंचित हो जाते हैं।

लाइब्रेरी के बाद पुस्तक मेला। क्या आप बोरी में किताब घर लायेंगे। क्या इस तरह से कोई पाठक बर्ताव करता है या फिर वो साल भी खरीदता रहे और पढ़ता रहे ऐसा क्यों नहीं हो सकता। लाइब्रेरी अपनी उपोयिगता के अंतिम चरण में है। शोध के अलावा लाइब्रेरी की उपयोगिता खत्म नहीं भी हुई है तो अप्रासंगिक हो चुकी है। लाइब्रेरी एक मतृप्राय अवधारणा है। इसका संबंध भी कोर्स और कंपटीशन से है। कोर्स से बाहर आते ही लाइब्रेरी से रिश्ता टूट जाता है। वो हमारी शहरी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। आन लाइन होने की तैयारी में हैं। कुल मिलाकर हमारा पाठक लेखक और प्रकाशक एक आलसी समाज बाज़ार की संरचना करते हैं। इस पर पहले भी बातें हो चुकी हैं बहुत ज्यादा करने का मतलब नहीं। मगर ऐसा भी नहीं कि मेरी बात खत्म हो गई।


हमारा पाठक भी प्रयास नहीं करता है। हम जिस सामाजिक राजनीतिक वातावरण में पाठक बनते हैं वहां पढ़ने का मतलब है जो प्रेसक्राइब्ड है। स्कूल और कालेज में हमारे पढ़ने का जो सैन्यीकरण होता है वो पढ़ने की स्वाभाविक प्रवृत्ति को कुंद करता है। घर में भी यही चलन होता है। मां या पिता का कोई फेवरेट लेखक कम ही होता है। उसकी किताब कम ही होती है। ज्यादातर घरों में। आप जैसे ही स्कूल कालेज के रेजिमेंट से निकल कर नौकरी में आते हैं सबसे पहले पढ़ने की आदत का त्याग कर देते हैं। कोई उम्मीद भी नहीं करता कि आप पढ़ें। इसीलिए किसी से पूछिए आप प्रेमचंद को जानते हैं तो कहेगा हां। उदय प्रकाश को जानते हैं मंगलेश डबराल को जानते हैं तो कहेगा ना। हालांकि दोनों शानदार लेखक कवि और खासे लोकप्रिय भी हैं। फिर भी। हमारे समाज में जो कोर्स में नहीं है वो पढ़ने लायक नहीं है। मैंने भी अपने खानदानी जीवनकाल में यही देखा है। पढ़ने को आनंद और पहचान से कभी नहीं जोड़ा गया। रागदरबारी की छपाई देखिये। इतना खराब कवर है कि वो किताब कभी ड्राइंग रूम की पहचान नहीं बन सकती फिर भी वो हम सब की पहचान है। सिर्फ रचना शक्ति के कारण। बाज़ार शक्ति के कारण नहीं। हिन्दी का बाज़ार हिन्दी के उत्पादों को घटिया बनाता है।

हमने पुस्तकों को ब्रांड की तरह पेश नहीं किया। किताबें सूरत से दुखी लगती हैं। सरोकारों की नकली संवेदनशीलता के कवर से ढंकी होती हैं। लेखक साहित्य लिखने के बाद सार्वजनिक जीवन की तमाम बहसों से दूर हो जाते हैं। उनकी कोई सार्वजनिक पहचान साहित्य से बाहर की नहीं है। तो साहित्य के बाहर के पाठकों से रिश्ता कैसे बनेगा। छोटे छोटे प्रयास हो रहे हैं। होते रहते हैं। इन प्रयासों का कोई मतलब नहीं जबतक ये कोई मार्केटिंग के फार्मूले में नहीं बदलते। हम बाज़ार को लेकर डर जाते हैं कि लेखन से समझौता करना होगा। इतने कम में बिकते हुए जब आपने समझौता नहीं किया तो ज्यादा दाम से कैसे बिक जाएंगे। एक बार लिखना तो छोड़िये। पहले प्रकाशकों से अपना बाज़ारू रिश्ता ठीक कीजिए वो आपको पाठकों तक पहुंचा देंगे। लोकार्ण एक और वायरस है जो किताबों को पाठक से दूर कर रहा है। लोकार्पण की रणनीति पर ठीक से पुनर्विचार की आवश्यकता है। अगर आप मार्केट के नियम से चलना चाहते हैं तो नियम को जानिये या फिर नया नियम लिख दीजिए।

अफसोस होता है कि हिन्दी के बेहतरीन रचनाकार आलोचकों का ही आसरा देखते रह जाते हैं। वो पाठकों की तरफ देखते ही नहीं हैं। यह एक गैप है जिसे भर सकते हैं तो कोई फार्मूला निकलेगा। मैं आपके सरोकार की भावना का अनादर भी नहीं कर सकता। यह गुनाह होगा। मगर कोई आपके सरोकार की भावना को मजबूरी में बदलते तो वो सरोकार कम समझौता ही ज्यादा होगा। पाठक हैं। चारों तरफ हैं। मगर क्या हम पाठकों की तलाश कर रहे हैं। पाठक का अपना स्वाभिमान होता है। मेरे घर के सामने पटरी पर जितनी भी अच्छी चीज़ें बिकती हैं दुकानदार कहता है पाठक पहले उसे ही खरीदता है। पाठक का अपना स्वाभिमान होता है। ज़रूरी नहीं है कि वो भी सरोकार के तहत ही पढ़ रहा हो। हमने हिन्दी में किताब खरीदने की संस्कृति पैदा नहीं की. इस बार दुर्गा पूजा में कोलकाता में था। सुनील गांगुली को चिप्स या किसी चीज़ के विज्ञापन में देखा। फिर शांतिनिकेतन में उनके एकांत घर को देखा जहां वो दुर्गा पूजा से पहले बंद हो जाते हैं और लिखते हैं। पूछा कि कैसे मैनेज करते हैं तो बताया गया कि काफी कमाते हैं। मैं अगर ये बात कह दूं तो लोग मेरी यहीं फिंचाई कर देंगे। लेकिन हमें सोचना चाहिए। बाज़ार को रिजेक्ट करने का फार्मूला मैंने दे दिया। आप किताब छापिये मत. पीडीएफ फाइल रखिये और अपने ब्लाग पर डाल दीजिए। यदि बाज़ार में जाते हैं तो उसके नियमों के अनुसार बड़ा खेल खेलिये। मुझे यह मत बताइये कि हिन्दी में किताबों को लेकर बड़ा खेल नहीं खेला जाता है। खूब जानता हूं। अगर सारी कोशिश पाठक को किनारे कर थोक में बेचने की होगी तो क्या किया जा सकता। पाठक तो खुदरा होता है। लेखक को भी खुदरा होना चाहिए। मैं विकल्प नहीं दे सकता। रास्ता यही है कि लेखक पाठको के बीच पहुंचे। पाठक उसके पास आ जाएगा। पहले प्रतिस्पर्धा तो हो। हर लाइब्रेरी को बुक कांप्लेक्स में नहीं बदल सकते। क्या लाइब्रेरी के बाहर उसी कैम्पस में किताबों की अच्छी दुकान नहीं हो सकती। क्यों नहीं साहित्य कि किताबों के लिए ठेला गाड़ी सोची जा सकती है, क्यों नहीं किताबों को मगंल बाज़ार में बेचा जा सकता है, क्यों नहीं हिन्दी की किताबें एयर पोर्ट पर मिलती हैं, जब वहां हिन्दी का चैनल चलता मिल जाता है तो हिन्दी का प्रकाशक अपनी किताब क्यों नहीं रखवा सकता, क्यों नहीं हम हिन्दी के नायकों और लेखकों के बीच कोई रिश्ता बनाकर किताब को पाठकों तक पहुंचातें हैं। हमारे तरीके पुराने पड़ रहे हैं। फर्क किसी को नहीं पड़ रहा। गिरिराज और निरुपम के अलावा। नए तरीके सामने हैं। दिख नहीं रहे हैं। बड़े लेखक मैदान में उतरें। नए लेखकों की किताबों की समीक्षा करें। समीक्षक आलोचक और लेखक के अंतर को मिटा दीजिए। आलोचना और समीक्षा कोई विशेष काम नहीं है। इसके लिए किसी विशेष योग्यता की कोई ज़रूरत नहीं है। ये सब बेकार की बातें हैं। जब विकेटकीपर पैड उतार कर बोलिंग कर सकता है तो लेखक भी कर सकता। बहुत कुछ करना होगा। वर्ना मिलेंगे इसी विषय पर किसी नए लेखक के साथ, किसी और सेमिनार में.

ऊं सिब्बलाय नम:

तो क्या सरकार पहले से सतर्क होने की कोशिश कर रही है कि भारत में भी अरब जगत और संपूर्ण जगत में चल रहे कब्ज़ा और तख्ता पलट आंदोलनों की नौबत न आ जाए? हिंदुस्तान में वैसा तो नहीं हुआ मगर फेसबुक,ट्वीटर और एस एम एस के ज़रिये अन्ना आंदोलन ने ज़ोर ज़रूर पकड़ा। फिर भी क्या कोई सरकार इस बात से निश्चिंत हो सकती है कि अब कोई नया आंदोलन खड़ा नहीं होगा? ट्वीटर और फेसबुक पर लिखी जा रही बातों पर सरसरी निगाह दौड़ाइये तो पता चल जाएगा कि यहां सरकार और पूरे राजनीतिक तबके के बारे में क्या चल रहा है। अगर कोई यह समझता है कि यह जमात पूरी तरह दक्षिणपंथी या विरोधी पार्टी समर्थक है तो वो गलत है। इसमें कोई शक नहीं कि नेट जगत में सरकार लोकप्रियता के मामले में काफी पीछे चल रही है लेकिन इसे कोई राजनीतिक दल भड़का रहा होता तो आडवाणी की रथ यात्रा को वैसा ही समर्थन मिलता जैसा अन्ना आंदोलन को मिला। बात चहेते नेताओं की तस्वीरों की भी नहीं, बात उससे आगे की है।

क्यों आई टी मंत्री कपिल सिब्बल ने याहू,गूगल, फेसबुक और यू ट्यूब जैसी सोशल मीडिया संस्थानों को बुलाया था? क्या वो सचमुच इस मुगालते में हैं कि जिस फेसबुक पर रोज़ाना २५ करोड़ तस्वीरें अपलोड होती हैं उनकी पहले से जांच की जाए। क्या वो सचमुच इस भ्रम में हैं कि भारत में फेसबुक और ट्वीटर के करीब आठ करोड़ उपभोक्ताओं की बातों पर अंकुश लगा सकेंगे? यह एक खतरनाक और असंभव काम है। फेसबुक और ट्वीटर का वजूद इसीलिए है क्योंकि यहां अभिव्यक्ति व्यक्तिगत और बेरोक-टोक है। सरकार द्वारा मैनेज होने वाले संपादकों या मीडिया संस्थानों के ज़रिये नहीं। इन मंचों पर सबकी राय की हैसियत बराबर की होती है। एक से एक राय मिलती हुई फटाफट जनमत में बदलती चली जाती है। यहां पर बन रही छवि को कोई भी सरकार हल्के में नहीं ले सकती। बेहतर तरीका यही है कि यहां आकर लिखने वालों से संवाद करे न कि उनके मन में भय पैदा करे। काश यह बात सरकार को कोई बता सकता। भारत में कोई बीस करोड़ लोग हैं जो इंटरनेट और मोबाइल के ज़रिये सोशल मीडिया के इन मंचों से जुड़े हैं। वोट के लिहाज़ से भले ही सत्ता दल को कमतर लगें मगर जनमत के लिहाज़ से से बिल्कुल कम नहीं हैं।

पारंपरिक मीडिया की विश्वसनीयता के कमज़ोर होने के दौर में लोगों को सोशल मीडिया पर गज़ब का विश्वास हो चला है। लेकिन पारंपरिक मीडिया ने भी इनसे होड़ करने की बजाय शामिल होना ही ठीक समझा। आज हर अखबार और टीवी चैनल ट्वीटर पर आने के लिए बेकरार है। क्या सरकार ऐसा नहीं कर सकती थी? यह ठीक है कि यू ट्यूब पर शरद पवार को तमाचे मारने की घटना पर कई आइटम बन गए हैं। दिग्विजय सिंह को लेकर अजीबोगरीब किस्म की तस्वीरें हैं पर वो तो नरेंद्र मोदी को लेकर भी हैं और मायावती को लेकर भी। लेकिन कपिल सिब्बल सिर्फ अपनी सरकार और पार्टी के नेताओं की तस्वीरों को लेकर क्यों भावुक हो गए। क्या वो नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते थे, क्या वो इसे अपनी तरफ से इसी मंच पर बहस में लाकर सार्थक तरीके से नहीं रोक सकते थे मगर शंका तो उन्होंने खुद पैदा कर दी, पिछले दरवाज़े से इंटरनेट कंपिनयों को बुलाकर और हड़का कर।

दुनिया में जब सोशल मीडिया की शुरूआत हुई तो ज़्यादातर लोग पुरानी बातों की खुमारी साझा कर रहे थे। मगर जल्दी ही लोग अतीत से निकलने लगे। वो समाज और सत्ता पर सवाल करने लगे। जब ऐसा हुआ तो नेता भी सोशल मीडिया से जुड़ने लगे। वो अपनी बातों को ट्वीट कर परखने लगे कि जनमत कैसा बन रहा है। लेकिन दूसरी तरफ ये नहीं देख पाए कि न्यूयार्क में बैठी एक लड़की कपिल सिब्बल के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त की और किसी ने उसे पसंद करने के बाद री ट्वीट किया तो वो हज़ारों लोगों की ज़ुबान बन गई। सोशल मीडिया पर बातें अब राजनीतिक होने लगी हैं। सोशल मीडिया को राजनीतिक किसने बनाया? राजनीतिक दलों ने बनाया। जब वे लोगों की निज अभिव्यक्ति के क्षेत्र में घुस कर वोट मांगने लगे। प्रचार करने लगे। बीजेपी से लेकर कांग्रेस और अन्य सभी दलों ने ये खेल खेला है। जब वो इसे वोट मांगने का मंच समझते हैं तो अब क्यों घबरा रहे हैं कि सोशल मीडिया का वोटर उनके ही खिलाफ हो रहा है। मगर नेताओं को अभी यह बात समझ नहीं आई है कि यहां की हवा को रोकने की कोशिश करेंगे तो तूफान से टकरा जायेंगे। दुनिया के किस हिस्से में नेताओं की मज़ाहिया तस्वीरें नहीं बनतीं और छपती हैं। आम तौर पर लोग ऐसी तस्वीरों पर हंसते हैं और लाइक बटन चटका देते हैं। आपत्तिजनक होने पर डिलिट यानी मिटा देते हैं। भारत में क्या एक भी ऐसा ठोस प्रमाण है जिससे यह साबित हो कि सोशल मीडिया के चलते दंगा भड़का। सही है कि वहां धर्म विशेष और नेताओं की आपत्तिजनक तस्वीरें घुमती हैं, जो सरकार को लग सकती है कि भड़काऊ हैं और इनसे सांप्रदायिक दंगे हो सकते हैं। फिर बताइये भरतपुर में दंगा क्या फेसबुक और ट्वीटर के कारण हुआ। ये तभी होगा जब कोई राजनीतिक दल ऐसा करना चाहेगा। दंगे बिना राजनीतिक समर्थन के नहीं होते हैं। सोशल मीडिया पर कई विचारधाराओं के हज़ारों लोग आपस में टकरा रहे होते हैं। सारी प्रक्रिया एक ही समय में और एक ही जगह पर चल रही होती है। यहां अपने आप सामाजिक नियंत्रण होते रहता है। कर्नाटक की राम सेने पार्टी को याद कीजिए। ये लोग सांस्कृतिक स्वाभिमान की ठेकेदारी करते हुए लड़कियों पर तरह तरह के नियम लाद रहे थे और वेलैंटाइन डे का विरोध कर रहे थे। मगर दिल्ली की एक लड़की ने पिंक चड्ढी कैंप शुरू कर दिया और राम सेने के दल को अल्पमत में ला दिया। एक संकीर्ण और सांप्रदायिक विचारधारा को जगह नहीं मिली। बहुत सारे मौलवी पंडित ग्रंथी फेसबुक पर हैं। उनके सामने से भी ऐसी तस्वीरें गुज़रती हैं। वो चेतावनी देते हुए इन तस्वीरों को मिटा देते हैं। आगे कोई बहस नहीं। भड़काने का उद्देश्य वहीं पर समाप्त हो जाता है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि धर्म गुरुओं या धार्मिक तस्वीरों को आगे कर सरकार ने अपने इरादे को ढांपने की कोशिश की। हाल ही में दिल्ली में विकीलिक्स के जूलियन असांज ने कहा कि दुनिया भर में सरकारें इस्लामिक आतंकवाद के नाम पर सोशल मीडिया या इंटरनेट की मानिटरिंग कर रही हैं। तो क्या भारत में भी धार्मिक तस्वीरों के बहाने ये खेल खेलने की कोशिश की गई? ताकि सेंसर की इस कोशिश को सेक्युलर बनाम कम्युनल बनाकर देशहित में ज़रूरी साबित कर दिया जाए। सोशल मीडिया में मर्यादायें टूट रही हैं। मगर यह उसका अत्यंत ही छोटा और अप्रसांगिक हिस्सा है। यह बहस पुरानी है कि अश्लीलता कौन तय करे। सरकार या लोग। अश्लीलता की सीमा तो सरकार बताती है मगर उसके बहाने वो किस हद तक आपके व्यक्तिगत स्पेस में घुस सकती है, ये नहीं बताती है। अश्लीलता के पैमाने पर किसी राजनीतिक दल का स्टैंड साफ और टिकाऊ नहीं है। ओमर अब्दुल्ला ने कपिल सिब्बल के प्रसंग पर ट्वीट किया कि बीजेपी अभिव्यक्ति की आजा़दी की बात कर रही है जबकि इसी के चलते महान कलाकार एम एफ हुसैन को हिन्दुस्तान छोड़ना पड़ा। मगर वो यह ट्वीट नहीं कर पाए कि कांग्रेस ने क्या उन्हें हिन्दुस्तान लाने की हिम्मत दिखाई। क्यों तस्लीमा पर लेफ्ट की सरकार पर प्रतिबंध लगा। पहले राजनीतिक दल आपस में नज़रिया साफ कर लें फिर लोगों को सीखायें कि वो क्या सोचें और क्या कहें।

इसीलिए सरकार की नीयत पर संदेह होता है। सरकार को समझना चाहिए कि करोड़ों की संख्या में लोग फेसबुक या ट्वीटर के गुलाम नहीं हैं। अगर यहां अभिव्यक्ति की आज़ादी संदिग्ध हो जाएगी तो जल्दी ही ये मंच भी अप्रासंगिक हो जायेंगे। सेकेंड भर में अपना अकाउंट बंद कर वहां चले जायेंगे जहां उन्हें ज़्यादा आजा़दी मिलती हो। लोगों ने इसका स्वाद चख लिया है और वो बार बार इसकी तलाश करेंगे। इंटरनेट को लेकर उसकी नींद टूटी भी तो देर से और ग़लत करवट से। सरकार चाहे जो करे, चाहे जो कहे,लोग अब कहेंगे। यहां नहीं तो वहां कहेंगे।
(rajasthan patrika me chhap chuka hai)