रामधन एंड मूलधन इन यूपी इलेक्शन

रामधन पगडंडी पर दौड़े चले आ रहे थे। मूलधन ने रोक लिया तो टोके जाने पर गरमा गये। काहें रे काहें टोक दिया हमको बीच रास्ते में। मूलधन भी गरम हो गया। अबहूं अपशकुन का भय सतावत है भइया। राजनीति तो हम गरीबों के लिए साजनीति है। सही से साज देती है। सीधा कर देती है। अरे काहें ऐसे बोलता है मूलधनवा। तुमको ब्याज नहीं मिला क्या अबकी चुनाव में। पौवा पर टैक्स बढ़ गया है। आधे बोतल दिया है। तीन रोज़ का खुराक। तो मस्त रह ओतने में। नहीं भइया। सुनत रहीं कि बाबू टिकटार्थी हमरे इंसाफ खातिर लखनऊ गएल रहलन। साले इंसाफ के गंजी अंडरवियर बनाके पहिरबे का रे। ज़मीन का मुकदमा है उ तो सगरो चुनाव में रहेगा। चुनाव बिला जाएगा मगर मुकदमा बिलाया है कभी। मूलधन गरम हो गया। एमबीसी हैं रामधन। हम एमबीसी हैं। हमरे जात के हैं सैम पित्रोदा। विश्वकर्मा की संतान। रामधन और गरम हो गया। बोला विश्वकर्मा की संतान है तो लोहा का समान काहे नहीं बनाइस। प्लास्टिक आ कचकाड़ा के कंप्यूटर बना दिया। आज तकला विश्वकर्मा दिवस को राष्ट्रीय अवकाश में बदलने का बात किया ऊ।

ये देश है वीर जवानों का अलबेलों का मस्तानों का....लाउडस्पीकर से आती आवाज़। मगर एक और आवाज़ तेजी से बढ़ती चली आ रही थी। यूपी बदनाम हुई, डार्लिंग तेरे लिए, अमिया से आम हुई डार्लिंग तेरे लिए, ओ वोटर रे ओ वोटर रे, तूं कहां छुप गया चीटर रे...नैनो कार पर अवधेश बाबू का प्रचार चल रहा था। कार छोटी है मगर सरकार हमारी होगी। मोस्ट बैकवर्ड की अब फ्रंटफुट पर खेलने की बारी होगी। अति पिछड़ा जागेगा और अति अगड़ा दौड़ा चला आवेगा। राहुल बाबा भी हमीं को खोज रहे हैं। हम सब अब तक चुनाव में लुकाइल बिलाइल थे,अब ताकत हैं। बीजेपी भी खोज रही है। नीतीश जी को नहीं लाना चाहती,कुर्मी नेता को तो कुशवाहा को ले आई। लोकल नेता चाहिए भोट खातिर। हमको भोट दीजिए। नेता हम नया ज़रूर हैं और अभी तक अपनी पार्टी के ही हुज़ूर हैं।

मूलधन चकरा गया। लगा खेत से गाजर उखाड़ने। आज शाम को उसे कुम्हार के यहां से घड़ा भी लाना था। सोचा तालाब से सिंघाड़ा लेते चले। तभी साइकिल से अखिलेश भैय्या की पार्टी वाले आ गए। कम्युनिस्ट क्रांति से उधार लेकर लाल लाल टोपी पहने उम्मीद की साइकिल चलाते हुए। रथ पर रथ। यात्रा पर यात्रा। ये छोटे सरकार हैं, यूपी के दावेदार हैं। नारे लग रहे थे। रथ प्राइवेट जिम की तरह है जिसकी छत पर सिंबल साइकिल खड़़ी है। मूलधन कहने लगा कि हम अति पिछड़ा हैं भैय्या। अखिलेश बोलने लगे तो काहें घबराता है। हम बनायेंगे न पिछड़ा में अगड़ा। दिल दिया है जान भी देंगे ए पिछड़ा तेरे लिए...कर्मा के गाने पर अखिलेश के रथ से आवाज़ आती है।

तभी कमल छाप हाथों में कीचड़ लिये चले आ रहे हैं। देखो यही है वो कीचड़ जिसमें कमल खिलता है और यही है वो फटीचर जिससे कीचड़ बनता है। बस तनाव फैल गया। पिछड़ों को इंसाफ दिलाने निकले कुशवाहा को कैसे कह दिया कि कीचड़ हैं। कटियार बोले कीचड़ नहीं इ तो विभिषण है। रावण को हराने का आभूषण हैं। ऊं स्वाहा स्वाहा कुशवाहा। आदतन भाजपा वाले बिना हवन के काम शुरू नहीं करते। उमा जी चुप। एमबीसी नेता की तलाश में,लुट गई बीजेपी बाज़ार में। ये नारा लगने लगा। कांग्रेसी मजा लेने लगे।

तभी फुर्सतगंज की रैली में राहुल बाबा आ गए। मुझे बहुत गुस्सा आता है। आपको नहीं आता? रैली में लोग चिल्लाने लगे कि आता है आता है हमें भी गुस्सा आता है। पर क्या करें किसी और पे नहीं, तुम पे भी जो आता है। राहुल बाबा बोलने लगे, क्रेंद्र सरकार ने ये दिया, वो दिया मगर आपने वोट नहीं दिया। इस बार देना। यूपी की ताकत लौटेगी। विधानसभा चुनाव ही प्रधानमंत्री बनवा देगा केंद्र में। आपका विकास नहीं है। बाइस साल में नहीं हुआ। हम नया मेथड लाए हैं। पांच साल में यूपी विकासशील भारत का विकसित राज्य बन जाएगा। कहते कहते राहुल बाबा चलने लगते हैं। चलते चलते कहने लगते हैं। एमबीसी और मुस्लिम खोजने लगते हैं। कुछ तो आ जाओ। कुछ तो टूटो। कुछ तो जुटो। तभी प्रचार गाड़ी गाने लगती है। तू छुपी है कहां, मैं तड़पता यहां...तेरे बिन सूना सूना है यूपी का जहां। तू छुपी है कहां। ये कौन एमबीसी भड़का, ये कौन मुस्लिम छटका, महफिल में ऐसी भगदड़ मची तो दिल है मेरा धड़का। नवरंग के गाने पर नौजवानों के गीत।

दे दे भोट दे भोट दे भोट दे रे..देदे भोट दे...मूलधन कपार पीट लिहिस। मुझे इंसाफ चाहिए। तो रामधन बोला फ्री में आता है क्या इंसाफ। दे अपना भोट इनको। पर सबने हमें ठगा है रामधन भैय्या। अरे मूलधन,मुकदमा लड़ने वक्त वकील की फीस का ध्यान नहीं रखते। भोट इनकी फीस है तुम्हारे इंसाफ की। दे दो।

सैम तुम बैकवर्ड हो

आपने सत्यनारायण गंगाराम पित्रोदा के बारे में तो सुना ही होगा। तीस सालों से जो भारतीय सत्ता के शिखर तबके में सैम पित्रोदा नाम से जाने जाते हैं। उत्तर प्रदेश के रमाबाई नगर की एक रैली में जब राहुल गांधी ने सैम पित्रोदा के नाम का असली विस्तार बताया तो वहां मौजूद भीड़ में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। राहुल उस भीड़ को बता रहे थे कि भारत में दूरसंचार क्रांति के लेखक सैम पित्रोदा हैं और सैम विश्वकर्मा जाति के हैं यानि अति पिछड़े वर्ग से आते हैं। मैं बचपन से सैम पित्रोदा के बारे में एक रहस्य की तरह पढ़ रहा हूं। जैसा कि हर स्कूली छात्र का मासूम मन होता है मैं भी सैम को एक ऐसे शख्स के रूप में जानता रहा मानो वो भारत की समस्याओं के कोई टेक्नो दैवी रूप रहे हों। अब मैं सैम को इस नज़र से नहीं देखा मगर हैरानी हो रही है कि मैंने अब तक सैम को सत्यनारायण गंगाराम पित्रोदा यानी विश्वकर्मा जाति के प्रतीक के रूप में क्यों नहीं देखा था। राहुल गांधी ने क्या इस चुनाव से पहले कभी सैम को देखा होगा? क्या उनके पिता राजीव गांधी ने सैम से दोस्ती किसी जातिगत राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर की थी? अगर ऐसा था तो राजीव कभी सैम को चुनावी सभाओं में नहीं ले गए। एकाध अपवाद हों तो माफी चाहूंगा मगर जो सैम टैक्नो क्रांति के गैर जातीय और गैर क्षेत्रीय प्रतीक रहे हों वो उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में विश्वकर्मा जाति के निकल आए तो इस सामान्य समझ कर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

यह खोज मौलिक रूप से राहुल गांधी की ही रही होगी। उत्तर प्रदेश में अति पिछड़ों की मदद से मायावती ने पिछली बार अपनी ज़बरदस्त जीत का जाल बुना था। राहुल इसमें सेंध लगाना चाहते हैं। इसलिए वो मंच पर मौजूद अति पिछड़े नेताओं की तरफ इशारा कर रैली में आए लोगों को बता रहे थे कि आप भी आगे बढ़ेंगे। वो मुलायम सिंह के गढ़ में भी घूमते रहे। जिनका पिछड़ी जातियों पर कब्जा रहा है। राहुल के ही इशारे पर कुर्मी जाति में पकड़ रखने वाले पूर्व समाजवादी नेता और कांग्रेस सांसद बेनी प्रसाद वर्ना को कबीना मंत्री भी बनाया गया। अब सवाल यह उठता है कि क्या एक नितांत गैर जातिवादी माहौल में पला बढ़ा यह युवा राजनेता राजनीति की व्यावहारिकता को समझने लगा है? राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के भीतर बदलाव के लिए निकले थे। युवा कांग्रेस में लोकतंत्र की बहाली के लिए एक किस्म की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कायम कर रहे हैं जिसका मूल इस बात में बताया जाता रहा कि जो ज़मीन के स्तर पर लोकप्रिय होगा वही चुनकर युवा कांग्रेस में नेता बनेगा। तो क्या यह राजनीतिक जानकारों की कमी थी जो यही देखते रहे कि राहुल गांधी प्रतिभा को मौका दे रहे हैं, पृष्ठभूमि को नहीं। क्यों यह माना जाने लगा कि यह युवा राजनेता बीसवीं सदी की जकड़नों में फंसी राजनीतिक समीकरणों से निकलने का कोई रास्ता ढूंढ रहा है? अगर ऐसा ही था तो क्या राहुल गांधी का विश्वास कमज़ोर पड़ रहा है? क्या वो मायावती और मुलायम सिंह यादव के जातिगत समीकरणों का काट उन्हीं के फार्मूले से देने लगे हैं?

दरअसल राहुल गांधी कई स्तरों पर बदल रहे हैं। वो समझ रहे हैं कि दिल्ली की जनता या ट्वीटर जमात को सबसे पहले भारतीय वाले नारे से खुश किया जा सकता है मगर वोट नहीं बटोरा जा सकता है। वोट बटोरने के लिए ज़रूरी है कि सैम पित्रोदा अब अति पिछड़े के रूप में आगे आएं। ये सैम पित्रोदा की नाकामी है कि उन्होंने जिस कांग्रेस पार्टी के नेताओं से नज़दीकी का लाभ लिया और कई काम अच्छे भी किये मगर खुद को विश्वकर्मा जाति के रूप में पेश नहीं किया जिससे वे कांग्रेस के काम आ सके। अच्छा राहुल गांधी बदल रहे हैं। सात साल से उत्तर प्रदेश की लगातार यात्राओं ने उनकी सोच बदल दिया है। वो लड़ रहे हैं और ज़रूरत पड़ने पर भिड़ रहे हैं। अपने गुस्से को ज़ाहिर करते हुए एंग्री यंग मैन की छवि देने की कोशिश करते हैं मगर गांव कस्बों के वोटरों के लिए जातिगत नायकों को ढूंढ रहे हैं।

सिर्फ जाति के आधार पर ही नहीं। राहुल गांधी बदायूं की आलिया कादरिया मदरसा पहुंच गए। नमाज़ी टोपी पहनकर छात्रों से गले मिलने लगे। लखनऊ में थे तो इस्लामी शिक्षा के केंद्र नदवातुल विश्वविद्लाय चले गए। यह सब वो केंद्र रहे हैं जो कई कारणों से बाबरी मस्जिद के खिलाफ चले राजनीतिक आंदोलन के दौरान चर्चा में रहे थे। हर जगह जाने के बहाने अलग हैं। कहीं शिक्षा के अधिकार के तहत मदरसों का मामला हो तो कहीं मुसलमानों को आरक्षण देने का मसला। राहुल यूपी के चुनावी मैदान में उसके सारे पुराने हथियारों से ही लड़ रहे हैं। उनके अभियान के बाद कांग्रेस के नेता खुल कर पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण देने के मसले पर बोल रहे हैं। वो फिर से उस पुराने कांग्रेस की जमीन खोज रहे हैं जिसने कांग्रेस को लंबे समय तक सत्ता दी। क्या यह मुमकिन है? देखना होगा कि एक साल कई कार्ड खेलते हुए राहुल गांधी कांग्रेस को यूपी की सत्ता में ला पाते हैं या नहीं? उनका एक्का तो यूपी के विकास का मुद्दा है मगर बाकी पत्तियों को वो उनकी चाल के मुताबिक ही फेंक रहे हैं।

राहुल गांधी क्या बेसब्र होते जा रहे हैं? उन्होंने खुद को उत्तर प्रदेश के चुनाव से इतना जोड़ लिया है कि अगर नतीजे नहीं आए तो उनकी व्यक्तिगत नाकामी समझी जाएगी । यह एक बड़ा जोखिम है जिसकी ज़रूरत नहीं थी। राष्ट्रीय मुद्दों से उनकी अनुपस्थिति उनका पीछा कर रही है और करेगी। लेकिन क्या राहुल गांधी खुद को विकास और जातिगत राजनीति के मिश्रण के मुताबिक ढालने लगे हैं। जो लोग राहुल गांधी से राजनीतिक कारणों से मिलते रहे हैं वो हमेशा ये बात कहते हैं कि इलाके के तमाम समीकरणों की वे पूरी जानकारी रखते हैं मगर वो इन समीकरणों से आजाद एक ऐसा स्थानीय लीडर ढूंढ रहे हैं जो उनकी फौज को नया चेहरा दे सके। राहुल अगर यूपी का मैदान जीत भी गए तो क्या वो राहुल गांधी होंगे जिसकी छवि उन्होंने खुद बनाई या वो राहुल गांधी होंगे जिसे आप एक नए मुलायम या नई मायावती का संस्करण के रूप में देख सकेंगे। ऐसे निष्कर्ष के लिए जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए मगर अगर ऐसा हो जाए तो हैरान भी नहीं होना चाहिए। राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में सोई हुई कांग्रेस को लड़ना तो सीखा रहे हैं मगर हथियार वही पुराने हैं जिसके वापस मिलने के इंतज़ार में कांग्रेस यूपी में हारती रही है। पिछले लोकसभा के नतीजों से उत्साहित राहुल गांधी के पास वक्त कम है और उत्तर प्रदेश की चुनौती बड़ी। याद रखियेगा उन छवियों को जिन्हें राहुल ने लोगों के घर पहुंच कर खुद बनाई। एक ऐसे नेता की छवि जिसके लिए जनता जाति या धर्म से ऊपर है। जिसके लिए कभी सैम पित्रोदा विश्वकर्मा जाति के नहीं हुआ करते थे।
(यह लेख राजस्थान पत्रिका में छप चुका है)

पत्रकारिता का बक्साबंद वक्तावृंद काल

यह साल स्पीड न्यूज़ और बक्साबंद वक्तावृंद का काल रहा है। अन्ना आंदोलन ने दर्शकों को भी उत्तेजित किया तो स्क्रीन दड़बेनुमा बना दिए गए। बहसें होने लगीं। बहस मुंडियों को दिखाने के लिए स्क्रीन पर दस दस बक्से बनने लगे। याद कीजिए सालों पहले आजतक ने चुनावी कवरेज के दिन अपने रिपोर्टरों का बक्सा बनाया था। तब संवाददाता हीरो की तरह नज़र आए थे। फिर सभी चैनलों में ऐसे बक्से रिपोर्टरों के ही बने। अब रिपोर्टर टीवी और बक्से से गायब कर दिये गए। उनकी जगह वक्ता और प्रवक्ता आ गये हैं। वो झांक रहे हैं। जिस तरह स्क्रीन के दड़बे से मुंडियां झांक कर बोलने लगी हैं अगर ऐसे ही इसकी बारंबरता बढ़ी तो जल्दी ही वक्तावृंदों की बीबीयां फोन कर पूछने लगेंगी कि चुन्नू के पापा आपके चैनल में है या आजतक में हैं? वो निकले तो थे हेडलाइन्स टुडे के लिए मगर एनडीटीवी इंडिया में कैसे दिख रहे हैं। उनकी बेटियां फोन करेंगी कि रवीश, पापा आपके साथ हैं, जरा फोन दीजिएगा उनको। उनसे कहना है कि एनडीटीवी के बाद आजतक से होते हुए जब ज़ी स्टुडियो जायेंगे तो नोएडा के अट्टा मार्केट से मिक्सी का ग्राइंडर लेते आएंगें उसके बाद ही टाइम्स नाउ जाएं।

बहस बढ़ी तो वक्ता भी बढ़ाये गए। कुछ वक्ताओं ने इस फारमेट को गंभीरता से लिया। वो संजीदगी से आते रहें और दर्शकों तक अपनी बात पहुंचाते रहे। इनकी वजह से बहस का स्तर अच्छा भी हुआ। पार्टी प्रवक्ताओं की कमी पड़ी तो कुछ हारे हुए नेताओं को ढूंढा गया। एक चैनल ढूंढ कर लाया तो सबने चलाया। इस क्रम में कुछ वक्ता ढूंढे जाने के बाद भी जल्दी ही ग़ायब कर दिये गए क्योंकि वो अच्छे नहीं थे। फिर सांसदों को ढूंढा गया। यह एक सकारात्मक पक्ष रहा। नए सांसदों के आने से पता चला कि वो बोल सकते हैं और बेहतर भी हैं। कुछ वक्ताओं ने खुद से तय कर लिया कि वो दिन भी दो चैनल या दो बहस करेंगे तो कुछ ने इतनी उदारता दिखाई कि सुबह नौ बजे से लेकर रात के ग्यारह बजे तक बोलते ही रहते हैं। इस क्रम में एक और विकास हुआ। कुछ वक्ताओं के घर में टू एम बी लाइन लगा दी गई। यह तकनीकी चीज़ है। आप बस इतना समझिये कि ओबी वैन भेजने की जगह कुछ वक्ताओं के घर यह व्यवस्था कर दी गई कि वो बस अपने ड्राइंग रूम की कुर्सी में बैठ जायें और भाषण शुरू कर दें। कुछ ने अपनी हैसियत इस तरह से बढ़ाई कि वो स्टुडियों में नही जाते, ओबी वैन मांगते हैं। यह बड़े वक्ताओं के बीच हैसियत का लैंडमार्क बन गया है। कई वक्ताओं ने यह भी तय करने की कोशिश की है कि वो फलां के साथ नहीं बैठ सकते क्योंकि वो उनकी बराबरी के नहीं हैं। कुछ वक्ता अंग्रेजी चैनल में कुर्सी लगाकर बैठ जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वहां क्लास है। काश कोई बताता कि अंग्रेजी चैनलों की दर्शक संख्या हज़ारों में होती है और हिन्दी चैनल के दर्शकों की संख्या लाखों में। फिर भी क्लास क्लास होता है इसलिए वो हिन्दी चैनल में जाना पसंद नहीं करते। पूरी प्रक्रिया में इमेज का भी खेल है। इसलिए कुछ तथाकथित बड़े वक्ता अंग्रेजी चैनल में नियमित हैं और कुछ तथाकथित छोटे वक्ता हिन्दी चैनल में नियमित हैं। मेरी राय में हिन्दी चैनल के वक्ताओं की हैसियत अंग्रेजी से काफी बड़ी है क्योंकि वो संख्या के लिहाज़ से ज्यादा लोगों तक पहुंचते हैं। एक स्थिति और है। नया वक्ता ढूंढ कर लाइये और वो कुछ दिनों बाद दूसरे चैनल पर ज्यादा दिखने लगता है। जो ढूंढ कर लाया है उसी को नहीं मिलता।

अब तो जिन लोगों की बाइट लेने हम पूरे शहर में दौड़ा करते थे वो हमारे एक स्टुडियो से निकल कर दूसरे स्टुडियों में भागते नज़र आते हैं। इसलिए गया गुज़रा साल टीवी में बाइट की मौत का साल था। जब तक रिपोर्टर बाइट लेकर ओबी वैन की तरफ दौड़ा आता है,तब तक बाइट देने वाला स्टुडियो में पहुंच चुका होता है या वहीं ओबी वैन पर बैठकर अपनी ऑडियो टेस्टिंग करवा रहा होता है। सारे वरिष्ठ संपादकों ने लेख लिखने बंद कर दिये और बोलने शुरू कर दिये। वो इस संकट से गुज़रने लगे कि स्टुडियो में जो बोल कर आये वही लिखे या कुछ नया। नया लिखें या जो सुन कर आयें हैं वो लिखें। कई रिपोर्टरों ने जुगाड़ निकाला। उन्होंने भी खुद को अपनी बीट का प्रवक्ता बना लिया। इससे यह होने लगा कि जब तक पार्टी के नेता जाम के कारण स्टुडियो नहीं पहुंच पाते, तब तक वो पार्टी की तरफ से बोलने लगे। इससे इन रिपोर्टरों ने खुद को स्क्रीन से गायब होने से बचा लिया और पार्टी के प्रवक्ताओं को भी कड़ी टक्कर देने लगे हैं। कई संपादकों ने अपने रिपोर्टरों को चमकते देख खुद को भी प्राक्सी के रूप में पेश कर दिया। तो इस साल पूरी लड़ाई स्क्रीन पर बने बक्से में खुद को भरने की रही। कमाल की बात यह रही कि विभिन्न क्षेत्रों से अलग अलग वक्ता ढूंढ कर निकाले गए। इस क्रम में प्रवक्ता की नई भूमिका बनी। प्रवक्ता सिर्फ पार्टी का ही नहीं होने लगा बल्कि मुद्दों का भी होने लगा। कई जानकार मुद्दों के प्रवक्ता के रूप में आने लगे। बुलाये जाने लगे। कुछ प्रवक्ताओं ने जानबूझ कर खुद को एक से अधिक मुद्दों का प्रवक्ता बनाए रखा ताकि उनकी पूछ बनी रहे। वो एक साथ क्रिकेट से लेकर राजनीति पर बोलने लगे तो कुछ संविधान से लेकर आंदोलनों पर। अखबारों में जो संपादकीय पन्ना था उसे टीवी ने टक्कर दी। खबर खत्म हो गई या कतरन बनकर स्पीड न्यूज़ की घराड़ी में घूमने लगी। स्पीड न्यूज़ ख़बरों की पेराई मशीन है। तेल निकल जा रहा है खबरों का।

यह साल मुद्दों और उत्तेजनाओं का साल था। अन्ना ने इतना उत्तेजित किया कि टीवी में हज़ारों की संख्या में इसी मुद्दे पर बहस आयोजित हुई। अब अगले साल उत्तेजित मुद्दों के अभाव में देखना होगा कि क्या होता है। फिलहाल मार्च तक तो ये बहस बक्से बने रहेंगे। बुद्धू बक्से को बहस बक्से में बदलने का काम कर गया साल। एक और बात है यह साल सवालों के खत्म होने का भी साल रहा। इससे पहले आपने देखा होगा कि हर मुद्दे के बाद न्यूज़ चैनल वाले कई सवाल पूछते थे। क्या सहवाग फार्म से बाहर हैं? क्या सहवाग थके हैं? क्या सहवाग डरे हैं? न्यूज़ चैनल की तरफ से पूछे जाने वाले पांच से पचीस सवाल अब बहस के सवाल बन गए। यहां भी इसकी मौत हो चुकी है। वो सिर्फ बक्से के ऊपर झालर की तरह लटका रहता है। जिसे दूसरे टिकर या दूसरे सवाल आंधी की तरह उड़ाते हटाते रहते हैं। जिस सवाल को लेकर बहस शुरू होती है वो सवाल पहले ही जवाब के साथ खत्म हो जाता है। तू तू मैं मैं की जगह अब वक्ताओं के बीच के संबंध हम भी तुम भी में बदलने लगे हैं। वो अब असहमत कम, सहमत ज़्यादा होते हैं। वो अब बहस में एक दूसरे को मित्र बताने में ही समय खपाने लगे हैं। लड़ाई होने के बाद वो एक साथ सीढ़ी से भी नीचे उतरते हैं। वहां पर कोई मारपीट नहीं होती। सभी अपना अपना कार्ड एक्सचेंज करते हैं। नंबर लेते देते हैं। यह भारत की लोकतांत्रिक विविधता के प्रति गहरा सम्मान है। हमारे देश में व्यक्तियों के बीच कभी लड़ाई नहीं होती। सिर्फ व्यक्तियों द्वारा बोले जाने वाली बातों और मुद्दों के बीच लड़ाई होती है।

एंकर के लिए भी सख्त सवालों की गुज़ाइश कम हो गई है। अगले दिन वक्ता के न आने का खतरा रहता है। कुछ एंकरों के उत्पात पर संसद में भी चर्चा हो चुकी है। नेता इन बहसों से और एंकरों से घबराये लगते हैं। साफ है एक मुद्दे को इतना मथा जाता है कि कुछ बात एक चैनल से छूट भी जाए तो दूसरे चैनल से पूरी हो जाती है। इससे दर्शक को लाभ हो रहा है। सिस्टम का पर्दाफाश हो रहा है। जागरूकता के साथ बेचैनी और बेचैनी के साथ जागरूकता आ रही है। कोई एंकर शायरी सुना रहा है तो कोई दलीलें छांट रहा है। एंकर भी अपने आप में एक प्रवक्ता बन गया है। कई एंकर मुद्दों के प्रवक्ता बन गए हैं। टू इन वन। कई एंकर बोलते वक्त इतने तनावग्रस्त हो जाते हैं कि अगर मैं डाक्टर होता तो उनके चेहरे की तमाम नसों को कंधे के पीछे शिफ्ट कर देता ताकि वो सामान्य दिखें। नसों के फटने का खतरा ही दिखता रहा मगर कभी फटीं नहीं। कुछ गले को इतना फाड़ना शुरू कर दिया है कि बोल बोल कर सच साबित करने का प्रयास होता दिख रहा है। कुछ तो इतना हिलने लगे हैं कि बीच बीच में फ्रेम से गायब ही हो जाते हैं।

इस क्रम में अगर मैं वक्तावृंदों को जुटाने वाले गेस्ट रिलेशन वालों की बात करना चाहता हूं। हालांकि मैं गेस्ट रिलेशन शब्द को स्वीकार नहीं करता। ये भी पत्रकार ही हैं। इन्हीं के कौशल के दम पर बक्साबंद बहसों की दुकान चल रही है। इनके कौशल और तनाव पर अलग से अध्धयन किया जाना चाहिए। सारे नेताओं के मोबाइल में अब रिपोर्टर के नंबर भले न हों मगर इनके ज़रूर होते हैं। कई नेता इन्हें एस एम एस भी कर देते हैं कि शहर में आ गया हूं बुला सकते हो। कई बार इन गेस्ट पत्रकारों को कई तरीके से झूठ का सहारा लेना होता है। एक गेस्ट को बदल कर दूसरे को लाना होता है। कई बार बदला गया गेस्ट उस वक्त टीवी देखकर फोन भी कर देता है कि तुम तो बोले थे कि टॉपिक चेंज हो गया है मगर टॉपिक तो वही है। अच्छा मेरी जगह उसे बुला लिया। फिर वो सॉरी सॉरी बोलते हुए अपनी नौकरी की दुहाई देता है। ये गेस्ट पत्रकार किसी न्यूज़ डे पर किसी प्रभावी मुद्दे पर बोलने वाले प्रभावी वक्ताओं के घर को घेर कर खड़े हो जाते हैं। सर पहले मेरे यहां तो मेरा यहां में समय का बंटवारा होता है। मैं इनके श्रम और जनसंपर्क कौशल का कायल हूं। ये जल्दी ही बिना कान के सुनने लगेंगे। जिस तरह से मोबाइल पर प्रवक्ता के फोन उठा लेने के लिए चिपके रहते हैं,उससे तो कान खराब होना ही है। किसी रिपोर्टर को इनसे सीखना चाहिए। इन्हीं को पहले पता होता है कि किस नेता के यहां लंच है और किसके यहां डिनर। रिपोर्टर के पहुंचने से पहले यही खाते भी दिख जाते हैं। ये अपने सच झूठ के बीच के रोज़ाना तनावों से गुज़रते हुए और शायद बहुत ही कम पैसा पाते हुए जो काम कर रहे हैं उसकी सार्वजनिक सराहना करता हूं। बल्कि एक बड़ा बदलाव यह आया है कि अब रिपोर्टरों के बीच चैनल को लेकर प्रतियोगिता नहीं होती, गेस्ट रिलेशन संपादकों पत्रकारों के बीच होती है। ये लोग ज़्यादा खबरी लगते हैं।

कुल मिलाकर पत्रकारिता के इस बहस काल की खूबियां भी हैं और कमियां भी हैं। कई शानदार वक्ताओं ने अपने सवालों और जवाबों से सरकार या विपक्ष की कमज़ोरियों को खूब उजागर भी किया है। इससे बहस में पारदर्शिता और नाटकीयता दोनों आई है। दर्शकों को एक साथ देखने का मौका मिला है कि कौन सही है या कौन नाटक कर रहा है। इस बहस काल ने पार्टी दफ्तर में होने वाली अलग अलग प्रेस कांफ्रेंसों को भी बेमानी कर दिया है। काहें को अलग से तीन बजे और चार बजे की प्रेस कांफ्रेंस करनी है जब रात को टीवी स्टुडियों में ही टकराना है। इससे एक लाभ और हुआ है। पार्टी दफ्तर में प्रेस कांफ्रेंस से दिन में सिर्फ एक ही प्रवक्ता को मौका मिलता था। अब एक बार मुद्दा आ जाए तो उसके बाद पार्टी सूची में मौजूद तमाम प्रवक्ताओं की बुकिंग शुरू होने लगती है। इस तरह बोलने वाले नेताओं की अच्छी ट्रेनिंग हो रही है। वो बारी बारी से भारी प्रवक्ताओं से टकरा रहे हैं और अपना प्रदर्शन अच्छा कर रहे हैं। बस अगर बहस वाले कार्यक्रम का दौर कहीं ठंडा न पड़ जाए, वर्ना पहले दूसरे नंबर के प्रवक्ताओं के बाद किसी का नाम याद भी नहीं रहेगा।

तो ये रही पिछले साल की टीवी की उपलब्धि बहसबंद वक्तावृंद काल की। आलोचना सिर्फ यही है कि बहुत ही ज्यादा होने लगा है। दाल भात की तरह। ऐसी बहसें होनी चाहिएं मगर प्लीज़ इनकी हालत ये न कीजिए कि जैसे टीवी पर देखने का सुख खत्म हो गया, कहीं टीवी पर सुनने का शौक भी कम न पड़ जाए। बल्कि एक आइडिया आ रहा है। एक टीवी ऐसा भी होना चाहिए जिसमें एक ही स्क्रीन पर बीस टीवी आ जाए। जब आप एक स्क्रीन पर दस बक्से देख सकते हैं और सबको एक साथ बोलते हुए सुन समझ सकते हैं तो एक स्क्रीन पर दस चैनल क्यों नहीं देख सकते? इससे रिमोट बदलकर टीआरपी गिराने बढ़ाने की समस्या खत्म हो जाएगी। सबकी बराबर रेटिंग आएगी। एक ही अफसोस रहा। स्पीड न्यूज़ और बक्साबंद बहसों ने रिपोर्टर की मौत का एलान कर दिया। ख़बरों में उनकी ज़रूरत तो बनी रही लेकिन न्यूज़ एजेंसी की खबरों से ज्यादा नहीं। एक पंक्ति का संवाददाता बना दिए गए रिपोर्टर।

(दोस्तों एक निवेदन है। इस लेख की कापी न करें और न ही प्रकाशित करें। मीडिया साइट वालों से भी निवेदन है कि अपनी साइट पर न लगायें। ऐसा करेंगे तो बड़ी उपकार करेंगे)

टैम युक्त और टैम विमुक्त दर्शकों की जंग में टीवी

(यह भाषण हाल ही में इंडिया हैबिटैट सेंटर में हुए समन्वय कार्यक्रम के लिए लिखा गया था। चूंकि सभी कुछ बोलने की शैली में है और एक बार में ही लिखा गया है इसलिए संभव है अशुद्धियां रह गईं होंगी। उन्हें सुधार कर भूल चूक माफ कर पढ़ियेगा।)

मैं जिस दुनिया से आता हूं वहां रोज़ दर्शक की तलाश होती है। इस हिसाब से उस दुनिया में अभी तक सभी प्रकार के दर्शकों को खोज लिया गया होगा या कुछ बाकी होंगे तो जल्दी ही खोज लिये जायेंगे। मेरी दुनिया में दर्शक दो तरह के होते हैं। एक टैम युक्त दर्शक यानी जिसके घर में टैम मीटर लगा होता है। वो संख्या में सात या दस हज़ार होगा मगर औकात काफी है क्योंकि साढ़े सात हज़ार टैम बक्से ही तय करते हैं कि दर्शकों की संख्या कितनी है। दूसरा दर्शक वो है जो टैम लेस है यानी टैम विहीन है। ये बेऔकात भौकाल दर्शक हैं। छटपटाते रहते हैं कि भई हम भी तो दर्शक हैं फिर हमारी क्यों नहीं सुनी जाती। टैम विहीन दर्शक आलोचक पैदा करते हैं और फिर बाद में निष्क्रिय दर्शक में बदलकर जो दिख रहा है देखने में लग जाते हैं। टैम युक्त दर्शकों का बर्ताव कुछ संसद जैसा लगता है कि भाई हमें चुना गया है। हम हीं सब तय करेंगे। टैम विहीन दर्शक अन्ना के समर्थक जैसे हैं कि भई हमारे बीच आकर आप कानून पर चर्चा क्यों नहीं करते हैं। जो टैम विहीन दर्शक है वो टैम युक्त दर्शक का बंधुआ है। टैम युक्त दर्शक ही ताकतवर है। इसीलिए टैम युक्त दर्शक के मिज़ाज को तत्क्षण पकड़ने के लिए बड़े बड़े लोग बिठाये गए हैं। इनकी आंखों में टीवी घुसेड़ देने के लिए कई तरह के कर्मकांड नित चलते रहते हैं।

आज कल ये टैम युक्त दर्शक स्पीड न्यूज़ ज़्यादा समझने लगा है। ये काफी तेज़ी से बदलता है। रेटिंग चार्ट के हिसाब से स्पीड न्यूज़ की स्वीकार्यता पिछले दो साल से बनी हुई है। यानी आपके पास समय नहीं है। आपका ध्यान क्षणभंगुर है। इधर उधर ताक झांक करते हुए टीवी देखते हैं और आप मल्टी टास्किंग दर्शक हैं। खिचड़ी बनाते हुए, लंगोट बांधते हुए, दाढ़ी बनाते हुए आप न्यूज़ भी सुनना चाहते हैं। इन्हीं सब दलीलों से स्पीड न्यूज़ की शुरूआत सुबह के वक्त शुरू हुई। अब लगता है कि जो दर्शक घर में है वो दिन भर कोई न कोई काम कर रहा है। कपड़े धो रहा है, सब्ज़ी ला रहा है परन्तु न्यूज़ के प्रति उसकी प्रतिबद्धता कम नहीं हो रही है। ध्यान क्षणभंगुर है फिर भी वो तीस मिनट में कई सौ ख़बरें सुन कर पचा ले रहा है। ऐसा ग़ज़ब का दर्शक मैंने नहीं देखा है। जिसकी ध्यान शक्ति बको ध्यानंम को पुष्ट करते हुए दनादन खबरों को सुन कर पत्रकारिता को बचा रहा है। ऐसे दर्शकों का सम्मान किया जाना चाहिए कि कम से कम वो न्यूज़ ही देख रहा है और आप यही चाहते भी थे कि न्यूज़ क्यों नहीं दिखा रहे हैं। अब देखिये। ऐसा लगता है कि कंवेयर बेल्ट पर गन्ना लदा है और तेजी से क्रैशर के नीचे कुचला जा रहा है। अब तो आप नहीं कह सकते न कि खबरें नहीं चलती या आप यह भी तय करना चाहते हैं कि खबरें कैसे चलें तो फिर आप टैम युक्त होने के सपने देखिये। जो टैम में नहीं है वो दर्शक मानता है तो मैं क्या कर सकता हूं।

कुलमिलाकर आप मेरी बातों को समझ गए होंगे। दर्शक कौन है हममें से किसी ने नहीं देखा। वो ईश्वर है मगर एक मामले में ईश्वर से अलग है। वो यह कि सचमुच देखता है। देखकर हर बुधवार को बता देता है कि क्या क्या देखा और कितनी देर तक देखा। क्योंकि रेटिंग का पैमाना ज्यादा देर तक देखने से भी छलकता है। यूं तो स्पीड न्यूज़ अंग्रेज़ी के न्यूज़ एट ए ग्लांस से आया मगर जल्दी ही ग्लांस एट ए न्यूज़ में बदल गया। हर भाषा में त्वरित खबरें हैं। हिन्दी का दर्शक समाज इतना सुपरफास्ट बना रहा तो जल्दी ही फिल्में भी स्पीड न्यूज़ की स्टाइल से बनेंगी और जल्दी ही आप लेखक भी इसी रफ्तार से रचनाएं रचेंगे। मालूम नहीं क्या होगा। दर्शक एक रहस्य है। इसकी तलाश में कल्पना शक्ति की बड़ी भूमिका होती है। दर्शकों को गढ़ लिया जाता है। तुम ऐसे ही हो। अगर आप रफ्तार से दर्शक की विवेचना करेंगे तो एक नए युग में प्रवेश कर जायेंगे। लेकिन शायद ही कोई इंकार कर सकता है कि स्पीड न्यूज़ का अवतार दर्शक की तलाश की देन है. अब सही है या नहीं यह बहस मैं आपके साथ नहीं करना चाहता क्योंकि आप टैम विहीन दर्शक हैं। टैम युक्त होते तो मंच छोड़ कर आपके कदमों में बैठा होता और पूछता कि बताइये क्या देखना चाहते हैं। यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि एक दर्शक के रूप में आप अपनी अहमियत को पहले समझिये फिर पत्रकारिता की प्रासंगिकता पर बहस कीजिएगा। अब मेरा पास कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है जिससे मैं साबित कर दूं कि आपका मिज़ाज भी टैम युक्त दर्शकों जैसा ही है। यानी आप के पास भी कम से कम आधा घंटा तो है जब आप पूरी एकाग्रता से उस आधे घंटे में कई सौ ख़बरें सुन कर समझने की शक्ति रखते हैं।

पर यह बदलाव क्यों हो रहा है, कैसे हो रहा है, क्या इसे तार्किक ढंग से हम कभी समझ पायेंगे। क्या हम यह जानते हैं कि चैनलों पर फार्मूले के तहत चलाये गए कितने प्रोग्राम पिट जाते हैं। फिर वो क्यों दोहराये जाते हैं। मैं आ रहा हूं आपके विषय पर। दर्शक का बर्ताव क्या पाठक के बर्ताव से अलग है? क्या एक पाठक के रूप में आप कुछ और हैं और एक दर्शक के रूप में कुछ और । या फिर जो दर्शक है वो पाठक नहीं है और जो पाठक है वो दर्शक नहीं है। हर नायिका आइटम गर्ल बनना चाहती है। उसकी मुक्ति आइटम होने में है तो टीवी पत्रकारिता का हर नायक आइटम क्यों न हो। दोनों का बाज़ार एक दूसरे से मिला जुला है। कम से कम दोनों माध्यमों के हथियार तो एक जैसे ही है। ऐसा नहीं है कि टीवी में अच्छे काम नहीं हो रहे हैं। हो रहे हैं। उन पर भी अलग से बात होनी चाहिए। एक महंगे माध्यम में खबरों को पेश करने का तरीका सिर्फ रेटिंग ही नहीं बचत का भी जुगाड़ है। यह भी समझना होगा। मगर समझ कर आप करेंगे क्या। शोध लिखेंगे या टीवी देखेंगे। यह आप तय कर लीजिए। जब एक माध्यम अपने मूल हथियार के खिलाफ काम करने लगे तो मुझे चिन्ता होती है। इतनी भी चिन्ता नहीं होती कि मर ही जाऊं। लेकिन होती है। उन चिन्ताओं के बीच जी तो रहा ही हूं। विज़ुअल ही नहीं है टीवी में तो फिर विज़न का मतलब क्या है। या तो मुंडी दिखती है या फिर जो दिखता है वो भागता हुआ दिखता है। तो क्या हमारा दर्शक कोई सुपर मदर वुमन टाइप का हो गया है क्या। क्या हम धीमी गति के समाचार युग से सुपर फास्ट समाचार युग में आ गए हैं। अगर यही हाल रहा कि मानव विकास के क्रम का ख्याल करते हुए सोचिये कि आज से पांच साल बाद ख़बरों की रफ्तार क्या होगी? क्या आप यह सोच पा रहे हैं कि कोई मशीन आधे घंटे में पांच सौ खबरें पढ़ देगी और आप सुन भी लेंगे। क्या टीवी सिर्फ सुनने का माध्यम बन कर रह जाएगा या फिर टीवी अपने टीवी होने के संकट को समझ ही नहीं पा रहा है या फिर जो समझ कर कर रहा है उसे हम महज़ा आलोचना के लिहाज़ से नहीं देख पा रहे हैं। हो सकता है कि रफ्तार वाली खबरें और दर्शक आज की हकीकत हों। इसे आप तभी चैलेंज कर सकते हैं जब आप टैम युक्त दर्शक हों। मैं किसी निष्कर्ष में यकीन करने वाला प्रवक्ता नहीं हूं। निष्कर्ष किसी भी बहस की संभावना को खत्म कर देता है। इसीलिए जो कहा वो एक सवाल के तौर पर कहा।

इसमें चिन्ता सिर्फ माध्यम और दर्शक की है। पत्रकारिता की नहीं है। यह मेरे लिए उतना बड़ा सवाल नहीं है। फिलहाल। अलग से विषय ज़रूर हो सकता है। सवाल यही है कि क्या हम अपने दर्शकों को जान गए हैं, क्या खोज पायें हैं, अगर आज खोज सकें हैं तो पिछले फार्मूले के मुताबिक जिन दर्शकों को खोजा था वो कहां चले गए। वो दर्शक कहां गए जो पाकिस्तान और आ रहा है तालिबान पर टीवी कार्यक्रम देखकर लट्टू हुए जा रहे थे. क्या वे सारे दर्शक अफगानिस्तान के पुनर्निमाण कार्यक्रमों के मज़दूर बनकर काबुल चले गए या यहीं भारत में है मगर टीवी देखना छोड़कर कुछ और कर रहे हैं। मालूम नहीं। ऐसा कोई
टैम युक्त दर्शक मिले तो बताइयेगा। या फिर दर्शक वही है मगर उसका स्वाद बदल रहा है।

यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि मैं जिस दुनिया से आता हूं वहां निराकार दर्शक कितना कुछ तय कर रहा है। वही तय कर रहा है या उसी के नाम पर तय हो रहा है दोनों बातें पूरी तरह ठीक ठीक हैं। क्या आपके पाठकों की दुनिया में ऐसा कोई पाठक वर्ग है। जो तय करता हो कि किताबों का बाज़ार कैसा होगा। व्यक्तिगत राय तो यही है कि बिल्कुल न हो वर्ना लिखना भी बाज़ारू बन जाएगा। वैसे लिखना हमेशा से बाज़ारू भी रहा है। तो मैं कह रहा था कि आपकी दुनिया में तो पाठक ही तलाश करता रहता है कि भाई लेखक किधर गया। कहां है। किताब कहां है उसकी। जिन लोगों को हिन्दी भवनों के सेमिनारों में जाने का मौका नहीं मिला और जो हिन्दी के छात्र नहीं रहे हैं उनमें से विरले ही होंगे जो अपने लेखक को स्टेशन पर देखते ही पहचान जाएं। कई लोग वैसे पहचान लिये जाते हैं लेकिन मैं कहना यह चाह रहा हूं कि क्या हमारे पाठक और लेखक के बीच रचनेतर यानी रचना के बाहर कोई संबंध है? वो संबंध कब और कहां बनता है? वो कहां अपने लेखक और पाठक को देख सकता है मिल सकता है चैट कर सकता है। क्या हमने नेट क्रांति को मिस कर दिया। अब पिछली बॉगी पकड़ कर ट्रेन चढ़ रहे हैं। मेरा साहित्य से कम नाता रहा है। फिर भी यह सवाल परेशान करता है कि मैं अपने लेखकों को क्यों नहीं पहचानता। यह मेरी ही कमी है या लेखक की भी है। क्या हमारा लेखक नए ज़माने के नए तरीकों से पाठक से संवाद करता है। क्या हमारा पाठक उन तरीकों का इस्तमाल करते हुए अपने लेखक को खोज पाता है। हिन्दी के कई बड़े लेखकों का इस मामले में लोहा मानता हूं कि बाज़ार के चाल चलन से दूर रहते हुए भी उन्होंने ख्याति और रचना के स्तर की ऊंची से ऊंची बुलंदी को छुआ है मगर क्या वो बुलंदी सार्वभौमिक है। अपने ही हिन्दी समाज में सार्वभौमिक है। सार्वभौमिकता से मेरा मतलब व्यापकता से है। अगर आप इतने ही बाज़ार विरोधी हैं तो दस हज़ार की पेशगी पर किताब क्यों लिखते हैं। पीडीएफ फाइल भेज दीजिए। अगर हमारा बड़ा लेखक भी दस या पचीस हज़ार की पेशगी पर लिखता है तो सरोकार के अलावा कुछ अन्य कारण रहे होंगे। जैसे प्रमोशन मठाधीशी वगैरह। मैं कौन होता हूं उनकी नीयत पर सवाल करने वाला। करना भी नहीं चाहिए क्योंकि मुझे इस दुनिया की वास्तविकता ठीक से नहीं मालूम। मगर इतना समझ सकता हूं कि दस हज़ार के रेट पर जो किताब लिख रहे हैं वो सचमुच सरोकारी क्रांतिकारी होंगे या फिर दूसरा यही होगा कि फालतू होंगे। हर भाषा का पाठक किताबों की कीमतें अनाप शनाप नहीं देता है। अंग्रेजी के किताबों की कीमत भी हिन्दी जैसी ही होती हैं। वहां भी पांच सौ की किताबें होती हैं यहां भी। उधर भी डेढ़ सौ वाली होती है इधर भी । जब हमारा लेखक इतने मन से और इतने सस्ते में प्रकाशक या रचना के प्रति समर्पित है तो प्रकाशक को निश्चित रूप से उसे बाज़ार के पैमानों से हट कर समझना चाहिए। अगर प्रकाशक ऐसा करता है तो ठीक ही करता है। दस हज़ार वाला या तो लेखक नहीं होगा या फिर वो बाज़ार को लेकर नासमझ होगा या फिर उसे शौक होगा कि घर आए मेहमान को बताए कि देखिये ये मेरी किताब है पढ़ लीजिए. कहां मिलेगी तो हमीं से ले लीजिए। प्रकाशक लाइब्रेरी को बेच कर खुश हो लेता है। लेखक भी खुश है कि उसने अपनी ज़िम्मेदारी की। इसमें कोई दिक्कत नहीं है। दिक्कत तभी है जब आप पाठक तलाशने लगते हैं। पाठक की तलाश का मतलब अगर मैं यही समझ रहा हूं कि किताब खरीदने वाला पाठक तो। जिस दिल्ली में हिन्दी के किताब की अच्छी दुकान नहीं है वहां आप बताइये पाठक लेखक को ढूंढेगा या लेखक को पाठक ढूंढने चाहिए या प्रकाशक को यह काम करना चाहिए। बिना मंडी बिना रेहड़ी पटरी के बाज़ार नहीं होता। अंसारी रोड के गोदाम कभी दुकान का विकल्प नहीं हो सकते। फिर भी जो पाठक चल कर आते हैं और खरीदते हैं उन्हें सलाम करना ही चाहिए। मगर इस वजह से भी पाठक दूर होते हैं। वो प्रकाशित को तुरंत पढ़ने के सौभाग्य से वंचित हो जाते हैं।

लाइब्रेरी के बाद पुस्तक मेला। क्या आप बोरी में किताब घर लायेंगे। क्या इस तरह से कोई पाठक बर्ताव करता है या फिर वो साल भी खरीदता रहे और पढ़ता रहे ऐसा क्यों नहीं हो सकता। लाइब्रेरी अपनी उपोयिगता के अंतिम चरण में है। शोध के अलावा लाइब्रेरी की उपयोगिता खत्म नहीं भी हुई है तो अप्रासंगिक हो चुकी है। लाइब्रेरी एक मतृप्राय अवधारणा है। इसका संबंध भी कोर्स और कंपटीशन से है। कोर्स से बाहर आते ही लाइब्रेरी से रिश्ता टूट जाता है। वो हमारी शहरी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। आन लाइन होने की तैयारी में हैं। कुल मिलाकर हमारा पाठक लेखक और प्रकाशक एक आलसी समाज बाज़ार की संरचना करते हैं। इस पर पहले भी बातें हो चुकी हैं बहुत ज्यादा करने का मतलब नहीं। मगर ऐसा भी नहीं कि मेरी बात खत्म हो गई।


हमारा पाठक भी प्रयास नहीं करता है। हम जिस सामाजिक राजनीतिक वातावरण में पाठक बनते हैं वहां पढ़ने का मतलब है जो प्रेसक्राइब्ड है। स्कूल और कालेज में हमारे पढ़ने का जो सैन्यीकरण होता है वो पढ़ने की स्वाभाविक प्रवृत्ति को कुंद करता है। घर में भी यही चलन होता है। मां या पिता का कोई फेवरेट लेखक कम ही होता है। उसकी किताब कम ही होती है। ज्यादातर घरों में। आप जैसे ही स्कूल कालेज के रेजिमेंट से निकल कर नौकरी में आते हैं सबसे पहले पढ़ने की आदत का त्याग कर देते हैं। कोई उम्मीद भी नहीं करता कि आप पढ़ें। इसीलिए किसी से पूछिए आप प्रेमचंद को जानते हैं तो कहेगा हां। उदय प्रकाश को जानते हैं मंगलेश डबराल को जानते हैं तो कहेगा ना। हालांकि दोनों शानदार लेखक कवि और खासे लोकप्रिय भी हैं। फिर भी। हमारे समाज में जो कोर्स में नहीं है वो पढ़ने लायक नहीं है। मैंने भी अपने खानदानी जीवनकाल में यही देखा है। पढ़ने को आनंद और पहचान से कभी नहीं जोड़ा गया। रागदरबारी की छपाई देखिये। इतना खराब कवर है कि वो किताब कभी ड्राइंग रूम की पहचान नहीं बन सकती फिर भी वो हम सब की पहचान है। सिर्फ रचना शक्ति के कारण। बाज़ार शक्ति के कारण नहीं। हिन्दी का बाज़ार हिन्दी के उत्पादों को घटिया बनाता है।

हमने पुस्तकों को ब्रांड की तरह पेश नहीं किया। किताबें सूरत से दुखी लगती हैं। सरोकारों की नकली संवेदनशीलता के कवर से ढंकी होती हैं। लेखक साहित्य लिखने के बाद सार्वजनिक जीवन की तमाम बहसों से दूर हो जाते हैं। उनकी कोई सार्वजनिक पहचान साहित्य से बाहर की नहीं है। तो साहित्य के बाहर के पाठकों से रिश्ता कैसे बनेगा। छोटे छोटे प्रयास हो रहे हैं। होते रहते हैं। इन प्रयासों का कोई मतलब नहीं जबतक ये कोई मार्केटिंग के फार्मूले में नहीं बदलते। हम बाज़ार को लेकर डर जाते हैं कि लेखन से समझौता करना होगा। इतने कम में बिकते हुए जब आपने समझौता नहीं किया तो ज्यादा दाम से कैसे बिक जाएंगे। एक बार लिखना तो छोड़िये। पहले प्रकाशकों से अपना बाज़ारू रिश्ता ठीक कीजिए वो आपको पाठकों तक पहुंचा देंगे। लोकार्ण एक और वायरस है जो किताबों को पाठक से दूर कर रहा है। लोकार्पण की रणनीति पर ठीक से पुनर्विचार की आवश्यकता है। अगर आप मार्केट के नियम से चलना चाहते हैं तो नियम को जानिये या फिर नया नियम लिख दीजिए।

अफसोस होता है कि हिन्दी के बेहतरीन रचनाकार आलोचकों का ही आसरा देखते रह जाते हैं। वो पाठकों की तरफ देखते ही नहीं हैं। यह एक गैप है जिसे भर सकते हैं तो कोई फार्मूला निकलेगा। मैं आपके सरोकार की भावना का अनादर भी नहीं कर सकता। यह गुनाह होगा। मगर कोई आपके सरोकार की भावना को मजबूरी में बदलते तो वो सरोकार कम समझौता ही ज्यादा होगा। पाठक हैं। चारों तरफ हैं। मगर क्या हम पाठकों की तलाश कर रहे हैं। पाठक का अपना स्वाभिमान होता है। मेरे घर के सामने पटरी पर जितनी भी अच्छी चीज़ें बिकती हैं दुकानदार कहता है पाठक पहले उसे ही खरीदता है। पाठक का अपना स्वाभिमान होता है। ज़रूरी नहीं है कि वो भी सरोकार के तहत ही पढ़ रहा हो। हमने हिन्दी में किताब खरीदने की संस्कृति पैदा नहीं की. इस बार दुर्गा पूजा में कोलकाता में था। सुनील गांगुली को चिप्स या किसी चीज़ के विज्ञापन में देखा। फिर शांतिनिकेतन में उनके एकांत घर को देखा जहां वो दुर्गा पूजा से पहले बंद हो जाते हैं और लिखते हैं। पूछा कि कैसे मैनेज करते हैं तो बताया गया कि काफी कमाते हैं। मैं अगर ये बात कह दूं तो लोग मेरी यहीं फिंचाई कर देंगे। लेकिन हमें सोचना चाहिए। बाज़ार को रिजेक्ट करने का फार्मूला मैंने दे दिया। आप किताब छापिये मत. पीडीएफ फाइल रखिये और अपने ब्लाग पर डाल दीजिए। यदि बाज़ार में जाते हैं तो उसके नियमों के अनुसार बड़ा खेल खेलिये। मुझे यह मत बताइये कि हिन्दी में किताबों को लेकर बड़ा खेल नहीं खेला जाता है। खूब जानता हूं। अगर सारी कोशिश पाठक को किनारे कर थोक में बेचने की होगी तो क्या किया जा सकता। पाठक तो खुदरा होता है। लेखक को भी खुदरा होना चाहिए। मैं विकल्प नहीं दे सकता। रास्ता यही है कि लेखक पाठको के बीच पहुंचे। पाठक उसके पास आ जाएगा। पहले प्रतिस्पर्धा तो हो। हर लाइब्रेरी को बुक कांप्लेक्स में नहीं बदल सकते। क्या लाइब्रेरी के बाहर उसी कैम्पस में किताबों की अच्छी दुकान नहीं हो सकती। क्यों नहीं साहित्य कि किताबों के लिए ठेला गाड़ी सोची जा सकती है, क्यों नहीं किताबों को मगंल बाज़ार में बेचा जा सकता है, क्यों नहीं हिन्दी की किताबें एयर पोर्ट पर मिलती हैं, जब वहां हिन्दी का चैनल चलता मिल जाता है तो हिन्दी का प्रकाशक अपनी किताब क्यों नहीं रखवा सकता, क्यों नहीं हम हिन्दी के नायकों और लेखकों के बीच कोई रिश्ता बनाकर किताब को पाठकों तक पहुंचातें हैं। हमारे तरीके पुराने पड़ रहे हैं। फर्क किसी को नहीं पड़ रहा। गिरिराज और निरुपम के अलावा। नए तरीके सामने हैं। दिख नहीं रहे हैं। बड़े लेखक मैदान में उतरें। नए लेखकों की किताबों की समीक्षा करें। समीक्षक आलोचक और लेखक के अंतर को मिटा दीजिए। आलोचना और समीक्षा कोई विशेष काम नहीं है। इसके लिए किसी विशेष योग्यता की कोई ज़रूरत नहीं है। ये सब बेकार की बातें हैं। जब विकेटकीपर पैड उतार कर बोलिंग कर सकता है तो लेखक भी कर सकता। बहुत कुछ करना होगा। वर्ना मिलेंगे इसी विषय पर किसी नए लेखक के साथ, किसी और सेमिनार में.

ऊं सिब्बलाय नम:

तो क्या सरकार पहले से सतर्क होने की कोशिश कर रही है कि भारत में भी अरब जगत और संपूर्ण जगत में चल रहे कब्ज़ा और तख्ता पलट आंदोलनों की नौबत न आ जाए? हिंदुस्तान में वैसा तो नहीं हुआ मगर फेसबुक,ट्वीटर और एस एम एस के ज़रिये अन्ना आंदोलन ने ज़ोर ज़रूर पकड़ा। फिर भी क्या कोई सरकार इस बात से निश्चिंत हो सकती है कि अब कोई नया आंदोलन खड़ा नहीं होगा? ट्वीटर और फेसबुक पर लिखी जा रही बातों पर सरसरी निगाह दौड़ाइये तो पता चल जाएगा कि यहां सरकार और पूरे राजनीतिक तबके के बारे में क्या चल रहा है। अगर कोई यह समझता है कि यह जमात पूरी तरह दक्षिणपंथी या विरोधी पार्टी समर्थक है तो वो गलत है। इसमें कोई शक नहीं कि नेट जगत में सरकार लोकप्रियता के मामले में काफी पीछे चल रही है लेकिन इसे कोई राजनीतिक दल भड़का रहा होता तो आडवाणी की रथ यात्रा को वैसा ही समर्थन मिलता जैसा अन्ना आंदोलन को मिला। बात चहेते नेताओं की तस्वीरों की भी नहीं, बात उससे आगे की है।

क्यों आई टी मंत्री कपिल सिब्बल ने याहू,गूगल, फेसबुक और यू ट्यूब जैसी सोशल मीडिया संस्थानों को बुलाया था? क्या वो सचमुच इस मुगालते में हैं कि जिस फेसबुक पर रोज़ाना २५ करोड़ तस्वीरें अपलोड होती हैं उनकी पहले से जांच की जाए। क्या वो सचमुच इस भ्रम में हैं कि भारत में फेसबुक और ट्वीटर के करीब आठ करोड़ उपभोक्ताओं की बातों पर अंकुश लगा सकेंगे? यह एक खतरनाक और असंभव काम है। फेसबुक और ट्वीटर का वजूद इसीलिए है क्योंकि यहां अभिव्यक्ति व्यक्तिगत और बेरोक-टोक है। सरकार द्वारा मैनेज होने वाले संपादकों या मीडिया संस्थानों के ज़रिये नहीं। इन मंचों पर सबकी राय की हैसियत बराबर की होती है। एक से एक राय मिलती हुई फटाफट जनमत में बदलती चली जाती है। यहां पर बन रही छवि को कोई भी सरकार हल्के में नहीं ले सकती। बेहतर तरीका यही है कि यहां आकर लिखने वालों से संवाद करे न कि उनके मन में भय पैदा करे। काश यह बात सरकार को कोई बता सकता। भारत में कोई बीस करोड़ लोग हैं जो इंटरनेट और मोबाइल के ज़रिये सोशल मीडिया के इन मंचों से जुड़े हैं। वोट के लिहाज़ से भले ही सत्ता दल को कमतर लगें मगर जनमत के लिहाज़ से से बिल्कुल कम नहीं हैं।

पारंपरिक मीडिया की विश्वसनीयता के कमज़ोर होने के दौर में लोगों को सोशल मीडिया पर गज़ब का विश्वास हो चला है। लेकिन पारंपरिक मीडिया ने भी इनसे होड़ करने की बजाय शामिल होना ही ठीक समझा। आज हर अखबार और टीवी चैनल ट्वीटर पर आने के लिए बेकरार है। क्या सरकार ऐसा नहीं कर सकती थी? यह ठीक है कि यू ट्यूब पर शरद पवार को तमाचे मारने की घटना पर कई आइटम बन गए हैं। दिग्विजय सिंह को लेकर अजीबोगरीब किस्म की तस्वीरें हैं पर वो तो नरेंद्र मोदी को लेकर भी हैं और मायावती को लेकर भी। लेकिन कपिल सिब्बल सिर्फ अपनी सरकार और पार्टी के नेताओं की तस्वीरों को लेकर क्यों भावुक हो गए। क्या वो नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते थे, क्या वो इसे अपनी तरफ से इसी मंच पर बहस में लाकर सार्थक तरीके से नहीं रोक सकते थे मगर शंका तो उन्होंने खुद पैदा कर दी, पिछले दरवाज़े से इंटरनेट कंपिनयों को बुलाकर और हड़का कर।

दुनिया में जब सोशल मीडिया की शुरूआत हुई तो ज़्यादातर लोग पुरानी बातों की खुमारी साझा कर रहे थे। मगर जल्दी ही लोग अतीत से निकलने लगे। वो समाज और सत्ता पर सवाल करने लगे। जब ऐसा हुआ तो नेता भी सोशल मीडिया से जुड़ने लगे। वो अपनी बातों को ट्वीट कर परखने लगे कि जनमत कैसा बन रहा है। लेकिन दूसरी तरफ ये नहीं देख पाए कि न्यूयार्क में बैठी एक लड़की कपिल सिब्बल के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त की और किसी ने उसे पसंद करने के बाद री ट्वीट किया तो वो हज़ारों लोगों की ज़ुबान बन गई। सोशल मीडिया पर बातें अब राजनीतिक होने लगी हैं। सोशल मीडिया को राजनीतिक किसने बनाया? राजनीतिक दलों ने बनाया। जब वे लोगों की निज अभिव्यक्ति के क्षेत्र में घुस कर वोट मांगने लगे। प्रचार करने लगे। बीजेपी से लेकर कांग्रेस और अन्य सभी दलों ने ये खेल खेला है। जब वो इसे वोट मांगने का मंच समझते हैं तो अब क्यों घबरा रहे हैं कि सोशल मीडिया का वोटर उनके ही खिलाफ हो रहा है। मगर नेताओं को अभी यह बात समझ नहीं आई है कि यहां की हवा को रोकने की कोशिश करेंगे तो तूफान से टकरा जायेंगे। दुनिया के किस हिस्से में नेताओं की मज़ाहिया तस्वीरें नहीं बनतीं और छपती हैं। आम तौर पर लोग ऐसी तस्वीरों पर हंसते हैं और लाइक बटन चटका देते हैं। आपत्तिजनक होने पर डिलिट यानी मिटा देते हैं। भारत में क्या एक भी ऐसा ठोस प्रमाण है जिससे यह साबित हो कि सोशल मीडिया के चलते दंगा भड़का। सही है कि वहां धर्म विशेष और नेताओं की आपत्तिजनक तस्वीरें घुमती हैं, जो सरकार को लग सकती है कि भड़काऊ हैं और इनसे सांप्रदायिक दंगे हो सकते हैं। फिर बताइये भरतपुर में दंगा क्या फेसबुक और ट्वीटर के कारण हुआ। ये तभी होगा जब कोई राजनीतिक दल ऐसा करना चाहेगा। दंगे बिना राजनीतिक समर्थन के नहीं होते हैं। सोशल मीडिया पर कई विचारधाराओं के हज़ारों लोग आपस में टकरा रहे होते हैं। सारी प्रक्रिया एक ही समय में और एक ही जगह पर चल रही होती है। यहां अपने आप सामाजिक नियंत्रण होते रहता है। कर्नाटक की राम सेने पार्टी को याद कीजिए। ये लोग सांस्कृतिक स्वाभिमान की ठेकेदारी करते हुए लड़कियों पर तरह तरह के नियम लाद रहे थे और वेलैंटाइन डे का विरोध कर रहे थे। मगर दिल्ली की एक लड़की ने पिंक चड्ढी कैंप शुरू कर दिया और राम सेने के दल को अल्पमत में ला दिया। एक संकीर्ण और सांप्रदायिक विचारधारा को जगह नहीं मिली। बहुत सारे मौलवी पंडित ग्रंथी फेसबुक पर हैं। उनके सामने से भी ऐसी तस्वीरें गुज़रती हैं। वो चेतावनी देते हुए इन तस्वीरों को मिटा देते हैं। आगे कोई बहस नहीं। भड़काने का उद्देश्य वहीं पर समाप्त हो जाता है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि धर्म गुरुओं या धार्मिक तस्वीरों को आगे कर सरकार ने अपने इरादे को ढांपने की कोशिश की। हाल ही में दिल्ली में विकीलिक्स के जूलियन असांज ने कहा कि दुनिया भर में सरकारें इस्लामिक आतंकवाद के नाम पर सोशल मीडिया या इंटरनेट की मानिटरिंग कर रही हैं। तो क्या भारत में भी धार्मिक तस्वीरों के बहाने ये खेल खेलने की कोशिश की गई? ताकि सेंसर की इस कोशिश को सेक्युलर बनाम कम्युनल बनाकर देशहित में ज़रूरी साबित कर दिया जाए। सोशल मीडिया में मर्यादायें टूट रही हैं। मगर यह उसका अत्यंत ही छोटा और अप्रसांगिक हिस्सा है। यह बहस पुरानी है कि अश्लीलता कौन तय करे। सरकार या लोग। अश्लीलता की सीमा तो सरकार बताती है मगर उसके बहाने वो किस हद तक आपके व्यक्तिगत स्पेस में घुस सकती है, ये नहीं बताती है। अश्लीलता के पैमाने पर किसी राजनीतिक दल का स्टैंड साफ और टिकाऊ नहीं है। ओमर अब्दुल्ला ने कपिल सिब्बल के प्रसंग पर ट्वीट किया कि बीजेपी अभिव्यक्ति की आजा़दी की बात कर रही है जबकि इसी के चलते महान कलाकार एम एफ हुसैन को हिन्दुस्तान छोड़ना पड़ा। मगर वो यह ट्वीट नहीं कर पाए कि कांग्रेस ने क्या उन्हें हिन्दुस्तान लाने की हिम्मत दिखाई। क्यों तस्लीमा पर लेफ्ट की सरकार पर प्रतिबंध लगा। पहले राजनीतिक दल आपस में नज़रिया साफ कर लें फिर लोगों को सीखायें कि वो क्या सोचें और क्या कहें।

इसीलिए सरकार की नीयत पर संदेह होता है। सरकार को समझना चाहिए कि करोड़ों की संख्या में लोग फेसबुक या ट्वीटर के गुलाम नहीं हैं। अगर यहां अभिव्यक्ति की आज़ादी संदिग्ध हो जाएगी तो जल्दी ही ये मंच भी अप्रासंगिक हो जायेंगे। सेकेंड भर में अपना अकाउंट बंद कर वहां चले जायेंगे जहां उन्हें ज़्यादा आजा़दी मिलती हो। लोगों ने इसका स्वाद चख लिया है और वो बार बार इसकी तलाश करेंगे। इंटरनेट को लेकर उसकी नींद टूटी भी तो देर से और ग़लत करवट से। सरकार चाहे जो करे, चाहे जो कहे,लोग अब कहेंगे। यहां नहीं तो वहां कहेंगे।
(rajasthan patrika me chhap chuka hai)

बनते शहर के विस्थापित नागरिक

मैं जहां रहता हूं उसके आसपास बहुत सारी इमारतें गाछ की तरह पसर गईं हैं। सोसायटी बोलते हैं हम इनको। इन इमारतों के आने तक सोसायटी का कोई मूर्त या शारीरिक ढांचा नहीं होता था। सोसायटी एक नए किस्म का समाज है। जहां एक निश्चित इदारे के भीतर लोग निहायत ही व्यक्तिवादी ज़िंदगी जीते हुए भी खुद को सोसायटी के तर्ज पर संचालित करते हैं। समूह बनाकर नियम बनाते हैं और तय करते हैं। किसी शोधकर्ता को अध्ययन करना चाहिए कि हरेक हाउसिंग सोसायटी में किस किस तरह के नियम बन रहे हैं। हाउसिंग सोसायटी में विस्थापितों के बीच किस तरह के संबंधों को परिभाषित किया जा रहा है। चाहरदीवारी के भीतर के स्पेस में आपसी सहमति से नागरिक कानून बन रहे हैं। किस तरह के धार्मिक माहौल और प्रतीकों की रचना हो रही है। क्या ये एक नए किस्म के घेटो यानी दड़बे में बदल रही हैं? इनके भीतर की धार्मिक समरसता कैसी है? इसी पर एक सीरीज़ लिखने का मन हुआ है।

अगर आप ध्यान से देखें तो हाउसिंग सोसायटी में रहनेवाले ज्यादातर लोग विस्थापित हैं। वो शहर के अलग-अलग इलाकों में काम करने जाते हैं। अलग-अलग राज्यों से आए हुए लोग होते हैं। इन सोसायटी में रोज़ाना काम करने वाले भी विस्थापित हैं। दूसरे राज्यों से उजड़ कर आए हैं। मगर आर्थिक हैसियत के लिहाज़ से निम्नतम तबके से आते हैं। विस्थापित होने के बाद ये लोग शहर के जिस हिस्से में अपना बसर करते हैं वहां कोई नियम कानून नहीं है। जैसे मैं गाज़ियाबाद के वैशाली इलाके में रहता हूं। यहां और इंदिरापुरम में काम करने वाले ज्यादातर पुरुष और स्त्री खोड़ा और मकनपुर में रहते हैं। जो अतिक्रमण की पैदाइश हैं। इन जगहों में रहने के हालात बहुत ख़राब हैं। यहां से लाखों लोग रोज़ गैर नियमित समाज और बस्ती से निकलकर नियमित बस्ती या सोसायटी में प्रवेश करते हैं। इस संक्रमण को सहजता से जीते हुए वो सोसायटी की बुनियाद बन चुके हैं। पूरी हाउसिंग सोसायटी अनधिकृत तौर से बसी कालोनियों से आने वाले दैनिक कर्मचारियों से संचालित होती है।

मेरी हाउसिंस सोसायटी में हर दिन ऐसे सौ लोग प्रवेश करते हैं। पचास के करीब ड्राईवर और पैंतालीस के करीब कामवालियां। जिन्हें अब सब मेड ही कहते हैं। नौकरानी जैसा सामंती शब्द लुप्त प्राय हो चुका है। आतंकवादी घटनाओं के बाद इन तमाम मेड के सोसायटी के हिसाब से परिचय पत्र बनवाए जा रहे हैं। सबके पास एंट्री कार्ड होता है। ये महिलाएं पांच से छह किमी पैदल चल कर काम की जगह पर पहुंचती हैं। इस कारण ज्यादातर छरहरी दिखती हैं। इनके शरीर में पोषक तत्वों की भी भयंकर कमी होती है। इन सबने लिफ्ट में चलना सीख लिया है। अपने भीतर के भय को जीत लिया है। लिफ्ट के कोने में दुबकी ये महिलाएं किसी तरह से अपनी मंज़िल के आने तक सांस रोके रहती हैं। इन सब महिलाओं का घर में प्रवेश करते ही दो तरह से रिश्ता बदलता है। मेमसाहब और घर में स्थायी रूप से रहनेवाली मेड से। स्थायी रूप से रहने वाली मेड भी इनके साथ मेमसाहब वाला रिश्ता रखती हैं। इस रिश्ते पर भी खास अध्ययन नहीं हुआ है। पहचान पत्र ने उनकी पहचान को बदला तो है मगर नियमित रूप से बसे विस्थापितों का उनके प्रति नज़रियां नहीं बदला। विस्थापन का दर्द साझा नहीं होता। भावनात्मक रिश्ता नहीं बन पाता।

मेरा ध्यान जिस बात ने खींचा वो इस सिस्टम में पारंपरिक जजमानी का बचा रह जाना। जजमानी सिस्टम में मज़दूरी नहीं होती थी। खेत की बंटाई, खेत का कुछ हिस्सा, अनाज और पर्व त्योहारों पर दान स्वरूप उपहार ताकि मज़दूर मालिक से बंधा रहे। जजमानी का यह रूप हाउसिंग सोसायटी में बदल गया है। मेमसाहब अपनी पसंद की मेड को पुराने कपड़े, फल और घर के कुछ सामान.स्वेटर, चप्पल आदि देकर उपकृत करती रहती हैं ताकि रिश्ता स्थायी बनता रहे। इससे हुआ यह कि कामवालियों के पहनावे में बदलाव आने लगा है। झांसी से आई एक महिला काम करने के लिए साड़ी ही पहनना पसंद करती थी, वही उसकी आदत भी थी, लेकिन जिस मेम साहब के यहां काम करती है वो घर में सलवार कमीज़ पहना करती हैं। लिहाज़ा उसने साड़ी पहनना कम कर दिया है और सलवार कमीज़ में आने लगी है। एक घर में मेमसाहब मिडी और जीन्स पहनती हैं तो उनके यहां स्थायी रूप से काम करने वाली झारखंड की आदिवासी महिला के पहनावे ही उनके जैसे हो गए। पुराने कपड़ों से पहनावे में एक किस्म की समानता बनती दिख रही है। यह सब हो रहा है जजमानी के बचे खुचे रूप के कारण। जहां मेमसाहब को इस बात से एतराज़ नहीं कि उनके साथ काम करनेवाली महिला भी स्कर्ट और जीन्स पहनती है। उन्हीं के दिये हुए। पहनावे ने काम करने वाली महिलाओं के व्यक्तित्व में ग़ज़ब का सकारात्मक बदलाव ला दिया है। बातचीत का लहज़ा भी तेज़ी से बदल रहा है। ये सभी महिलाएं साक्षर महिलाओं की तरह पूंजीवादी सिस्टम में एक फिनिश्ड प्रोडक्ट के रूप में परिवर्तित हो रही हैं। खानपान में भी बदलाव आ रहा है जिसकी आंतरिक जानकारी ज़्यादा नहीं है मुझे।

जजमानी सिस्टम से भावनात्मक रिश्ता बन जाता है। जहां मज़दूरी को लेकर होने वाले मोलभाव में एक किस्म का संकोच पैदा हो जाता है। यह संकोच दीवार का काम करता है। इसके बाद भी पुराने घरों को छोड़ नए घरों में जाने वालीं कामवालियों में मेहनताने को लेकर नज़रिया बदल रहा है। वो मोलभाव करने लगी हैं। कह देती हैं कि देख लीजिए मुझे इतने का ऑफर है। इस तरह के बारगेन यानी मोलभाव तो पढ़ी लिखी महिलाएं हमारे पेश में नहीं कर पातीं कि आखिर क्यों किसी टीवी चैनल में महिला संपादक नहीं है। नीचे के स्तर पर महिलाओं का जीवन काफी बदला है। वो पहले से ज्यादा आत्मनिर्भर होने लगी हैं। कई महिलाओं को देख रहा हूं जो गोरखपुर बस्ती और हरदोई से आतीं हैं मगर यहां काम करते हुए बदल रही हैं। साइकिल चलाने लगी हैं। साइकिल से वो दो से तीन सोसायटी में काम पर जाने लगी हैं। वर्ना पैदल चल कर आने की मजबूरी के कारण कोशिश यही रहती थी कि एक ही हाउसिंग कांप्लेक्स में काम मिल जाए। इस मजबूरी के कारण वो मज़दूरी को लेकर भी समझौता करने लगती थीं। अब बदलाव आ रहा है। साइकिल से आनेवाली कामवालियां दो या उससे अधिक सोसायटी में काम करने के लिए जा रही हैं। पढ़ी लिखी न होने के बाद भी वो सोसायटी के कायदों संकेतों को अच्छे समझती हैं। अपनी कमाई के एक हिस्से पर नियंत्रण कायम करने लगी हैं। बचत के तौर पर या मेमसाहब के यहां जमा रखकर।

इनकी आत्मनिर्भरता बदल रही है। बढ़ रही है। सोसायटी के स्पेस में मर्दों का जाल बिछा रहता है। गेटकीपर से लेकर स्टिल्ट में बैठे ड्राईवरों की नज़रों से होकर गुज़रना पड़ता है। उनकी चुटकियों और तानों से बचकर निकलने के अभ्यास ने ज़्यादातर कामवालियों को सीधी रेखा में देखने लिए अभ्यस्त कर दिया है। ये सभी कामवालियां सिर्फ सीधा देखती हैं। सीधा देखते हुए लिफ्ट में जाती हैं, लिफ्ट से निकलती हैं और सीधा देखते हुए घर के भीतर। घर के भीतर भी इधर-उधर नहीं देखतीं। बाल्टी कपड़ा उठाया और पोछा चालू कर दिया। दायें बायें ऊपर नीचे देखा तक नहीं। यह उनका आउटलुक है। इस हाव भाव में एक किस्म के सम्मान की चाह दिखती है। जो गांव और घर में रहने की प्रताड़ना की भरपाई कर सके। एक अनजान स्पेस में खुद को ढालने के इन अनुभवों का सामाजिक अध्ययन होना चाहिए।

विस्थापन ने उनके हाव-भाव में कितना बदलाव किया है। यह मौका विस्थापन से मिला है। एक नई जगह पर नए सिरे से सामाजिक संबंधों को विकसित करने का मौका मिला। गांवों में उपार्जन के अवसर मिल तो जाते मगर सामाजिक संबंधों में बदलाव कम होने के कारण उनके व्यक्तित्व का विकास उस तेज़ी से नहीं हो पाता। लोक लाज के रूप में सामंती बंदिशें उन्हें कई तरह से रोकतीं। यहां उनके व्यक्तित्व का विकास हो रहा है। वो खुद को वर्क फोर्स समझ रही है। मर्द की जगह कमाने वाला समझ रही हैं। वो जानती हैं कि शहर में उनकी कमाई पूरक नहीं है बल्कि घर के लिए बहुत ज़रूरी है। सोसायटी में घुसने के लिए बना कार्ड या मेमसाहब के साथ होंडा सिटी में मॉल जाने का अनुभव यह सब उनके निजी व्यक्तित्व का हिस्सा बन रहे हैं। इन अनुभवों के बनते वक्त उनके मर्दों का साया नहीं होता। वो चुपचाप दुनिया को देख रही हैं। कुछ सोच रही हैं। अपने पसीने को छुपाते हुए साफ सुथरी दिखते हुए।
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तो राहुल जाति-राजनीति सीख रहे हैं?

क्या आधुनिक भारत के निर्माता कहे जानेवाले जवाहर लाल नेहरू को चुनावी राजनीति में किस भी तरीके से लांच किया जा सकता है? इस बात पर चर्चा चलेगी कि राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के चुनावी अभियान की शुरूआत के लिए नेहरू के संसदीय क्षेत्र फूलपुर को क्यों चुना? संविधान निर्माताओं और आज़ादी की लड़ाई के नेताओं में डॉ भीभराव अंबेडकर को छोड़ कर कोई चुनावी प्रतीक नहीं बन सका। नेहरू हमेशा राजनीति से ऊपर उठकर याद किये जाते रहे। सरदार पटेल लौह पुरुष की उपमाओं के लिए याद किये जाते रहे, मगर राजनीति में जैसी निरंतरता अंबेडकर की रही, नेहरू और पटेल की कभी नहीं रही। १९७१ के चुनाव में विश्वनाथ प्रताप सिंह के फूलपुर से जीतने के बाद गांधी परिवार ने वहां से कभी नेहरू की विरासत पर दावा करने का प्रयास नहीं किया। अपने घोर राजनीतिक संकट के वक्त भी इंदिरा ने चिकमंगलूर और सोनिया ने बेल्लारी को चुना। फूलपुर को नहीं। बाद में रायबरेली और अमेठी राजीव गांधी,इंदिरा गांधी और राहुल गांधी से जुड़ते चले गए। राहुल गांधी ने अचानक अपनी दादी के जन्मदिन से पांच दिन पहले जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन को क्यों चुना? क्या इसलिए कि नेहरू तक पहुंचकर सारे राजनीतिक विवाद ठहर से जाते हैं। नेहरू को याद करने में एक किस्म का रोमांस है पर उन्हें रोमांस के साथ याद करने वाली पीढ़ियां अब बची ही कहां हैं।

लेकिन राजनीति प्रतीकों के पीछे अपने असली मायने गढ़ती है। फूलपुर पूरी तरह से पिछड़ों के वर्चस्ववाला राजनीतिक गढ़ है। यहां ब्राह्मण भी पर्याप्त मात्रा में हैं। यहां की पांच विधानसभा सीटों में से एक कांग्रेस के हाथ में हैं। राहुल की रैली से एक दिन पहले उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण सम्मेलन में मायावती ने ब्राह्मणों को चेताया था कि अगर कांग्रेस आई तो ठाकुर दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बनेंगे और बीजेपी सत्ता में आई तो ठाकुर राजनाथ सिंह। मायावती का यह बयान राहुल गांधी के गुस्से की तरह अनायास नहीं था। वो जानती हैं कि यूपी की राजनीति में ठाकुर और ब्राह्मण प्रतिद्वंदि रहे हैं। दोनों सत्ता की वापसी के लिए बेचैन हैं। ब्राह्मणों ने थोड़ी बहुत वापसी भी की है मगर बीएसपी को डर है कि कहीं वे छिटकर राहुल गांधी के पास न चले जाएं जो कहीं न कहीं पंडित जवाहर लाल नेहरू से खुद को जोड़कर उस पहचान को और स्पष्ट करना चाहते हैं। राहुल गांधी भी जानते हैं कि अगर ब्राह्मण बसपा से छिटक गए तो कांग्रेस और मज़बूत हो सकती है। अपने भाषण की पहली दूसरी पंक्ति में ही राहुल गांधी ने कहा कि जहां के नेहरू एमपी थे,आज वहां से माफिया एमपी है। फूलपुर को अपनी इस विरासत पर गर्व होता तो अमेठी और रायबरेली की तरह गांधी परिवार के साथ जुड़ा रहता। अगर राहुल यहां के पचास से साठ फीसदी पिछड़ों को नेहरू और सुनहरे अतीत के नाम पर कांग्रेस की तरफ कर सकते हैं तो समाजवादी पार्टी को भी प्रभावित करेंगे। इसलिए फूलपुर जाकर उन्होंने मायावती और मुलायम को चुनौती ही नहीं दी बल्कि दोनों को लालची तक कह दिया। ये राहुल गांधी की ज़ुबान नहीं है मगर एंग्री यंग मैन की भूमिका में आए राहुल जब यह कहते हैं कि मुलायम मायावती को अब ग़रीबों के अत्याचार पर गुस्सा नहीं आता। मुझे आता है तो वो उत्तर प्रदेश में सरकार विरोधी जनभावना की इकलौती आवाज़ बनना चाहते हैं। बीजेपी का तो ज़िक्र भी नहीं था उनके भाषण में।

फूलपुर की रैली सिर्फ नेहरू के प्रतीक के पीछ के विश्लेषणों तक सीमित नहीं रहेगी। राहुल गांधी की नई छवि पर भी काफी कुछ कहने के लिए मजबूर करेगी। राहुल गांधी ने खुद को एक गंभीर नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की है। मनरेगा के मज़दूरों के साथ फोटो खींचाना, दलितों के घर जाकर खाना, भट्टा परसौल में पंचायत करना और पदयात्रा। मगर अन्ना आंदोलन ने उनकी छवि को काफी धक्का पहुंचाया। उम्मीद की जा रही थी कि भ्रष्टाचार को लेकर व्याप्त गुस्से के वक्त राहुल गांधी कुछ बोलेंगे। बहुत देर तक राहुल चुप ही रहे। यह ठीक है कि सोनिया गांधी की हालत उस वक्त काफी खराब थी मगर जब वो संसद में बोलने गए तो अपनी लाइन चला दी। उसके बाद वे फिर चुप हो गए। लोगों ने पूछना शुरू कर दिया कि ऐसे मुश्किल वक्तों में राहुल गांधी सार्वजनिक बयान क्यों नहीं देते हैं? हर नेता बयान के लिए अपना वक्त चुनता है। मायावती भी तभी बोलती हैं जब उन्हें लगता है कि सही मौका है। लेकिन राहुल की चुप्पी को अन्ना आंदोलन में शामिल युवाओं ने अलग तरीके से देखा। अब राहुल गांधी अपने गुस्से को यूपी का गुस्सा बनाना चाहते हैं। जवाब हम देंगे। ये उनके पोस्टर का नया नारा है। मुझे गुस्सा आता है कि कब जागेगा यूपी। मुझे बताइये कब जागेगा यूपी। राहुल गांधी काफी उत्तेजक रूप से बोल रहे थे। उन्होंने अपनी पुरानी शैली छोड़ दी है। बीस साल से अधिक हो गए कांग्रेस को सत्ता से बाहर हुए, फिर भी यूपी की जनता कांग्रेस की के लिए नहीं जागी। शायद राहुल यही पूछ रहे हैं कि क्या इस बार जागेगी? क्यों नहीं जागती है?

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को जगाने की आशा-हताशा में राहुल चुनावी मुद्दे भी गढ़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश का आदमी कब तक महाराष्ट्र में भीख मांगेगा। राहुल गांधी ने यह बात उठाकर बता दिया है कि चुनावी राजनीति की पैंतरेबाज़ियों को भी अपनाने से नहीं चूकेंगे। विस्थापन को स्वाभिमान से जोड़ने की सफल कोशिश बिहार में नीतीश कुमार ने भी की थी। राहुल गांधी की फौरी आलोचना तो हो गई मगर भीख मांगने वाला उनका यह बयान स्वाभिमान के रास्ते उत्तर प्रदेश की जनता में उतर सकता है। यह सत्य है कि हाल के दिनों का विस्थापन विकास की क्षेत्रीय असंतुलन से भी बढ़ा है मगर उत्तर प्रदेश में विस्थापन दो सौ साल पुरानी प्रक्रिया है। इस बयान पर विवाद होंगे मगर यही वो बयान है जो उनके विकास के एजेंडे की राजनीति को बैक अप देने का काम भी करेगा। राजनीति इसी का नाम है। वो जितना सतही और चुनावी होगी, संघर्ष दिलचस्प होता है। कार्यकर्ताओं में जोश इसी से भरता है, विचारधारा से नहीं। राहुल गांधी ने सीख लिया है।
(आज के राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित)

रॉक स्टार- स्टीफेंस का लपाड़ा और हिन्दू की लौंडिया क्यों नहीं?

रॉक स्टार। अस्सी के दशक में जो कोशिश डिस्को डांसर ने की थी, उसके उनतीस साल बाद यही कोशिश रॉक स्टार की है। डिस्को डांसर का अव्वा अव्वा, रॉक स्टार के बेहतरीन निर्देशिक और रचित हव्वा हव्वा के सामने पत्तों की तरह उड़ जाता है। पटना से वास्ता रखने वाले इम्तियाज़ पर डिस्को डांसर का जादू नहीं होगा कहना मुश्किल है। डिस्को डांसर का अनिल भी फुटपाथ से कामयाबी के शिखर पर पहुंचता है मगर रिश्तों की बुनियादी उलझनें उसे यह बता देती हैं कि कामयाबी की कीमत क्या होती है। मैं यहां डिस्को डांसर और रॉक स्टार की तुलना नहीं कर रहा। सिर्फ दोनों का ज़िक्र साथ-साथ कर रहा हूं। उस फिल्म में मिथुन गा रहे थे-कि लोग कहते हैं मैं तब भी गाता था जब मैं बोल पाता नहीं था। रॉक स्टार का जनार्दन गा रहा है- जो भी मैं कहना चाहूं,बर्बाद करे अल्फाज़ मेरे। जनार्दन इस उत्तर आधुनिक दौर में अति संचार और अति संवाद की जड़ताओं से निकल कर अपनी बुनियादी अहसास से संवाद करने की पीड़ा से गुज़र रहा है। कशिश और तपिश की निरंतरता डिस्को डांसर से लेकर रॉक स्टार तक में महसूस की जा सकती है। डिस्को डांसर ने उस वक्त के बारातियों को एक ऐसी चुनौती दी कि पटना के चिड़ैया टांड पुल के नीचे बारात रोक कर पटाखे के साथ डांस की पीड़ा पुल के दोनों तरफ जाम में फंसे लोगों ने ज़रूर महसूस की थी। बैंड मास्टरों का पसंदीदा गाना था आया मैं डिस्को डांसर। ढैन ढैन। रॉक स्टार के गाने बेहतरीन हैं। हव्वा हव्वा सुनते हुए सात ख़ून माफ का गाना डार्लिंग रोको न...भी याद आता है। कितना सुंदर गीत है ये हव्वा हव्वा।...पैरों से रानी फिर नौ दो ग्यारह। एक दिन में जूते बारह...राजा का चढ़ गया पारा...खबरी को पास पुकारा....देखो..वो जाती कहां...खबरी ने पीछा किया...रानी को घर से...जाते देखा...। उत्तर आधुनिक विमर्श में पुरानी आशंकाएं आज़ाद ख़्यालों का पीछा करती हैं।

रॉक स्टार जनार्दन को जॉर्डन बनाकर बताती है कि कामयाबी और कुलीनता का ठेकेदार भले ही मालिश कराने वाला म्यूज़िक कंपनी का पंजाबीबागीय बंदानवाज़ हो मगर शोहरत में देसी टच की जगह नहीं। डिस्को डांसर में भी म्यूज़िक कंपनी वाला है मगर वो बंबइया है। पंजाबीबागीय नहीं। खैर शोहरत में भदेस नहीं चलेगा इसीलिए हिन्दू कालेज का कैंटीन वाला खूब समझाता है दिल का टूटना ज़रूरी है। इश्क़ ज़रूरी है। संगीत वहां से निकलता है। यानी जो रिजेक्टेड है वही रचनाकार है। जो एक्सेप्टेड है,वो बाज़ार है। जनार्दन को मार्केट के हिसाब से यह कहानी शुरू से ही ढालना चाहती है। ज़बरदस्ती ठेलकर। स्टीफेंस कालेज की कुलीनता पर आंच नहीं आने दी है इम्तियाज़ ने। मगर अपने ही कॉलेज हिन्दू कालेज की कुलीनता के साथ खूब छेड़छाड़ किया है। हिन्दू कॉलेज का जनार्दन सिर्फ दिल्ली का जाट नहीं बल्कि मिरांडा और स्टीफेंस की लड़कियों को हसरत से देखनेवाला ‘बिहारी माइग्ररेंट बट आईएस एसपिरेंट’ भी है। मैं इस प्लाट से चट चुका हूं। दिल्ली की सारी प्रेम कथाएं स्टीफेंस के स्वीकृत और हिन्दू के तिरस्कृत भाव से ही जन्म नहीं लेती हैं।

इम्तियाज़ निहायत ही कुलीन निर्देशक हैं। ज़हनी तौर पर भी। वो आज की पीढ़ी के हैं जिसे पैकेजिंग बहुत अच्छी आती है। मगर कहानी के लिए जनार्दन का पात्र गढ़ता है और दिल्ली की ग़ैर कुलीन बस्तियों को फन यानी मस्ती के लिए खोजता यानी एक्सप्लोर करता है। जंगली जवानी किस वर्ग के ख्वाबों को सहलानेवाली प्रातदर्शनीय फिल्म हैं? हीर और जनार्दन पहली बार जंगली जवानी देखने जाते हैं। सिर्फ एक दिन के लिए। अमर थियेटर को बदनाम जगह के रूप में स्थापित करते हैं। वही जो एक कुलीन सोच होती है। उधर मत जाना। स्टीफेंस और हिन्दू के लौंडे लपाड़े गंदे नहीं होते, मगर एक दिन के लिए गंदे काम कर सकते हैं। ‘जस्ट लाइक अ ट्रिप’। गए और वापस आ गए। अपनी अच्छाई के खोह में। ये जगहें लाखों के जीवन का हिस्सा है मगर इम्तियाज़ जैसे कहानीकारों और हिन्दू स्टीफेंस के छात्रों के लिए फन यानी एकदिवसीय मस्ती का अड्डा। ताकि जब वो जीवन में अपने नेटवर्क की बदौलत कुछ हासिल कर लें तो ‘मेमोआयर्स’ यानी संस्मरण को रोचक बना सकें। पुराना किला के पीछे दारू पीने का प्रसंग वहां बैठे लोगों के स्टीरीयोटाइप को ही कंफर्म यानी पुष्टि करता है। निर्देशक का यही कुलीन पूर्वाग्रह प्राग में भी गंदे पब को ढूंढता है। एक दिन के लिए। जहां लेबर क्लास के लोग जाते हैं। क्या वो जगहें गंदी होती हैं? इम्तियाज़ को क्रांतिकारी तब मानता जब जनार्दन स्टीफंस का लौंडा लपाड़ा होता और हीर हिन्दू की ख़ूबसूरत हसीना। ख़ैर निर्देशक की आज़ादी होती है कैसे भी फिल्म बनाए। समीक्षक की आज़ादी होनी चाहिए कैसे भी फिल्म को देखे। उसका पैसा उसकी राय। हिन्दू के होने का कांप्लेक्स और स्टीफेंस का गर्वलेक्स किसी भी तरह से खंडित नहीं होता है। स्टीफेंस की सर्वोच्चता कायम रहती है। जॉर्डन तुम जाट नहीं हो, तुम बिहारी हो। पूछ लेना इम्तियाज़ से। तुम्हारा सांचा जाट का है मगर सच्चाई हिन्दी मीडियम बिहारी की है। भाभी वाला प्रसंग रेडियो एफएम के सोनिया भाभी और सविता भाभी डाट काम से प्रेरित है और अच्छा है। बेहतरीन। इसीलिए यह फिल्म उत्तर आधुनिक और पुरातन के बीच झूलती रहती है।

जिस वक्त हिन्दू के कैंटीन में फिल्म की शूटिंग चल रही थी, मेरी बेटी और मेरे मित्र का बेटा दोनों भाग कर वहां चले गए। शूटिंग के बाद बिखरे डिब्बों से खेलने लगे। उनके लिए यह स्पेस एक सामान्य से ज्यादा कुछ नहीं था। मगर सिनेमा में हम स्पेस को गढ़ते हैं। नार्थ कैंपस से पुरानी दिल्ली तक आना दिल्ली को खोजना नहीं है। दिल्ली के गांवों में आस पास बने मकानों की मिलती बालकनियों से झांकता और कालोनी के गेट से अंदर जाता जनार्दन एक शहर का बोध कराता है मगर दीवार और बैकड्राप से ज्यादा कुछ नहीं है। वो दिल्ली में रीयल होने की कोशिश करता है मगर प्राग जाकर भौंचक्क हो जाता है। यहां इम्तियाज़ खानापूर्ति करने की कोशिश करती हैं। मस्ती को न्यायोचित ठहराने के लिए प्राग में भी लिस्ट बनाते हैं और उत्तर आधुनिक होने का रिसेस यानी ब्रेक टाइम में भरम पाल लेते हैं जो एक रात जार्डन के दीवार लांघने पर सिक्योरिटी अलार्म बजने के साथ ही फुस्स हो जाता है। अंत में हीर का राजा पिस्तौल निकाल लेता है और जार्डन इंडिया आकर अलबला जाता है।

शहर को स्टीरीयोटाइप बनाने के साथ एक और कथा चलती है। निज़ामुद्दीन औलिया और भगवती जागरण की कहानी। पत्रकार जनार्जन के जॉर्डन बनने की कथा को हैरत से खोज रही है। शायद कामयाबी के बाद भी आखिरी बार पुष्टि की कोशिश हो रही है कि कोई गैरकुलीन स्टार कैसे बन जाता है। उसी क्रम में भगवती जागरण और निज़ामुद्दीन के दरबार के प्रसंगों को गढ़ा जाता है। संगीत समाज में बनता है। आसमान में नहीं। कोई महान संगीतकार अपने समाज का हिस्सा बने बिना पैदा ही नहीं हो सकता। इम्तियाज़ ने औलिया के दरबार और दरवाज़े को अलग ही कैमरे से भव्य बनाया है। लेकिन यह मत समझिये कि मैं फिल्म को रिजेक्ट कर रहा हूं। फिल्म के बाद की प्रतिक्रिया के रूप में पढ़िये इसे। फिल्म देखते वक्त कई तरह के शहरों, मोहल्लों और गलियों के बीच आते-जाते रहना और एक खूबसूरत हसीना हीर को देखते रहने की चाहत में डूबे रहना अलग अहसास से भरता है। तभी मैंने फेसबुक पर लिखा था,शहर सांसों सा गुज़रता है,अहसासों में कोई क्यूं रहता है।

जनार्दन से जॉर्डन बनने और बिखर जाने का सफर सुखांत और दुखांत पैटर्न पर चलने का एक संतुलित प्रयास है। कहानी अच्छी बन रही है तो जोखिम क्यूं लिया जाए। निर्देशक जोखिम वहां लेता हैं जब वो कश्मीर में घुसता है। तिब्बत की आज़ादी को नायक की बेचैनियों से जोड़ता है। कश्मीर में हीर जनार्दन को कहती है 'हग' करो मुझे। अद्भुत दृश्य है। हिन्दी गाई(guy) पर हीर थोड़े समय के तरस खा लेती है। उसके इनोसेंस पर। जनार्दन हग कर चला जाता है। हग मतलब अल्पकालिक आलिंगन। प्राग में हीर उसे भूल जाती है। सिर्फ बीमारी से साबित नहीं होता कि वो जनार्दन को मिस कर रही है। खैर दोनों मिलते हैं और दिल्ली की मस्ती प्राग की मस्ती में बदल जाती है। पूरी फिल्म में कुलनीता की निरंतरता कहीं नहीं टूटती है। शादी के भीतर एक अतिरिक्त संबंध को मान्यता दे दी जाती है। दोनों कमज़ोर प्रेमी साबित होते हैं। हीर अपनी कुलीनताओं में जकड़ी नहीं होती और हिन्दी मीडियम टाइप जनार्दन को एक दिन के चुंबन की आज़ादी से ज़्यादा और आगे के लायक सोची होती तो इस कहानी में भूचाल आ जाता। रॉक स्टार एक बेहतरीन फिल्म होने के बाद भी रणबीर को डिस्को डांसर जैसी शोहरत और गहराई नहीं दे पायेगा। इसके बावजूद यह फिल्म रणबीर के स्टारडम की पहली औपचारिक फिल्म मानी जाएगी।

सोचता हूं कैमरे की इतनी अच्छी समझ रखनेवाला इम्तियाज़ डिस्को डांसर से आगे क्यों नहीं जा पाया? निश्चित रूप से उसने अच्छी फिल्म बनाई है। मगर उसे अपनी कहानी को स्टीफेंस और हिन्दू के बीच की ग्रंथियों से आज़ाद कर देना होगा। वो फालतू की और पचीस लोगों की हीन और गर्व गंथ्रियां हैं। हिन्दू कालेज का कैंटीनवाला दरअसल इम्तियाज़ से कह रहा है कि कहानी यहां नहीं हैं।। पूरे मन से देखा इस फिल्म को और मन भर देखा। रावन अगर पिट पिटा के नहीं गई होती तो रॉक स्टार को चुनौतियों का सामना करना पड़ता। रावन से घायल दर्शकों के लिए रॉक स्टार मरहम की तरह है। पूरा पैसा वसूल है। भावुकता के कई खूबसूरत लम्हें रचती है यह फिल्म। एक पलायनवादी तड़प कि नौकरी के बंधनों से मुक्त किसी को पाने के लिए सबकुछ गंवा देना ही चरम आध्यात्म है। जबकि ऐसा नहीं है। इम्तियाज़ अली एक अच्छे निर्देशक हैं। मगर अभी तक उन्होंने निर्देशन की ऐसी किसी ऊंचाई को स्पर्श नहीं किया जिससे उन्हें बेहद सृजनशील निर्देशक कहा जाए। कहानी के मामले में भी वो अभी तक कोई नई ज़मीन नहीं गढ़ पाए हैं। बहुत उम्मीद है इस निर्देशक से बस कोई इसे आजाद कर दे। कोई नई उड़ान का रास्ता दिखा दे।लेकिन जो भी इस फिल्म को देखकर लौटेगा, खुश होकर लौटेगा। रहमान के लिए इस नाचीज़ की नसीहत है, अल्फाज़ बर्बाद नहीं करते हमेशा, यादगार भी बनाते हैं। अपने संगीत को इतना हावी न होने दें कि बेहतरीन अल्फाज़ गा़यब हो जाए। न सुनाई दें न समझ आए। साफ साफ गाना होना चाहिए। कि लोग कहते हैं मैं तब भी गाता था जब बोल पाता नहीं था...तरा तरा..ढैन ढैन...याया...याइये....याया....। चलेगा मगर खो जाएगा। थोड़े समय के बाद।फिल्म बेहतरीन है। यह समीक्षा देखने के बाद की है। जब देख रहा था तब बहुत ही मज़ा आया। डूबा रहा।

रागदरबारी से पहले की प्रस्तावना

दोस्तों, एक मौलिक और महत्वपूर्ण रचना का वाचिक पुनर्पाठ किसी भी कालखंड की सबसे दुखद घटना हो सकती है। पढ़नेवाला किस मनोभाव और हावभाव से पढ़ेगा यह जानने के लिए रचनाकार की गैरमौजूदगी उस घटना की विडंबना को बड़ा बनाती है। कुतिया से लेकर चूतिया तक सभी एक ही सफ में खड़े लाइव कमेंट्री के किरदार की तरह स्तब्ध नज़र आ सकते हैं, जबकि रचनाकार के मूलभाव में सभी ठहरावमान अपितु गतिमान समझे जा सकते हैं। समाज,सिस्टम के खटाल और जांघों के बीच से नुची हुई खाल का टुकड़ा मैं समय हूं के कथन को पठन लायक बनाता है। आंखों देखा हाल। संजय ने महाभारत का प्रस्तुत किया उसके बाद से भारत का आंखों देखा हाल सिर्फ राजपथ पर सजनेवाली गणतंत्र की झांकियों का हुआ,परन्तु शिवपालगंज का आंखों देखा हाल उस भारत का बदहाल भाव है जो महानगर से लेकर गांव कस्बों तक समभाव में मौजूद है। शिवपालगंज की त्रासदी भारत की त्रासदी है और भारत की त्रासदी शिवपालगंज की। वाइसी वर्सा के इस खेल में जो नज़र वर्षा हमारे दिवंगत कलमकार रचनाकार और असली कार विहीन साहित्यकार श्रीमान श्रीलाल शुक्ल ने की है वो किसी ने नहीं की है। यह वो किस्सा है जो कस के नहीं पढ़ा गया तो कसक बाकी हो सकती है। गनीमत है कि भारत की आत्मा गांवों में बसाई गई और वहीं से बाकी जीवों में भिजवाई गई है। उन स्थायी किन्तु स्थानीय स्तर पर भटकती आत्माओं का ऐसा जैविक कर्मकांडीय बखान किसी भागवत कथा में नहीं मिलता है। बाबा शुक्ल जो कह गए हैं उसी के बाद कहा जा रहा है। यथास्थिति की हर परिस्थिति का विहंगम मूल्यांकन कर गुज़रने के बाद जो बचना है वो तो बस पुनर्पाठ की संभावना और आलोचना की रचना है। शिवपालगंज हमारे आपके मोहल्ले दफ्तर,सरकार, रामलीला मैदान, प्रेम प्रसंग कहीं भी हो सकता है। उत्तर आधुनिक काल से पहले के तमाम कालों के चूतड़ उघाड़ कर ऐसी दृष्टि हमें दे गए हैं कि हम कभी हीन नहीं हो सकते। हर तरह के दरबारों का आडंबर यहीं नारियल की तरह फूटता है, जब लेखक कहता है कि ट्रक का जन्म केवल सड़कों के साथ बलात्कार के लिए हुआ है। तो हर उम्र,हर प्रकार के माननीयों तैयार हो जाइये,रुप्पन बाबू,वैधजी,सनिचर,रंगनाथ,खन्ना मास्टर,बद्री पहलवान,बेला आदि अनेकानेक पात्रों से लैस रागदरबारी के चंद अंशों के महादान से बनी महान रचना के पुनर्पाठ के लिए। जो सुनेगा वो मुझे कोसेगा,जो इसे पढ़ेगा वो श्रीलाल शुक्ल जी को याद करेगा। मैं रागदरबारी हूं। मैं संजय धनंजय टाइप के टीवी रिपोर्टर आने से पहले का भारत हूं जिसकी लाइव रिपोर्टिंग तीन सौ उनतीस पन्नों के उपन्यास में ही होती है। जो है उसके होने की चुनौति उसके नहीं होने की तमाम संभावनाओं के साथ प्रस्तुत है।

( महमूद फ़ारूक़ी के घर में श्रीलाल शुक्ल को याद किया गया। बकरीद की पूर्व संध्या पर। वहीं पर राग दरबारी का पाठ करने से पहले यह प्रस्तावना मेरे द्वारा रचित और पठित की गई। विनीत का कहना था कि इसे पोस्ट कर दिया जाए। हालांकि मैं कहीं से भी श्रीलाल शुक्ल पर बोलने के लिए अधिकारी नियुक्त नहीं हुआ हूं पर चूंकि अन्ना आंदोलन के बाद कोई भी संविधान पर भाषण दे सकता है तो मैं भी साहित्य बांच सकता हूं। उपरोक्त लिखित पंक्तियों को मैंने ज़ोर ज़ोर से पढ़ा था। आपसे भी अनुरोध है कि आप इसे देख-देख कर न पढ़ें बल्कि बोल-बोल कर पढ़ें। जे बा से की)

क्या आपने सेमेस्टर के बारे में सोचा है?

सेंट स्टीफेंस के गणित के प्रोफेसरों ने प्रिंसिपल को खत लिखा है कि पहले सेमेस्टर की पढ़ाई खत्म होने के तीन दिनों बाद टर्मिनल इम्तहान हैं लिहाज़ा तैयारी का वक्त नहीं। खत में लिखा है कि बच्चे रो रहे थे। इतने विशालकाय कोर्स की तैयारी तीन दिनों में नहीं हो सकती। मास्टरों ने यह भी लिखा है कि गणित का कोर्स बड़ा है। सेमेस्टर के हिसाब से टारगेट टाइम दिया गया हैं वो काफी नहीं हैं। तमाम छुट्टियों के कारण शनिवार और रविवार को क्लास लेने पड़े फिर भी कोर्स पूरा नहीं हुआ। यह पूरा सेमेस्टरवाद टीचर और छात्र के लिए सज़ा की तरह हो गया है। हमारी तरफ से फीडबैक यह है कि यह सिस्टम पूरी तरह खरा नहीं प्रतीत होता है। टीचर चाहते हैं कि सर्दी की छुट्टी में से कुछ काट लें और तब इम्तहान करा लें, बीच का समय बच्चों को तैयारी के लिए मिले। प्रिंसिपल ने यह चिट्ठी वीसी को भेज दी है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में जब सेमेस्टर थोपा जा रहा था तब छात्र उदासीन रहे। कुछ छात्रों ने टीचरों का साथ तो दिया मगर बाकी को बड़ा मुद्दा नहीं लगा। सब कुछ नया कर देने के नाम पर सेमेस्टर भले ही अच्छा लगे मगर दुनिया के कई बड़े संस्थानों ने इसे नकारा है। कई जगहों पर सेमेस्टर सिस्टम वापस भी लिया गया है। इसके बाद भी शिक्षक छात्रों की पीड़ा समझ रहे हैं। ज़रूरी है कि शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर छात्र ज़्यादा सक्रिय हों। सेमेस्टर एक फटीचर नीति है।