रॉक स्टार। अस्सी के दशक में जो कोशिश डिस्को डांसर ने की थी, उसके उनतीस साल बाद यही कोशिश रॉक स्टार की है। डिस्को डांसर का अव्वा अव्वा, रॉक स्टार के बेहतरीन निर्देशिक और रचित हव्वा हव्वा के सामने पत्तों की तरह उड़ जाता है। पटना से वास्ता रखने वाले इम्तियाज़ पर डिस्को डांसर का जादू नहीं होगा कहना मुश्किल है। डिस्को डांसर का अनिल भी फुटपाथ से कामयाबी के शिखर पर पहुंचता है मगर रिश्तों की बुनियादी उलझनें उसे यह बता देती हैं कि कामयाबी की कीमत क्या होती है। मैं यहां डिस्को डांसर और रॉक स्टार की तुलना नहीं कर रहा। सिर्फ दोनों का ज़िक्र साथ-साथ कर रहा हूं। उस फिल्म में मिथुन गा रहे थे-कि लोग कहते हैं मैं तब भी गाता था जब मैं बोल पाता नहीं था। रॉक स्टार का जनार्दन गा रहा है- जो भी मैं कहना चाहूं,बर्बाद करे अल्फाज़ मेरे। जनार्दन इस उत्तर आधुनिक दौर में अति संचार और अति संवाद की जड़ताओं से निकल कर अपनी बुनियादी अहसास से संवाद करने की पीड़ा से गुज़र रहा है। कशिश और तपिश की निरंतरता डिस्को डांसर से लेकर रॉक स्टार तक में महसूस की जा सकती है। डिस्को डांसर ने उस वक्त के बारातियों को एक ऐसी चुनौती दी कि पटना के चिड़ैया टांड पुल के नीचे बारात रोक कर पटाखे के साथ डांस की पीड़ा पुल के दोनों तरफ जाम में फंसे लोगों ने ज़रूर महसूस की थी। बैंड मास्टरों का पसंदीदा गाना था आया मैं डिस्को डांसर। ढैन ढैन। रॉक स्टार के गाने बेहतरीन हैं। हव्वा हव्वा सुनते हुए सात ख़ून माफ का गाना डार्लिंग रोको न...भी याद आता है। कितना सुंदर गीत है ये हव्वा हव्वा।...पैरों से रानी फिर नौ दो ग्यारह। एक दिन में जूते बारह...राजा का चढ़ गया पारा...खबरी को पास पुकारा....देखो..वो जाती कहां...खबरी ने पीछा किया...रानी को घर से...जाते देखा...। उत्तर आधुनिक विमर्श में पुरानी आशंकाएं आज़ाद ख़्यालों का पीछा करती हैं।
रॉक स्टार जनार्दन को जॉर्डन बनाकर बताती है कि कामयाबी और कुलीनता का ठेकेदार भले ही मालिश कराने वाला म्यूज़िक कंपनी का पंजाबीबागीय बंदानवाज़ हो मगर शोहरत में देसी टच की जगह नहीं। डिस्को डांसर में भी म्यूज़िक कंपनी वाला है मगर वो बंबइया है। पंजाबीबागीय नहीं। खैर शोहरत में भदेस नहीं चलेगा इसीलिए हिन्दू कालेज का कैंटीन वाला खूब समझाता है दिल का टूटना ज़रूरी है। इश्क़ ज़रूरी है। संगीत वहां से निकलता है। यानी जो रिजेक्टेड है वही रचनाकार है। जो एक्सेप्टेड है,वो बाज़ार है। जनार्दन को मार्केट के हिसाब से यह कहानी शुरू से ही ढालना चाहती है। ज़बरदस्ती ठेलकर। स्टीफेंस कालेज की कुलीनता पर आंच नहीं आने दी है इम्तियाज़ ने। मगर अपने ही कॉलेज हिन्दू कालेज की कुलीनता के साथ खूब छेड़छाड़ किया है। हिन्दू कॉलेज का जनार्दन सिर्फ दिल्ली का जाट नहीं बल्कि मिरांडा और स्टीफेंस की लड़कियों को हसरत से देखनेवाला ‘बिहारी माइग्ररेंट बट आईएस एसपिरेंट’ भी है। मैं इस प्लाट से चट चुका हूं। दिल्ली की सारी प्रेम कथाएं स्टीफेंस के स्वीकृत और हिन्दू के तिरस्कृत भाव से ही जन्म नहीं लेती हैं।
इम्तियाज़ निहायत ही कुलीन निर्देशक हैं। ज़हनी तौर पर भी। वो आज की पीढ़ी के हैं जिसे पैकेजिंग बहुत अच्छी आती है। मगर कहानी के लिए जनार्दन का पात्र गढ़ता है और दिल्ली की ग़ैर कुलीन बस्तियों को फन यानी मस्ती के लिए खोजता यानी एक्सप्लोर करता है। जंगली जवानी किस वर्ग के ख्वाबों को सहलानेवाली प्रातदर्शनीय फिल्म हैं? हीर और जनार्दन पहली बार जंगली जवानी देखने जाते हैं। सिर्फ एक दिन के लिए। अमर थियेटर को बदनाम जगह के रूप में स्थापित करते हैं। वही जो एक कुलीन सोच होती है। उधर मत जाना। स्टीफेंस और हिन्दू के लौंडे लपाड़े गंदे नहीं होते, मगर एक दिन के लिए गंदे काम कर सकते हैं। ‘जस्ट लाइक अ ट्रिप’। गए और वापस आ गए। अपनी अच्छाई के खोह में। ये जगहें लाखों के जीवन का हिस्सा है मगर इम्तियाज़ जैसे कहानीकारों और हिन्दू स्टीफेंस के छात्रों के लिए फन यानी एकदिवसीय मस्ती का अड्डा। ताकि जब वो जीवन में अपने नेटवर्क की बदौलत कुछ हासिल कर लें तो ‘मेमोआयर्स’ यानी संस्मरण को रोचक बना सकें। पुराना किला के पीछे दारू पीने का प्रसंग वहां बैठे लोगों के स्टीरीयोटाइप को ही कंफर्म यानी पुष्टि करता है। निर्देशक का यही कुलीन पूर्वाग्रह प्राग में भी गंदे पब को ढूंढता है। एक दिन के लिए। जहां लेबर क्लास के लोग जाते हैं। क्या वो जगहें गंदी होती हैं? इम्तियाज़ को क्रांतिकारी तब मानता जब जनार्दन स्टीफंस का लौंडा लपाड़ा होता और हीर हिन्दू की ख़ूबसूरत हसीना। ख़ैर निर्देशक की आज़ादी होती है कैसे भी फिल्म बनाए। समीक्षक की आज़ादी होनी चाहिए कैसे भी फिल्म को देखे। उसका पैसा उसकी राय। हिन्दू के होने का कांप्लेक्स और स्टीफेंस का गर्वलेक्स किसी भी तरह से खंडित नहीं होता है। स्टीफेंस की सर्वोच्चता कायम रहती है। जॉर्डन तुम जाट नहीं हो, तुम बिहारी हो। पूछ लेना इम्तियाज़ से। तुम्हारा सांचा जाट का है मगर सच्चाई हिन्दी मीडियम बिहारी की है। भाभी वाला प्रसंग रेडियो एफएम के सोनिया भाभी और सविता भाभी डाट काम से प्रेरित है और अच्छा है। बेहतरीन। इसीलिए यह फिल्म उत्तर आधुनिक और पुरातन के बीच झूलती रहती है।
जिस वक्त हिन्दू के कैंटीन में फिल्म की शूटिंग चल रही थी, मेरी बेटी और मेरे मित्र का बेटा दोनों भाग कर वहां चले गए। शूटिंग के बाद बिखरे डिब्बों से खेलने लगे। उनके लिए यह स्पेस एक सामान्य से ज्यादा कुछ नहीं था। मगर सिनेमा में हम स्पेस को गढ़ते हैं। नार्थ कैंपस से पुरानी दिल्ली तक आना दिल्ली को खोजना नहीं है। दिल्ली के गांवों में आस पास बने मकानों की मिलती बालकनियों से झांकता और कालोनी के गेट से अंदर जाता जनार्दन एक शहर का बोध कराता है मगर दीवार और बैकड्राप से ज्यादा कुछ नहीं है। वो दिल्ली में रीयल होने की कोशिश करता है मगर प्राग जाकर भौंचक्क हो जाता है। यहां इम्तियाज़ खानापूर्ति करने की कोशिश करती हैं। मस्ती को न्यायोचित ठहराने के लिए प्राग में भी लिस्ट बनाते हैं और उत्तर आधुनिक होने का रिसेस यानी ब्रेक टाइम में भरम पाल लेते हैं जो एक रात जार्डन के दीवार लांघने पर सिक्योरिटी अलार्म बजने के साथ ही फुस्स हो जाता है। अंत में हीर का राजा पिस्तौल निकाल लेता है और जार्डन इंडिया आकर अलबला जाता है।
शहर को स्टीरीयोटाइप बनाने के साथ एक और कथा चलती है। निज़ामुद्दीन औलिया और भगवती जागरण की कहानी। पत्रकार जनार्जन के जॉर्डन बनने की कथा को हैरत से खोज रही है। शायद कामयाबी के बाद भी आखिरी बार पुष्टि की कोशिश हो रही है कि कोई गैरकुलीन स्टार कैसे बन जाता है। उसी क्रम में भगवती जागरण और निज़ामुद्दीन के दरबार के प्रसंगों को गढ़ा जाता है। संगीत समाज में बनता है। आसमान में नहीं। कोई महान संगीतकार अपने समाज का हिस्सा बने बिना पैदा ही नहीं हो सकता। इम्तियाज़ ने औलिया के दरबार और दरवाज़े को अलग ही कैमरे से भव्य बनाया है। लेकिन यह मत समझिये कि मैं फिल्म को रिजेक्ट कर रहा हूं। फिल्म के बाद की प्रतिक्रिया के रूप में पढ़िये इसे। फिल्म देखते वक्त कई तरह के शहरों, मोहल्लों और गलियों के बीच आते-जाते रहना और एक खूबसूरत हसीना हीर को देखते रहने की चाहत में डूबे रहना अलग अहसास से भरता है। तभी मैंने फेसबुक पर लिखा था,शहर सांसों सा गुज़रता है,अहसासों में कोई क्यूं रहता है।
जनार्दन से जॉर्डन बनने और बिखर जाने का सफर सुखांत और दुखांत पैटर्न पर चलने का एक संतुलित प्रयास है। कहानी अच्छी बन रही है तो जोखिम क्यूं लिया जाए। निर्देशक जोखिम वहां लेता हैं जब वो कश्मीर में घुसता है। तिब्बत की आज़ादी को नायक की बेचैनियों से जोड़ता है। कश्मीर में हीर जनार्दन को कहती है 'हग' करो मुझे। अद्भुत दृश्य है। हिन्दी गाई(guy) पर हीर थोड़े समय के तरस खा लेती है। उसके इनोसेंस पर। जनार्दन हग कर चला जाता है। हग मतलब अल्पकालिक आलिंगन। प्राग में हीर उसे भूल जाती है। सिर्फ बीमारी से साबित नहीं होता कि वो जनार्दन को मिस कर रही है। खैर दोनों मिलते हैं और दिल्ली की मस्ती प्राग की मस्ती में बदल जाती है। पूरी फिल्म में कुलनीता की निरंतरता कहीं नहीं टूटती है। शादी के भीतर एक अतिरिक्त संबंध को मान्यता दे दी जाती है। दोनों कमज़ोर प्रेमी साबित होते हैं। हीर अपनी कुलीनताओं में जकड़ी नहीं होती और हिन्दी मीडियम टाइप जनार्दन को एक दिन के चुंबन की आज़ादी से ज़्यादा और आगे के लायक सोची होती तो इस कहानी में भूचाल आ जाता। रॉक स्टार एक बेहतरीन फिल्म होने के बाद भी रणबीर को डिस्को डांसर जैसी शोहरत और गहराई नहीं दे पायेगा। इसके बावजूद यह फिल्म रणबीर के स्टारडम की पहली औपचारिक फिल्म मानी जाएगी।
सोचता हूं कैमरे की इतनी अच्छी समझ रखनेवाला इम्तियाज़ डिस्को डांसर से आगे क्यों नहीं जा पाया? निश्चित रूप से उसने अच्छी फिल्म बनाई है। मगर उसे अपनी कहानी को स्टीफेंस और हिन्दू के बीच की ग्रंथियों से आज़ाद कर देना होगा। वो फालतू की और पचीस लोगों की हीन और गर्व गंथ्रियां हैं। हिन्दू कालेज का कैंटीनवाला दरअसल इम्तियाज़ से कह रहा है कि कहानी यहां नहीं हैं।। पूरे मन से देखा इस फिल्म को और मन भर देखा। रावन अगर पिट पिटा के नहीं गई होती तो रॉक स्टार को चुनौतियों का सामना करना पड़ता। रावन से घायल दर्शकों के लिए रॉक स्टार मरहम की तरह है। पूरा पैसा वसूल है। भावुकता के कई खूबसूरत लम्हें रचती है यह फिल्म। एक पलायनवादी तड़प कि नौकरी के बंधनों से मुक्त किसी को पाने के लिए सबकुछ गंवा देना ही चरम आध्यात्म है। जबकि ऐसा नहीं है। इम्तियाज़ अली एक अच्छे निर्देशक हैं। मगर अभी तक उन्होंने निर्देशन की ऐसी किसी ऊंचाई को स्पर्श नहीं किया जिससे उन्हें बेहद सृजनशील निर्देशक कहा जाए। कहानी के मामले में भी वो अभी तक कोई नई ज़मीन नहीं गढ़ पाए हैं। बहुत उम्मीद है इस निर्देशक से बस कोई इसे आजाद कर दे। कोई नई उड़ान का रास्ता दिखा दे।लेकिन जो भी इस फिल्म को देखकर लौटेगा, खुश होकर लौटेगा। रहमान के लिए इस नाचीज़ की नसीहत है, अल्फाज़ बर्बाद नहीं करते हमेशा, यादगार भी बनाते हैं। अपने संगीत को इतना हावी न होने दें कि बेहतरीन अल्फाज़ गा़यब हो जाए। न सुनाई दें न समझ आए। साफ साफ गाना होना चाहिए। कि लोग कहते हैं मैं तब भी गाता था जब बोल पाता नहीं था...तरा तरा..ढैन ढैन...याया...याइये....याया....। चलेगा मगर खो जाएगा। थोड़े समय के बाद।फिल्म बेहतरीन है। यह समीक्षा देखने के बाद की है। जब देख रहा था तब बहुत ही मज़ा आया। डूबा रहा।
रागदरबारी से पहले की प्रस्तावना
दोस्तों, एक मौलिक और महत्वपूर्ण रचना का वाचिक पुनर्पाठ किसी भी कालखंड की सबसे दुखद घटना हो सकती है। पढ़नेवाला किस मनोभाव और हावभाव से पढ़ेगा यह जानने के लिए रचनाकार की गैरमौजूदगी उस घटना की विडंबना को बड़ा बनाती है। कुतिया से लेकर चूतिया तक सभी एक ही सफ में खड़े लाइव कमेंट्री के किरदार की तरह स्तब्ध नज़र आ सकते हैं, जबकि रचनाकार के मूलभाव में सभी ठहरावमान अपितु गतिमान समझे जा सकते हैं। समाज,सिस्टम के खटाल और जांघों के बीच से नुची हुई खाल का टुकड़ा मैं समय हूं के कथन को पठन लायक बनाता है। आंखों देखा हाल। संजय ने महाभारत का प्रस्तुत किया उसके बाद से भारत का आंखों देखा हाल सिर्फ राजपथ पर सजनेवाली गणतंत्र की झांकियों का हुआ,परन्तु शिवपालगंज का आंखों देखा हाल उस भारत का बदहाल भाव है जो महानगर से लेकर गांव कस्बों तक समभाव में मौजूद है। शिवपालगंज की त्रासदी भारत की त्रासदी है और भारत की त्रासदी शिवपालगंज की। वाइसी वर्सा के इस खेल में जो नज़र वर्षा हमारे दिवंगत कलमकार रचनाकार और असली कार विहीन साहित्यकार श्रीमान श्रीलाल शुक्ल ने की है वो किसी ने नहीं की है। यह वो किस्सा है जो कस के नहीं पढ़ा गया तो कसक बाकी हो सकती है। गनीमत है कि भारत की आत्मा गांवों में बसाई गई और वहीं से बाकी जीवों में भिजवाई गई है। उन स्थायी किन्तु स्थानीय स्तर पर भटकती आत्माओं का ऐसा जैविक कर्मकांडीय बखान किसी भागवत कथा में नहीं मिलता है। बाबा शुक्ल जो कह गए हैं उसी के बाद कहा जा रहा है। यथास्थिति की हर परिस्थिति का विहंगम मूल्यांकन कर गुज़रने के बाद जो बचना है वो तो बस पुनर्पाठ की संभावना और आलोचना की रचना है। शिवपालगंज हमारे आपके मोहल्ले दफ्तर,सरकार, रामलीला मैदान, प्रेम प्रसंग कहीं भी हो सकता है। उत्तर आधुनिक काल से पहले के तमाम कालों के चूतड़ उघाड़ कर ऐसी दृष्टि हमें दे गए हैं कि हम कभी हीन नहीं हो सकते। हर तरह के दरबारों का आडंबर यहीं नारियल की तरह फूटता है, जब लेखक कहता है कि ट्रक का जन्म केवल सड़कों के साथ बलात्कार के लिए हुआ है। तो हर उम्र,हर प्रकार के माननीयों तैयार हो जाइये,रुप्पन बाबू,वैधजी,सनिचर,रंगनाथ,खन्ना मास्टर,बद्री पहलवान,बेला आदि अनेकानेक पात्रों से लैस रागदरबारी के चंद अंशों के महादान से बनी महान रचना के पुनर्पाठ के लिए। जो सुनेगा वो मुझे कोसेगा,जो इसे पढ़ेगा वो श्रीलाल शुक्ल जी को याद करेगा। मैं रागदरबारी हूं। मैं संजय धनंजय टाइप के टीवी रिपोर्टर आने से पहले का भारत हूं जिसकी लाइव रिपोर्टिंग तीन सौ उनतीस पन्नों के उपन्यास में ही होती है। जो है उसके होने की चुनौति उसके नहीं होने की तमाम संभावनाओं के साथ प्रस्तुत है।
( महमूद फ़ारूक़ी के घर में श्रीलाल शुक्ल को याद किया गया। बकरीद की पूर्व संध्या पर। वहीं पर राग दरबारी का पाठ करने से पहले यह प्रस्तावना मेरे द्वारा रचित और पठित की गई। विनीत का कहना था कि इसे पोस्ट कर दिया जाए। हालांकि मैं कहीं से भी श्रीलाल शुक्ल पर बोलने के लिए अधिकारी नियुक्त नहीं हुआ हूं पर चूंकि अन्ना आंदोलन के बाद कोई भी संविधान पर भाषण दे सकता है तो मैं भी साहित्य बांच सकता हूं। उपरोक्त लिखित पंक्तियों को मैंने ज़ोर ज़ोर से पढ़ा था। आपसे भी अनुरोध है कि आप इसे देख-देख कर न पढ़ें बल्कि बोल-बोल कर पढ़ें। जे बा से की)
( महमूद फ़ारूक़ी के घर में श्रीलाल शुक्ल को याद किया गया। बकरीद की पूर्व संध्या पर। वहीं पर राग दरबारी का पाठ करने से पहले यह प्रस्तावना मेरे द्वारा रचित और पठित की गई। विनीत का कहना था कि इसे पोस्ट कर दिया जाए। हालांकि मैं कहीं से भी श्रीलाल शुक्ल पर बोलने के लिए अधिकारी नियुक्त नहीं हुआ हूं पर चूंकि अन्ना आंदोलन के बाद कोई भी संविधान पर भाषण दे सकता है तो मैं भी साहित्य बांच सकता हूं। उपरोक्त लिखित पंक्तियों को मैंने ज़ोर ज़ोर से पढ़ा था। आपसे भी अनुरोध है कि आप इसे देख-देख कर न पढ़ें बल्कि बोल-बोल कर पढ़ें। जे बा से की)
क्या आपने सेमेस्टर के बारे में सोचा है?
सेंट स्टीफेंस के गणित के प्रोफेसरों ने प्रिंसिपल को खत लिखा है कि पहले सेमेस्टर की पढ़ाई खत्म होने के तीन दिनों बाद टर्मिनल इम्तहान हैं लिहाज़ा तैयारी का वक्त नहीं। खत में लिखा है कि बच्चे रो रहे थे। इतने विशालकाय कोर्स की तैयारी तीन दिनों में नहीं हो सकती। मास्टरों ने यह भी लिखा है कि गणित का कोर्स बड़ा है। सेमेस्टर के हिसाब से टारगेट टाइम दिया गया हैं वो काफी नहीं हैं। तमाम छुट्टियों के कारण शनिवार और रविवार को क्लास लेने पड़े फिर भी कोर्स पूरा नहीं हुआ। यह पूरा सेमेस्टरवाद टीचर और छात्र के लिए सज़ा की तरह हो गया है। हमारी तरफ से फीडबैक यह है कि यह सिस्टम पूरी तरह खरा नहीं प्रतीत होता है। टीचर चाहते हैं कि सर्दी की छुट्टी में से कुछ काट लें और तब इम्तहान करा लें, बीच का समय बच्चों को तैयारी के लिए मिले। प्रिंसिपल ने यह चिट्ठी वीसी को भेज दी है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में जब सेमेस्टर थोपा जा रहा था तब छात्र उदासीन रहे। कुछ छात्रों ने टीचरों का साथ तो दिया मगर बाकी को बड़ा मुद्दा नहीं लगा। सब कुछ नया कर देने के नाम पर सेमेस्टर भले ही अच्छा लगे मगर दुनिया के कई बड़े संस्थानों ने इसे नकारा है। कई जगहों पर सेमेस्टर सिस्टम वापस भी लिया गया है। इसके बाद भी शिक्षक छात्रों की पीड़ा समझ रहे हैं। ज़रूरी है कि शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर छात्र ज़्यादा सक्रिय हों। सेमेस्टर एक फटीचर नीति है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में जब सेमेस्टर थोपा जा रहा था तब छात्र उदासीन रहे। कुछ छात्रों ने टीचरों का साथ तो दिया मगर बाकी को बड़ा मुद्दा नहीं लगा। सब कुछ नया कर देने के नाम पर सेमेस्टर भले ही अच्छा लगे मगर दुनिया के कई बड़े संस्थानों ने इसे नकारा है। कई जगहों पर सेमेस्टर सिस्टम वापस भी लिया गया है। इसके बाद भी शिक्षक छात्रों की पीड़ा समझ रहे हैं। ज़रूरी है कि शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर छात्र ज़्यादा सक्रिय हों। सेमेस्टर एक फटीचर नीति है।
मौत का कुआं से फार्मूला ट्रैक तक का सफर

नूझ लैनलों और बकबारों ने फार्मूला वन निरक्षरता को दूर करने में जो उल्लेखनीय योगदान दिया है,उसकी सराहना करनी चाहिए। इससे साबित हो गया कि मीडिया बेलमुंड ज्योतिषियों के सहारे अंधविश्वास फैलाने में ही नहीं, अत्याधुनिक और विलासी गेम के लोकप्रचार में भी योगदान कर सकता है। बारह झंडे से लेकर ग्रिड गर्ल्स और कब पेन्चर ठीक होता है यह सब जानकारी अभी तक आपके भीतर ठूंस दी गई होगी। इस अतिकुलीन गेम को हिन्दीवालों ने अपनी बाज़ार विरोधी कुंठा के बाद भी नहीं छोड़ा है। ग्रां प्रीं नोएडा साउथ दिल्ली में नहीं हैं। वो हिन्दी बेल्ट है। हम कार साक्षरता के लेवल टू में पहुंच रहे हैं। हम आल्टो और नैनो चलाने वाले देश नहीं रहेंगे। सब कुछ टीआरपी के लिए नहीं होता। यह जनकांक्षा और लोकचेतना के प्रसार में उठाया गया कदम है। बस हिन्दीवालों को महान चालकों का साक्षात्कार नहीं मिल सका। जल्दी ही मुगलसराय का कोई ड्राइवर जब इन कारों पर बैठेगा वो पहले इंग्लिश स्टुडियो से निकलने के बाद हिन्दी स्टुडियो ज़रूर आवेगा। चलो ग्रां प्रीं नोएडा चले।

चंडोक साहब का इंटरभू भी छपा है कि नब्बे हज़ार करोड़ के कारोबार की संभावना है और पचास हज़ार रोज़गार की। ऐसी जनउपयोगी प्रतियोगिता का हर हाल में समर्थन करना चाहिए। महंगाई के दौर में महंगे शौक के विस्तार में लोकपक्षीय मीडिया ने ज़बरन अपितु ज़बरदस्त भूमिका निभाई है। नूझ लैनलों के ग्राफिक्स एनिमेशन से ट्रैक का जो रा-वनीय रूपांतरण हुआ है वो ग़ज़ब है। एंचर फार्मूला वन के एनिमेटेड कार में बैठे दनदना रहे हैं। बिना हेल्मेट के। यह एक अद्भुत समय है। हिन्दी लैनलों ने एक अतिकुलीन खेल को अतिसाधारण बना दिया है। टायर खोलकर और ईंजन का नट भोल्ट दिखाकर यकीन करा दिया है कि भाई लोग ट्राई करोगे तो इसका भी जुगाड़ बन सकता है और मेरठ रोड पर दौड़ सकता है। रही बात करोड़पति चालकों के ड्रेस की तो वो फैन्सी ड्रैस की दुकान से आ जाएगी। जब जुगाड़ टेक्नोलजी से बनी फार्मूला वन कारें ग्रां प्रीं नोएडा से गुज़रेंगी तो दो सौ करोड़ की फार्मूला कारों को चिढ़ाया करेंगी। देखो भाई लोग हमने तो पुराने पंप सेट से मोटर और क्वायल निकालकर ही फार्मूला वन बना ली है। काठ की सीट है और आल्टो कार की टायर। बेकार में विजय माल्या भाई टशन दे रहे थे।
अगर हम इसी तरह से बढ़ते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब अगले साल गढ़ गंगा के मेले में भी फार्मूला वन रेस होगी। अभी तक हम मौत का कुआं से ही काम चला रहे थे। मारुति एट हंड्रेड की खिड़की से हाथ निकाल कर दिल दहला देने वाले आंचलिक शूमाकरों को हमने कभी नायक नहीं बनाया। मगर याद कीजिए, कैसे सांसें रूक जाती हैं, कैसे उनकी कार की रफ्तार से निकलने वाली ज़ूं ज़ूं फूं फूं की आवाज़ तीनों लोक में गड़गड़ाहट पैदा करती है। बल्कि हम शान से कह सकते हैं कि हमारे देश में भी फार्मूला वन की देसी परंपरा रही है। ज़माने से रही है। आज भी बची खुची हुई है। इस फार्मूला वन रेस के लोकप्रिय होते ही हम मौत का कुआं को एंटिक पीस के रूप में प्रजेंट करेंगे और दिल्ली हाट में प्रदर्शन करा कर लोककलाओं के संरक्षण का राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल करेंगे। मौत का कुआं सड़कों पर फैलकर ट्रैक हो गया है। शूमाकर भाई को मौत का कुआं में ले जाओ, पता चलेगा। बल्कि जल्दी ही किसी नूझ लैनल को मौत का कुआं लाइव दिखाकर दर्शकों की सतायी आंखों में रोमांच पैदा कर देना चाहिए। टीआरपी मिलेगी। बराबर मिलेगी।
मालवीय नगर की महबूबा और राजा गार्डन का राजकुमार
(1)
राजा गार्डन का राजकुमार अपने घोड़े को लेकर सराय काले खां में सुस्ताने लगा। मालवीय नगर की महबूबा को जैसे ही पता चला कि रायसीना हिल्स के घुड़सवारों की पीठ पर पत्रकार सवार हैं वो हाफंने लगी। ये पत्रकार हर उस निशान की छाप लेकर नार्थ ब्लाक फैक्स कर रहे थे जहां राजा गार्डन के राजकुमार के घोड़े की टाप पड़ी थी। रास्ते में मिले टूटे हुए नाल को लेकर रायसीना हिल्स का एक घुड़सवार तेज़ी से मुड़ गया था। वो पद्मा पुरस्कारों की घोषणा से पहले ही नाल सौंप देना चाहता था। सराय काले खां बस स्टाप पर राजकुमार भेष बदल कर दस रूपये के दस पेचकस बेचने लगा। मालवीय नगर की महबूबा बिग बॉस में एंट्री ले चुकी थी। मगर जैसे ही बिग बॉस ने प्लान ए,प्लान बी और प्लान सी का नाम लिया, आवाज़ सुनकर वो बेहोश हो गई। इस बीच सहारनपुर की तरफ रवाना होती बस से राजकुमार उतरा ही था कि रायसीना हिल्स के घोड़े नज़र आ गए। वो फिर से अलवर जाने वाली बस में सवार हो गया( लघु प्रेम कथा-लप्रेक अन्ना प्रसंग)
(2)
मालवीय नगर की महबूबा फार्मूला वन रेस देखने पहुंच गई। राजकुमार अपने घोड़े पर सवार उसे दिल्ली के अस्तबलों में ढूंढने लगा। शाहरूख़ ने अपनी फिल्म की कामयाबी के बाद दुबई का रास्ता ले लिया और दिग्विजय सिंह आराम से किसी और दिशा में एक और बयान की रचना में खोए गए। मगर घोड़े पर बैठा राजकुमार अपनी पीठ पर मुल्क का मुस्तकबिल लादे भटक रहा था। दोस्तों ने केक काटकर उसका जन्मदिन तो मना लिया मगर फ्रांस की महारानी का जूठन यह केक हिन्दुस्तान के ग़रीब प्रेमी के होठों से लिपट कर घोड़े की लीद बन गया। हिन्दी में कटकटाते उसके दांत कह रहे थे एक पागल आत्मकथा ऐसे ही लिखेगा। मालवीय नगर की महबूबा तो और भी पागल( लप्रेक)
(3)
अपने ही घोड़े के टाप से उड़ते ग़ुबार में राजकुमार को पता ही नहीं चला कि कब जेब से पंडारा रोड के रेस्त्रां की रसीदें उड़ने लगीं। पीछा कर रहे रायसीना के घुड़सवारों ने रसीदों को लपक लिया। किसी ख़तरे को भांप उसने मालवीय नगर की महबूबा से कहा जल्दी से मुड़ो, खिड़की एक्सटेंशन होते हुए साकेत में पीवीआर में रावन देखने बैठ जाओ। मैं ग़ाज़ीपुर होते हुए वसुंधरा चला जाता हूं। हमें प्यार करने से पहले सोच लेना चाहिए था कि इस मुल्क में मोहब्बत भी भ्रष्टाचार है। मालवीय नगर की महबूबा बोली, रायसीना के घुड़सवार वहां भी पहुंच गए तो? तो फिर तुम पीवीआर में ही किसी का दामन थाम लेना। मैं भागता हुआ मुज़फ्फ़रनगर निकल जाऊंगा। हो सके तो एक आख़िरी ख़त अन्ना को लिख देना। (लप्रेक)
(4)
वो राजकुमार घोड़े की पीठ पर बैठा राजपथ पर चला जा रहा था। घोड़े की टाप की आवाज़ उठती हुई रायसीना हिल्स की तरफ बढ़ने लगी। धनतेरस में स्टील का टिफिन बाक्स खरीद कर उसने मालवीय नगर की महबूबा को बता दिया था कि आज के दौर में मुमताजों को यही नसीब है। आसमान में निकला चांद चीन में बने अपने डुप्लीकेट से लोहा ले रहा था। ज़मीन पर घोड़े की टाप से उड़ती धूल से उसके आंखों की तकलीफ़ बढ़ती जा रही थी। अपने लंबे बालों को खोल उसने हवा को रोकने की कोशिश तो की मगर कानों के ऊपर से सरकती हुई उंगलियों ने मदहोश कर दिया। राजकुमार बोला- जब कुछ भी नहीं बचेगा तो इस टिफिन बाक्स में हम मोहब्बत की दो रोटियां रखा करेंगे।( लप्रेक)
राजा गार्डन का राजकुमार अपने घोड़े को लेकर सराय काले खां में सुस्ताने लगा। मालवीय नगर की महबूबा को जैसे ही पता चला कि रायसीना हिल्स के घुड़सवारों की पीठ पर पत्रकार सवार हैं वो हाफंने लगी। ये पत्रकार हर उस निशान की छाप लेकर नार्थ ब्लाक फैक्स कर रहे थे जहां राजा गार्डन के राजकुमार के घोड़े की टाप पड़ी थी। रास्ते में मिले टूटे हुए नाल को लेकर रायसीना हिल्स का एक घुड़सवार तेज़ी से मुड़ गया था। वो पद्मा पुरस्कारों की घोषणा से पहले ही नाल सौंप देना चाहता था। सराय काले खां बस स्टाप पर राजकुमार भेष बदल कर दस रूपये के दस पेचकस बेचने लगा। मालवीय नगर की महबूबा बिग बॉस में एंट्री ले चुकी थी। मगर जैसे ही बिग बॉस ने प्लान ए,प्लान बी और प्लान सी का नाम लिया, आवाज़ सुनकर वो बेहोश हो गई। इस बीच सहारनपुर की तरफ रवाना होती बस से राजकुमार उतरा ही था कि रायसीना हिल्स के घोड़े नज़र आ गए। वो फिर से अलवर जाने वाली बस में सवार हो गया( लघु प्रेम कथा-लप्रेक अन्ना प्रसंग)
(2)
मालवीय नगर की महबूबा फार्मूला वन रेस देखने पहुंच गई। राजकुमार अपने घोड़े पर सवार उसे दिल्ली के अस्तबलों में ढूंढने लगा। शाहरूख़ ने अपनी फिल्म की कामयाबी के बाद दुबई का रास्ता ले लिया और दिग्विजय सिंह आराम से किसी और दिशा में एक और बयान की रचना में खोए गए। मगर घोड़े पर बैठा राजकुमार अपनी पीठ पर मुल्क का मुस्तकबिल लादे भटक रहा था। दोस्तों ने केक काटकर उसका जन्मदिन तो मना लिया मगर फ्रांस की महारानी का जूठन यह केक हिन्दुस्तान के ग़रीब प्रेमी के होठों से लिपट कर घोड़े की लीद बन गया। हिन्दी में कटकटाते उसके दांत कह रहे थे एक पागल आत्मकथा ऐसे ही लिखेगा। मालवीय नगर की महबूबा तो और भी पागल( लप्रेक)
(3)
अपने ही घोड़े के टाप से उड़ते ग़ुबार में राजकुमार को पता ही नहीं चला कि कब जेब से पंडारा रोड के रेस्त्रां की रसीदें उड़ने लगीं। पीछा कर रहे रायसीना के घुड़सवारों ने रसीदों को लपक लिया। किसी ख़तरे को भांप उसने मालवीय नगर की महबूबा से कहा जल्दी से मुड़ो, खिड़की एक्सटेंशन होते हुए साकेत में पीवीआर में रावन देखने बैठ जाओ। मैं ग़ाज़ीपुर होते हुए वसुंधरा चला जाता हूं। हमें प्यार करने से पहले सोच लेना चाहिए था कि इस मुल्क में मोहब्बत भी भ्रष्टाचार है। मालवीय नगर की महबूबा बोली, रायसीना के घुड़सवार वहां भी पहुंच गए तो? तो फिर तुम पीवीआर में ही किसी का दामन थाम लेना। मैं भागता हुआ मुज़फ्फ़रनगर निकल जाऊंगा। हो सके तो एक आख़िरी ख़त अन्ना को लिख देना। (लप्रेक)
(4)
वो राजकुमार घोड़े की पीठ पर बैठा राजपथ पर चला जा रहा था। घोड़े की टाप की आवाज़ उठती हुई रायसीना हिल्स की तरफ बढ़ने लगी। धनतेरस में स्टील का टिफिन बाक्स खरीद कर उसने मालवीय नगर की महबूबा को बता दिया था कि आज के दौर में मुमताजों को यही नसीब है। आसमान में निकला चांद चीन में बने अपने डुप्लीकेट से लोहा ले रहा था। ज़मीन पर घोड़े की टाप से उड़ती धूल से उसके आंखों की तकलीफ़ बढ़ती जा रही थी। अपने लंबे बालों को खोल उसने हवा को रोकने की कोशिश तो की मगर कानों के ऊपर से सरकती हुई उंगलियों ने मदहोश कर दिया। राजकुमार बोला- जब कुछ भी नहीं बचेगा तो इस टिफिन बाक्स में हम मोहब्बत की दो रोटियां रखा करेंगे।( लप्रेक)
तकनीक का धाक धिना धिन
आज पान की गुमटी में बारह वोल्ट के इस इंवर्टर को देखकर सुखद अहसास सा हुआ। पान की गुमटीवाले ने बताया कि नगद अठारह सौ में और किश्त पर दो हज़ार में। इस इंवर्टर से आठ वाट का सीएफएल बल्ब जल जाता है। इंवर्टर घर से चार्ज करके लाता हूं। इससे रोशनी भी हो रही है और कटिया लगाकर बिजली चोरी करने से मुक्ति मिल गई है। बार-बार बिजली और पुलिसवाले को रिश्वत देनी पड़ती थी। हमारे देश में करोड़ों गुमटियों में बड़ी-बड़ी कंपनियों के उत्पाद बिकते हैं। ये रोज़गार का सबसे बड़ा ज़रिया है। मगर इन्हें औपचारिक तरीके से बिजली नहीं मिलती। ये बिजली कंपनियों की अदूरदर्शिता और तकनीकी नाकामी है कि वे सड़क के किनारे सजी दुकानों को बिजली मुहय्या नहीं करा सकतीं। लिहाज़ा एक लंबे वक्त तक ढ़िबरी,लालटेन और बैटरी के लालटेन से इन्हें अपनी रोज़ी रोटी चलानी पड़ी। फिर इन्होंने सर के ऊपर से गुज़रती तारों से गैर कानूनी तरीके से अपना हिस्सा मांगा। लोगों को लगा कि ये बिल नहीं दे सकते इसलिए चोरी करते हैं। जबकि ऐसा नहीं है। ऐसा कभी था भी नहीं। चोरी की बिजली से मुक्ति का जश्न मनाने का मौका मिला तो गुमटीवाले ने झट से दो हज़ार रुपये की किश्त पर छोटा इंवर्टर ले लिया।
यही अनुभव कोलकाता में भी हुआ। झाल मुरी और फुचका बेचनेवालों के ठेले से ढ़िबरी गायब है। चीन से आयातित एल ई डी बल्बों की भुकभुकाहट से उनका ठेला रौशन हो रहा है। धंधा चकाचक चल रहा है और रौशनी पर खर्च भी कम हो रहा है। पूंजीवाद कभी भी आम लोगों की तकलीफों के निदान का प्रयास सबसे पहले नहीं करता। वर्ना सोचिए भुने हुए चने के बीच में एक टिन की डिब्बी में जलती बाती। हल्की सी हवा पर भुकभुकाहट और फिर बंद हो जाना। पेट्रोमेक्स का ज़माना तो और भी तकलीफदेह था। अचानक बुझ गया। उसकी जाली जल गई। हवा पर हवा दिये जा रहे हैं। टाइट होने के बाद ही जाली जलती थी और रौशनी मिलती थी। अब इन सबसे मुक्ति मिल रही है। देश में बिजली के उत्पादन की जो हालत है उसके लिए और बीस पचीस साल इंतज़ार करने होंगे। लेकिन उससे पहले ऐसे कमाल के आइटम कमाल कर रहे हैं।
इसीलिए जब सैमसंग और कैनन के फोटोस्टेट मशीनें लघु रूप में आईं तो अब ये दर्जी,परचून और दवा की दुकानों पर भी मिलने लगी हैं। तकनीकी की इस उपलब्धता ने लोगों को अतिरिक्त रोज़गार का साधन उपलब्ध करा दिया है। इससे पहले जब आर टी ओ दफ्तर के बाहर के दलालों ने भी कई विकल्प निकाले। उन्हें दफ्तर बनाने की अनुमति नहीं है इसलिए वो मारुति ८०० और वैन में फोटो स्टेट मशीन लाद लाये। वो एक महंगा विकल्प था। एक दिन अचानक इंडिया गेट की झाड़ियों में फोटो स्टेट मशीनें दिखीं। उनके ऊपर गीला तौलिया रखा था ताकि भीषण गर्मी में मशीन गर्म न हो जाए। ये मशीनें देसी दिमाग के इस्तमाल से बैटरी से जोड़ दी गईं थीं। झट फोटो पट प्रिंट। लेकिन अब नई आधुनिक मशीनों ने इन तकलीफों को काफी कम किया है। आज दिल्ली के आनंद विहार में दर्ज़ी की मशीन पर फोटो स्टेट की मशीन देखकर सुखद अहसास हुआ। अब कोई भी प्रिंट कर सकता है। इसके लिए ज़्यादा स्पेस की ज़रूरत नहीं है। तकनीकी आम लोगों का जीवन बदलती है या काम आती है तभी अच्छी लगती है। काम की लगती है। तो है न ये तकनीक का ताक धिना धिन। वाह।
पुष्पा चक्कर काट कर चली गई
अरे जो सामने वाला गार्ड है न जावेद। हां। वो बता रहा था। क्या? कि वो आज तीन चार बार चक्कर काट कर चली गई है। कान में बाली पहनी थी और नया कपड़ा पहनी थी। सुंदर लग रही थी। चौदह पंद्रह साल का लड़का एक लड़की के आकर चले जाने का किस्सा अपने हमउम्र दोस्त को बता रहा था। पान की गुमटी में बैठे दोनों कभी फुसफुस तो कभी इतनी ज़ोर से बातें तो कर ही रहे थे कि मैं दोनों को सुन सकता था। आज शाम पान की गुमटी पर खड़ा रहा। देख रहा था कि आज कल के लड़के क्या बातें करते हैं, कैसे सिगरेट खरीद कर मुहं छुपा कर पीते हैं। धीरे-धीरे उनकी बातों में अटकने लगा। दुकानदार लड़का कहने लगा कि वो आज बहुत सुंदर लग रही थी। गार्ड बता रहा था। बस अब यहां वो नाम ले लेता है। जब उसका दोस्त पूछता है कि कौन? तो कहता है अरे पुष्पा की बात कर रहा हूं। इस सोसायटी में जो काम करने आती है न। वो पुष्पा। गार्ड बता रहा था कि पुष्पा तीन-चार चक्कर काट कर गई है। लगता है उसने आज मेरे लिए करवां चौथ किया था। दोस्त का कौतूहल बढ़ने लगता है। अरे वाह। पुष्पा तुमको प्यार करने लगी। दुकानदार लड़का शर्मा गया बेचारा। पता नहीं। केवल गुज़रती है तो मुस्कुरा देती है। फिर दोनों एक दूसरे को कोहनी मारने लगे। वो शर्माने लगा। हां,पुष्पा पसंद तो करती है। काश आज दुकान पर होता मैं। तो दोस्त कहता है कि तो कहा थे तुम। अरे तुम्हारे ही साथ तो गया था दोपहर में। उसे बड़ा दुख था कि करवां चौथ के दिन पुष्पा चक्कर काट कर चली गई। एक प्रेम कथा बनने की संभावना चांद के निकलने से पहले ही गोधूली बेला में धुंधली हो चुकी थी। वो उदास लग रहा था। मैं भी बड़ा शैतान। पता नहीं क्यों वहां खड़ा-खड़ा सुनता रहा। उन दोनों को देखकर मुस्कराता भी रहा। दोनों मुझे देखकर ज़रा भी नहीं घबराए। मुझे भी बड़ा अफसोस हुआ। पुष्पा चक्कर काट कर चली गई। उसका करवां चौथ अधूरा रह गया।( यह बिल्कुल सत्य कथा है)
एनालॉग से डिजिटल की ओर
केंद्रीय मंत्रिमंडल का यह फैसला न्यूज़ चैनलों के लिए क्रांतिकारी हो सकता है। सरकार ने तय किया है कि वह केबल आपरेटरों को अनिवार्य रूप से डिजिटल तकनीक अपनाने के लिए अध्यादेश लाएगी। हमारे देश में अस्सी फीसदी टीवी उपभोक्ता केबल नेटवर्क के ज़रिये चैनलों को ख़रीदते हैं। जिसके लिए वो महीने में दो सौ से तीन सौ रुपये तक देते हैं। अभी एनालॉग सिस्टम चलन में है।एनालॉग सिस्टम में कई तरह के बैंड होते हैं। बैंड का स्पेस सीमित होता है। टीवी सेट भी बैंड के हिसाब से होने चाहिए। कई टीवी सेट में पचास से ज़्यादा चैनल नहीं आते। इसीलिए पहले पचास में आने के लिए चैनल केबल आपरेटर को भारी मात्रा में कैरेज फीस देते हैं। इस मांग और आपूर्ति का उपभोक्ता से कोई लेना देना नहीं है। एनालॉग सिस्टम में होता यह है कि एक चैनल एक नंबर पर आता है और दूसरा किसी और नंबर पर। अगर आप टाटा स्काई ऑन करें तो न्यूज़ चैनल एक जगह मिलेंगे, स्पोर्टस एक कैटगरी में। लेकिन एनालॉग में आपको पूरा सौ नंबर तक जाकर अपने पंसद के चैनल ढूंढने पड़ते हैं। इसीलिए न्यूज़ चैनलवाले भारी रकम केबल आपरेटर को देते हैं ताकि वो पहले दस या पहले बीस में चैनल को दिखाये।
कोई न्यूज़ चैनल अगर सौ करोड़ रुपये खर्च करता है तो उसमें से पचास से साठ करोड़ रुपये केबल कैरिज फीस से के रूप में चला जाता है। बीस पचीस करोड़ रुपये मार्केटिंग में और कांटेंट पर सबसे कम बीस करोड़ के करीब। यही वजह है कि कांटेंट सस्ता और चलताऊ होता जा रहा है। सारा पैसा मार्केट में दिखने के लिए खर्च हो जाता है। केबल आपरेटरों के डिजिटल होने से बहुत राहत मिलने की बात कही जा रही है। एक तो यह है कि आपका चैनल किसी भी नंबर पर आएगा, साफ सुथरा ही दिखेगा। धुंधला नहीं। तो पहले दस और पचीस को लेकर मार खत्म। इसके लिए बताया जा रहा है कि केबल जगत को तीस हज़ार करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। अब यह देखना होगा कि केबल जगत इस खर्चे की भरपाई कैसे करता है। उपभोक्ता से कितना वसूलता है। क्या अस्सी फीसदी उपभोक्ता इसके लिए तैयार होंगे? एक दलील यह भी दी जा रही है कि डिजिटल होने से केबल वाले चैनलों के स्पेस की मार्केंटिग खुद कर सकेंगे। जैसे अमुक चैनल के ब्रेक में पटना में अलग एडवरटीज़मेंट दिखेगा और लखनऊ में अलग। अभी तो केबल वाला यह करता है कि अमुक चैनल को हटा देता है। उससे जबरन ज्यादा पैसा मांगता है। उपभोक्ता कुछ नहीं कर सकता। उसे मजबूरन अपने पंसद का चैनल छोड़ उस नंबर पर दूसरा चैनल देखना पड़ता है।
यह एक ज़रूरी कदम है। वर्ना न्यूज़ चैनलों की आर्थिक हालत खराब होती जा रही है। न तो नए लोग आ रहे हैं न नया चैनल न नया प्रोग्राम जिसमें बहुत सारे प्रयोग हों। पर यह प्रक्रिया कैसे लागू होगी और कब तक लागू होगी इसे आप सिर्फ डेडलाइन देकर तय नहीं कर सकते। ज्यादातर केबल नेटवर्क राजनीतिक लोगों के हाथ में हैं। इसलिए जब हो जाए तभी ताली।
कोई न्यूज़ चैनल अगर सौ करोड़ रुपये खर्च करता है तो उसमें से पचास से साठ करोड़ रुपये केबल कैरिज फीस से के रूप में चला जाता है। बीस पचीस करोड़ रुपये मार्केटिंग में और कांटेंट पर सबसे कम बीस करोड़ के करीब। यही वजह है कि कांटेंट सस्ता और चलताऊ होता जा रहा है। सारा पैसा मार्केट में दिखने के लिए खर्च हो जाता है। केबल आपरेटरों के डिजिटल होने से बहुत राहत मिलने की बात कही जा रही है। एक तो यह है कि आपका चैनल किसी भी नंबर पर आएगा, साफ सुथरा ही दिखेगा। धुंधला नहीं। तो पहले दस और पचीस को लेकर मार खत्म। इसके लिए बताया जा रहा है कि केबल जगत को तीस हज़ार करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। अब यह देखना होगा कि केबल जगत इस खर्चे की भरपाई कैसे करता है। उपभोक्ता से कितना वसूलता है। क्या अस्सी फीसदी उपभोक्ता इसके लिए तैयार होंगे? एक दलील यह भी दी जा रही है कि डिजिटल होने से केबल वाले चैनलों के स्पेस की मार्केंटिग खुद कर सकेंगे। जैसे अमुक चैनल के ब्रेक में पटना में अलग एडवरटीज़मेंट दिखेगा और लखनऊ में अलग। अभी तो केबल वाला यह करता है कि अमुक चैनल को हटा देता है। उससे जबरन ज्यादा पैसा मांगता है। उपभोक्ता कुछ नहीं कर सकता। उसे मजबूरन अपने पंसद का चैनल छोड़ उस नंबर पर दूसरा चैनल देखना पड़ता है।
यह एक ज़रूरी कदम है। वर्ना न्यूज़ चैनलों की आर्थिक हालत खराब होती जा रही है। न तो नए लोग आ रहे हैं न नया चैनल न नया प्रोग्राम जिसमें बहुत सारे प्रयोग हों। पर यह प्रक्रिया कैसे लागू होगी और कब तक लागू होगी इसे आप सिर्फ डेडलाइन देकर तय नहीं कर सकते। ज्यादातर केबल नेटवर्क राजनीतिक लोगों के हाथ में हैं। इसलिए जब हो जाए तभी ताली।
PRESS RELEASE-RATING HAS BECOME MONTHLY.
September 8, 2011
FOR IMMEDIATE RELEASE
Re: Shifting of TAM Ratings for News Channels from Weekly to Monthly
New Delhi: September 8, 2011……The NBA Board, in its effort to improve news
broadcasting standards, has taken a decision to move from weekly to monthly ratings
for all national news and business channels in Hindi and English. News channels
being distinct from other genres, have a responsibility to inform and empower its
viewers with quality programming and dissemination of news rather than providing
content merely for garnering viewership. Coverage and reportage of news and
programmes cannot always be linked to popularity or audience measurement. News
broadcasting standards, the NBA Board believed, can only improve with time spent on
strategic planning and research rather than knee jerk reactions taken on a weekly
basis.
This initiative taken by the News Broadcasters Association (NBA) would not in any
way hamper the decision making of advertisers and advertising agencies. In the new
monthly dispensation, advertisers would continue to get access to data broken down to
a minute or a day-part or a specific programme in a manner similar to how data points
are currently accessed in the weekly format.
The NBA and TAM are in discussion on implementation of this initiative which is
being proposed to be introduced initially for a period of two years.
The changes are expected to be implemented from October, 2011. Eventually the
monthly format is expected to be implemented for regional news channels as well.
For further details on this initiative kindly send your queries by email to Mrs. Annie
Joseph, Secretary General, NBA at nba@nbanewdelhi.com.
Annie Joseph
Secretary General
FOR IMMEDIATE RELEASE
Re: Shifting of TAM Ratings for News Channels from Weekly to Monthly
New Delhi: September 8, 2011……The NBA Board, in its effort to improve news
broadcasting standards, has taken a decision to move from weekly to monthly ratings
for all national news and business channels in Hindi and English. News channels
being distinct from other genres, have a responsibility to inform and empower its
viewers with quality programming and dissemination of news rather than providing
content merely for garnering viewership. Coverage and reportage of news and
programmes cannot always be linked to popularity or audience measurement. News
broadcasting standards, the NBA Board believed, can only improve with time spent on
strategic planning and research rather than knee jerk reactions taken on a weekly
basis.
This initiative taken by the News Broadcasters Association (NBA) would not in any
way hamper the decision making of advertisers and advertising agencies. In the new
monthly dispensation, advertisers would continue to get access to data broken down to
a minute or a day-part or a specific programme in a manner similar to how data points
are currently accessed in the weekly format.
The NBA and TAM are in discussion on implementation of this initiative which is
being proposed to be introduced initially for a period of two years.
The changes are expected to be implemented from October, 2011. Eventually the
monthly format is expected to be implemented for regional news channels as well.
For further details on this initiative kindly send your queries by email to Mrs. Annie
Joseph, Secretary General, NBA at nba@nbanewdelhi.com.
Annie Joseph
Secretary General
बोलती बंद कर देती है बोल।
मारना जुर्म है तो पैदा करना जुर्म क्यों नहीं है? बोल फिल्म का यह सवाल उठता तो एक मुल्क़,मज़हब विशेष में मगर हो जाता है कई मुल्क़ों,मज़हबों का। जिन्होंने शोएब मंसूर की खुदा के लिए देखी होगी वो इस फिल्म के ज़रिये निर्देशक के मन में चल रही कहानियों और बेचैनियों को महसूस कर सकते हैं। बोल में कथाओं का इतना संगम और टकराव है कि आप एक साथ कई तरह के समय और सवालों में उलझते चले जाते हैं। टेक्नॉलजी और एडिटिंग के दम पर यह फिल्म फिल्म नहीं बनती बल्कि अपनी कथाओं के सहारे फिल्म बनती चली जाती है। लाहौर की सड़कें,छतें और गलियों से निकलती कहानियां हिन्दुस्तान के सिनेमाघर में देखते हुए अपने शहरों की लगने लगती है। यह फिल्म एक हिन्दुस्तानी को जो पाकिस्तान कभी नहीं गया, उसके समाज से परिचय कराती है। वर्ना मीडिया से जो पाकिस्तान हमें विरासत में मिला है उसमें सिर्फ हुक्मरानों,फौजियों,आतंकवादियों,क्रिकेटरों,गायकों की तस्वीरें हैं। घर और समाज नहीं है। बोल पाकिस्तान को लेकर हमारी चुप्पी को भी तोड़ देती है। यह फिल्म सहजता से ऐसे मुश्किल सवालों को अपने मुल्क के सामाजिक परिवेश में उठा देती है जिसकी आवाज़ हमें किसी और चैनल से इस तरफ नहीं सुनाई पड़ती। सच कहूं तो पहली बार किसी फिल्म को देखकर लगा कि इधर के हों या उधर के,मसले दोनों के एक हैं।
कहानी में हिन्दुस्तान का बंटवारा है तो दिल्ली से आया हकीम साहब का ख़ानदान। आधुनिक डाक्टरी के दौर में हकीम का पेशा छूटता जा रहा है और परिवार की आबादी बढ़ती जा रही है। जल्दी ही यह फिल्म इस्लामिक समाज में औरतों के बग़ावत की बुनियाद डालने का काम करने लगती है। पितृसत्तात्मक समाज के वालिद बने हकीम साहब सुन्नत के ठेकेदार के रूप में बेबस नज़र आते हैं। उनकी हवेली और उनमें हर साल पैदा होने वाली लड़कियां। लड़कियों का बढ़ना और एक भाई के रूप में सैफ़ी का घर आना। कहानी अपने ग्रैड नैरेटिव को छोड़ कर एक ट्रांस जेंडर बच्चे की परवरिश और उसके प्रति बहनों और बाप के नज़रिये से टकराने लगती है। सैफी का प्रसंग बहुत रूलाता है। ज़ार-ज़ार कर देता है। लगता है छाती पीट पीट कर दहाड़ने लगे। निर्देशक अपना धीरज नहीं खोता। कोई फास्ट कट नहीं है। सैफी अपनी रफ्तार से बड़ा होता है। ज़ैनब के सहारे दुनिया को देखने की कोशिश में उन हरकतों का शिकार होता है जिसके शिकार हमारे घरों में बच्चे रिश्तेदारों के हाथ होते रहे हैं। हिजड़ों की नज़र से बचाकर बहनों का उसे मर्द बनाना और मर्द न होने पर अपने बाप हकीम साहब से बचाना कहानी का ऐसा मोड़ है तो कलेजा फाड़ देता है। सैफी के साथ बलात्कार और फिर बाप के हाथों उसकी मौत। बलात्कार के बाद घर लौटना और उसकी मां का अपने बच्चे को गोद में लेकर रोना, निर्देशक मंसूर अपने दिलेर कैमरे से देखनेवालों की आंखों में आंखें मिलाकर पूछने लगता है। सैफ़ी को उसका बाप मार देता है और कहानी अपनी ग्रैंड नैरेटिव पर लौट आती है। बल्कि कहानियां ऐसी बुनी गईं कि कोई भी कहानी कभी भी किसी को नहीं छोड़ती। सब उलझती-सुलझती चलती हैं।
हकीम साहब की बेटियां बड़ी हो रही हैं। बेटियां मां के प्रति हमदर्द होने लगती हैं। उनमें साहस पैदा हो रहा है ज़ैनब के ज़रिये। दुनिया को औरतों की नज़र से देखने और बनाने का। हकीम साहब अहले सुन्नत के दरवाज़े पर खड़े वो पहरेदार हैं जिनकी दाढ़ी उस वक्त खिजाब से रंग जाती है जब वो हत्या के जुर्म से बचने के लिए कंजर समुदाय के हाथों बिक जाते हैं। मस्जिक की रकम चुकाने के लिए कंजर जाति की मीना से निकाह करते हैं। साथ ही साथ अपनी बेटी को पड़ोसी दोस्त के बेटे के हाथ देने से मना कर देते हैं क्योंकि वो शिया हैं। कहानी मज़हब का इम्तहान लेती है। बेटियां दुनियादारी के सवालों से मज़हबी ढकोसलनेपन को चुनौती देने लगती हैं। हकीम साहब बेटियां पैदा करने की मशीन बने मीना के साथ रात गुज़ारने लगते हैं। अहले सुन्नत की चौकीदारी छोड़ कंजरों के बच्चों को कुरान पढ़ाने लगते हैं। मगर उनके लिए अपना घर और बेटियां वो आखिरी मोर्चा हैं जिसकी सरहद पर खड़े होकर वो अपने पितृसत्तात्मक अहं की हिफ़ाज़त करने में जुटे रह जाते हैं। तब तक जब एक रात मीना अपनी बेटी उनकी चौखट पर नहीं छो़ड़ जाती है। घर में कोहराम मचता है और हकीम के भीतर का मज़हबी मर्द फिर वहशी होता है और वो एक तवायफ़ बीबी से पैदा हुई बेटी का गला घोंटने लगते हैं। ज़ैनब इस बार अपनी बेबसी तोड़ देती है और बाप को मार देती है। बेटियां यहां अपनी ज़ात के सवालों को नहीं छोड़तीं। वो बाप के क़त्ल के बीच मीना की उस बेटी को भी बचा लेती हैं जिसके होने की बात सामने आने पर हकीम साहब के मौत का संदर्भ बनता है। फिल्म बहुत मज़बूती से औरतों के हक़ और सवालों पर टिकी रहती है।
यह एक ह्रदयविदारक प्रसंग है। फिल्म कई बार क्लाईमैक्स पर चढ़ती है और उतरती है। तभी तो हकीम साहब का क्रिकेट प्रेम भी सामने आता है और बेटियों के तेंदुलकर प्रेम और भारत की हार से गुस्सा होकर रेडियो भी तोड़ देते हैं। फिल्म शुरू होती है जेल के दृश्य से। ज़ैनब अपनी बहनों के बुर्के को उखाड़ फेंकती है। कहती है अभी से फेंको इनको। फिर मां और बहनों से घिर कर रोने लगती है। फांसी के तख्ते तक ले जाए जाने से पहले का यह दृश्य साफ कर देता है कि इस फिल्म की दुनिया में औरतों ने एक दूसरे को नहीं छोड़ा है। ये औरतें सतायी हुई वो जमात है जो अपने घर में,अपने बाप से लड़ने का साहस हासिल करती हुईं मज़हबी दकियानूसी ख़्यालातों से लोहा लेती हैं। जवान और अनपढ़ लड़कियां अपनी दुनिया रचने की छोटी-छोटी कोशिशें करती रहती हैं। शुरू से लेकर अंत के पहले तक यह फिल्म हकीकत के सौ फीसदी करीब है। आखिरी पांच मिनट में सिनेमाई क्लपनालोक की तरह कामायाबी का मंज़र बनाना इसकी मजबूरी बन जाती है। बल्कि मंसूर बहुत सलीके से हर दर्दनाक हकीकत के क्लाईमैक्स पर पहुंचते ही कहानी में हल्के प्रसंग ले आते हैं ताकि आप एक साथ इस्लाम, समाज और मुल्क के कई सवालों से टकराते रहे हैं और भावुक होकर ज़िंदगी और मज़हब की जंग को देखते रहे। तभी यह फिल्म सिर्फ पाकिस्तान की नहीं रह जाती। हिन्दुस्तान की भी हो जाती है। हमारे समाजों में ग़रीबी और आबादी एक मज़हब का मसला नहीं है। सभी का है। यह फिल्म एक दिलेर फिल्म है बल्कि इतनी दिलेर की बोलती बंद कर देती है। देखने के लिए टिकट का पैसा नहीं बल्कि मज़बूत कलेजा चाहिए।
कहानी में हिन्दुस्तान का बंटवारा है तो दिल्ली से आया हकीम साहब का ख़ानदान। आधुनिक डाक्टरी के दौर में हकीम का पेशा छूटता जा रहा है और परिवार की आबादी बढ़ती जा रही है। जल्दी ही यह फिल्म इस्लामिक समाज में औरतों के बग़ावत की बुनियाद डालने का काम करने लगती है। पितृसत्तात्मक समाज के वालिद बने हकीम साहब सुन्नत के ठेकेदार के रूप में बेबस नज़र आते हैं। उनकी हवेली और उनमें हर साल पैदा होने वाली लड़कियां। लड़कियों का बढ़ना और एक भाई के रूप में सैफ़ी का घर आना। कहानी अपने ग्रैड नैरेटिव को छोड़ कर एक ट्रांस जेंडर बच्चे की परवरिश और उसके प्रति बहनों और बाप के नज़रिये से टकराने लगती है। सैफी का प्रसंग बहुत रूलाता है। ज़ार-ज़ार कर देता है। लगता है छाती पीट पीट कर दहाड़ने लगे। निर्देशक अपना धीरज नहीं खोता। कोई फास्ट कट नहीं है। सैफी अपनी रफ्तार से बड़ा होता है। ज़ैनब के सहारे दुनिया को देखने की कोशिश में उन हरकतों का शिकार होता है जिसके शिकार हमारे घरों में बच्चे रिश्तेदारों के हाथ होते रहे हैं। हिजड़ों की नज़र से बचाकर बहनों का उसे मर्द बनाना और मर्द न होने पर अपने बाप हकीम साहब से बचाना कहानी का ऐसा मोड़ है तो कलेजा फाड़ देता है। सैफी के साथ बलात्कार और फिर बाप के हाथों उसकी मौत। बलात्कार के बाद घर लौटना और उसकी मां का अपने बच्चे को गोद में लेकर रोना, निर्देशक मंसूर अपने दिलेर कैमरे से देखनेवालों की आंखों में आंखें मिलाकर पूछने लगता है। सैफ़ी को उसका बाप मार देता है और कहानी अपनी ग्रैंड नैरेटिव पर लौट आती है। बल्कि कहानियां ऐसी बुनी गईं कि कोई भी कहानी कभी भी किसी को नहीं छोड़ती। सब उलझती-सुलझती चलती हैं।
हकीम साहब की बेटियां बड़ी हो रही हैं। बेटियां मां के प्रति हमदर्द होने लगती हैं। उनमें साहस पैदा हो रहा है ज़ैनब के ज़रिये। दुनिया को औरतों की नज़र से देखने और बनाने का। हकीम साहब अहले सुन्नत के दरवाज़े पर खड़े वो पहरेदार हैं जिनकी दाढ़ी उस वक्त खिजाब से रंग जाती है जब वो हत्या के जुर्म से बचने के लिए कंजर समुदाय के हाथों बिक जाते हैं। मस्जिक की रकम चुकाने के लिए कंजर जाति की मीना से निकाह करते हैं। साथ ही साथ अपनी बेटी को पड़ोसी दोस्त के बेटे के हाथ देने से मना कर देते हैं क्योंकि वो शिया हैं। कहानी मज़हब का इम्तहान लेती है। बेटियां दुनियादारी के सवालों से मज़हबी ढकोसलनेपन को चुनौती देने लगती हैं। हकीम साहब बेटियां पैदा करने की मशीन बने मीना के साथ रात गुज़ारने लगते हैं। अहले सुन्नत की चौकीदारी छोड़ कंजरों के बच्चों को कुरान पढ़ाने लगते हैं। मगर उनके लिए अपना घर और बेटियां वो आखिरी मोर्चा हैं जिसकी सरहद पर खड़े होकर वो अपने पितृसत्तात्मक अहं की हिफ़ाज़त करने में जुटे रह जाते हैं। तब तक जब एक रात मीना अपनी बेटी उनकी चौखट पर नहीं छो़ड़ जाती है। घर में कोहराम मचता है और हकीम के भीतर का मज़हबी मर्द फिर वहशी होता है और वो एक तवायफ़ बीबी से पैदा हुई बेटी का गला घोंटने लगते हैं। ज़ैनब इस बार अपनी बेबसी तोड़ देती है और बाप को मार देती है। बेटियां यहां अपनी ज़ात के सवालों को नहीं छोड़तीं। वो बाप के क़त्ल के बीच मीना की उस बेटी को भी बचा लेती हैं जिसके होने की बात सामने आने पर हकीम साहब के मौत का संदर्भ बनता है। फिल्म बहुत मज़बूती से औरतों के हक़ और सवालों पर टिकी रहती है।
यह एक ह्रदयविदारक प्रसंग है। फिल्म कई बार क्लाईमैक्स पर चढ़ती है और उतरती है। तभी तो हकीम साहब का क्रिकेट प्रेम भी सामने आता है और बेटियों के तेंदुलकर प्रेम और भारत की हार से गुस्सा होकर रेडियो भी तोड़ देते हैं। फिल्म शुरू होती है जेल के दृश्य से। ज़ैनब अपनी बहनों के बुर्के को उखाड़ फेंकती है। कहती है अभी से फेंको इनको। फिर मां और बहनों से घिर कर रोने लगती है। फांसी के तख्ते तक ले जाए जाने से पहले का यह दृश्य साफ कर देता है कि इस फिल्म की दुनिया में औरतों ने एक दूसरे को नहीं छोड़ा है। ये औरतें सतायी हुई वो जमात है जो अपने घर में,अपने बाप से लड़ने का साहस हासिल करती हुईं मज़हबी दकियानूसी ख़्यालातों से लोहा लेती हैं। जवान और अनपढ़ लड़कियां अपनी दुनिया रचने की छोटी-छोटी कोशिशें करती रहती हैं। शुरू से लेकर अंत के पहले तक यह फिल्म हकीकत के सौ फीसदी करीब है। आखिरी पांच मिनट में सिनेमाई क्लपनालोक की तरह कामायाबी का मंज़र बनाना इसकी मजबूरी बन जाती है। बल्कि मंसूर बहुत सलीके से हर दर्दनाक हकीकत के क्लाईमैक्स पर पहुंचते ही कहानी में हल्के प्रसंग ले आते हैं ताकि आप एक साथ इस्लाम, समाज और मुल्क के कई सवालों से टकराते रहे हैं और भावुक होकर ज़िंदगी और मज़हब की जंग को देखते रहे। तभी यह फिल्म सिर्फ पाकिस्तान की नहीं रह जाती। हिन्दुस्तान की भी हो जाती है। हमारे समाजों में ग़रीबी और आबादी एक मज़हब का मसला नहीं है। सभी का है। यह फिल्म एक दिलेर फिल्म है बल्कि इतनी दिलेर की बोलती बंद कर देती है। देखने के लिए टिकट का पैसा नहीं बल्कि मज़बूत कलेजा चाहिए।
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