(1)
राजा गार्डन का राजकुमार अपने घोड़े को लेकर सराय काले खां में सुस्ताने लगा। मालवीय नगर की महबूबा को जैसे ही पता चला कि रायसीना हिल्स के घुड़सवारों की पीठ पर पत्रकार सवार हैं वो हाफंने लगी। ये पत्रकार हर उस निशान की छाप लेकर नार्थ ब्लाक फैक्स कर रहे थे जहां राजा गार्डन के राजकुमार के घोड़े की टाप पड़ी थी। रास्ते में मिले टूटे हुए नाल को लेकर रायसीना हिल्स का एक घुड़सवार तेज़ी से मुड़ गया था। वो पद्मा पुरस्कारों की घोषणा से पहले ही नाल सौंप देना चाहता था। सराय काले खां बस स्टाप पर राजकुमार भेष बदल कर दस रूपये के दस पेचकस बेचने लगा। मालवीय नगर की महबूबा बिग बॉस में एंट्री ले चुकी थी। मगर जैसे ही बिग बॉस ने प्लान ए,प्लान बी और प्लान सी का नाम लिया, आवाज़ सुनकर वो बेहोश हो गई। इस बीच सहारनपुर की तरफ रवाना होती बस से राजकुमार उतरा ही था कि रायसीना हिल्स के घोड़े नज़र आ गए। वो फिर से अलवर जाने वाली बस में सवार हो गया( लघु प्रेम कथा-लप्रेक अन्ना प्रसंग)
(2)
मालवीय नगर की महबूबा फार्मूला वन रेस देखने पहुंच गई। राजकुमार अपने घोड़े पर सवार उसे दिल्ली के अस्तबलों में ढूंढने लगा। शाहरूख़ ने अपनी फिल्म की कामयाबी के बाद दुबई का रास्ता ले लिया और दिग्विजय सिंह आराम से किसी और दिशा में एक और बयान की रचना में खोए गए। मगर घोड़े पर बैठा राजकुमार अपनी पीठ पर मुल्क का मुस्तकबिल लादे भटक रहा था। दोस्तों ने केक काटकर उसका जन्मदिन तो मना लिया मगर फ्रांस की महारानी का जूठन यह केक हिन्दुस्तान के ग़रीब प्रेमी के होठों से लिपट कर घोड़े की लीद बन गया। हिन्दी में कटकटाते उसके दांत कह रहे थे एक पागल आत्मकथा ऐसे ही लिखेगा। मालवीय नगर की महबूबा तो और भी पागल( लप्रेक)
(3)
अपने ही घोड़े के टाप से उड़ते ग़ुबार में राजकुमार को पता ही नहीं चला कि कब जेब से पंडारा रोड के रेस्त्रां की रसीदें उड़ने लगीं। पीछा कर रहे रायसीना के घुड़सवारों ने रसीदों को लपक लिया। किसी ख़तरे को भांप उसने मालवीय नगर की महबूबा से कहा जल्दी से मुड़ो, खिड़की एक्सटेंशन होते हुए साकेत में पीवीआर में रावन देखने बैठ जाओ। मैं ग़ाज़ीपुर होते हुए वसुंधरा चला जाता हूं। हमें प्यार करने से पहले सोच लेना चाहिए था कि इस मुल्क में मोहब्बत भी भ्रष्टाचार है। मालवीय नगर की महबूबा बोली, रायसीना के घुड़सवार वहां भी पहुंच गए तो? तो फिर तुम पीवीआर में ही किसी का दामन थाम लेना। मैं भागता हुआ मुज़फ्फ़रनगर निकल जाऊंगा। हो सके तो एक आख़िरी ख़त अन्ना को लिख देना। (लप्रेक)
(4)
वो राजकुमार घोड़े की पीठ पर बैठा राजपथ पर चला जा रहा था। घोड़े की टाप की आवाज़ उठती हुई रायसीना हिल्स की तरफ बढ़ने लगी। धनतेरस में स्टील का टिफिन बाक्स खरीद कर उसने मालवीय नगर की महबूबा को बता दिया था कि आज के दौर में मुमताजों को यही नसीब है। आसमान में निकला चांद चीन में बने अपने डुप्लीकेट से लोहा ले रहा था। ज़मीन पर घोड़े की टाप से उड़ती धूल से उसके आंखों की तकलीफ़ बढ़ती जा रही थी। अपने लंबे बालों को खोल उसने हवा को रोकने की कोशिश तो की मगर कानों के ऊपर से सरकती हुई उंगलियों ने मदहोश कर दिया। राजकुमार बोला- जब कुछ भी नहीं बचेगा तो इस टिफिन बाक्स में हम मोहब्बत की दो रोटियां रखा करेंगे।( लप्रेक)
तकनीक का धाक धिना धिन
आज पान की गुमटी में बारह वोल्ट के इस इंवर्टर को देखकर सुखद अहसास सा हुआ। पान की गुमटीवाले ने बताया कि नगद अठारह सौ में और किश्त पर दो हज़ार में। इस इंवर्टर से आठ वाट का सीएफएल बल्ब जल जाता है। इंवर्टर घर से चार्ज करके लाता हूं। इससे रोशनी भी हो रही है और कटिया लगाकर बिजली चोरी करने से मुक्ति मिल गई है। बार-बार बिजली और पुलिसवाले को रिश्वत देनी पड़ती थी। हमारे देश में करोड़ों गुमटियों में बड़ी-बड़ी कंपनियों के उत्पाद बिकते हैं। ये रोज़गार का सबसे बड़ा ज़रिया है। मगर इन्हें औपचारिक तरीके से बिजली नहीं मिलती। ये बिजली कंपनियों की अदूरदर्शिता और तकनीकी नाकामी है कि वे सड़क के किनारे सजी दुकानों को बिजली मुहय्या नहीं करा सकतीं। लिहाज़ा एक लंबे वक्त तक ढ़िबरी,लालटेन और बैटरी के लालटेन से इन्हें अपनी रोज़ी रोटी चलानी पड़ी। फिर इन्होंने सर के ऊपर से गुज़रती तारों से गैर कानूनी तरीके से अपना हिस्सा मांगा। लोगों को लगा कि ये बिल नहीं दे सकते इसलिए चोरी करते हैं। जबकि ऐसा नहीं है। ऐसा कभी था भी नहीं। चोरी की बिजली से मुक्ति का जश्न मनाने का मौका मिला तो गुमटीवाले ने झट से दो हज़ार रुपये की किश्त पर छोटा इंवर्टर ले लिया।
यही अनुभव कोलकाता में भी हुआ। झाल मुरी और फुचका बेचनेवालों के ठेले से ढ़िबरी गायब है। चीन से आयातित एल ई डी बल्बों की भुकभुकाहट से उनका ठेला रौशन हो रहा है। धंधा चकाचक चल रहा है और रौशनी पर खर्च भी कम हो रहा है। पूंजीवाद कभी भी आम लोगों की तकलीफों के निदान का प्रयास सबसे पहले नहीं करता। वर्ना सोचिए भुने हुए चने के बीच में एक टिन की डिब्बी में जलती बाती। हल्की सी हवा पर भुकभुकाहट और फिर बंद हो जाना। पेट्रोमेक्स का ज़माना तो और भी तकलीफदेह था। अचानक बुझ गया। उसकी जाली जल गई। हवा पर हवा दिये जा रहे हैं। टाइट होने के बाद ही जाली जलती थी और रौशनी मिलती थी। अब इन सबसे मुक्ति मिल रही है। देश में बिजली के उत्पादन की जो हालत है उसके लिए और बीस पचीस साल इंतज़ार करने होंगे। लेकिन उससे पहले ऐसे कमाल के आइटम कमाल कर रहे हैं।
इसीलिए जब सैमसंग और कैनन के फोटोस्टेट मशीनें लघु रूप में आईं तो अब ये दर्जी,परचून और दवा की दुकानों पर भी मिलने लगी हैं। तकनीकी की इस उपलब्धता ने लोगों को अतिरिक्त रोज़गार का साधन उपलब्ध करा दिया है। इससे पहले जब आर टी ओ दफ्तर के बाहर के दलालों ने भी कई विकल्प निकाले। उन्हें दफ्तर बनाने की अनुमति नहीं है इसलिए वो मारुति ८०० और वैन में फोटो स्टेट मशीन लाद लाये। वो एक महंगा विकल्प था। एक दिन अचानक इंडिया गेट की झाड़ियों में फोटो स्टेट मशीनें दिखीं। उनके ऊपर गीला तौलिया रखा था ताकि भीषण गर्मी में मशीन गर्म न हो जाए। ये मशीनें देसी दिमाग के इस्तमाल से बैटरी से जोड़ दी गईं थीं। झट फोटो पट प्रिंट। लेकिन अब नई आधुनिक मशीनों ने इन तकलीफों को काफी कम किया है। आज दिल्ली के आनंद विहार में दर्ज़ी की मशीन पर फोटो स्टेट की मशीन देखकर सुखद अहसास हुआ। अब कोई भी प्रिंट कर सकता है। इसके लिए ज़्यादा स्पेस की ज़रूरत नहीं है। तकनीकी आम लोगों का जीवन बदलती है या काम आती है तभी अच्छी लगती है। काम की लगती है। तो है न ये तकनीक का ताक धिना धिन। वाह।
पुष्पा चक्कर काट कर चली गई
अरे जो सामने वाला गार्ड है न जावेद। हां। वो बता रहा था। क्या? कि वो आज तीन चार बार चक्कर काट कर चली गई है। कान में बाली पहनी थी और नया कपड़ा पहनी थी। सुंदर लग रही थी। चौदह पंद्रह साल का लड़का एक लड़की के आकर चले जाने का किस्सा अपने हमउम्र दोस्त को बता रहा था। पान की गुमटी में बैठे दोनों कभी फुसफुस तो कभी इतनी ज़ोर से बातें तो कर ही रहे थे कि मैं दोनों को सुन सकता था। आज शाम पान की गुमटी पर खड़ा रहा। देख रहा था कि आज कल के लड़के क्या बातें करते हैं, कैसे सिगरेट खरीद कर मुहं छुपा कर पीते हैं। धीरे-धीरे उनकी बातों में अटकने लगा। दुकानदार लड़का कहने लगा कि वो आज बहुत सुंदर लग रही थी। गार्ड बता रहा था। बस अब यहां वो नाम ले लेता है। जब उसका दोस्त पूछता है कि कौन? तो कहता है अरे पुष्पा की बात कर रहा हूं। इस सोसायटी में जो काम करने आती है न। वो पुष्पा। गार्ड बता रहा था कि पुष्पा तीन-चार चक्कर काट कर गई है। लगता है उसने आज मेरे लिए करवां चौथ किया था। दोस्त का कौतूहल बढ़ने लगता है। अरे वाह। पुष्पा तुमको प्यार करने लगी। दुकानदार लड़का शर्मा गया बेचारा। पता नहीं। केवल गुज़रती है तो मुस्कुरा देती है। फिर दोनों एक दूसरे को कोहनी मारने लगे। वो शर्माने लगा। हां,पुष्पा पसंद तो करती है। काश आज दुकान पर होता मैं। तो दोस्त कहता है कि तो कहा थे तुम। अरे तुम्हारे ही साथ तो गया था दोपहर में। उसे बड़ा दुख था कि करवां चौथ के दिन पुष्पा चक्कर काट कर चली गई। एक प्रेम कथा बनने की संभावना चांद के निकलने से पहले ही गोधूली बेला में धुंधली हो चुकी थी। वो उदास लग रहा था। मैं भी बड़ा शैतान। पता नहीं क्यों वहां खड़ा-खड़ा सुनता रहा। उन दोनों को देखकर मुस्कराता भी रहा। दोनों मुझे देखकर ज़रा भी नहीं घबराए। मुझे भी बड़ा अफसोस हुआ। पुष्पा चक्कर काट कर चली गई। उसका करवां चौथ अधूरा रह गया।( यह बिल्कुल सत्य कथा है)
एनालॉग से डिजिटल की ओर
केंद्रीय मंत्रिमंडल का यह फैसला न्यूज़ चैनलों के लिए क्रांतिकारी हो सकता है। सरकार ने तय किया है कि वह केबल आपरेटरों को अनिवार्य रूप से डिजिटल तकनीक अपनाने के लिए अध्यादेश लाएगी। हमारे देश में अस्सी फीसदी टीवी उपभोक्ता केबल नेटवर्क के ज़रिये चैनलों को ख़रीदते हैं। जिसके लिए वो महीने में दो सौ से तीन सौ रुपये तक देते हैं। अभी एनालॉग सिस्टम चलन में है।एनालॉग सिस्टम में कई तरह के बैंड होते हैं। बैंड का स्पेस सीमित होता है। टीवी सेट भी बैंड के हिसाब से होने चाहिए। कई टीवी सेट में पचास से ज़्यादा चैनल नहीं आते। इसीलिए पहले पचास में आने के लिए चैनल केबल आपरेटर को भारी मात्रा में कैरेज फीस देते हैं। इस मांग और आपूर्ति का उपभोक्ता से कोई लेना देना नहीं है। एनालॉग सिस्टम में होता यह है कि एक चैनल एक नंबर पर आता है और दूसरा किसी और नंबर पर। अगर आप टाटा स्काई ऑन करें तो न्यूज़ चैनल एक जगह मिलेंगे, स्पोर्टस एक कैटगरी में। लेकिन एनालॉग में आपको पूरा सौ नंबर तक जाकर अपने पंसद के चैनल ढूंढने पड़ते हैं। इसीलिए न्यूज़ चैनलवाले भारी रकम केबल आपरेटर को देते हैं ताकि वो पहले दस या पहले बीस में चैनल को दिखाये।
कोई न्यूज़ चैनल अगर सौ करोड़ रुपये खर्च करता है तो उसमें से पचास से साठ करोड़ रुपये केबल कैरिज फीस से के रूप में चला जाता है। बीस पचीस करोड़ रुपये मार्केटिंग में और कांटेंट पर सबसे कम बीस करोड़ के करीब। यही वजह है कि कांटेंट सस्ता और चलताऊ होता जा रहा है। सारा पैसा मार्केट में दिखने के लिए खर्च हो जाता है। केबल आपरेटरों के डिजिटल होने से बहुत राहत मिलने की बात कही जा रही है। एक तो यह है कि आपका चैनल किसी भी नंबर पर आएगा, साफ सुथरा ही दिखेगा। धुंधला नहीं। तो पहले दस और पचीस को लेकर मार खत्म। इसके लिए बताया जा रहा है कि केबल जगत को तीस हज़ार करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। अब यह देखना होगा कि केबल जगत इस खर्चे की भरपाई कैसे करता है। उपभोक्ता से कितना वसूलता है। क्या अस्सी फीसदी उपभोक्ता इसके लिए तैयार होंगे? एक दलील यह भी दी जा रही है कि डिजिटल होने से केबल वाले चैनलों के स्पेस की मार्केंटिग खुद कर सकेंगे। जैसे अमुक चैनल के ब्रेक में पटना में अलग एडवरटीज़मेंट दिखेगा और लखनऊ में अलग। अभी तो केबल वाला यह करता है कि अमुक चैनल को हटा देता है। उससे जबरन ज्यादा पैसा मांगता है। उपभोक्ता कुछ नहीं कर सकता। उसे मजबूरन अपने पंसद का चैनल छोड़ उस नंबर पर दूसरा चैनल देखना पड़ता है।
यह एक ज़रूरी कदम है। वर्ना न्यूज़ चैनलों की आर्थिक हालत खराब होती जा रही है। न तो नए लोग आ रहे हैं न नया चैनल न नया प्रोग्राम जिसमें बहुत सारे प्रयोग हों। पर यह प्रक्रिया कैसे लागू होगी और कब तक लागू होगी इसे आप सिर्फ डेडलाइन देकर तय नहीं कर सकते। ज्यादातर केबल नेटवर्क राजनीतिक लोगों के हाथ में हैं। इसलिए जब हो जाए तभी ताली।
कोई न्यूज़ चैनल अगर सौ करोड़ रुपये खर्च करता है तो उसमें से पचास से साठ करोड़ रुपये केबल कैरिज फीस से के रूप में चला जाता है। बीस पचीस करोड़ रुपये मार्केटिंग में और कांटेंट पर सबसे कम बीस करोड़ के करीब। यही वजह है कि कांटेंट सस्ता और चलताऊ होता जा रहा है। सारा पैसा मार्केट में दिखने के लिए खर्च हो जाता है। केबल आपरेटरों के डिजिटल होने से बहुत राहत मिलने की बात कही जा रही है। एक तो यह है कि आपका चैनल किसी भी नंबर पर आएगा, साफ सुथरा ही दिखेगा। धुंधला नहीं। तो पहले दस और पचीस को लेकर मार खत्म। इसके लिए बताया जा रहा है कि केबल जगत को तीस हज़ार करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। अब यह देखना होगा कि केबल जगत इस खर्चे की भरपाई कैसे करता है। उपभोक्ता से कितना वसूलता है। क्या अस्सी फीसदी उपभोक्ता इसके लिए तैयार होंगे? एक दलील यह भी दी जा रही है कि डिजिटल होने से केबल वाले चैनलों के स्पेस की मार्केंटिग खुद कर सकेंगे। जैसे अमुक चैनल के ब्रेक में पटना में अलग एडवरटीज़मेंट दिखेगा और लखनऊ में अलग। अभी तो केबल वाला यह करता है कि अमुक चैनल को हटा देता है। उससे जबरन ज्यादा पैसा मांगता है। उपभोक्ता कुछ नहीं कर सकता। उसे मजबूरन अपने पंसद का चैनल छोड़ उस नंबर पर दूसरा चैनल देखना पड़ता है।
यह एक ज़रूरी कदम है। वर्ना न्यूज़ चैनलों की आर्थिक हालत खराब होती जा रही है। न तो नए लोग आ रहे हैं न नया चैनल न नया प्रोग्राम जिसमें बहुत सारे प्रयोग हों। पर यह प्रक्रिया कैसे लागू होगी और कब तक लागू होगी इसे आप सिर्फ डेडलाइन देकर तय नहीं कर सकते। ज्यादातर केबल नेटवर्क राजनीतिक लोगों के हाथ में हैं। इसलिए जब हो जाए तभी ताली।
PRESS RELEASE-RATING HAS BECOME MONTHLY.
September 8, 2011
FOR IMMEDIATE RELEASE
Re: Shifting of TAM Ratings for News Channels from Weekly to Monthly
New Delhi: September 8, 2011……The NBA Board, in its effort to improve news
broadcasting standards, has taken a decision to move from weekly to monthly ratings
for all national news and business channels in Hindi and English. News channels
being distinct from other genres, have a responsibility to inform and empower its
viewers with quality programming and dissemination of news rather than providing
content merely for garnering viewership. Coverage and reportage of news and
programmes cannot always be linked to popularity or audience measurement. News
broadcasting standards, the NBA Board believed, can only improve with time spent on
strategic planning and research rather than knee jerk reactions taken on a weekly
basis.
This initiative taken by the News Broadcasters Association (NBA) would not in any
way hamper the decision making of advertisers and advertising agencies. In the new
monthly dispensation, advertisers would continue to get access to data broken down to
a minute or a day-part or a specific programme in a manner similar to how data points
are currently accessed in the weekly format.
The NBA and TAM are in discussion on implementation of this initiative which is
being proposed to be introduced initially for a period of two years.
The changes are expected to be implemented from October, 2011. Eventually the
monthly format is expected to be implemented for regional news channels as well.
For further details on this initiative kindly send your queries by email to Mrs. Annie
Joseph, Secretary General, NBA at nba@nbanewdelhi.com.
Annie Joseph
Secretary General
FOR IMMEDIATE RELEASE
Re: Shifting of TAM Ratings for News Channels from Weekly to Monthly
New Delhi: September 8, 2011……The NBA Board, in its effort to improve news
broadcasting standards, has taken a decision to move from weekly to monthly ratings
for all national news and business channels in Hindi and English. News channels
being distinct from other genres, have a responsibility to inform and empower its
viewers with quality programming and dissemination of news rather than providing
content merely for garnering viewership. Coverage and reportage of news and
programmes cannot always be linked to popularity or audience measurement. News
broadcasting standards, the NBA Board believed, can only improve with time spent on
strategic planning and research rather than knee jerk reactions taken on a weekly
basis.
This initiative taken by the News Broadcasters Association (NBA) would not in any
way hamper the decision making of advertisers and advertising agencies. In the new
monthly dispensation, advertisers would continue to get access to data broken down to
a minute or a day-part or a specific programme in a manner similar to how data points
are currently accessed in the weekly format.
The NBA and TAM are in discussion on implementation of this initiative which is
being proposed to be introduced initially for a period of two years.
The changes are expected to be implemented from October, 2011. Eventually the
monthly format is expected to be implemented for regional news channels as well.
For further details on this initiative kindly send your queries by email to Mrs. Annie
Joseph, Secretary General, NBA at nba@nbanewdelhi.com.
Annie Joseph
Secretary General
बोलती बंद कर देती है बोल।
मारना जुर्म है तो पैदा करना जुर्म क्यों नहीं है? बोल फिल्म का यह सवाल उठता तो एक मुल्क़,मज़हब विशेष में मगर हो जाता है कई मुल्क़ों,मज़हबों का। जिन्होंने शोएब मंसूर की खुदा के लिए देखी होगी वो इस फिल्म के ज़रिये निर्देशक के मन में चल रही कहानियों और बेचैनियों को महसूस कर सकते हैं। बोल में कथाओं का इतना संगम और टकराव है कि आप एक साथ कई तरह के समय और सवालों में उलझते चले जाते हैं। टेक्नॉलजी और एडिटिंग के दम पर यह फिल्म फिल्म नहीं बनती बल्कि अपनी कथाओं के सहारे फिल्म बनती चली जाती है। लाहौर की सड़कें,छतें और गलियों से निकलती कहानियां हिन्दुस्तान के सिनेमाघर में देखते हुए अपने शहरों की लगने लगती है। यह फिल्म एक हिन्दुस्तानी को जो पाकिस्तान कभी नहीं गया, उसके समाज से परिचय कराती है। वर्ना मीडिया से जो पाकिस्तान हमें विरासत में मिला है उसमें सिर्फ हुक्मरानों,फौजियों,आतंकवादियों,क्रिकेटरों,गायकों की तस्वीरें हैं। घर और समाज नहीं है। बोल पाकिस्तान को लेकर हमारी चुप्पी को भी तोड़ देती है। यह फिल्म सहजता से ऐसे मुश्किल सवालों को अपने मुल्क के सामाजिक परिवेश में उठा देती है जिसकी आवाज़ हमें किसी और चैनल से इस तरफ नहीं सुनाई पड़ती। सच कहूं तो पहली बार किसी फिल्म को देखकर लगा कि इधर के हों या उधर के,मसले दोनों के एक हैं।
कहानी में हिन्दुस्तान का बंटवारा है तो दिल्ली से आया हकीम साहब का ख़ानदान। आधुनिक डाक्टरी के दौर में हकीम का पेशा छूटता जा रहा है और परिवार की आबादी बढ़ती जा रही है। जल्दी ही यह फिल्म इस्लामिक समाज में औरतों के बग़ावत की बुनियाद डालने का काम करने लगती है। पितृसत्तात्मक समाज के वालिद बने हकीम साहब सुन्नत के ठेकेदार के रूप में बेबस नज़र आते हैं। उनकी हवेली और उनमें हर साल पैदा होने वाली लड़कियां। लड़कियों का बढ़ना और एक भाई के रूप में सैफ़ी का घर आना। कहानी अपने ग्रैड नैरेटिव को छोड़ कर एक ट्रांस जेंडर बच्चे की परवरिश और उसके प्रति बहनों और बाप के नज़रिये से टकराने लगती है। सैफी का प्रसंग बहुत रूलाता है। ज़ार-ज़ार कर देता है। लगता है छाती पीट पीट कर दहाड़ने लगे। निर्देशक अपना धीरज नहीं खोता। कोई फास्ट कट नहीं है। सैफी अपनी रफ्तार से बड़ा होता है। ज़ैनब के सहारे दुनिया को देखने की कोशिश में उन हरकतों का शिकार होता है जिसके शिकार हमारे घरों में बच्चे रिश्तेदारों के हाथ होते रहे हैं। हिजड़ों की नज़र से बचाकर बहनों का उसे मर्द बनाना और मर्द न होने पर अपने बाप हकीम साहब से बचाना कहानी का ऐसा मोड़ है तो कलेजा फाड़ देता है। सैफी के साथ बलात्कार और फिर बाप के हाथों उसकी मौत। बलात्कार के बाद घर लौटना और उसकी मां का अपने बच्चे को गोद में लेकर रोना, निर्देशक मंसूर अपने दिलेर कैमरे से देखनेवालों की आंखों में आंखें मिलाकर पूछने लगता है। सैफ़ी को उसका बाप मार देता है और कहानी अपनी ग्रैंड नैरेटिव पर लौट आती है। बल्कि कहानियां ऐसी बुनी गईं कि कोई भी कहानी कभी भी किसी को नहीं छोड़ती। सब उलझती-सुलझती चलती हैं।
हकीम साहब की बेटियां बड़ी हो रही हैं। बेटियां मां के प्रति हमदर्द होने लगती हैं। उनमें साहस पैदा हो रहा है ज़ैनब के ज़रिये। दुनिया को औरतों की नज़र से देखने और बनाने का। हकीम साहब अहले सुन्नत के दरवाज़े पर खड़े वो पहरेदार हैं जिनकी दाढ़ी उस वक्त खिजाब से रंग जाती है जब वो हत्या के जुर्म से बचने के लिए कंजर समुदाय के हाथों बिक जाते हैं। मस्जिक की रकम चुकाने के लिए कंजर जाति की मीना से निकाह करते हैं। साथ ही साथ अपनी बेटी को पड़ोसी दोस्त के बेटे के हाथ देने से मना कर देते हैं क्योंकि वो शिया हैं। कहानी मज़हब का इम्तहान लेती है। बेटियां दुनियादारी के सवालों से मज़हबी ढकोसलनेपन को चुनौती देने लगती हैं। हकीम साहब बेटियां पैदा करने की मशीन बने मीना के साथ रात गुज़ारने लगते हैं। अहले सुन्नत की चौकीदारी छोड़ कंजरों के बच्चों को कुरान पढ़ाने लगते हैं। मगर उनके लिए अपना घर और बेटियां वो आखिरी मोर्चा हैं जिसकी सरहद पर खड़े होकर वो अपने पितृसत्तात्मक अहं की हिफ़ाज़त करने में जुटे रह जाते हैं। तब तक जब एक रात मीना अपनी बेटी उनकी चौखट पर नहीं छो़ड़ जाती है। घर में कोहराम मचता है और हकीम के भीतर का मज़हबी मर्द फिर वहशी होता है और वो एक तवायफ़ बीबी से पैदा हुई बेटी का गला घोंटने लगते हैं। ज़ैनब इस बार अपनी बेबसी तोड़ देती है और बाप को मार देती है। बेटियां यहां अपनी ज़ात के सवालों को नहीं छोड़तीं। वो बाप के क़त्ल के बीच मीना की उस बेटी को भी बचा लेती हैं जिसके होने की बात सामने आने पर हकीम साहब के मौत का संदर्भ बनता है। फिल्म बहुत मज़बूती से औरतों के हक़ और सवालों पर टिकी रहती है।
यह एक ह्रदयविदारक प्रसंग है। फिल्म कई बार क्लाईमैक्स पर चढ़ती है और उतरती है। तभी तो हकीम साहब का क्रिकेट प्रेम भी सामने आता है और बेटियों के तेंदुलकर प्रेम और भारत की हार से गुस्सा होकर रेडियो भी तोड़ देते हैं। फिल्म शुरू होती है जेल के दृश्य से। ज़ैनब अपनी बहनों के बुर्के को उखाड़ फेंकती है। कहती है अभी से फेंको इनको। फिर मां और बहनों से घिर कर रोने लगती है। फांसी के तख्ते तक ले जाए जाने से पहले का यह दृश्य साफ कर देता है कि इस फिल्म की दुनिया में औरतों ने एक दूसरे को नहीं छोड़ा है। ये औरतें सतायी हुई वो जमात है जो अपने घर में,अपने बाप से लड़ने का साहस हासिल करती हुईं मज़हबी दकियानूसी ख़्यालातों से लोहा लेती हैं। जवान और अनपढ़ लड़कियां अपनी दुनिया रचने की छोटी-छोटी कोशिशें करती रहती हैं। शुरू से लेकर अंत के पहले तक यह फिल्म हकीकत के सौ फीसदी करीब है। आखिरी पांच मिनट में सिनेमाई क्लपनालोक की तरह कामायाबी का मंज़र बनाना इसकी मजबूरी बन जाती है। बल्कि मंसूर बहुत सलीके से हर दर्दनाक हकीकत के क्लाईमैक्स पर पहुंचते ही कहानी में हल्के प्रसंग ले आते हैं ताकि आप एक साथ इस्लाम, समाज और मुल्क के कई सवालों से टकराते रहे हैं और भावुक होकर ज़िंदगी और मज़हब की जंग को देखते रहे। तभी यह फिल्म सिर्फ पाकिस्तान की नहीं रह जाती। हिन्दुस्तान की भी हो जाती है। हमारे समाजों में ग़रीबी और आबादी एक मज़हब का मसला नहीं है। सभी का है। यह फिल्म एक दिलेर फिल्म है बल्कि इतनी दिलेर की बोलती बंद कर देती है। देखने के लिए टिकट का पैसा नहीं बल्कि मज़बूत कलेजा चाहिए।
कहानी में हिन्दुस्तान का बंटवारा है तो दिल्ली से आया हकीम साहब का ख़ानदान। आधुनिक डाक्टरी के दौर में हकीम का पेशा छूटता जा रहा है और परिवार की आबादी बढ़ती जा रही है। जल्दी ही यह फिल्म इस्लामिक समाज में औरतों के बग़ावत की बुनियाद डालने का काम करने लगती है। पितृसत्तात्मक समाज के वालिद बने हकीम साहब सुन्नत के ठेकेदार के रूप में बेबस नज़र आते हैं। उनकी हवेली और उनमें हर साल पैदा होने वाली लड़कियां। लड़कियों का बढ़ना और एक भाई के रूप में सैफ़ी का घर आना। कहानी अपने ग्रैड नैरेटिव को छोड़ कर एक ट्रांस जेंडर बच्चे की परवरिश और उसके प्रति बहनों और बाप के नज़रिये से टकराने लगती है। सैफी का प्रसंग बहुत रूलाता है। ज़ार-ज़ार कर देता है। लगता है छाती पीट पीट कर दहाड़ने लगे। निर्देशक अपना धीरज नहीं खोता। कोई फास्ट कट नहीं है। सैफी अपनी रफ्तार से बड़ा होता है। ज़ैनब के सहारे दुनिया को देखने की कोशिश में उन हरकतों का शिकार होता है जिसके शिकार हमारे घरों में बच्चे रिश्तेदारों के हाथ होते रहे हैं। हिजड़ों की नज़र से बचाकर बहनों का उसे मर्द बनाना और मर्द न होने पर अपने बाप हकीम साहब से बचाना कहानी का ऐसा मोड़ है तो कलेजा फाड़ देता है। सैफी के साथ बलात्कार और फिर बाप के हाथों उसकी मौत। बलात्कार के बाद घर लौटना और उसकी मां का अपने बच्चे को गोद में लेकर रोना, निर्देशक मंसूर अपने दिलेर कैमरे से देखनेवालों की आंखों में आंखें मिलाकर पूछने लगता है। सैफ़ी को उसका बाप मार देता है और कहानी अपनी ग्रैंड नैरेटिव पर लौट आती है। बल्कि कहानियां ऐसी बुनी गईं कि कोई भी कहानी कभी भी किसी को नहीं छोड़ती। सब उलझती-सुलझती चलती हैं।
हकीम साहब की बेटियां बड़ी हो रही हैं। बेटियां मां के प्रति हमदर्द होने लगती हैं। उनमें साहस पैदा हो रहा है ज़ैनब के ज़रिये। दुनिया को औरतों की नज़र से देखने और बनाने का। हकीम साहब अहले सुन्नत के दरवाज़े पर खड़े वो पहरेदार हैं जिनकी दाढ़ी उस वक्त खिजाब से रंग जाती है जब वो हत्या के जुर्म से बचने के लिए कंजर समुदाय के हाथों बिक जाते हैं। मस्जिक की रकम चुकाने के लिए कंजर जाति की मीना से निकाह करते हैं। साथ ही साथ अपनी बेटी को पड़ोसी दोस्त के बेटे के हाथ देने से मना कर देते हैं क्योंकि वो शिया हैं। कहानी मज़हब का इम्तहान लेती है। बेटियां दुनियादारी के सवालों से मज़हबी ढकोसलनेपन को चुनौती देने लगती हैं। हकीम साहब बेटियां पैदा करने की मशीन बने मीना के साथ रात गुज़ारने लगते हैं। अहले सुन्नत की चौकीदारी छोड़ कंजरों के बच्चों को कुरान पढ़ाने लगते हैं। मगर उनके लिए अपना घर और बेटियां वो आखिरी मोर्चा हैं जिसकी सरहद पर खड़े होकर वो अपने पितृसत्तात्मक अहं की हिफ़ाज़त करने में जुटे रह जाते हैं। तब तक जब एक रात मीना अपनी बेटी उनकी चौखट पर नहीं छो़ड़ जाती है। घर में कोहराम मचता है और हकीम के भीतर का मज़हबी मर्द फिर वहशी होता है और वो एक तवायफ़ बीबी से पैदा हुई बेटी का गला घोंटने लगते हैं। ज़ैनब इस बार अपनी बेबसी तोड़ देती है और बाप को मार देती है। बेटियां यहां अपनी ज़ात के सवालों को नहीं छोड़तीं। वो बाप के क़त्ल के बीच मीना की उस बेटी को भी बचा लेती हैं जिसके होने की बात सामने आने पर हकीम साहब के मौत का संदर्भ बनता है। फिल्म बहुत मज़बूती से औरतों के हक़ और सवालों पर टिकी रहती है।
यह एक ह्रदयविदारक प्रसंग है। फिल्म कई बार क्लाईमैक्स पर चढ़ती है और उतरती है। तभी तो हकीम साहब का क्रिकेट प्रेम भी सामने आता है और बेटियों के तेंदुलकर प्रेम और भारत की हार से गुस्सा होकर रेडियो भी तोड़ देते हैं। फिल्म शुरू होती है जेल के दृश्य से। ज़ैनब अपनी बहनों के बुर्के को उखाड़ फेंकती है। कहती है अभी से फेंको इनको। फिर मां और बहनों से घिर कर रोने लगती है। फांसी के तख्ते तक ले जाए जाने से पहले का यह दृश्य साफ कर देता है कि इस फिल्म की दुनिया में औरतों ने एक दूसरे को नहीं छोड़ा है। ये औरतें सतायी हुई वो जमात है जो अपने घर में,अपने बाप से लड़ने का साहस हासिल करती हुईं मज़हबी दकियानूसी ख़्यालातों से लोहा लेती हैं। जवान और अनपढ़ लड़कियां अपनी दुनिया रचने की छोटी-छोटी कोशिशें करती रहती हैं। शुरू से लेकर अंत के पहले तक यह फिल्म हकीकत के सौ फीसदी करीब है। आखिरी पांच मिनट में सिनेमाई क्लपनालोक की तरह कामायाबी का मंज़र बनाना इसकी मजबूरी बन जाती है। बल्कि मंसूर बहुत सलीके से हर दर्दनाक हकीकत के क्लाईमैक्स पर पहुंचते ही कहानी में हल्के प्रसंग ले आते हैं ताकि आप एक साथ इस्लाम, समाज और मुल्क के कई सवालों से टकराते रहे हैं और भावुक होकर ज़िंदगी और मज़हब की जंग को देखते रहे। तभी यह फिल्म सिर्फ पाकिस्तान की नहीं रह जाती। हिन्दुस्तान की भी हो जाती है। हमारे समाजों में ग़रीबी और आबादी एक मज़हब का मसला नहीं है। सभी का है। यह फिल्म एक दिलेर फिल्म है बल्कि इतनी दिलेर की बोलती बंद कर देती है। देखने के लिए टिकट का पैसा नहीं बल्कि मज़बूत कलेजा चाहिए।
आओ आंदोलन आंदोलन खेलें
दोनों लड़कियों ने खुद को एक दूसरे से जकड़ लिया और हवा में हाथ उठाकर कैमरे के क्लिक होने का इंतज़ार करती रहीं। दोस्तों ने क्लिक किया और फिर कैमरा लड़कियों के हाथ में और लड़कों के हाथ इंकलाब की मुद्रा में लहराते हुए। रामलीला मैदान से लौटते दोस्तों की टोलियों में एक आंदोलन से लौटने का इतना उत्साह कभी नहीं देखा। भले ही ये तस्वीरें उनके लिए सर्टिफिकेट कोर्स की तरह प्रमाण बन जायेंगी लेकिन 74 साल के एक बूढ़े के प्रति नौजवानों का उत्साह और समर्थन सिर्फ तस्वीरें खींचाने तक ही सीमित नहीं था। वर्ना वो कई महीनों और कई दिनों तक अण्णा आंदोलन से जुड़े नहीं रहते।
अब एक दूसरी तस्वीर देखिये। 2009 का लोकसभा चुनाव। पंद्रहवी लोकसभा को अब तक का सबसे युवा लोकसभा करार दिया जाता है। हिन्दुस्तान की आबादी के तरुण होने की कितनी बातें लिखी जाती हैं,बोली जाती हैं। पत्रिकाओं के कवर में उच्चवर्गीय राजनीतिक परिवारों के वारिस सांसद बन कर युवाओं के भावी प्रतिनिधि के रूप में चमकने लगते हैं। अंग्रेज़ी के एक अखबार में तो नियमित कालम ही शुरू हो जाता है कि युवा सांसदों की दिनचर्या कैसे बीत रही है। कई पत्रिकाओं में उनके फैशन,शौक और गुड लुकिंग का राज पूछा और लिखा जाने लगता है। 66 सांसद ऐसे चुन कर आते हैं जिनकी उम्र 25 से 40 साल के बीच है। 41-50 साल के बीच की उम्र के सांसदों की संख्या १५० हो जाती है और लोकसभा के सांसदों की औसत उम्र 54.5 साल हो जाती है। मीडिया इन युवा सांसदों को चमक दमक के चश्में से देखने लगा।
लेकिन रामलीला मैदान से लेकर देश के तमाम शहरों और गांवों में क्या हुआ? छह महीने तक चले इस आंदोलन में कोई युवा सांसद नज़र नहीं आया। इन युवा सांसदों के आने से जिस राजनीति को नया और तरोताजा बताया जाने लगा वो पहली रोटी की तरह छिप कर कैसरोल के डिब्बे में बासी होने लगे। इनमें से किसी युवा सांसद ने अण्णा हज़ारे के पीछे जुटे युवाओं से संवाद कायम करने की कोशिश नहीं की। मेरे एक मित्र ने दक्षिण दिल्ली के कमला नेहरू कालेज से गुज़रते वक्त बड़ी संख्या में लड़कियों का एक वीडियो बनाया। जिसमें ये लड़कियां चिल्ला रही थीं कि कहां हैं राहुल गांधी। वो अब अपने युवा राहुल गांधी को खोज रही थीं जिनके स्टीवंस कालेज में जाने पर लड़कियों ने आई लव यू राहुल गांधी कहा था। राहुल गांधी भले ही पारिवारिक कारणों से चुप रह गए हों मगर तमाम युवा सांसदों को चुप्पी ने बता दिया कि सांसदों के युवा होने से राजनीति में साहस का नया संचार नहीं हो जाता। युवा सांसद तभी आगे आए जब राहुल गांधी लोकसभा में आकर बोल गए। उसके बाद टीवी चैनलों पर बोलने के लिए कांग्रेस के युवा सांसदों की भरमार हो गई। यानी राजनीति में कुछ नहीं बदला। जब सबको पार्टी लाइन पर ही चलना है तो सांसद के युवा या बुजुर्ग होने से क्या फर्क पड़ता है। एक तरह से देखें तो युवा सांसदों और नेताओं ने युवाओं की इस बेचैनी की आवाज़ बनने से इंकार कर दिया।
उधर अण्णा हज़ारे के पीछे जमा युवाओं की भीड़ को समझने में जानकारों ने भी चूक कर दी। फेसबुक,ट्विटर और मोबाइल से लैस ये युवा उस भारत के नागरिक हैं जो इनके बीच खुद की मार्केटिंग विश्व शक्ति के रूप में करता रहा है। इन युवाओं के जीवन की रफ्तार और धीरज की गति में काफी फर्क है। वो प्रायोजित तरीके से विश्व शक्ति के रूप में प्रचारित किये जा रहे भारत की जड़ता को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। वो जीवन के कई क्षेत्रों मे दीवारें गिरा रहे हैं। राजीनीति की दीवार उनके लिए बाद में आकर खड़ी हुई है। जब सामने आई तो युवाओं ने चुनौती दी। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में भी युवा आगे आए। इन युवाओं ने मीडिया और समाज की बनी बनाई छवि को तोड़ दिया। बड़ी संख्या में लड़के और लड़कियों ने घरों से निकल कर यह साबित कर दिया कि वो सिर्फ अपनी ज़िंदगी में ही नहीं जी रहे थे। जिन युवाओं के लिए हकीकत से काट कर फिल्में तक बनने लगीं, उन युवाओं ने देश की कुछ हकीकत से लड़ने का फैसला किया।
इसीलिए रामलीला ग्राउंड से लेकर तमाम जगहों पर हर धर्म और हर जाति के युवाओं की तादाद दिखी। उनकी एक राजनीतिक ट्रेनिंग का माहौल बना। यह सवाल भी उठा कि क्या यह सवर्णवादी युवा है जो देश की विषमता को नहीं समझता और आरक्षण का विरोध करता है। क्या यह वो युवा है जो सांप्रदायिक शक्तियों द्वारा प्रायोजित आंदोलन में बिना किसी राजनीतिक समझ के उतर गया है? लोग यह भूल गए कि यह वही युवा है जिसने २००४ और २००९ में दो बार सांप्रदायिक शक्तियों को खारिज किया है। यह वो युवा है जो राजनीति के बनाए इन पूर्वाग्रहों को समझने लगा है मगर पूरी तरह से समझ रहा है इसके प्रमाण और ढूंढे जाने बाकी है। आखिर भ्रष्टाचार के विरोध में नारे लगाते लगाते भले ही कुछ लोगों ने आरक्षण के विरोध का नारा लगाया वो अन्य जातियों में पर्याप्त रूप से शंका पैदा कर सकता है। लेकिन इसके बाद भी इस आंदोलन में जाति और धर्म के हिसाब से युवाओं की विविधता की भागीदारी उल्लेखनीय रही। न सिर्फ भागीदारी के स्तर पर बल्कि आंदोलन को तैयार करने और जारी रखने के स्तर पर। इसके लिए इन युवाओं ने किसी फैशनपरस्त और गुडलुकिंग युवा सांसद को भ्रष्टाचार की लड़ाई का प्रतीक नहीं बनाया। बल्कि अपने घर के पिछवाड़े में धकेल दिये गए बुज़ुर्गों में से एक को ढूंढ लाए और उनमें उन्हीं नैतिक मान्यताओं की खोज की जो हमारी राजनीति का आधार रहे हैं। १९७४ में भी युवाओं ने जयप्रकाश नारायण को खोजा था। वो ढूंढ लाए थे पटना में बीमारी से लड़ रहे जयप्रकाश नारायण को। इस बार ढूंढ लाए रालेगण सिद्धी गांव में बैठे अण्णा हज़ारे को।
लेकिन सवाल यहां एक और है जिसपर आंदोलन से लौट कर युवाओं को सोचना होगा। भाषण और नारेबाज़ी के बीच के फर्क का। बेचैनियों को आवाज़ देने के उतावलेपन में सहनशीलता को छोड़ देने के ख़तरे का। सांप्रदायिकता के प्रति सचेत रहने का होश गंवा देने के खतरा का। एक आंदोलन तभी कामयाब माना जाता है जब ऐसी आशंकाएं हाशिये पर ही खत्म हो जाएं,मुख्यधारा में न आएं। वसीम बरेलवी का एक शेर है। उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है,जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है, नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये,कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है। युवाओं की भागीदारी ने राजनीति को समृद्ध बनाया है मगर इस डर को उन्हें ही ग़लत साबित करना होगा कि उनकी भागीदारी से चलने वाले आंदोलन आगे किसी मोड़ पर संकुचित नहीं होंगे।
(आज के राजस्थान पत्रिका में छपा है)
अब एक दूसरी तस्वीर देखिये। 2009 का लोकसभा चुनाव। पंद्रहवी लोकसभा को अब तक का सबसे युवा लोकसभा करार दिया जाता है। हिन्दुस्तान की आबादी के तरुण होने की कितनी बातें लिखी जाती हैं,बोली जाती हैं। पत्रिकाओं के कवर में उच्चवर्गीय राजनीतिक परिवारों के वारिस सांसद बन कर युवाओं के भावी प्रतिनिधि के रूप में चमकने लगते हैं। अंग्रेज़ी के एक अखबार में तो नियमित कालम ही शुरू हो जाता है कि युवा सांसदों की दिनचर्या कैसे बीत रही है। कई पत्रिकाओं में उनके फैशन,शौक और गुड लुकिंग का राज पूछा और लिखा जाने लगता है। 66 सांसद ऐसे चुन कर आते हैं जिनकी उम्र 25 से 40 साल के बीच है। 41-50 साल के बीच की उम्र के सांसदों की संख्या १५० हो जाती है और लोकसभा के सांसदों की औसत उम्र 54.5 साल हो जाती है। मीडिया इन युवा सांसदों को चमक दमक के चश्में से देखने लगा।
लेकिन रामलीला मैदान से लेकर देश के तमाम शहरों और गांवों में क्या हुआ? छह महीने तक चले इस आंदोलन में कोई युवा सांसद नज़र नहीं आया। इन युवा सांसदों के आने से जिस राजनीति को नया और तरोताजा बताया जाने लगा वो पहली रोटी की तरह छिप कर कैसरोल के डिब्बे में बासी होने लगे। इनमें से किसी युवा सांसद ने अण्णा हज़ारे के पीछे जुटे युवाओं से संवाद कायम करने की कोशिश नहीं की। मेरे एक मित्र ने दक्षिण दिल्ली के कमला नेहरू कालेज से गुज़रते वक्त बड़ी संख्या में लड़कियों का एक वीडियो बनाया। जिसमें ये लड़कियां चिल्ला रही थीं कि कहां हैं राहुल गांधी। वो अब अपने युवा राहुल गांधी को खोज रही थीं जिनके स्टीवंस कालेज में जाने पर लड़कियों ने आई लव यू राहुल गांधी कहा था। राहुल गांधी भले ही पारिवारिक कारणों से चुप रह गए हों मगर तमाम युवा सांसदों को चुप्पी ने बता दिया कि सांसदों के युवा होने से राजनीति में साहस का नया संचार नहीं हो जाता। युवा सांसद तभी आगे आए जब राहुल गांधी लोकसभा में आकर बोल गए। उसके बाद टीवी चैनलों पर बोलने के लिए कांग्रेस के युवा सांसदों की भरमार हो गई। यानी राजनीति में कुछ नहीं बदला। जब सबको पार्टी लाइन पर ही चलना है तो सांसद के युवा या बुजुर्ग होने से क्या फर्क पड़ता है। एक तरह से देखें तो युवा सांसदों और नेताओं ने युवाओं की इस बेचैनी की आवाज़ बनने से इंकार कर दिया।
उधर अण्णा हज़ारे के पीछे जमा युवाओं की भीड़ को समझने में जानकारों ने भी चूक कर दी। फेसबुक,ट्विटर और मोबाइल से लैस ये युवा उस भारत के नागरिक हैं जो इनके बीच खुद की मार्केटिंग विश्व शक्ति के रूप में करता रहा है। इन युवाओं के जीवन की रफ्तार और धीरज की गति में काफी फर्क है। वो प्रायोजित तरीके से विश्व शक्ति के रूप में प्रचारित किये जा रहे भारत की जड़ता को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। वो जीवन के कई क्षेत्रों मे दीवारें गिरा रहे हैं। राजीनीति की दीवार उनके लिए बाद में आकर खड़ी हुई है। जब सामने आई तो युवाओं ने चुनौती दी। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में भी युवा आगे आए। इन युवाओं ने मीडिया और समाज की बनी बनाई छवि को तोड़ दिया। बड़ी संख्या में लड़के और लड़कियों ने घरों से निकल कर यह साबित कर दिया कि वो सिर्फ अपनी ज़िंदगी में ही नहीं जी रहे थे। जिन युवाओं के लिए हकीकत से काट कर फिल्में तक बनने लगीं, उन युवाओं ने देश की कुछ हकीकत से लड़ने का फैसला किया।
इसीलिए रामलीला ग्राउंड से लेकर तमाम जगहों पर हर धर्म और हर जाति के युवाओं की तादाद दिखी। उनकी एक राजनीतिक ट्रेनिंग का माहौल बना। यह सवाल भी उठा कि क्या यह सवर्णवादी युवा है जो देश की विषमता को नहीं समझता और आरक्षण का विरोध करता है। क्या यह वो युवा है जो सांप्रदायिक शक्तियों द्वारा प्रायोजित आंदोलन में बिना किसी राजनीतिक समझ के उतर गया है? लोग यह भूल गए कि यह वही युवा है जिसने २००४ और २००९ में दो बार सांप्रदायिक शक्तियों को खारिज किया है। यह वो युवा है जो राजनीति के बनाए इन पूर्वाग्रहों को समझने लगा है मगर पूरी तरह से समझ रहा है इसके प्रमाण और ढूंढे जाने बाकी है। आखिर भ्रष्टाचार के विरोध में नारे लगाते लगाते भले ही कुछ लोगों ने आरक्षण के विरोध का नारा लगाया वो अन्य जातियों में पर्याप्त रूप से शंका पैदा कर सकता है। लेकिन इसके बाद भी इस आंदोलन में जाति और धर्म के हिसाब से युवाओं की विविधता की भागीदारी उल्लेखनीय रही। न सिर्फ भागीदारी के स्तर पर बल्कि आंदोलन को तैयार करने और जारी रखने के स्तर पर। इसके लिए इन युवाओं ने किसी फैशनपरस्त और गुडलुकिंग युवा सांसद को भ्रष्टाचार की लड़ाई का प्रतीक नहीं बनाया। बल्कि अपने घर के पिछवाड़े में धकेल दिये गए बुज़ुर्गों में से एक को ढूंढ लाए और उनमें उन्हीं नैतिक मान्यताओं की खोज की जो हमारी राजनीति का आधार रहे हैं। १९७४ में भी युवाओं ने जयप्रकाश नारायण को खोजा था। वो ढूंढ लाए थे पटना में बीमारी से लड़ रहे जयप्रकाश नारायण को। इस बार ढूंढ लाए रालेगण सिद्धी गांव में बैठे अण्णा हज़ारे को।
लेकिन सवाल यहां एक और है जिसपर आंदोलन से लौट कर युवाओं को सोचना होगा। भाषण और नारेबाज़ी के बीच के फर्क का। बेचैनियों को आवाज़ देने के उतावलेपन में सहनशीलता को छोड़ देने के ख़तरे का। सांप्रदायिकता के प्रति सचेत रहने का होश गंवा देने के खतरा का। एक आंदोलन तभी कामयाब माना जाता है जब ऐसी आशंकाएं हाशिये पर ही खत्म हो जाएं,मुख्यधारा में न आएं। वसीम बरेलवी का एक शेर है। उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है,जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है, नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये,कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है। युवाओं की भागीदारी ने राजनीति को समृद्ध बनाया है मगर इस डर को उन्हें ही ग़लत साबित करना होगा कि उनकी भागीदारी से चलने वाले आंदोलन आगे किसी मोड़ पर संकुचित नहीं होंगे।
(आज के राजस्थान पत्रिका में छपा है)
आंदोलन चालू आहे
क्या आप भी अण्णा के आंदोलन का समर्थन करते-करते कई तरह के सवाल करने लगते हैं, या विरोध करते-करते तमाम सवालों की खोज करने लगते हैं। अगर ऐसा है तो आप उन लोगों में से हैं जिनकी बौद्धिकता को इस आंदोलन ने हिला कर रख दिया है। पांच अप्रैल को जबसे अण्णा का अनशन शुरू हुआ है तब से इस आंदोलन के तमाम पक्षों पर लगातार लिखा और बोला जा रहा है। देश की समस्याओं से जुड़े तमाम सवाल इस आंदोलन में ठेले जा रहे हैं जो कि चिन्ता के कई स्तरों पर जायज़ भी हैं। संभावनाओं की खोज करने वाली तमाम दलीलों को देखें तो आप उत्साहित हो जायेंगे। अकेले दैनिक भास्कर में ही अण्णा के आंदोलन पर छपे तमाम लेखों की एक किताब छाप दी जाए तो कई सौ पन्नों की हो जाएगी।
मेरी नज़र में अण्णा के आंदोलन का यह सबसे बड़ा योगदान है। लोग हर सवाल पर बहस कर रहे हैं।मेरे टीवी शो में दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने कह दिया कि इस आंदोलन में दलित नहीं हैं। सवर्णवादी आंदोलन है। प्राइम टाइम से बाहर आते ही तमाम दलित अफसरों के फोन आने लगे और कहने लगे कि चंद्रभान हमें मुख्यधारा से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं। चंद्रभान अपनी बात पर डटे रहे। मशहूर विद्वान आशीष नंदी ने तड़ से कहा कि मध्यमवर्ग का चरित्र बदल गया है। यह वो सत्तर के दशक वाला मध्यमवर्ग नहीं है जिसमें नब्बे फीसदी सवर्ण थे। आज के मध्यमवर्ग में पचास फीसदी दूसरी जाति समाज के भी लोग हैं। फिर यह सवाल उठा कि इसमें मुसलमान नहीं हैं। रविवार को जब दिल्ली के सीलमपुर और शाहदरा इलाके से गुज़र रहा था तब एक-एक गाड़ी में कई मुस्लिम युवा भरे हुए थे और हाथों में तिरंगा लेकर रामलीला की तरफ रवाना हो रहे थे। आयोजकों से बात की कि क्या आपके यहां दलित और मुस्लिम युवा सक्रिय नहीं हैं तो उन्होंने कई लोगों को सामने कर दिया। संतोष एक दलित लड़की थी जो छत्रसाल स्टेडियम में टीम अण्णा की तरफ से मोर्चा संभाले हुए थी। उसे बड़ा दुख हुआ कि दलित की पहचान कर सवाल किया गया। उसने कहा कि कई दलित युवा इस आंदोलन में शामिल हैं। फिर भी चंद्रभान के इस सवाल के साहस को मानना होगा जिसने इस आंदोलन को संविधान बदलने या लिखने की कोशिश में देखा और दलित राजनीति से जुड़े सवालों के संदर्भ में।
लेकिन क्या यह बेचैनी इसलिए भी नहीं कि इसके मंच पर दलित या मुस्लिम राजनीति के नेतृत्व के जाने-पहचाने चेहरे नहीं हैं। नेताओं के वो जाने-पहचाने समर्थक नहीं हैं जो उनके एक इशारे पर भारत की धार्मिक विभिन्नता का प्रदर्शन करते हुए मंच पर आ जाते थे। जैसे ही इस सवाल से गुज़र रहा था तो अंग्रेजी के अख़बार के एक ख़बर पर नज़र गई कि आधी रात के बाद रामलीला मैदान में आरक्षण विरोधी नारे भी लग रहे थे। संघ के समर्थन की ख़बरें छप रही हैं। जबकि अण्णा कह रहे हैं कि एक पार्टी जायेगी तो जो दूसरी आएगी वो भी भ्रष्टाचार में पीएचडी होगी। इसके बाद भी ऐसे तत्वों का आंदोलन में घुसना पुराने सवालों की गुज़ाइश की जगह बना ही देता है। वैसे आप देश भर से आ रही तस्वीरों को देखें तो उसमें काफी विविधता है। शायद इसीलिए हमें इस आंदोलन पर तुरंत किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तमाम सवालों और संभावनाओं के साथ लगातार नज़र रखनी चाहिए।
मध्यमवर्ग की बुनावट पर बहस होते होते इसके गांधीवादी चरित्र पर बात पहुंचती है तो आज़ादी के आंदोलन से जुड़े बहुत सारे किस्से और आख्यान मुख्यधारा की मीडिया से होते हुए जनमानस में पहुंचने लगते हैं। गांधी टोपी कैसे अण्णा टोपी का रूप धर कर यह बता रही है कि आज के समय में गांधी के प्रतीकों का नवीनीकरण भी हो सकता है। कुछ साल पहले आई जब फिल्म मुन्ना भाई आई तो उसके आस-पास के समय में मुन्ना भाई की गांधीगीरी को लोगों ने अपना लिया था। अब वे अण्णा की गांधीगीरी अपना रहे हैं। गांधी अब सिर्फ खादी वालों की बपौती नहीं हैं। रैली में आए लाखों लोगों ने अहिंसक तरीका अपना कर साबित कर दिया। लेकिन इस अहिंसा में अनशन की ज़िद पर जो सवाल खड़े हो रहे हैं वो भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। आजकल के अखबारों में आप देखिये। अनशन की ज़िद पर खूब लेख मिलेंगे। ये लोग तब नहीं लिख रहे थे जब सरकार नौ अप्रैल के बाद बनी ड्राफ्ट कमेटी की बैठकों में इस टीम की साख को कमतर करने में जुटी थी। जब सत्ता अपने अहंकार में टीम अण्णा को पांच लोगों की टीम समझ रही थी। कहां तो सरकार इस पूरे मामलों को लोकतांत्रिक बनाती और विपक्ष सहित अरुणा रॉय के लोकपाल ड्राफ्ट को भी केंद्र में ले आती। लेकिन उनकी टीम के सदस्य निखिल डे ने बताया कि ड्राफ्ट कमेटी को लिखने के बाद भी बुलावा नहीं आया। तब सरकार को सहनशीलता के पाठ पढ़ाने वाले लेख नहीं लिखे जा रहे थे। फिर भी यह सवाल वाजिब है कि इस तरह की ज़िद पर अड़ा आंदोलन आगे आने वाले समय में किस तरह की राजनीति की बुनियाद रखने वाला है।
इसमें एक दिलचस्प बात यह भी है कि इसमें बड़ी संख्या में सरकारी अफसरों को उद्वेलित कर दिया है। वो भी भ्रष्टाचार के सवाल से टकरा रहे हैं। नेताओं की ही नहीं अफसरों की भी साख दांव पर हैं। ऐसा माहौल बना है जिसमें उन्हें वाकई सार्वजनिक या पारिवारिक जीवन में जाने पर सवालों का सामना करना पड़ता होगा। कई अफसर एसएमएस कर रहे हैं कि उस भ्रष्टाचार का क्या होगा जो पैंतीस करोड़ की कोठियों में रहता है मगर एक्साईज़ से लेकर इंकम टैक्स नहीं देता। क्या हम सभी चोर हैं? इसीलिए लगता है कि यह आंदोलन सामाजिक जीवन में भी भ्रष्ट लोगों के प्रति सहनशीलता को काफी कम करेगा। दीर्घकालिक रूप से न सही मगर अस्थायी कमी भी एक सकारात्मक माहौल तो पैदा करेगे ही। वर्ना मैंने भी देखा है कि मिडिल क्लास के लोग आराम से भ्रष्ट अफसर रिश्तेदारों की महंगी शादियों में शिरकत करते हैं।
जिस समाज को हम उदारीकरण के जश्न भरे माहौल में व्यक्तिवादी का तमगा पहनाकर लानतें भेज चुके थें, वो अचानक कैसे सामूहिक हो गई है। उसे क्यों यह सपना आ रहा है कि भारत को कैसा होना चाहिए। जो उदारीकरण की संताने भारत महान के झंडे को लेकर विदेशों में गईं हैं वो भी भारत महान की इस सबसे बड़ी बीमारी के खिलाफ सड़कों पर उतरी है। वही लोग जो कल तक यह कहा करते थे कि मीडिया में नकारात्मक ख़बरें दिखाने से विदेशों में भारत की छवि ख़राब होती है,आज वही लोग विदेशों में अण्णा के समर्थन में झंडा लेकर निकले हैं।
हम किसी आंदोलन को मिडिल क्लास बताकर खारिज नहीं कर सकते। हाल के दिनों में मुख्य राजनीतिक दलों के बड़े नेता कार्यकर्ता ढूंढ रहे थे। नए कार्यकर्ताओं की खोज में उनका लंबा वक्त भी गुज़रा है। आखिर ये कौन लोग हैं जो बिना किसी एक राजनीतिक नेतृत्व के इतने बड़े आंदोलन को संचालित कर रहे हैं। जब भी मिडिल क्लास का जनउभार सामने आया है यही कहा गया है कि यह भीड़ आज आई है, कल खो जाएगी। मुंबई धमाके के बाद लाखों लोगों की भीड़ आतंक के खिलाफ उमड़ पड़ी थी। वो गुम हो गई। उससे पहले दिल्ली के इंडिया गेट पर ऐसी ही कई भीड़ आकर चली गई। मगर यह समझना चाहिए कि ये वो भीड़ है जो बार-बार आ रही है। अप्रैल में भी आई थी और अगस्त में भी आ रही है। सिर्फ इस बात से निश्चिंत होने की ज़रूरत नहीं कि ये लोग जल्दी लौट कर गुम हो जाएंगे। तब क्या करेंगे जब फिर आ जाएंगे।
(इसका संपादित अंश आज दैनिक भास्कर में छपा है, भास्कर से साभार)
मेरी नज़र में अण्णा के आंदोलन का यह सबसे बड़ा योगदान है। लोग हर सवाल पर बहस कर रहे हैं।मेरे टीवी शो में दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने कह दिया कि इस आंदोलन में दलित नहीं हैं। सवर्णवादी आंदोलन है। प्राइम टाइम से बाहर आते ही तमाम दलित अफसरों के फोन आने लगे और कहने लगे कि चंद्रभान हमें मुख्यधारा से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं। चंद्रभान अपनी बात पर डटे रहे। मशहूर विद्वान आशीष नंदी ने तड़ से कहा कि मध्यमवर्ग का चरित्र बदल गया है। यह वो सत्तर के दशक वाला मध्यमवर्ग नहीं है जिसमें नब्बे फीसदी सवर्ण थे। आज के मध्यमवर्ग में पचास फीसदी दूसरी जाति समाज के भी लोग हैं। फिर यह सवाल उठा कि इसमें मुसलमान नहीं हैं। रविवार को जब दिल्ली के सीलमपुर और शाहदरा इलाके से गुज़र रहा था तब एक-एक गाड़ी में कई मुस्लिम युवा भरे हुए थे और हाथों में तिरंगा लेकर रामलीला की तरफ रवाना हो रहे थे। आयोजकों से बात की कि क्या आपके यहां दलित और मुस्लिम युवा सक्रिय नहीं हैं तो उन्होंने कई लोगों को सामने कर दिया। संतोष एक दलित लड़की थी जो छत्रसाल स्टेडियम में टीम अण्णा की तरफ से मोर्चा संभाले हुए थी। उसे बड़ा दुख हुआ कि दलित की पहचान कर सवाल किया गया। उसने कहा कि कई दलित युवा इस आंदोलन में शामिल हैं। फिर भी चंद्रभान के इस सवाल के साहस को मानना होगा जिसने इस आंदोलन को संविधान बदलने या लिखने की कोशिश में देखा और दलित राजनीति से जुड़े सवालों के संदर्भ में।
लेकिन क्या यह बेचैनी इसलिए भी नहीं कि इसके मंच पर दलित या मुस्लिम राजनीति के नेतृत्व के जाने-पहचाने चेहरे नहीं हैं। नेताओं के वो जाने-पहचाने समर्थक नहीं हैं जो उनके एक इशारे पर भारत की धार्मिक विभिन्नता का प्रदर्शन करते हुए मंच पर आ जाते थे। जैसे ही इस सवाल से गुज़र रहा था तो अंग्रेजी के अख़बार के एक ख़बर पर नज़र गई कि आधी रात के बाद रामलीला मैदान में आरक्षण विरोधी नारे भी लग रहे थे। संघ के समर्थन की ख़बरें छप रही हैं। जबकि अण्णा कह रहे हैं कि एक पार्टी जायेगी तो जो दूसरी आएगी वो भी भ्रष्टाचार में पीएचडी होगी। इसके बाद भी ऐसे तत्वों का आंदोलन में घुसना पुराने सवालों की गुज़ाइश की जगह बना ही देता है। वैसे आप देश भर से आ रही तस्वीरों को देखें तो उसमें काफी विविधता है। शायद इसीलिए हमें इस आंदोलन पर तुरंत किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तमाम सवालों और संभावनाओं के साथ लगातार नज़र रखनी चाहिए।
मध्यमवर्ग की बुनावट पर बहस होते होते इसके गांधीवादी चरित्र पर बात पहुंचती है तो आज़ादी के आंदोलन से जुड़े बहुत सारे किस्से और आख्यान मुख्यधारा की मीडिया से होते हुए जनमानस में पहुंचने लगते हैं। गांधी टोपी कैसे अण्णा टोपी का रूप धर कर यह बता रही है कि आज के समय में गांधी के प्रतीकों का नवीनीकरण भी हो सकता है। कुछ साल पहले आई जब फिल्म मुन्ना भाई आई तो उसके आस-पास के समय में मुन्ना भाई की गांधीगीरी को लोगों ने अपना लिया था। अब वे अण्णा की गांधीगीरी अपना रहे हैं। गांधी अब सिर्फ खादी वालों की बपौती नहीं हैं। रैली में आए लाखों लोगों ने अहिंसक तरीका अपना कर साबित कर दिया। लेकिन इस अहिंसा में अनशन की ज़िद पर जो सवाल खड़े हो रहे हैं वो भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। आजकल के अखबारों में आप देखिये। अनशन की ज़िद पर खूब लेख मिलेंगे। ये लोग तब नहीं लिख रहे थे जब सरकार नौ अप्रैल के बाद बनी ड्राफ्ट कमेटी की बैठकों में इस टीम की साख को कमतर करने में जुटी थी। जब सत्ता अपने अहंकार में टीम अण्णा को पांच लोगों की टीम समझ रही थी। कहां तो सरकार इस पूरे मामलों को लोकतांत्रिक बनाती और विपक्ष सहित अरुणा रॉय के लोकपाल ड्राफ्ट को भी केंद्र में ले आती। लेकिन उनकी टीम के सदस्य निखिल डे ने बताया कि ड्राफ्ट कमेटी को लिखने के बाद भी बुलावा नहीं आया। तब सरकार को सहनशीलता के पाठ पढ़ाने वाले लेख नहीं लिखे जा रहे थे। फिर भी यह सवाल वाजिब है कि इस तरह की ज़िद पर अड़ा आंदोलन आगे आने वाले समय में किस तरह की राजनीति की बुनियाद रखने वाला है।
इसमें एक दिलचस्प बात यह भी है कि इसमें बड़ी संख्या में सरकारी अफसरों को उद्वेलित कर दिया है। वो भी भ्रष्टाचार के सवाल से टकरा रहे हैं। नेताओं की ही नहीं अफसरों की भी साख दांव पर हैं। ऐसा माहौल बना है जिसमें उन्हें वाकई सार्वजनिक या पारिवारिक जीवन में जाने पर सवालों का सामना करना पड़ता होगा। कई अफसर एसएमएस कर रहे हैं कि उस भ्रष्टाचार का क्या होगा जो पैंतीस करोड़ की कोठियों में रहता है मगर एक्साईज़ से लेकर इंकम टैक्स नहीं देता। क्या हम सभी चोर हैं? इसीलिए लगता है कि यह आंदोलन सामाजिक जीवन में भी भ्रष्ट लोगों के प्रति सहनशीलता को काफी कम करेगा। दीर्घकालिक रूप से न सही मगर अस्थायी कमी भी एक सकारात्मक माहौल तो पैदा करेगे ही। वर्ना मैंने भी देखा है कि मिडिल क्लास के लोग आराम से भ्रष्ट अफसर रिश्तेदारों की महंगी शादियों में शिरकत करते हैं।
जिस समाज को हम उदारीकरण के जश्न भरे माहौल में व्यक्तिवादी का तमगा पहनाकर लानतें भेज चुके थें, वो अचानक कैसे सामूहिक हो गई है। उसे क्यों यह सपना आ रहा है कि भारत को कैसा होना चाहिए। जो उदारीकरण की संताने भारत महान के झंडे को लेकर विदेशों में गईं हैं वो भी भारत महान की इस सबसे बड़ी बीमारी के खिलाफ सड़कों पर उतरी है। वही लोग जो कल तक यह कहा करते थे कि मीडिया में नकारात्मक ख़बरें दिखाने से विदेशों में भारत की छवि ख़राब होती है,आज वही लोग विदेशों में अण्णा के समर्थन में झंडा लेकर निकले हैं।
हम किसी आंदोलन को मिडिल क्लास बताकर खारिज नहीं कर सकते। हाल के दिनों में मुख्य राजनीतिक दलों के बड़े नेता कार्यकर्ता ढूंढ रहे थे। नए कार्यकर्ताओं की खोज में उनका लंबा वक्त भी गुज़रा है। आखिर ये कौन लोग हैं जो बिना किसी एक राजनीतिक नेतृत्व के इतने बड़े आंदोलन को संचालित कर रहे हैं। जब भी मिडिल क्लास का जनउभार सामने आया है यही कहा गया है कि यह भीड़ आज आई है, कल खो जाएगी। मुंबई धमाके के बाद लाखों लोगों की भीड़ आतंक के खिलाफ उमड़ पड़ी थी। वो गुम हो गई। उससे पहले दिल्ली के इंडिया गेट पर ऐसी ही कई भीड़ आकर चली गई। मगर यह समझना चाहिए कि ये वो भीड़ है जो बार-बार आ रही है। अप्रैल में भी आई थी और अगस्त में भी आ रही है। सिर्फ इस बात से निश्चिंत होने की ज़रूरत नहीं कि ये लोग जल्दी लौट कर गुम हो जाएंगे। तब क्या करेंगे जब फिर आ जाएंगे।
(इसका संपादित अंश आज दैनिक भास्कर में छपा है, भास्कर से साभार)
अण्णा पर फेसबुकी प्रतिक्रिया
1)आंदोलनों में भी वीकेंड की व्यवस्था होनी चाहिए। दो दिन का रेस्ट मिल जाता। आंदोलन लाइव काल में मुश्किल हो गया है। अण्णा आंदोलन ने महाआख्यान को जन्म दे दिया है। सरकार के अहंकार का चूर होना, मिडिल क्लास की व्यापकता,इसके भीतर तबकों की भागीदारी पर सवाल, संसदीय दादागीरी से आंदोलन की दादागीरी तक,संघ के हाईजैक कर लेने की आशंका, एंटी आरक्षण भीड़ की साज़िश आदि आदि। पूरा आंदोलन ही रामलीला ग्राउंड हो गया है। आप भी किसी भी गेट से अपने सवालों को लेकर प्रवेश कर जाइये। इसे डिबेट मूवमेंट भी कहा जाना चाहिए।
2)अण्णा के आंदोलन में प्रतिक्रियाओं की इतनी विविधता है कि पता ही नहीं चलता कि थ्योरी कहां गई। मैं कोई संपूर्ण तो हूं नहीं। विषयांतर बहुत हुआ इसलिए मुझे भी लगा कि जमा नहीं आज मामला। रही बात चंद्रभान के सवाल की तो सुनना चाहिए।उनका काट तो था शो में। वो साहसिक व्यक्ति हैं। इसी शो में आरक्षण पर बैन की मांग का विरोध कर गए। कहा कि दलित संगठन कमज़ोर हैं। किसी आंदोलन का आत्मविश्वास बताता है कि वो हर सवाल से सामना करने के लिए तैयार है। जो लोग बीच में चैनल बदल गए मेरा नुकसान कर गए। टीआरपी लॉस।
3)आपकी प्रतिक्रियाओं से मेरी राय बदल रही है। प्राइम टाइम इतना भी बुरा नहीं था। कई सवाल मिल गए आपको शो के बाद बहस करने के लिए। वैसे भी समाधान देना मेरा काम नहीं है। सवाल खड़े हो जाएं वही बहुत है। दुखद समाचार यह है कि टीआरपी का क्या करें। क्या शो में वाकई ऐसी कमी है कि दर्शक बंध नहीं रहा। खुल कर बताइयेगा वर्ना अगले हफ्ते से प्रयोग बंद, फार्मूला चालू। नहीं ये मैं नहीं करूंगा। प्रयोग चालू रहेगा। गु़डनाइट।
4)अण्णा के आंदोलन की नियति पर सवाल कर सकते हैं मगर मुझे नहीं लगता कि इसमें सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं है। शामिल होने वाले लोगों के लिहाज़ से और आयोजकों के समूह को देखने के लिहाज़ से। जो लोग सवाल कर रहे हैं वो किस आधार पर कह रहे हैं कि इसमें अमुक जाति के नहीं हैं और अमुक के ही हैं। यह एक जनआंदोलन है। अण्णा का भी नहीं रहा अब तो। यह लोगों का आंदोलन है। खिलाफ में बात कही जानी चाहिए मगर तथ्य तो हों पहले।
5)आशीष नंदी ने कहा कि मध्यमवर्ग को नए नज़रिये से देखने की ज़रूरत है। नब्बे के दशक के पहले के मध्यमवर्ग में नब्बे फीसदी सवर्ण थे। अब मध्यमवर्ग का ढांचा बदला है। इसमें पचास फीसदी अभी भी सवर्ण हैं लेकिन बाकी के पचास में दलित भी हैं। और भी तबके हैं। आदिवासी नहीं हैं। और यह एक शानदार आंदोलन है जिसने सत्ता के अहंकार को बेजोड़ चुनौती दी है।
6)शो के दौरान और बाद में कई दलित अधिकारियों के फोन आने लगे। कहने लगे कि दलित नहीं है इस आंदोलन में ऐसा न कहें। ऐसा कहकर आप हमें अलग-थलग कह रहे हैं। दफ्तर का फोन जाम हो गया। मुझे इस बात की गाली पड़ रही है कि दलित नहीं है ये सवाल महत्वपूर्ण नहीं है। वो हैं। गढ़वाल से एक एक्ज़िक्यूटिव इंजीनियर का फोन आया। कहा कि मैं दलित हूं। रोज़ शाम को मोमबत्ती लेकर निकलता हूं। लेबर विभाग के एक अफसर का फोन आ गया। कहा कि ये सवाल हम दलितों को मुख्यधारा से अलग कर रहा है।
7)दलित जनमत के भीतर की विविधता को नज़रअंदाज़ करना ख़तरनाक है। वो दलित नहीं है। वो दलितों के रूप में हैं। शो में जब यह सवाल उठा कि दलित नहीं हैं इस मिडिल क्लास मूवमेंट में तो टीम अण्णा की एक पुरानी सदस्य संतोष ने कहा कि वे ही छत्रसाल स्टेडियम में सब संभाल रही हैं। उनके साथ बहुत दलित लड़के लड़कियां हैं। आयोजकों में कई मुस्लिम युवा हैं। अण्णा आंदोलन की नुमाइंदगी की आलोचना तथ्यों पर हो। डिब्बावाला संघ ने बताया कि उनके संगठन में सभी जाति के हैं। वो अण्णा का समर्थन कर रहे हैं।
8)मध्यमवर्ग-जब वो सो रहा था तब गाली सुन रहा था, जब जागता है तब गाली सुनता है। पाश ठीक कहते थे बीच का कोई रास्ता नहीं होता। बीच का कोई वर्ग नहीं होता। मध्यमवर्ग को नामकरण दूसरा कर लेना चाहिए। इस आंदोलन की सबसे बड़ी खूबी है कि अप्रैल से अगस्त हो गया इसके भीतर इतने एंगल हैं कि आप कई सवालों और कई संभावनाओं के साथ इसे देख सकते हैं। लेकिन सिविल सोसायटी का हिन्दी नामकरण कैसा है। नागरिक जमात या नागरिक तबका। ये दोनों नाम जनसत्ता के संपादक ओम थाणवी ने सुझाये हैं। आप क्या पसंद करते हैं।
2)अण्णा के आंदोलन में प्रतिक्रियाओं की इतनी विविधता है कि पता ही नहीं चलता कि थ्योरी कहां गई। मैं कोई संपूर्ण तो हूं नहीं। विषयांतर बहुत हुआ इसलिए मुझे भी लगा कि जमा नहीं आज मामला। रही बात चंद्रभान के सवाल की तो सुनना चाहिए।उनका काट तो था शो में। वो साहसिक व्यक्ति हैं। इसी शो में आरक्षण पर बैन की मांग का विरोध कर गए। कहा कि दलित संगठन कमज़ोर हैं। किसी आंदोलन का आत्मविश्वास बताता है कि वो हर सवाल से सामना करने के लिए तैयार है। जो लोग बीच में चैनल बदल गए मेरा नुकसान कर गए। टीआरपी लॉस।
3)आपकी प्रतिक्रियाओं से मेरी राय बदल रही है। प्राइम टाइम इतना भी बुरा नहीं था। कई सवाल मिल गए आपको शो के बाद बहस करने के लिए। वैसे भी समाधान देना मेरा काम नहीं है। सवाल खड़े हो जाएं वही बहुत है। दुखद समाचार यह है कि टीआरपी का क्या करें। क्या शो में वाकई ऐसी कमी है कि दर्शक बंध नहीं रहा। खुल कर बताइयेगा वर्ना अगले हफ्ते से प्रयोग बंद, फार्मूला चालू। नहीं ये मैं नहीं करूंगा। प्रयोग चालू रहेगा। गु़डनाइट।
4)अण्णा के आंदोलन की नियति पर सवाल कर सकते हैं मगर मुझे नहीं लगता कि इसमें सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं है। शामिल होने वाले लोगों के लिहाज़ से और आयोजकों के समूह को देखने के लिहाज़ से। जो लोग सवाल कर रहे हैं वो किस आधार पर कह रहे हैं कि इसमें अमुक जाति के नहीं हैं और अमुक के ही हैं। यह एक जनआंदोलन है। अण्णा का भी नहीं रहा अब तो। यह लोगों का आंदोलन है। खिलाफ में बात कही जानी चाहिए मगर तथ्य तो हों पहले।
5)आशीष नंदी ने कहा कि मध्यमवर्ग को नए नज़रिये से देखने की ज़रूरत है। नब्बे के दशक के पहले के मध्यमवर्ग में नब्बे फीसदी सवर्ण थे। अब मध्यमवर्ग का ढांचा बदला है। इसमें पचास फीसदी अभी भी सवर्ण हैं लेकिन बाकी के पचास में दलित भी हैं। और भी तबके हैं। आदिवासी नहीं हैं। और यह एक शानदार आंदोलन है जिसने सत्ता के अहंकार को बेजोड़ चुनौती दी है।
6)शो के दौरान और बाद में कई दलित अधिकारियों के फोन आने लगे। कहने लगे कि दलित नहीं है इस आंदोलन में ऐसा न कहें। ऐसा कहकर आप हमें अलग-थलग कह रहे हैं। दफ्तर का फोन जाम हो गया। मुझे इस बात की गाली पड़ रही है कि दलित नहीं है ये सवाल महत्वपूर्ण नहीं है। वो हैं। गढ़वाल से एक एक्ज़िक्यूटिव इंजीनियर का फोन आया। कहा कि मैं दलित हूं। रोज़ शाम को मोमबत्ती लेकर निकलता हूं। लेबर विभाग के एक अफसर का फोन आ गया। कहा कि ये सवाल हम दलितों को मुख्यधारा से अलग कर रहा है।
7)दलित जनमत के भीतर की विविधता को नज़रअंदाज़ करना ख़तरनाक है। वो दलित नहीं है। वो दलितों के रूप में हैं। शो में जब यह सवाल उठा कि दलित नहीं हैं इस मिडिल क्लास मूवमेंट में तो टीम अण्णा की एक पुरानी सदस्य संतोष ने कहा कि वे ही छत्रसाल स्टेडियम में सब संभाल रही हैं। उनके साथ बहुत दलित लड़के लड़कियां हैं। आयोजकों में कई मुस्लिम युवा हैं। अण्णा आंदोलन की नुमाइंदगी की आलोचना तथ्यों पर हो। डिब्बावाला संघ ने बताया कि उनके संगठन में सभी जाति के हैं। वो अण्णा का समर्थन कर रहे हैं।
8)मध्यमवर्ग-जब वो सो रहा था तब गाली सुन रहा था, जब जागता है तब गाली सुनता है। पाश ठीक कहते थे बीच का कोई रास्ता नहीं होता। बीच का कोई वर्ग नहीं होता। मध्यमवर्ग को नामकरण दूसरा कर लेना चाहिए। इस आंदोलन की सबसे बड़ी खूबी है कि अप्रैल से अगस्त हो गया इसके भीतर इतने एंगल हैं कि आप कई सवालों और कई संभावनाओं के साथ इसे देख सकते हैं। लेकिन सिविल सोसायटी का हिन्दी नामकरण कैसा है। नागरिक जमात या नागरिक तबका। ये दोनों नाम जनसत्ता के संपादक ओम थाणवी ने सुझाये हैं। आप क्या पसंद करते हैं।
लघु प्रेम कथा
1)
मूंग धुली दाल की तरह चमकती दिल्ली और घने-हरे पेड़ों की मस्ती के नीचे लोधी गार्डन में उसने अपने कदम तेज़ कर लिये। बालों को समेट कर शर्मिला टैगोर मार्का जूड़ा बना लिया। साड़ी मुमताज़ जैसी। पीछा करती आवाज़ से बचने के लिए उसने तेज़ी से सड़क पार की और ख़ान मार्केट की दुकानों को निहारते चलने लगी। वो आवाज़ अब भी आ रही थी..हमीं जब न होंगे तो ऐ दिलरुबा..किसे देखकर हाय शर्माओगे...बदन पे सितारे...कहां जा रही हो,पांव ठिठक से गए, दुकान के शीशे पर प्रिंस की तस्वीर,उफ्फ शम्मी,विल मिस यू।(लप्रेक)
2)
अभी-अभी वो शहीद देखकर निकला था। गोलचा सिनेमा से बाहर आते ही डिवाइडर पर खड़े होकर भाषण देने लगा। लानत है यह जवानी जो मुल्क के काम न आए। तोड़ दो बेड़ियों को। वो घबरा गई। अचानक से तुम्हें क्या हो गया। फ़िल्म के असर में इंक़लाब की बातें न करो। अब इंकलाब की इजाज़त नहीं है देश में। कल ही एक मंत्री ने कहा है। मैंने तो पहले ही कहा था कि ज़िंदगी मिलेगी न दोबारा देखते हैं। कभी-कभी तो इस मुल्क पर खुश होना सीखो जानम।( लप्रेक)
3)
अभी-अभी वो शहीद देखकर निकला था। गोलचा सिनेमा से बाहर आते ही डिवाइडर पर खड़े होकर भाषण देने लगा। लानत है यह जवानी जो मुल्क के काम न आए। तोड़ दो बेड़ियों को। वो घबरा गई। अचानक से तुम्हें क्या हो गया। फ़िल्म के असर में इंक़लाब की बातें न करो। अब इंकलाब की इजाज़त नहीं है देश में। कल ही एक मंत्री ने कहा है। मैंने तो पहले ही कहा था कि ज़िंदगी मिलेगी न दोबारा देखते हैं। कभी-कभी तो इस मुल्क पर खुश होना सीखो जानम।( लप्रेक)
4)
मसूर की दाल तो मालवीय नगर में भी मिलती है। लेकिन मुझे शापिंग का अहसास होता ही है ख़ान मार्केट में। वहां मुझे कोई जानता नहीं बट सब अपने जैसे लगते हैं। डार्लिंग सवाल वहां की भीड़ का नहीं है। मसूर की दाल का है। ओफ्फो,तुम्हारा भी न,क्लास नहीं है। ये कार, गोगल्स, डियोड्रेंट तुमने ड्राइंग रूम के लिए ख़रीदे हैं क्या। मुझे जीने दो और जाने दो। और तुम क्यों जाते हो ओबेरॉय में कॉफी पीने? क्या पता ज़िंदगी मिले न दोबारा। फिल्म देखकर आए तो दोनों के झगड़े भी बदल गए।(लप्रेक)
5)
नहीं मैं इस्तीफा नहीं दूंगा। गहरी नींद से अचानक वह जाग गया। क्या हुआ। बगल में जाग रही लाजवंती ने पूछा तो अलबलाने लगा। सपना देख रहा था। क्या? यही कि सीएजी में नाम आ गया है। लोकायुक्त की रिपोर्ट में भी नाम है। लोगों ने मुझे घेर लिया है। इस्तीफा मांग रहे हैं। हां तो ये कौन सा सपना है। जो दिन में देखते हो, वही रात में भी । छोड़ों रिपोर्टिंग। एंकर बन जाओ। सपने नहीं आएंगे। क्या पता तब तुम किसी सपने में टाई में लटके मिलो। न बाबा न। मेरे ख्याल से तुम सपने देखना ही छोड़ दो।( लप्रेक)
6)
दोनों परेशान थे। सीएजी की रिपोर्ट में बारापुला का नाम देखकर। बारापुला पर ही खड़े होकर दोनों ने हुमायूं के मकबरे की पीठ की तरफ अपना सीना कर कसमें खाईं थीं। हमेशा हमेशा के लिए बारापुला पर आकर उसे निहारने का वादा किया था। अखबार में ख़बर देख वो घबराई हुई थी। कहने लगी कि इस पुल के साथ हमारा प्यार भी दाग़दार हो गया है। हमें क्यों न मालूम चल सका कि जिस बारापुला पर खड़े होकर हम एक दूसरे का हाथ थामे रहे, उसकी बुनियाद किसी घोटाले में है। अल्लाह, ये इश्क़ का कौन सा इम्तहान है।( लप्रेक)
7)
चित्तरंजन पार्के के मार्केट वन में कतला पर तरसती उसकी निगाहें जब उठीं तो मछलियों की भीड़ से टैंगड़ा चुनती उसकी कलाई पर टिक गई। ताज़ी मछली को चुन लेना पारखी निगाहों का काम है। कतला छोड़ वो भी टैंगड़ा ढूंढने लगा। कलाइयां टकराने लगीं। बगल में बेसुध पड़ी पाबदा और रोहू का कटा बड़ा सा हिस्सा,ताज़ी मछली ले लो की चिचियाहट,निगाहें जब मिलती हैं तो सूखी ज़मीन पर मछलियों की तरह तड़पने-तैरने लगती हैं। तब तक तड़पती है जब तक कोई काट कर झट से उसे पीस में न बदल दे। (लप्रेक)
8)
मूंग धुली दाल की तरह चमकती दिल्ली और घने-हरे पेड़ों की मस्ती के नीचे लोधी गार्डन में उसने अपने कदम तेज़ कर लिये। बालों को समेट कर शर्मिला टैगोर मार्का जूड़ा बना लिया। साड़ी मुमताज़ जैसी। पीछा करती आवाज़ से बचने के लिए उसने तेज़ी से सड़क पार की और ख़ान मार्केट की दुकानों को निहारते चलने लगी। वो आवाज़ अब भी आ रही थी..हमीं जब न होंगे तो ऐ दिलरुबा..किसे देखकर हाय शर्माओगे...बदन पे सितारे...कहां जा रही हो,पांव ठिठक से गए, दुकान के शीशे पर प्रिंस की तस्वीर,उफ्फ शम्मी,विल मिस यू।(लप्रेक)
2)
अभी-अभी वो शहीद देखकर निकला था। गोलचा सिनेमा से बाहर आते ही डिवाइडर पर खड़े होकर भाषण देने लगा। लानत है यह जवानी जो मुल्क के काम न आए। तोड़ दो बेड़ियों को। वो घबरा गई। अचानक से तुम्हें क्या हो गया। फ़िल्म के असर में इंक़लाब की बातें न करो। अब इंकलाब की इजाज़त नहीं है देश में। कल ही एक मंत्री ने कहा है। मैंने तो पहले ही कहा था कि ज़िंदगी मिलेगी न दोबारा देखते हैं। कभी-कभी तो इस मुल्क पर खुश होना सीखो जानम।( लप्रेक)
3)
अभी-अभी वो शहीद देखकर निकला था। गोलचा सिनेमा से बाहर आते ही डिवाइडर पर खड़े होकर भाषण देने लगा। लानत है यह जवानी जो मुल्क के काम न आए। तोड़ दो बेड़ियों को। वो घबरा गई। अचानक से तुम्हें क्या हो गया। फ़िल्म के असर में इंक़लाब की बातें न करो। अब इंकलाब की इजाज़त नहीं है देश में। कल ही एक मंत्री ने कहा है। मैंने तो पहले ही कहा था कि ज़िंदगी मिलेगी न दोबारा देखते हैं। कभी-कभी तो इस मुल्क पर खुश होना सीखो जानम।( लप्रेक)
4)
मसूर की दाल तो मालवीय नगर में भी मिलती है। लेकिन मुझे शापिंग का अहसास होता ही है ख़ान मार्केट में। वहां मुझे कोई जानता नहीं बट सब अपने जैसे लगते हैं। डार्लिंग सवाल वहां की भीड़ का नहीं है। मसूर की दाल का है। ओफ्फो,तुम्हारा भी न,क्लास नहीं है। ये कार, गोगल्स, डियोड्रेंट तुमने ड्राइंग रूम के लिए ख़रीदे हैं क्या। मुझे जीने दो और जाने दो। और तुम क्यों जाते हो ओबेरॉय में कॉफी पीने? क्या पता ज़िंदगी मिले न दोबारा। फिल्म देखकर आए तो दोनों के झगड़े भी बदल गए।(लप्रेक)
5)
नहीं मैं इस्तीफा नहीं दूंगा। गहरी नींद से अचानक वह जाग गया। क्या हुआ। बगल में जाग रही लाजवंती ने पूछा तो अलबलाने लगा। सपना देख रहा था। क्या? यही कि सीएजी में नाम आ गया है। लोकायुक्त की रिपोर्ट में भी नाम है। लोगों ने मुझे घेर लिया है। इस्तीफा मांग रहे हैं। हां तो ये कौन सा सपना है। जो दिन में देखते हो, वही रात में भी । छोड़ों रिपोर्टिंग। एंकर बन जाओ। सपने नहीं आएंगे। क्या पता तब तुम किसी सपने में टाई में लटके मिलो। न बाबा न। मेरे ख्याल से तुम सपने देखना ही छोड़ दो।( लप्रेक)
6)
दोनों परेशान थे। सीएजी की रिपोर्ट में बारापुला का नाम देखकर। बारापुला पर ही खड़े होकर दोनों ने हुमायूं के मकबरे की पीठ की तरफ अपना सीना कर कसमें खाईं थीं। हमेशा हमेशा के लिए बारापुला पर आकर उसे निहारने का वादा किया था। अखबार में ख़बर देख वो घबराई हुई थी। कहने लगी कि इस पुल के साथ हमारा प्यार भी दाग़दार हो गया है। हमें क्यों न मालूम चल सका कि जिस बारापुला पर खड़े होकर हम एक दूसरे का हाथ थामे रहे, उसकी बुनियाद किसी घोटाले में है। अल्लाह, ये इश्क़ का कौन सा इम्तहान है।( लप्रेक)
7)
चित्तरंजन पार्के के मार्केट वन में कतला पर तरसती उसकी निगाहें जब उठीं तो मछलियों की भीड़ से टैंगड़ा चुनती उसकी कलाई पर टिक गई। ताज़ी मछली को चुन लेना पारखी निगाहों का काम है। कतला छोड़ वो भी टैंगड़ा ढूंढने लगा। कलाइयां टकराने लगीं। बगल में बेसुध पड़ी पाबदा और रोहू का कटा बड़ा सा हिस्सा,ताज़ी मछली ले लो की चिचियाहट,निगाहें जब मिलती हैं तो सूखी ज़मीन पर मछलियों की तरह तड़पने-तैरने लगती हैं। तब तक तड़पती है जब तक कोई काट कर झट से उसे पीस में न बदल दे। (लप्रेक)
8)
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