September 8, 2011
FOR IMMEDIATE RELEASE
Re: Shifting of TAM Ratings for News Channels from Weekly to Monthly
New Delhi: September 8, 2011……The NBA Board, in its effort to improve news
broadcasting standards, has taken a decision to move from weekly to monthly ratings
for all national news and business channels in Hindi and English. News channels
being distinct from other genres, have a responsibility to inform and empower its
viewers with quality programming and dissemination of news rather than providing
content merely for garnering viewership. Coverage and reportage of news and
programmes cannot always be linked to popularity or audience measurement. News
broadcasting standards, the NBA Board believed, can only improve with time spent on
strategic planning and research rather than knee jerk reactions taken on a weekly
basis.
This initiative taken by the News Broadcasters Association (NBA) would not in any
way hamper the decision making of advertisers and advertising agencies. In the new
monthly dispensation, advertisers would continue to get access to data broken down to
a minute or a day-part or a specific programme in a manner similar to how data points
are currently accessed in the weekly format.
The NBA and TAM are in discussion on implementation of this initiative which is
being proposed to be introduced initially for a period of two years.
The changes are expected to be implemented from October, 2011. Eventually the
monthly format is expected to be implemented for regional news channels as well.
For further details on this initiative kindly send your queries by email to Mrs. Annie
Joseph, Secretary General, NBA at nba@nbanewdelhi.com.
Annie Joseph
Secretary General
बोलती बंद कर देती है बोल।
मारना जुर्म है तो पैदा करना जुर्म क्यों नहीं है? बोल फिल्म का यह सवाल उठता तो एक मुल्क़,मज़हब विशेष में मगर हो जाता है कई मुल्क़ों,मज़हबों का। जिन्होंने शोएब मंसूर की खुदा के लिए देखी होगी वो इस फिल्म के ज़रिये निर्देशक के मन में चल रही कहानियों और बेचैनियों को महसूस कर सकते हैं। बोल में कथाओं का इतना संगम और टकराव है कि आप एक साथ कई तरह के समय और सवालों में उलझते चले जाते हैं। टेक्नॉलजी और एडिटिंग के दम पर यह फिल्म फिल्म नहीं बनती बल्कि अपनी कथाओं के सहारे फिल्म बनती चली जाती है। लाहौर की सड़कें,छतें और गलियों से निकलती कहानियां हिन्दुस्तान के सिनेमाघर में देखते हुए अपने शहरों की लगने लगती है। यह फिल्म एक हिन्दुस्तानी को जो पाकिस्तान कभी नहीं गया, उसके समाज से परिचय कराती है। वर्ना मीडिया से जो पाकिस्तान हमें विरासत में मिला है उसमें सिर्फ हुक्मरानों,फौजियों,आतंकवादियों,क्रिकेटरों,गायकों की तस्वीरें हैं। घर और समाज नहीं है। बोल पाकिस्तान को लेकर हमारी चुप्पी को भी तोड़ देती है। यह फिल्म सहजता से ऐसे मुश्किल सवालों को अपने मुल्क के सामाजिक परिवेश में उठा देती है जिसकी आवाज़ हमें किसी और चैनल से इस तरफ नहीं सुनाई पड़ती। सच कहूं तो पहली बार किसी फिल्म को देखकर लगा कि इधर के हों या उधर के,मसले दोनों के एक हैं।
कहानी में हिन्दुस्तान का बंटवारा है तो दिल्ली से आया हकीम साहब का ख़ानदान। आधुनिक डाक्टरी के दौर में हकीम का पेशा छूटता जा रहा है और परिवार की आबादी बढ़ती जा रही है। जल्दी ही यह फिल्म इस्लामिक समाज में औरतों के बग़ावत की बुनियाद डालने का काम करने लगती है। पितृसत्तात्मक समाज के वालिद बने हकीम साहब सुन्नत के ठेकेदार के रूप में बेबस नज़र आते हैं। उनकी हवेली और उनमें हर साल पैदा होने वाली लड़कियां। लड़कियों का बढ़ना और एक भाई के रूप में सैफ़ी का घर आना। कहानी अपने ग्रैड नैरेटिव को छोड़ कर एक ट्रांस जेंडर बच्चे की परवरिश और उसके प्रति बहनों और बाप के नज़रिये से टकराने लगती है। सैफी का प्रसंग बहुत रूलाता है। ज़ार-ज़ार कर देता है। लगता है छाती पीट पीट कर दहाड़ने लगे। निर्देशक अपना धीरज नहीं खोता। कोई फास्ट कट नहीं है। सैफी अपनी रफ्तार से बड़ा होता है। ज़ैनब के सहारे दुनिया को देखने की कोशिश में उन हरकतों का शिकार होता है जिसके शिकार हमारे घरों में बच्चे रिश्तेदारों के हाथ होते रहे हैं। हिजड़ों की नज़र से बचाकर बहनों का उसे मर्द बनाना और मर्द न होने पर अपने बाप हकीम साहब से बचाना कहानी का ऐसा मोड़ है तो कलेजा फाड़ देता है। सैफी के साथ बलात्कार और फिर बाप के हाथों उसकी मौत। बलात्कार के बाद घर लौटना और उसकी मां का अपने बच्चे को गोद में लेकर रोना, निर्देशक मंसूर अपने दिलेर कैमरे से देखनेवालों की आंखों में आंखें मिलाकर पूछने लगता है। सैफ़ी को उसका बाप मार देता है और कहानी अपनी ग्रैंड नैरेटिव पर लौट आती है। बल्कि कहानियां ऐसी बुनी गईं कि कोई भी कहानी कभी भी किसी को नहीं छोड़ती। सब उलझती-सुलझती चलती हैं।
हकीम साहब की बेटियां बड़ी हो रही हैं। बेटियां मां के प्रति हमदर्द होने लगती हैं। उनमें साहस पैदा हो रहा है ज़ैनब के ज़रिये। दुनिया को औरतों की नज़र से देखने और बनाने का। हकीम साहब अहले सुन्नत के दरवाज़े पर खड़े वो पहरेदार हैं जिनकी दाढ़ी उस वक्त खिजाब से रंग जाती है जब वो हत्या के जुर्म से बचने के लिए कंजर समुदाय के हाथों बिक जाते हैं। मस्जिक की रकम चुकाने के लिए कंजर जाति की मीना से निकाह करते हैं। साथ ही साथ अपनी बेटी को पड़ोसी दोस्त के बेटे के हाथ देने से मना कर देते हैं क्योंकि वो शिया हैं। कहानी मज़हब का इम्तहान लेती है। बेटियां दुनियादारी के सवालों से मज़हबी ढकोसलनेपन को चुनौती देने लगती हैं। हकीम साहब बेटियां पैदा करने की मशीन बने मीना के साथ रात गुज़ारने लगते हैं। अहले सुन्नत की चौकीदारी छोड़ कंजरों के बच्चों को कुरान पढ़ाने लगते हैं। मगर उनके लिए अपना घर और बेटियां वो आखिरी मोर्चा हैं जिसकी सरहद पर खड़े होकर वो अपने पितृसत्तात्मक अहं की हिफ़ाज़त करने में जुटे रह जाते हैं। तब तक जब एक रात मीना अपनी बेटी उनकी चौखट पर नहीं छो़ड़ जाती है। घर में कोहराम मचता है और हकीम के भीतर का मज़हबी मर्द फिर वहशी होता है और वो एक तवायफ़ बीबी से पैदा हुई बेटी का गला घोंटने लगते हैं। ज़ैनब इस बार अपनी बेबसी तोड़ देती है और बाप को मार देती है। बेटियां यहां अपनी ज़ात के सवालों को नहीं छोड़तीं। वो बाप के क़त्ल के बीच मीना की उस बेटी को भी बचा लेती हैं जिसके होने की बात सामने आने पर हकीम साहब के मौत का संदर्भ बनता है। फिल्म बहुत मज़बूती से औरतों के हक़ और सवालों पर टिकी रहती है।
यह एक ह्रदयविदारक प्रसंग है। फिल्म कई बार क्लाईमैक्स पर चढ़ती है और उतरती है। तभी तो हकीम साहब का क्रिकेट प्रेम भी सामने आता है और बेटियों के तेंदुलकर प्रेम और भारत की हार से गुस्सा होकर रेडियो भी तोड़ देते हैं। फिल्म शुरू होती है जेल के दृश्य से। ज़ैनब अपनी बहनों के बुर्के को उखाड़ फेंकती है। कहती है अभी से फेंको इनको। फिर मां और बहनों से घिर कर रोने लगती है। फांसी के तख्ते तक ले जाए जाने से पहले का यह दृश्य साफ कर देता है कि इस फिल्म की दुनिया में औरतों ने एक दूसरे को नहीं छोड़ा है। ये औरतें सतायी हुई वो जमात है जो अपने घर में,अपने बाप से लड़ने का साहस हासिल करती हुईं मज़हबी दकियानूसी ख़्यालातों से लोहा लेती हैं। जवान और अनपढ़ लड़कियां अपनी दुनिया रचने की छोटी-छोटी कोशिशें करती रहती हैं। शुरू से लेकर अंत के पहले तक यह फिल्म हकीकत के सौ फीसदी करीब है। आखिरी पांच मिनट में सिनेमाई क्लपनालोक की तरह कामायाबी का मंज़र बनाना इसकी मजबूरी बन जाती है। बल्कि मंसूर बहुत सलीके से हर दर्दनाक हकीकत के क्लाईमैक्स पर पहुंचते ही कहानी में हल्के प्रसंग ले आते हैं ताकि आप एक साथ इस्लाम, समाज और मुल्क के कई सवालों से टकराते रहे हैं और भावुक होकर ज़िंदगी और मज़हब की जंग को देखते रहे। तभी यह फिल्म सिर्फ पाकिस्तान की नहीं रह जाती। हिन्दुस्तान की भी हो जाती है। हमारे समाजों में ग़रीबी और आबादी एक मज़हब का मसला नहीं है। सभी का है। यह फिल्म एक दिलेर फिल्म है बल्कि इतनी दिलेर की बोलती बंद कर देती है। देखने के लिए टिकट का पैसा नहीं बल्कि मज़बूत कलेजा चाहिए।
कहानी में हिन्दुस्तान का बंटवारा है तो दिल्ली से आया हकीम साहब का ख़ानदान। आधुनिक डाक्टरी के दौर में हकीम का पेशा छूटता जा रहा है और परिवार की आबादी बढ़ती जा रही है। जल्दी ही यह फिल्म इस्लामिक समाज में औरतों के बग़ावत की बुनियाद डालने का काम करने लगती है। पितृसत्तात्मक समाज के वालिद बने हकीम साहब सुन्नत के ठेकेदार के रूप में बेबस नज़र आते हैं। उनकी हवेली और उनमें हर साल पैदा होने वाली लड़कियां। लड़कियों का बढ़ना और एक भाई के रूप में सैफ़ी का घर आना। कहानी अपने ग्रैड नैरेटिव को छोड़ कर एक ट्रांस जेंडर बच्चे की परवरिश और उसके प्रति बहनों और बाप के नज़रिये से टकराने लगती है। सैफी का प्रसंग बहुत रूलाता है। ज़ार-ज़ार कर देता है। लगता है छाती पीट पीट कर दहाड़ने लगे। निर्देशक अपना धीरज नहीं खोता। कोई फास्ट कट नहीं है। सैफी अपनी रफ्तार से बड़ा होता है। ज़ैनब के सहारे दुनिया को देखने की कोशिश में उन हरकतों का शिकार होता है जिसके शिकार हमारे घरों में बच्चे रिश्तेदारों के हाथ होते रहे हैं। हिजड़ों की नज़र से बचाकर बहनों का उसे मर्द बनाना और मर्द न होने पर अपने बाप हकीम साहब से बचाना कहानी का ऐसा मोड़ है तो कलेजा फाड़ देता है। सैफी के साथ बलात्कार और फिर बाप के हाथों उसकी मौत। बलात्कार के बाद घर लौटना और उसकी मां का अपने बच्चे को गोद में लेकर रोना, निर्देशक मंसूर अपने दिलेर कैमरे से देखनेवालों की आंखों में आंखें मिलाकर पूछने लगता है। सैफ़ी को उसका बाप मार देता है और कहानी अपनी ग्रैंड नैरेटिव पर लौट आती है। बल्कि कहानियां ऐसी बुनी गईं कि कोई भी कहानी कभी भी किसी को नहीं छोड़ती। सब उलझती-सुलझती चलती हैं।
हकीम साहब की बेटियां बड़ी हो रही हैं। बेटियां मां के प्रति हमदर्द होने लगती हैं। उनमें साहस पैदा हो रहा है ज़ैनब के ज़रिये। दुनिया को औरतों की नज़र से देखने और बनाने का। हकीम साहब अहले सुन्नत के दरवाज़े पर खड़े वो पहरेदार हैं जिनकी दाढ़ी उस वक्त खिजाब से रंग जाती है जब वो हत्या के जुर्म से बचने के लिए कंजर समुदाय के हाथों बिक जाते हैं। मस्जिक की रकम चुकाने के लिए कंजर जाति की मीना से निकाह करते हैं। साथ ही साथ अपनी बेटी को पड़ोसी दोस्त के बेटे के हाथ देने से मना कर देते हैं क्योंकि वो शिया हैं। कहानी मज़हब का इम्तहान लेती है। बेटियां दुनियादारी के सवालों से मज़हबी ढकोसलनेपन को चुनौती देने लगती हैं। हकीम साहब बेटियां पैदा करने की मशीन बने मीना के साथ रात गुज़ारने लगते हैं। अहले सुन्नत की चौकीदारी छोड़ कंजरों के बच्चों को कुरान पढ़ाने लगते हैं। मगर उनके लिए अपना घर और बेटियां वो आखिरी मोर्चा हैं जिसकी सरहद पर खड़े होकर वो अपने पितृसत्तात्मक अहं की हिफ़ाज़त करने में जुटे रह जाते हैं। तब तक जब एक रात मीना अपनी बेटी उनकी चौखट पर नहीं छो़ड़ जाती है। घर में कोहराम मचता है और हकीम के भीतर का मज़हबी मर्द फिर वहशी होता है और वो एक तवायफ़ बीबी से पैदा हुई बेटी का गला घोंटने लगते हैं। ज़ैनब इस बार अपनी बेबसी तोड़ देती है और बाप को मार देती है। बेटियां यहां अपनी ज़ात के सवालों को नहीं छोड़तीं। वो बाप के क़त्ल के बीच मीना की उस बेटी को भी बचा लेती हैं जिसके होने की बात सामने आने पर हकीम साहब के मौत का संदर्भ बनता है। फिल्म बहुत मज़बूती से औरतों के हक़ और सवालों पर टिकी रहती है।
यह एक ह्रदयविदारक प्रसंग है। फिल्म कई बार क्लाईमैक्स पर चढ़ती है और उतरती है। तभी तो हकीम साहब का क्रिकेट प्रेम भी सामने आता है और बेटियों के तेंदुलकर प्रेम और भारत की हार से गुस्सा होकर रेडियो भी तोड़ देते हैं। फिल्म शुरू होती है जेल के दृश्य से। ज़ैनब अपनी बहनों के बुर्के को उखाड़ फेंकती है। कहती है अभी से फेंको इनको। फिर मां और बहनों से घिर कर रोने लगती है। फांसी के तख्ते तक ले जाए जाने से पहले का यह दृश्य साफ कर देता है कि इस फिल्म की दुनिया में औरतों ने एक दूसरे को नहीं छोड़ा है। ये औरतें सतायी हुई वो जमात है जो अपने घर में,अपने बाप से लड़ने का साहस हासिल करती हुईं मज़हबी दकियानूसी ख़्यालातों से लोहा लेती हैं। जवान और अनपढ़ लड़कियां अपनी दुनिया रचने की छोटी-छोटी कोशिशें करती रहती हैं। शुरू से लेकर अंत के पहले तक यह फिल्म हकीकत के सौ फीसदी करीब है। आखिरी पांच मिनट में सिनेमाई क्लपनालोक की तरह कामायाबी का मंज़र बनाना इसकी मजबूरी बन जाती है। बल्कि मंसूर बहुत सलीके से हर दर्दनाक हकीकत के क्लाईमैक्स पर पहुंचते ही कहानी में हल्के प्रसंग ले आते हैं ताकि आप एक साथ इस्लाम, समाज और मुल्क के कई सवालों से टकराते रहे हैं और भावुक होकर ज़िंदगी और मज़हब की जंग को देखते रहे। तभी यह फिल्म सिर्फ पाकिस्तान की नहीं रह जाती। हिन्दुस्तान की भी हो जाती है। हमारे समाजों में ग़रीबी और आबादी एक मज़हब का मसला नहीं है। सभी का है। यह फिल्म एक दिलेर फिल्म है बल्कि इतनी दिलेर की बोलती बंद कर देती है। देखने के लिए टिकट का पैसा नहीं बल्कि मज़बूत कलेजा चाहिए।
आओ आंदोलन आंदोलन खेलें
दोनों लड़कियों ने खुद को एक दूसरे से जकड़ लिया और हवा में हाथ उठाकर कैमरे के क्लिक होने का इंतज़ार करती रहीं। दोस्तों ने क्लिक किया और फिर कैमरा लड़कियों के हाथ में और लड़कों के हाथ इंकलाब की मुद्रा में लहराते हुए। रामलीला मैदान से लौटते दोस्तों की टोलियों में एक आंदोलन से लौटने का इतना उत्साह कभी नहीं देखा। भले ही ये तस्वीरें उनके लिए सर्टिफिकेट कोर्स की तरह प्रमाण बन जायेंगी लेकिन 74 साल के एक बूढ़े के प्रति नौजवानों का उत्साह और समर्थन सिर्फ तस्वीरें खींचाने तक ही सीमित नहीं था। वर्ना वो कई महीनों और कई दिनों तक अण्णा आंदोलन से जुड़े नहीं रहते।
अब एक दूसरी तस्वीर देखिये। 2009 का लोकसभा चुनाव। पंद्रहवी लोकसभा को अब तक का सबसे युवा लोकसभा करार दिया जाता है। हिन्दुस्तान की आबादी के तरुण होने की कितनी बातें लिखी जाती हैं,बोली जाती हैं। पत्रिकाओं के कवर में उच्चवर्गीय राजनीतिक परिवारों के वारिस सांसद बन कर युवाओं के भावी प्रतिनिधि के रूप में चमकने लगते हैं। अंग्रेज़ी के एक अखबार में तो नियमित कालम ही शुरू हो जाता है कि युवा सांसदों की दिनचर्या कैसे बीत रही है। कई पत्रिकाओं में उनके फैशन,शौक और गुड लुकिंग का राज पूछा और लिखा जाने लगता है। 66 सांसद ऐसे चुन कर आते हैं जिनकी उम्र 25 से 40 साल के बीच है। 41-50 साल के बीच की उम्र के सांसदों की संख्या १५० हो जाती है और लोकसभा के सांसदों की औसत उम्र 54.5 साल हो जाती है। मीडिया इन युवा सांसदों को चमक दमक के चश्में से देखने लगा।
लेकिन रामलीला मैदान से लेकर देश के तमाम शहरों और गांवों में क्या हुआ? छह महीने तक चले इस आंदोलन में कोई युवा सांसद नज़र नहीं आया। इन युवा सांसदों के आने से जिस राजनीति को नया और तरोताजा बताया जाने लगा वो पहली रोटी की तरह छिप कर कैसरोल के डिब्बे में बासी होने लगे। इनमें से किसी युवा सांसद ने अण्णा हज़ारे के पीछे जुटे युवाओं से संवाद कायम करने की कोशिश नहीं की। मेरे एक मित्र ने दक्षिण दिल्ली के कमला नेहरू कालेज से गुज़रते वक्त बड़ी संख्या में लड़कियों का एक वीडियो बनाया। जिसमें ये लड़कियां चिल्ला रही थीं कि कहां हैं राहुल गांधी। वो अब अपने युवा राहुल गांधी को खोज रही थीं जिनके स्टीवंस कालेज में जाने पर लड़कियों ने आई लव यू राहुल गांधी कहा था। राहुल गांधी भले ही पारिवारिक कारणों से चुप रह गए हों मगर तमाम युवा सांसदों को चुप्पी ने बता दिया कि सांसदों के युवा होने से राजनीति में साहस का नया संचार नहीं हो जाता। युवा सांसद तभी आगे आए जब राहुल गांधी लोकसभा में आकर बोल गए। उसके बाद टीवी चैनलों पर बोलने के लिए कांग्रेस के युवा सांसदों की भरमार हो गई। यानी राजनीति में कुछ नहीं बदला। जब सबको पार्टी लाइन पर ही चलना है तो सांसद के युवा या बुजुर्ग होने से क्या फर्क पड़ता है। एक तरह से देखें तो युवा सांसदों और नेताओं ने युवाओं की इस बेचैनी की आवाज़ बनने से इंकार कर दिया।
उधर अण्णा हज़ारे के पीछे जमा युवाओं की भीड़ को समझने में जानकारों ने भी चूक कर दी। फेसबुक,ट्विटर और मोबाइल से लैस ये युवा उस भारत के नागरिक हैं जो इनके बीच खुद की मार्केटिंग विश्व शक्ति के रूप में करता रहा है। इन युवाओं के जीवन की रफ्तार और धीरज की गति में काफी फर्क है। वो प्रायोजित तरीके से विश्व शक्ति के रूप में प्रचारित किये जा रहे भारत की जड़ता को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। वो जीवन के कई क्षेत्रों मे दीवारें गिरा रहे हैं। राजीनीति की दीवार उनके लिए बाद में आकर खड़ी हुई है। जब सामने आई तो युवाओं ने चुनौती दी। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में भी युवा आगे आए। इन युवाओं ने मीडिया और समाज की बनी बनाई छवि को तोड़ दिया। बड़ी संख्या में लड़के और लड़कियों ने घरों से निकल कर यह साबित कर दिया कि वो सिर्फ अपनी ज़िंदगी में ही नहीं जी रहे थे। जिन युवाओं के लिए हकीकत से काट कर फिल्में तक बनने लगीं, उन युवाओं ने देश की कुछ हकीकत से लड़ने का फैसला किया।
इसीलिए रामलीला ग्राउंड से लेकर तमाम जगहों पर हर धर्म और हर जाति के युवाओं की तादाद दिखी। उनकी एक राजनीतिक ट्रेनिंग का माहौल बना। यह सवाल भी उठा कि क्या यह सवर्णवादी युवा है जो देश की विषमता को नहीं समझता और आरक्षण का विरोध करता है। क्या यह वो युवा है जो सांप्रदायिक शक्तियों द्वारा प्रायोजित आंदोलन में बिना किसी राजनीतिक समझ के उतर गया है? लोग यह भूल गए कि यह वही युवा है जिसने २००४ और २००९ में दो बार सांप्रदायिक शक्तियों को खारिज किया है। यह वो युवा है जो राजनीति के बनाए इन पूर्वाग्रहों को समझने लगा है मगर पूरी तरह से समझ रहा है इसके प्रमाण और ढूंढे जाने बाकी है। आखिर भ्रष्टाचार के विरोध में नारे लगाते लगाते भले ही कुछ लोगों ने आरक्षण के विरोध का नारा लगाया वो अन्य जातियों में पर्याप्त रूप से शंका पैदा कर सकता है। लेकिन इसके बाद भी इस आंदोलन में जाति और धर्म के हिसाब से युवाओं की विविधता की भागीदारी उल्लेखनीय रही। न सिर्फ भागीदारी के स्तर पर बल्कि आंदोलन को तैयार करने और जारी रखने के स्तर पर। इसके लिए इन युवाओं ने किसी फैशनपरस्त और गुडलुकिंग युवा सांसद को भ्रष्टाचार की लड़ाई का प्रतीक नहीं बनाया। बल्कि अपने घर के पिछवाड़े में धकेल दिये गए बुज़ुर्गों में से एक को ढूंढ लाए और उनमें उन्हीं नैतिक मान्यताओं की खोज की जो हमारी राजनीति का आधार रहे हैं। १९७४ में भी युवाओं ने जयप्रकाश नारायण को खोजा था। वो ढूंढ लाए थे पटना में बीमारी से लड़ रहे जयप्रकाश नारायण को। इस बार ढूंढ लाए रालेगण सिद्धी गांव में बैठे अण्णा हज़ारे को।
लेकिन सवाल यहां एक और है जिसपर आंदोलन से लौट कर युवाओं को सोचना होगा। भाषण और नारेबाज़ी के बीच के फर्क का। बेचैनियों को आवाज़ देने के उतावलेपन में सहनशीलता को छोड़ देने के ख़तरे का। सांप्रदायिकता के प्रति सचेत रहने का होश गंवा देने के खतरा का। एक आंदोलन तभी कामयाब माना जाता है जब ऐसी आशंकाएं हाशिये पर ही खत्म हो जाएं,मुख्यधारा में न आएं। वसीम बरेलवी का एक शेर है। उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है,जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है, नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये,कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है। युवाओं की भागीदारी ने राजनीति को समृद्ध बनाया है मगर इस डर को उन्हें ही ग़लत साबित करना होगा कि उनकी भागीदारी से चलने वाले आंदोलन आगे किसी मोड़ पर संकुचित नहीं होंगे।
(आज के राजस्थान पत्रिका में छपा है)
अब एक दूसरी तस्वीर देखिये। 2009 का लोकसभा चुनाव। पंद्रहवी लोकसभा को अब तक का सबसे युवा लोकसभा करार दिया जाता है। हिन्दुस्तान की आबादी के तरुण होने की कितनी बातें लिखी जाती हैं,बोली जाती हैं। पत्रिकाओं के कवर में उच्चवर्गीय राजनीतिक परिवारों के वारिस सांसद बन कर युवाओं के भावी प्रतिनिधि के रूप में चमकने लगते हैं। अंग्रेज़ी के एक अखबार में तो नियमित कालम ही शुरू हो जाता है कि युवा सांसदों की दिनचर्या कैसे बीत रही है। कई पत्रिकाओं में उनके फैशन,शौक और गुड लुकिंग का राज पूछा और लिखा जाने लगता है। 66 सांसद ऐसे चुन कर आते हैं जिनकी उम्र 25 से 40 साल के बीच है। 41-50 साल के बीच की उम्र के सांसदों की संख्या १५० हो जाती है और लोकसभा के सांसदों की औसत उम्र 54.5 साल हो जाती है। मीडिया इन युवा सांसदों को चमक दमक के चश्में से देखने लगा।
लेकिन रामलीला मैदान से लेकर देश के तमाम शहरों और गांवों में क्या हुआ? छह महीने तक चले इस आंदोलन में कोई युवा सांसद नज़र नहीं आया। इन युवा सांसदों के आने से जिस राजनीति को नया और तरोताजा बताया जाने लगा वो पहली रोटी की तरह छिप कर कैसरोल के डिब्बे में बासी होने लगे। इनमें से किसी युवा सांसद ने अण्णा हज़ारे के पीछे जुटे युवाओं से संवाद कायम करने की कोशिश नहीं की। मेरे एक मित्र ने दक्षिण दिल्ली के कमला नेहरू कालेज से गुज़रते वक्त बड़ी संख्या में लड़कियों का एक वीडियो बनाया। जिसमें ये लड़कियां चिल्ला रही थीं कि कहां हैं राहुल गांधी। वो अब अपने युवा राहुल गांधी को खोज रही थीं जिनके स्टीवंस कालेज में जाने पर लड़कियों ने आई लव यू राहुल गांधी कहा था। राहुल गांधी भले ही पारिवारिक कारणों से चुप रह गए हों मगर तमाम युवा सांसदों को चुप्पी ने बता दिया कि सांसदों के युवा होने से राजनीति में साहस का नया संचार नहीं हो जाता। युवा सांसद तभी आगे आए जब राहुल गांधी लोकसभा में आकर बोल गए। उसके बाद टीवी चैनलों पर बोलने के लिए कांग्रेस के युवा सांसदों की भरमार हो गई। यानी राजनीति में कुछ नहीं बदला। जब सबको पार्टी लाइन पर ही चलना है तो सांसद के युवा या बुजुर्ग होने से क्या फर्क पड़ता है। एक तरह से देखें तो युवा सांसदों और नेताओं ने युवाओं की इस बेचैनी की आवाज़ बनने से इंकार कर दिया।
उधर अण्णा हज़ारे के पीछे जमा युवाओं की भीड़ को समझने में जानकारों ने भी चूक कर दी। फेसबुक,ट्विटर और मोबाइल से लैस ये युवा उस भारत के नागरिक हैं जो इनके बीच खुद की मार्केटिंग विश्व शक्ति के रूप में करता रहा है। इन युवाओं के जीवन की रफ्तार और धीरज की गति में काफी फर्क है। वो प्रायोजित तरीके से विश्व शक्ति के रूप में प्रचारित किये जा रहे भारत की जड़ता को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। वो जीवन के कई क्षेत्रों मे दीवारें गिरा रहे हैं। राजीनीति की दीवार उनके लिए बाद में आकर खड़ी हुई है। जब सामने आई तो युवाओं ने चुनौती दी। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में भी युवा आगे आए। इन युवाओं ने मीडिया और समाज की बनी बनाई छवि को तोड़ दिया। बड़ी संख्या में लड़के और लड़कियों ने घरों से निकल कर यह साबित कर दिया कि वो सिर्फ अपनी ज़िंदगी में ही नहीं जी रहे थे। जिन युवाओं के लिए हकीकत से काट कर फिल्में तक बनने लगीं, उन युवाओं ने देश की कुछ हकीकत से लड़ने का फैसला किया।
इसीलिए रामलीला ग्राउंड से लेकर तमाम जगहों पर हर धर्म और हर जाति के युवाओं की तादाद दिखी। उनकी एक राजनीतिक ट्रेनिंग का माहौल बना। यह सवाल भी उठा कि क्या यह सवर्णवादी युवा है जो देश की विषमता को नहीं समझता और आरक्षण का विरोध करता है। क्या यह वो युवा है जो सांप्रदायिक शक्तियों द्वारा प्रायोजित आंदोलन में बिना किसी राजनीतिक समझ के उतर गया है? लोग यह भूल गए कि यह वही युवा है जिसने २००४ और २००९ में दो बार सांप्रदायिक शक्तियों को खारिज किया है। यह वो युवा है जो राजनीति के बनाए इन पूर्वाग्रहों को समझने लगा है मगर पूरी तरह से समझ रहा है इसके प्रमाण और ढूंढे जाने बाकी है। आखिर भ्रष्टाचार के विरोध में नारे लगाते लगाते भले ही कुछ लोगों ने आरक्षण के विरोध का नारा लगाया वो अन्य जातियों में पर्याप्त रूप से शंका पैदा कर सकता है। लेकिन इसके बाद भी इस आंदोलन में जाति और धर्म के हिसाब से युवाओं की विविधता की भागीदारी उल्लेखनीय रही। न सिर्फ भागीदारी के स्तर पर बल्कि आंदोलन को तैयार करने और जारी रखने के स्तर पर। इसके लिए इन युवाओं ने किसी फैशनपरस्त और गुडलुकिंग युवा सांसद को भ्रष्टाचार की लड़ाई का प्रतीक नहीं बनाया। बल्कि अपने घर के पिछवाड़े में धकेल दिये गए बुज़ुर्गों में से एक को ढूंढ लाए और उनमें उन्हीं नैतिक मान्यताओं की खोज की जो हमारी राजनीति का आधार रहे हैं। १९७४ में भी युवाओं ने जयप्रकाश नारायण को खोजा था। वो ढूंढ लाए थे पटना में बीमारी से लड़ रहे जयप्रकाश नारायण को। इस बार ढूंढ लाए रालेगण सिद्धी गांव में बैठे अण्णा हज़ारे को।
लेकिन सवाल यहां एक और है जिसपर आंदोलन से लौट कर युवाओं को सोचना होगा। भाषण और नारेबाज़ी के बीच के फर्क का। बेचैनियों को आवाज़ देने के उतावलेपन में सहनशीलता को छोड़ देने के ख़तरे का। सांप्रदायिकता के प्रति सचेत रहने का होश गंवा देने के खतरा का। एक आंदोलन तभी कामयाब माना जाता है जब ऐसी आशंकाएं हाशिये पर ही खत्म हो जाएं,मुख्यधारा में न आएं। वसीम बरेलवी का एक शेर है। उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है,जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है, नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये,कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है। युवाओं की भागीदारी ने राजनीति को समृद्ध बनाया है मगर इस डर को उन्हें ही ग़लत साबित करना होगा कि उनकी भागीदारी से चलने वाले आंदोलन आगे किसी मोड़ पर संकुचित नहीं होंगे।
(आज के राजस्थान पत्रिका में छपा है)
आंदोलन चालू आहे
क्या आप भी अण्णा के आंदोलन का समर्थन करते-करते कई तरह के सवाल करने लगते हैं, या विरोध करते-करते तमाम सवालों की खोज करने लगते हैं। अगर ऐसा है तो आप उन लोगों में से हैं जिनकी बौद्धिकता को इस आंदोलन ने हिला कर रख दिया है। पांच अप्रैल को जबसे अण्णा का अनशन शुरू हुआ है तब से इस आंदोलन के तमाम पक्षों पर लगातार लिखा और बोला जा रहा है। देश की समस्याओं से जुड़े तमाम सवाल इस आंदोलन में ठेले जा रहे हैं जो कि चिन्ता के कई स्तरों पर जायज़ भी हैं। संभावनाओं की खोज करने वाली तमाम दलीलों को देखें तो आप उत्साहित हो जायेंगे। अकेले दैनिक भास्कर में ही अण्णा के आंदोलन पर छपे तमाम लेखों की एक किताब छाप दी जाए तो कई सौ पन्नों की हो जाएगी।
मेरी नज़र में अण्णा के आंदोलन का यह सबसे बड़ा योगदान है। लोग हर सवाल पर बहस कर रहे हैं।मेरे टीवी शो में दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने कह दिया कि इस आंदोलन में दलित नहीं हैं। सवर्णवादी आंदोलन है। प्राइम टाइम से बाहर आते ही तमाम दलित अफसरों के फोन आने लगे और कहने लगे कि चंद्रभान हमें मुख्यधारा से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं। चंद्रभान अपनी बात पर डटे रहे। मशहूर विद्वान आशीष नंदी ने तड़ से कहा कि मध्यमवर्ग का चरित्र बदल गया है। यह वो सत्तर के दशक वाला मध्यमवर्ग नहीं है जिसमें नब्बे फीसदी सवर्ण थे। आज के मध्यमवर्ग में पचास फीसदी दूसरी जाति समाज के भी लोग हैं। फिर यह सवाल उठा कि इसमें मुसलमान नहीं हैं। रविवार को जब दिल्ली के सीलमपुर और शाहदरा इलाके से गुज़र रहा था तब एक-एक गाड़ी में कई मुस्लिम युवा भरे हुए थे और हाथों में तिरंगा लेकर रामलीला की तरफ रवाना हो रहे थे। आयोजकों से बात की कि क्या आपके यहां दलित और मुस्लिम युवा सक्रिय नहीं हैं तो उन्होंने कई लोगों को सामने कर दिया। संतोष एक दलित लड़की थी जो छत्रसाल स्टेडियम में टीम अण्णा की तरफ से मोर्चा संभाले हुए थी। उसे बड़ा दुख हुआ कि दलित की पहचान कर सवाल किया गया। उसने कहा कि कई दलित युवा इस आंदोलन में शामिल हैं। फिर भी चंद्रभान के इस सवाल के साहस को मानना होगा जिसने इस आंदोलन को संविधान बदलने या लिखने की कोशिश में देखा और दलित राजनीति से जुड़े सवालों के संदर्भ में।
लेकिन क्या यह बेचैनी इसलिए भी नहीं कि इसके मंच पर दलित या मुस्लिम राजनीति के नेतृत्व के जाने-पहचाने चेहरे नहीं हैं। नेताओं के वो जाने-पहचाने समर्थक नहीं हैं जो उनके एक इशारे पर भारत की धार्मिक विभिन्नता का प्रदर्शन करते हुए मंच पर आ जाते थे। जैसे ही इस सवाल से गुज़र रहा था तो अंग्रेजी के अख़बार के एक ख़बर पर नज़र गई कि आधी रात के बाद रामलीला मैदान में आरक्षण विरोधी नारे भी लग रहे थे। संघ के समर्थन की ख़बरें छप रही हैं। जबकि अण्णा कह रहे हैं कि एक पार्टी जायेगी तो जो दूसरी आएगी वो भी भ्रष्टाचार में पीएचडी होगी। इसके बाद भी ऐसे तत्वों का आंदोलन में घुसना पुराने सवालों की गुज़ाइश की जगह बना ही देता है। वैसे आप देश भर से आ रही तस्वीरों को देखें तो उसमें काफी विविधता है। शायद इसीलिए हमें इस आंदोलन पर तुरंत किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तमाम सवालों और संभावनाओं के साथ लगातार नज़र रखनी चाहिए।
मध्यमवर्ग की बुनावट पर बहस होते होते इसके गांधीवादी चरित्र पर बात पहुंचती है तो आज़ादी के आंदोलन से जुड़े बहुत सारे किस्से और आख्यान मुख्यधारा की मीडिया से होते हुए जनमानस में पहुंचने लगते हैं। गांधी टोपी कैसे अण्णा टोपी का रूप धर कर यह बता रही है कि आज के समय में गांधी के प्रतीकों का नवीनीकरण भी हो सकता है। कुछ साल पहले आई जब फिल्म मुन्ना भाई आई तो उसके आस-पास के समय में मुन्ना भाई की गांधीगीरी को लोगों ने अपना लिया था। अब वे अण्णा की गांधीगीरी अपना रहे हैं। गांधी अब सिर्फ खादी वालों की बपौती नहीं हैं। रैली में आए लाखों लोगों ने अहिंसक तरीका अपना कर साबित कर दिया। लेकिन इस अहिंसा में अनशन की ज़िद पर जो सवाल खड़े हो रहे हैं वो भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। आजकल के अखबारों में आप देखिये। अनशन की ज़िद पर खूब लेख मिलेंगे। ये लोग तब नहीं लिख रहे थे जब सरकार नौ अप्रैल के बाद बनी ड्राफ्ट कमेटी की बैठकों में इस टीम की साख को कमतर करने में जुटी थी। जब सत्ता अपने अहंकार में टीम अण्णा को पांच लोगों की टीम समझ रही थी। कहां तो सरकार इस पूरे मामलों को लोकतांत्रिक बनाती और विपक्ष सहित अरुणा रॉय के लोकपाल ड्राफ्ट को भी केंद्र में ले आती। लेकिन उनकी टीम के सदस्य निखिल डे ने बताया कि ड्राफ्ट कमेटी को लिखने के बाद भी बुलावा नहीं आया। तब सरकार को सहनशीलता के पाठ पढ़ाने वाले लेख नहीं लिखे जा रहे थे। फिर भी यह सवाल वाजिब है कि इस तरह की ज़िद पर अड़ा आंदोलन आगे आने वाले समय में किस तरह की राजनीति की बुनियाद रखने वाला है।
इसमें एक दिलचस्प बात यह भी है कि इसमें बड़ी संख्या में सरकारी अफसरों को उद्वेलित कर दिया है। वो भी भ्रष्टाचार के सवाल से टकरा रहे हैं। नेताओं की ही नहीं अफसरों की भी साख दांव पर हैं। ऐसा माहौल बना है जिसमें उन्हें वाकई सार्वजनिक या पारिवारिक जीवन में जाने पर सवालों का सामना करना पड़ता होगा। कई अफसर एसएमएस कर रहे हैं कि उस भ्रष्टाचार का क्या होगा जो पैंतीस करोड़ की कोठियों में रहता है मगर एक्साईज़ से लेकर इंकम टैक्स नहीं देता। क्या हम सभी चोर हैं? इसीलिए लगता है कि यह आंदोलन सामाजिक जीवन में भी भ्रष्ट लोगों के प्रति सहनशीलता को काफी कम करेगा। दीर्घकालिक रूप से न सही मगर अस्थायी कमी भी एक सकारात्मक माहौल तो पैदा करेगे ही। वर्ना मैंने भी देखा है कि मिडिल क्लास के लोग आराम से भ्रष्ट अफसर रिश्तेदारों की महंगी शादियों में शिरकत करते हैं।
जिस समाज को हम उदारीकरण के जश्न भरे माहौल में व्यक्तिवादी का तमगा पहनाकर लानतें भेज चुके थें, वो अचानक कैसे सामूहिक हो गई है। उसे क्यों यह सपना आ रहा है कि भारत को कैसा होना चाहिए। जो उदारीकरण की संताने भारत महान के झंडे को लेकर विदेशों में गईं हैं वो भी भारत महान की इस सबसे बड़ी बीमारी के खिलाफ सड़कों पर उतरी है। वही लोग जो कल तक यह कहा करते थे कि मीडिया में नकारात्मक ख़बरें दिखाने से विदेशों में भारत की छवि ख़राब होती है,आज वही लोग विदेशों में अण्णा के समर्थन में झंडा लेकर निकले हैं।
हम किसी आंदोलन को मिडिल क्लास बताकर खारिज नहीं कर सकते। हाल के दिनों में मुख्य राजनीतिक दलों के बड़े नेता कार्यकर्ता ढूंढ रहे थे। नए कार्यकर्ताओं की खोज में उनका लंबा वक्त भी गुज़रा है। आखिर ये कौन लोग हैं जो बिना किसी एक राजनीतिक नेतृत्व के इतने बड़े आंदोलन को संचालित कर रहे हैं। जब भी मिडिल क्लास का जनउभार सामने आया है यही कहा गया है कि यह भीड़ आज आई है, कल खो जाएगी। मुंबई धमाके के बाद लाखों लोगों की भीड़ आतंक के खिलाफ उमड़ पड़ी थी। वो गुम हो गई। उससे पहले दिल्ली के इंडिया गेट पर ऐसी ही कई भीड़ आकर चली गई। मगर यह समझना चाहिए कि ये वो भीड़ है जो बार-बार आ रही है। अप्रैल में भी आई थी और अगस्त में भी आ रही है। सिर्फ इस बात से निश्चिंत होने की ज़रूरत नहीं कि ये लोग जल्दी लौट कर गुम हो जाएंगे। तब क्या करेंगे जब फिर आ जाएंगे।
(इसका संपादित अंश आज दैनिक भास्कर में छपा है, भास्कर से साभार)
मेरी नज़र में अण्णा के आंदोलन का यह सबसे बड़ा योगदान है। लोग हर सवाल पर बहस कर रहे हैं।मेरे टीवी शो में दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने कह दिया कि इस आंदोलन में दलित नहीं हैं। सवर्णवादी आंदोलन है। प्राइम टाइम से बाहर आते ही तमाम दलित अफसरों के फोन आने लगे और कहने लगे कि चंद्रभान हमें मुख्यधारा से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं। चंद्रभान अपनी बात पर डटे रहे। मशहूर विद्वान आशीष नंदी ने तड़ से कहा कि मध्यमवर्ग का चरित्र बदल गया है। यह वो सत्तर के दशक वाला मध्यमवर्ग नहीं है जिसमें नब्बे फीसदी सवर्ण थे। आज के मध्यमवर्ग में पचास फीसदी दूसरी जाति समाज के भी लोग हैं। फिर यह सवाल उठा कि इसमें मुसलमान नहीं हैं। रविवार को जब दिल्ली के सीलमपुर और शाहदरा इलाके से गुज़र रहा था तब एक-एक गाड़ी में कई मुस्लिम युवा भरे हुए थे और हाथों में तिरंगा लेकर रामलीला की तरफ रवाना हो रहे थे। आयोजकों से बात की कि क्या आपके यहां दलित और मुस्लिम युवा सक्रिय नहीं हैं तो उन्होंने कई लोगों को सामने कर दिया। संतोष एक दलित लड़की थी जो छत्रसाल स्टेडियम में टीम अण्णा की तरफ से मोर्चा संभाले हुए थी। उसे बड़ा दुख हुआ कि दलित की पहचान कर सवाल किया गया। उसने कहा कि कई दलित युवा इस आंदोलन में शामिल हैं। फिर भी चंद्रभान के इस सवाल के साहस को मानना होगा जिसने इस आंदोलन को संविधान बदलने या लिखने की कोशिश में देखा और दलित राजनीति से जुड़े सवालों के संदर्भ में।
लेकिन क्या यह बेचैनी इसलिए भी नहीं कि इसके मंच पर दलित या मुस्लिम राजनीति के नेतृत्व के जाने-पहचाने चेहरे नहीं हैं। नेताओं के वो जाने-पहचाने समर्थक नहीं हैं जो उनके एक इशारे पर भारत की धार्मिक विभिन्नता का प्रदर्शन करते हुए मंच पर आ जाते थे। जैसे ही इस सवाल से गुज़र रहा था तो अंग्रेजी के अख़बार के एक ख़बर पर नज़र गई कि आधी रात के बाद रामलीला मैदान में आरक्षण विरोधी नारे भी लग रहे थे। संघ के समर्थन की ख़बरें छप रही हैं। जबकि अण्णा कह रहे हैं कि एक पार्टी जायेगी तो जो दूसरी आएगी वो भी भ्रष्टाचार में पीएचडी होगी। इसके बाद भी ऐसे तत्वों का आंदोलन में घुसना पुराने सवालों की गुज़ाइश की जगह बना ही देता है। वैसे आप देश भर से आ रही तस्वीरों को देखें तो उसमें काफी विविधता है। शायद इसीलिए हमें इस आंदोलन पर तुरंत किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तमाम सवालों और संभावनाओं के साथ लगातार नज़र रखनी चाहिए।
मध्यमवर्ग की बुनावट पर बहस होते होते इसके गांधीवादी चरित्र पर बात पहुंचती है तो आज़ादी के आंदोलन से जुड़े बहुत सारे किस्से और आख्यान मुख्यधारा की मीडिया से होते हुए जनमानस में पहुंचने लगते हैं। गांधी टोपी कैसे अण्णा टोपी का रूप धर कर यह बता रही है कि आज के समय में गांधी के प्रतीकों का नवीनीकरण भी हो सकता है। कुछ साल पहले आई जब फिल्म मुन्ना भाई आई तो उसके आस-पास के समय में मुन्ना भाई की गांधीगीरी को लोगों ने अपना लिया था। अब वे अण्णा की गांधीगीरी अपना रहे हैं। गांधी अब सिर्फ खादी वालों की बपौती नहीं हैं। रैली में आए लाखों लोगों ने अहिंसक तरीका अपना कर साबित कर दिया। लेकिन इस अहिंसा में अनशन की ज़िद पर जो सवाल खड़े हो रहे हैं वो भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। आजकल के अखबारों में आप देखिये। अनशन की ज़िद पर खूब लेख मिलेंगे। ये लोग तब नहीं लिख रहे थे जब सरकार नौ अप्रैल के बाद बनी ड्राफ्ट कमेटी की बैठकों में इस टीम की साख को कमतर करने में जुटी थी। जब सत्ता अपने अहंकार में टीम अण्णा को पांच लोगों की टीम समझ रही थी। कहां तो सरकार इस पूरे मामलों को लोकतांत्रिक बनाती और विपक्ष सहित अरुणा रॉय के लोकपाल ड्राफ्ट को भी केंद्र में ले आती। लेकिन उनकी टीम के सदस्य निखिल डे ने बताया कि ड्राफ्ट कमेटी को लिखने के बाद भी बुलावा नहीं आया। तब सरकार को सहनशीलता के पाठ पढ़ाने वाले लेख नहीं लिखे जा रहे थे। फिर भी यह सवाल वाजिब है कि इस तरह की ज़िद पर अड़ा आंदोलन आगे आने वाले समय में किस तरह की राजनीति की बुनियाद रखने वाला है।
इसमें एक दिलचस्प बात यह भी है कि इसमें बड़ी संख्या में सरकारी अफसरों को उद्वेलित कर दिया है। वो भी भ्रष्टाचार के सवाल से टकरा रहे हैं। नेताओं की ही नहीं अफसरों की भी साख दांव पर हैं। ऐसा माहौल बना है जिसमें उन्हें वाकई सार्वजनिक या पारिवारिक जीवन में जाने पर सवालों का सामना करना पड़ता होगा। कई अफसर एसएमएस कर रहे हैं कि उस भ्रष्टाचार का क्या होगा जो पैंतीस करोड़ की कोठियों में रहता है मगर एक्साईज़ से लेकर इंकम टैक्स नहीं देता। क्या हम सभी चोर हैं? इसीलिए लगता है कि यह आंदोलन सामाजिक जीवन में भी भ्रष्ट लोगों के प्रति सहनशीलता को काफी कम करेगा। दीर्घकालिक रूप से न सही मगर अस्थायी कमी भी एक सकारात्मक माहौल तो पैदा करेगे ही। वर्ना मैंने भी देखा है कि मिडिल क्लास के लोग आराम से भ्रष्ट अफसर रिश्तेदारों की महंगी शादियों में शिरकत करते हैं।
जिस समाज को हम उदारीकरण के जश्न भरे माहौल में व्यक्तिवादी का तमगा पहनाकर लानतें भेज चुके थें, वो अचानक कैसे सामूहिक हो गई है। उसे क्यों यह सपना आ रहा है कि भारत को कैसा होना चाहिए। जो उदारीकरण की संताने भारत महान के झंडे को लेकर विदेशों में गईं हैं वो भी भारत महान की इस सबसे बड़ी बीमारी के खिलाफ सड़कों पर उतरी है। वही लोग जो कल तक यह कहा करते थे कि मीडिया में नकारात्मक ख़बरें दिखाने से विदेशों में भारत की छवि ख़राब होती है,आज वही लोग विदेशों में अण्णा के समर्थन में झंडा लेकर निकले हैं।
हम किसी आंदोलन को मिडिल क्लास बताकर खारिज नहीं कर सकते। हाल के दिनों में मुख्य राजनीतिक दलों के बड़े नेता कार्यकर्ता ढूंढ रहे थे। नए कार्यकर्ताओं की खोज में उनका लंबा वक्त भी गुज़रा है। आखिर ये कौन लोग हैं जो बिना किसी एक राजनीतिक नेतृत्व के इतने बड़े आंदोलन को संचालित कर रहे हैं। जब भी मिडिल क्लास का जनउभार सामने आया है यही कहा गया है कि यह भीड़ आज आई है, कल खो जाएगी। मुंबई धमाके के बाद लाखों लोगों की भीड़ आतंक के खिलाफ उमड़ पड़ी थी। वो गुम हो गई। उससे पहले दिल्ली के इंडिया गेट पर ऐसी ही कई भीड़ आकर चली गई। मगर यह समझना चाहिए कि ये वो भीड़ है जो बार-बार आ रही है। अप्रैल में भी आई थी और अगस्त में भी आ रही है। सिर्फ इस बात से निश्चिंत होने की ज़रूरत नहीं कि ये लोग जल्दी लौट कर गुम हो जाएंगे। तब क्या करेंगे जब फिर आ जाएंगे।
(इसका संपादित अंश आज दैनिक भास्कर में छपा है, भास्कर से साभार)
अण्णा पर फेसबुकी प्रतिक्रिया
1)आंदोलनों में भी वीकेंड की व्यवस्था होनी चाहिए। दो दिन का रेस्ट मिल जाता। आंदोलन लाइव काल में मुश्किल हो गया है। अण्णा आंदोलन ने महाआख्यान को जन्म दे दिया है। सरकार के अहंकार का चूर होना, मिडिल क्लास की व्यापकता,इसके भीतर तबकों की भागीदारी पर सवाल, संसदीय दादागीरी से आंदोलन की दादागीरी तक,संघ के हाईजैक कर लेने की आशंका, एंटी आरक्षण भीड़ की साज़िश आदि आदि। पूरा आंदोलन ही रामलीला ग्राउंड हो गया है। आप भी किसी भी गेट से अपने सवालों को लेकर प्रवेश कर जाइये। इसे डिबेट मूवमेंट भी कहा जाना चाहिए।
2)अण्णा के आंदोलन में प्रतिक्रियाओं की इतनी विविधता है कि पता ही नहीं चलता कि थ्योरी कहां गई। मैं कोई संपूर्ण तो हूं नहीं। विषयांतर बहुत हुआ इसलिए मुझे भी लगा कि जमा नहीं आज मामला। रही बात चंद्रभान के सवाल की तो सुनना चाहिए।उनका काट तो था शो में। वो साहसिक व्यक्ति हैं। इसी शो में आरक्षण पर बैन की मांग का विरोध कर गए। कहा कि दलित संगठन कमज़ोर हैं। किसी आंदोलन का आत्मविश्वास बताता है कि वो हर सवाल से सामना करने के लिए तैयार है। जो लोग बीच में चैनल बदल गए मेरा नुकसान कर गए। टीआरपी लॉस।
3)आपकी प्रतिक्रियाओं से मेरी राय बदल रही है। प्राइम टाइम इतना भी बुरा नहीं था। कई सवाल मिल गए आपको शो के बाद बहस करने के लिए। वैसे भी समाधान देना मेरा काम नहीं है। सवाल खड़े हो जाएं वही बहुत है। दुखद समाचार यह है कि टीआरपी का क्या करें। क्या शो में वाकई ऐसी कमी है कि दर्शक बंध नहीं रहा। खुल कर बताइयेगा वर्ना अगले हफ्ते से प्रयोग बंद, फार्मूला चालू। नहीं ये मैं नहीं करूंगा। प्रयोग चालू रहेगा। गु़डनाइट।
4)अण्णा के आंदोलन की नियति पर सवाल कर सकते हैं मगर मुझे नहीं लगता कि इसमें सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं है। शामिल होने वाले लोगों के लिहाज़ से और आयोजकों के समूह को देखने के लिहाज़ से। जो लोग सवाल कर रहे हैं वो किस आधार पर कह रहे हैं कि इसमें अमुक जाति के नहीं हैं और अमुक के ही हैं। यह एक जनआंदोलन है। अण्णा का भी नहीं रहा अब तो। यह लोगों का आंदोलन है। खिलाफ में बात कही जानी चाहिए मगर तथ्य तो हों पहले।
5)आशीष नंदी ने कहा कि मध्यमवर्ग को नए नज़रिये से देखने की ज़रूरत है। नब्बे के दशक के पहले के मध्यमवर्ग में नब्बे फीसदी सवर्ण थे। अब मध्यमवर्ग का ढांचा बदला है। इसमें पचास फीसदी अभी भी सवर्ण हैं लेकिन बाकी के पचास में दलित भी हैं। और भी तबके हैं। आदिवासी नहीं हैं। और यह एक शानदार आंदोलन है जिसने सत्ता के अहंकार को बेजोड़ चुनौती दी है।
6)शो के दौरान और बाद में कई दलित अधिकारियों के फोन आने लगे। कहने लगे कि दलित नहीं है इस आंदोलन में ऐसा न कहें। ऐसा कहकर आप हमें अलग-थलग कह रहे हैं। दफ्तर का फोन जाम हो गया। मुझे इस बात की गाली पड़ रही है कि दलित नहीं है ये सवाल महत्वपूर्ण नहीं है। वो हैं। गढ़वाल से एक एक्ज़िक्यूटिव इंजीनियर का फोन आया। कहा कि मैं दलित हूं। रोज़ शाम को मोमबत्ती लेकर निकलता हूं। लेबर विभाग के एक अफसर का फोन आ गया। कहा कि ये सवाल हम दलितों को मुख्यधारा से अलग कर रहा है।
7)दलित जनमत के भीतर की विविधता को नज़रअंदाज़ करना ख़तरनाक है। वो दलित नहीं है। वो दलितों के रूप में हैं। शो में जब यह सवाल उठा कि दलित नहीं हैं इस मिडिल क्लास मूवमेंट में तो टीम अण्णा की एक पुरानी सदस्य संतोष ने कहा कि वे ही छत्रसाल स्टेडियम में सब संभाल रही हैं। उनके साथ बहुत दलित लड़के लड़कियां हैं। आयोजकों में कई मुस्लिम युवा हैं। अण्णा आंदोलन की नुमाइंदगी की आलोचना तथ्यों पर हो। डिब्बावाला संघ ने बताया कि उनके संगठन में सभी जाति के हैं। वो अण्णा का समर्थन कर रहे हैं।
8)मध्यमवर्ग-जब वो सो रहा था तब गाली सुन रहा था, जब जागता है तब गाली सुनता है। पाश ठीक कहते थे बीच का कोई रास्ता नहीं होता। बीच का कोई वर्ग नहीं होता। मध्यमवर्ग को नामकरण दूसरा कर लेना चाहिए। इस आंदोलन की सबसे बड़ी खूबी है कि अप्रैल से अगस्त हो गया इसके भीतर इतने एंगल हैं कि आप कई सवालों और कई संभावनाओं के साथ इसे देख सकते हैं। लेकिन सिविल सोसायटी का हिन्दी नामकरण कैसा है। नागरिक जमात या नागरिक तबका। ये दोनों नाम जनसत्ता के संपादक ओम थाणवी ने सुझाये हैं। आप क्या पसंद करते हैं।
2)अण्णा के आंदोलन में प्रतिक्रियाओं की इतनी विविधता है कि पता ही नहीं चलता कि थ्योरी कहां गई। मैं कोई संपूर्ण तो हूं नहीं। विषयांतर बहुत हुआ इसलिए मुझे भी लगा कि जमा नहीं आज मामला। रही बात चंद्रभान के सवाल की तो सुनना चाहिए।उनका काट तो था शो में। वो साहसिक व्यक्ति हैं। इसी शो में आरक्षण पर बैन की मांग का विरोध कर गए। कहा कि दलित संगठन कमज़ोर हैं। किसी आंदोलन का आत्मविश्वास बताता है कि वो हर सवाल से सामना करने के लिए तैयार है। जो लोग बीच में चैनल बदल गए मेरा नुकसान कर गए। टीआरपी लॉस।
3)आपकी प्रतिक्रियाओं से मेरी राय बदल रही है। प्राइम टाइम इतना भी बुरा नहीं था। कई सवाल मिल गए आपको शो के बाद बहस करने के लिए। वैसे भी समाधान देना मेरा काम नहीं है। सवाल खड़े हो जाएं वही बहुत है। दुखद समाचार यह है कि टीआरपी का क्या करें। क्या शो में वाकई ऐसी कमी है कि दर्शक बंध नहीं रहा। खुल कर बताइयेगा वर्ना अगले हफ्ते से प्रयोग बंद, फार्मूला चालू। नहीं ये मैं नहीं करूंगा। प्रयोग चालू रहेगा। गु़डनाइट।
4)अण्णा के आंदोलन की नियति पर सवाल कर सकते हैं मगर मुझे नहीं लगता कि इसमें सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं है। शामिल होने वाले लोगों के लिहाज़ से और आयोजकों के समूह को देखने के लिहाज़ से। जो लोग सवाल कर रहे हैं वो किस आधार पर कह रहे हैं कि इसमें अमुक जाति के नहीं हैं और अमुक के ही हैं। यह एक जनआंदोलन है। अण्णा का भी नहीं रहा अब तो। यह लोगों का आंदोलन है। खिलाफ में बात कही जानी चाहिए मगर तथ्य तो हों पहले।
5)आशीष नंदी ने कहा कि मध्यमवर्ग को नए नज़रिये से देखने की ज़रूरत है। नब्बे के दशक के पहले के मध्यमवर्ग में नब्बे फीसदी सवर्ण थे। अब मध्यमवर्ग का ढांचा बदला है। इसमें पचास फीसदी अभी भी सवर्ण हैं लेकिन बाकी के पचास में दलित भी हैं। और भी तबके हैं। आदिवासी नहीं हैं। और यह एक शानदार आंदोलन है जिसने सत्ता के अहंकार को बेजोड़ चुनौती दी है।
6)शो के दौरान और बाद में कई दलित अधिकारियों के फोन आने लगे। कहने लगे कि दलित नहीं है इस आंदोलन में ऐसा न कहें। ऐसा कहकर आप हमें अलग-थलग कह रहे हैं। दफ्तर का फोन जाम हो गया। मुझे इस बात की गाली पड़ रही है कि दलित नहीं है ये सवाल महत्वपूर्ण नहीं है। वो हैं। गढ़वाल से एक एक्ज़िक्यूटिव इंजीनियर का फोन आया। कहा कि मैं दलित हूं। रोज़ शाम को मोमबत्ती लेकर निकलता हूं। लेबर विभाग के एक अफसर का फोन आ गया। कहा कि ये सवाल हम दलितों को मुख्यधारा से अलग कर रहा है।
7)दलित जनमत के भीतर की विविधता को नज़रअंदाज़ करना ख़तरनाक है। वो दलित नहीं है। वो दलितों के रूप में हैं। शो में जब यह सवाल उठा कि दलित नहीं हैं इस मिडिल क्लास मूवमेंट में तो टीम अण्णा की एक पुरानी सदस्य संतोष ने कहा कि वे ही छत्रसाल स्टेडियम में सब संभाल रही हैं। उनके साथ बहुत दलित लड़के लड़कियां हैं। आयोजकों में कई मुस्लिम युवा हैं। अण्णा आंदोलन की नुमाइंदगी की आलोचना तथ्यों पर हो। डिब्बावाला संघ ने बताया कि उनके संगठन में सभी जाति के हैं। वो अण्णा का समर्थन कर रहे हैं।
8)मध्यमवर्ग-जब वो सो रहा था तब गाली सुन रहा था, जब जागता है तब गाली सुनता है। पाश ठीक कहते थे बीच का कोई रास्ता नहीं होता। बीच का कोई वर्ग नहीं होता। मध्यमवर्ग को नामकरण दूसरा कर लेना चाहिए। इस आंदोलन की सबसे बड़ी खूबी है कि अप्रैल से अगस्त हो गया इसके भीतर इतने एंगल हैं कि आप कई सवालों और कई संभावनाओं के साथ इसे देख सकते हैं। लेकिन सिविल सोसायटी का हिन्दी नामकरण कैसा है। नागरिक जमात या नागरिक तबका। ये दोनों नाम जनसत्ता के संपादक ओम थाणवी ने सुझाये हैं। आप क्या पसंद करते हैं।
लघु प्रेम कथा
1)
मूंग धुली दाल की तरह चमकती दिल्ली और घने-हरे पेड़ों की मस्ती के नीचे लोधी गार्डन में उसने अपने कदम तेज़ कर लिये। बालों को समेट कर शर्मिला टैगोर मार्का जूड़ा बना लिया। साड़ी मुमताज़ जैसी। पीछा करती आवाज़ से बचने के लिए उसने तेज़ी से सड़क पार की और ख़ान मार्केट की दुकानों को निहारते चलने लगी। वो आवाज़ अब भी आ रही थी..हमीं जब न होंगे तो ऐ दिलरुबा..किसे देखकर हाय शर्माओगे...बदन पे सितारे...कहां जा रही हो,पांव ठिठक से गए, दुकान के शीशे पर प्रिंस की तस्वीर,उफ्फ शम्मी,विल मिस यू।(लप्रेक)
2)
अभी-अभी वो शहीद देखकर निकला था। गोलचा सिनेमा से बाहर आते ही डिवाइडर पर खड़े होकर भाषण देने लगा। लानत है यह जवानी जो मुल्क के काम न आए। तोड़ दो बेड़ियों को। वो घबरा गई। अचानक से तुम्हें क्या हो गया। फ़िल्म के असर में इंक़लाब की बातें न करो। अब इंकलाब की इजाज़त नहीं है देश में। कल ही एक मंत्री ने कहा है। मैंने तो पहले ही कहा था कि ज़िंदगी मिलेगी न दोबारा देखते हैं। कभी-कभी तो इस मुल्क पर खुश होना सीखो जानम।( लप्रेक)
3)
अभी-अभी वो शहीद देखकर निकला था। गोलचा सिनेमा से बाहर आते ही डिवाइडर पर खड़े होकर भाषण देने लगा। लानत है यह जवानी जो मुल्क के काम न आए। तोड़ दो बेड़ियों को। वो घबरा गई। अचानक से तुम्हें क्या हो गया। फ़िल्म के असर में इंक़लाब की बातें न करो। अब इंकलाब की इजाज़त नहीं है देश में। कल ही एक मंत्री ने कहा है। मैंने तो पहले ही कहा था कि ज़िंदगी मिलेगी न दोबारा देखते हैं। कभी-कभी तो इस मुल्क पर खुश होना सीखो जानम।( लप्रेक)
4)
मसूर की दाल तो मालवीय नगर में भी मिलती है। लेकिन मुझे शापिंग का अहसास होता ही है ख़ान मार्केट में। वहां मुझे कोई जानता नहीं बट सब अपने जैसे लगते हैं। डार्लिंग सवाल वहां की भीड़ का नहीं है। मसूर की दाल का है। ओफ्फो,तुम्हारा भी न,क्लास नहीं है। ये कार, गोगल्स, डियोड्रेंट तुमने ड्राइंग रूम के लिए ख़रीदे हैं क्या। मुझे जीने दो और जाने दो। और तुम क्यों जाते हो ओबेरॉय में कॉफी पीने? क्या पता ज़िंदगी मिले न दोबारा। फिल्म देखकर आए तो दोनों के झगड़े भी बदल गए।(लप्रेक)
5)
नहीं मैं इस्तीफा नहीं दूंगा। गहरी नींद से अचानक वह जाग गया। क्या हुआ। बगल में जाग रही लाजवंती ने पूछा तो अलबलाने लगा। सपना देख रहा था। क्या? यही कि सीएजी में नाम आ गया है। लोकायुक्त की रिपोर्ट में भी नाम है। लोगों ने मुझे घेर लिया है। इस्तीफा मांग रहे हैं। हां तो ये कौन सा सपना है। जो दिन में देखते हो, वही रात में भी । छोड़ों रिपोर्टिंग। एंकर बन जाओ। सपने नहीं आएंगे। क्या पता तब तुम किसी सपने में टाई में लटके मिलो। न बाबा न। मेरे ख्याल से तुम सपने देखना ही छोड़ दो।( लप्रेक)
6)
दोनों परेशान थे। सीएजी की रिपोर्ट में बारापुला का नाम देखकर। बारापुला पर ही खड़े होकर दोनों ने हुमायूं के मकबरे की पीठ की तरफ अपना सीना कर कसमें खाईं थीं। हमेशा हमेशा के लिए बारापुला पर आकर उसे निहारने का वादा किया था। अखबार में ख़बर देख वो घबराई हुई थी। कहने लगी कि इस पुल के साथ हमारा प्यार भी दाग़दार हो गया है। हमें क्यों न मालूम चल सका कि जिस बारापुला पर खड़े होकर हम एक दूसरे का हाथ थामे रहे, उसकी बुनियाद किसी घोटाले में है। अल्लाह, ये इश्क़ का कौन सा इम्तहान है।( लप्रेक)
7)
चित्तरंजन पार्के के मार्केट वन में कतला पर तरसती उसकी निगाहें जब उठीं तो मछलियों की भीड़ से टैंगड़ा चुनती उसकी कलाई पर टिक गई। ताज़ी मछली को चुन लेना पारखी निगाहों का काम है। कतला छोड़ वो भी टैंगड़ा ढूंढने लगा। कलाइयां टकराने लगीं। बगल में बेसुध पड़ी पाबदा और रोहू का कटा बड़ा सा हिस्सा,ताज़ी मछली ले लो की चिचियाहट,निगाहें जब मिलती हैं तो सूखी ज़मीन पर मछलियों की तरह तड़पने-तैरने लगती हैं। तब तक तड़पती है जब तक कोई काट कर झट से उसे पीस में न बदल दे। (लप्रेक)
8)
मूंग धुली दाल की तरह चमकती दिल्ली और घने-हरे पेड़ों की मस्ती के नीचे लोधी गार्डन में उसने अपने कदम तेज़ कर लिये। बालों को समेट कर शर्मिला टैगोर मार्का जूड़ा बना लिया। साड़ी मुमताज़ जैसी। पीछा करती आवाज़ से बचने के लिए उसने तेज़ी से सड़क पार की और ख़ान मार्केट की दुकानों को निहारते चलने लगी। वो आवाज़ अब भी आ रही थी..हमीं जब न होंगे तो ऐ दिलरुबा..किसे देखकर हाय शर्माओगे...बदन पे सितारे...कहां जा रही हो,पांव ठिठक से गए, दुकान के शीशे पर प्रिंस की तस्वीर,उफ्फ शम्मी,विल मिस यू।(लप्रेक)
2)
अभी-अभी वो शहीद देखकर निकला था। गोलचा सिनेमा से बाहर आते ही डिवाइडर पर खड़े होकर भाषण देने लगा। लानत है यह जवानी जो मुल्क के काम न आए। तोड़ दो बेड़ियों को। वो घबरा गई। अचानक से तुम्हें क्या हो गया। फ़िल्म के असर में इंक़लाब की बातें न करो। अब इंकलाब की इजाज़त नहीं है देश में। कल ही एक मंत्री ने कहा है। मैंने तो पहले ही कहा था कि ज़िंदगी मिलेगी न दोबारा देखते हैं। कभी-कभी तो इस मुल्क पर खुश होना सीखो जानम।( लप्रेक)
3)
अभी-अभी वो शहीद देखकर निकला था। गोलचा सिनेमा से बाहर आते ही डिवाइडर पर खड़े होकर भाषण देने लगा। लानत है यह जवानी जो मुल्क के काम न आए। तोड़ दो बेड़ियों को। वो घबरा गई। अचानक से तुम्हें क्या हो गया। फ़िल्म के असर में इंक़लाब की बातें न करो। अब इंकलाब की इजाज़त नहीं है देश में। कल ही एक मंत्री ने कहा है। मैंने तो पहले ही कहा था कि ज़िंदगी मिलेगी न दोबारा देखते हैं। कभी-कभी तो इस मुल्क पर खुश होना सीखो जानम।( लप्रेक)
4)
मसूर की दाल तो मालवीय नगर में भी मिलती है। लेकिन मुझे शापिंग का अहसास होता ही है ख़ान मार्केट में। वहां मुझे कोई जानता नहीं बट सब अपने जैसे लगते हैं। डार्लिंग सवाल वहां की भीड़ का नहीं है। मसूर की दाल का है। ओफ्फो,तुम्हारा भी न,क्लास नहीं है। ये कार, गोगल्स, डियोड्रेंट तुमने ड्राइंग रूम के लिए ख़रीदे हैं क्या। मुझे जीने दो और जाने दो। और तुम क्यों जाते हो ओबेरॉय में कॉफी पीने? क्या पता ज़िंदगी मिले न दोबारा। फिल्म देखकर आए तो दोनों के झगड़े भी बदल गए।(लप्रेक)
5)
नहीं मैं इस्तीफा नहीं दूंगा। गहरी नींद से अचानक वह जाग गया। क्या हुआ। बगल में जाग रही लाजवंती ने पूछा तो अलबलाने लगा। सपना देख रहा था। क्या? यही कि सीएजी में नाम आ गया है। लोकायुक्त की रिपोर्ट में भी नाम है। लोगों ने मुझे घेर लिया है। इस्तीफा मांग रहे हैं। हां तो ये कौन सा सपना है। जो दिन में देखते हो, वही रात में भी । छोड़ों रिपोर्टिंग। एंकर बन जाओ। सपने नहीं आएंगे। क्या पता तब तुम किसी सपने में टाई में लटके मिलो। न बाबा न। मेरे ख्याल से तुम सपने देखना ही छोड़ दो।( लप्रेक)
6)
दोनों परेशान थे। सीएजी की रिपोर्ट में बारापुला का नाम देखकर। बारापुला पर ही खड़े होकर दोनों ने हुमायूं के मकबरे की पीठ की तरफ अपना सीना कर कसमें खाईं थीं। हमेशा हमेशा के लिए बारापुला पर आकर उसे निहारने का वादा किया था। अखबार में ख़बर देख वो घबराई हुई थी। कहने लगी कि इस पुल के साथ हमारा प्यार भी दाग़दार हो गया है। हमें क्यों न मालूम चल सका कि जिस बारापुला पर खड़े होकर हम एक दूसरे का हाथ थामे रहे, उसकी बुनियाद किसी घोटाले में है। अल्लाह, ये इश्क़ का कौन सा इम्तहान है।( लप्रेक)
7)
चित्तरंजन पार्के के मार्केट वन में कतला पर तरसती उसकी निगाहें जब उठीं तो मछलियों की भीड़ से टैंगड़ा चुनती उसकी कलाई पर टिक गई। ताज़ी मछली को चुन लेना पारखी निगाहों का काम है। कतला छोड़ वो भी टैंगड़ा ढूंढने लगा। कलाइयां टकराने लगीं। बगल में बेसुध पड़ी पाबदा और रोहू का कटा बड़ा सा हिस्सा,ताज़ी मछली ले लो की चिचियाहट,निगाहें जब मिलती हैं तो सूखी ज़मीन पर मछलियों की तरह तड़पने-तैरने लगती हैं। तब तक तड़पती है जब तक कोई काट कर झट से उसे पीस में न बदल दे। (लप्रेक)
8)
बोल के लब आज़ाद हैं तेरे (मनमोहन की चुप्पी पर विशेष)
वो नहीं बोलते हैं तो ख़बर है। बोलते हैं तो ख़बर है। लोकतंत्र में कोई प्रधानमंत्री बोलने जा रहा है, यह भी ख़बर है। ख़बर कम है। लोकतंत्र का अपमान ज़्यादा। क्या आप मान सकते हैं कि प्रधानमंत्री को बोलने नहीं आता है। फिर वो क्लास में अपने छात्रों को कैसे पढ़ाते होंगे। अधिकारियों के साथ मीटिंग करते वक्त तो बोलते ही होंगे। अपनी राय तो रखते ही होंगे। यह कैसे हो सकता है कि दुनिया भर के अनुभवों वाला एक शख्स रबर स्टाम्प ही बना रहे। विश्वास करना मुश्किल होता है। कोई ज़बरदस्ती चुप रह कर यहां तक नहीं पहुंच सकता। कुछ तो उनकी अपनी राय होगी,जिससे उनके धीमे सुर में ही सही बोलते वक्त लगता होगा कि आदमी योग्य है। वर्ना मुंह न खोलने की शर्त पर उनकी योग्य छवि कैसे बनी। मालूम नहीं कि ज़िद में आकर मनमोहन सिंह नहीं बोलते या उन्हें बोलने की इजाज़त नहीं है। दोनों ही स्थिति में मामला ख़तरनाक लगता है।
जिस मनमोहन सिंह की मुख्यधारा की मीडिया ने लगातार तारीफ़ की हो अब उन्हीं की आलोचना हो रही है। यूपीए वन में उनकी चुप्पी को लोग खूबी बताया करते थे। कहा करते थे कि ये प्रधानमंत्री भाषण कम देता है। दिन भर काम करता है। देर रात तक काम करता है। यूपीए वन के वक्त लोकसभा में विश्वासमत जीतने के बाद बाहर आकर विक्ट्री साइन भी बनाता है। जीत के उन लम्हों को याद कीजिए,फिर आपको नहीं लगेगा कि मनमोहन सिंह चुप रहने वाले शख्स होंगे। संपादकों की बेचैनी का कोई मतलब नहीं है। उन्हें बेवजह लगता है कि प्रधानमंत्री उनसे बात नहीं करते। इसलिए कई संपादकों ने लिखा कि वे बात क्यों नहीं कर रहे हैं। सवाल यही महत्वपूर्ण है कि कई मौकों पर प्रधानमंत्री देश से संवाद क्यों नहीं करते? अपना लिखित बयान भी जारी नहीं करते। अगर सवाल-जवाब से दिक्कत है तो लिखित बयान भी नियमित रूप से जारी किये जा सकते थे। जनता स्वीकार कर लेती। कहती कि अच्छा है प्रधानमंत्री कम बोलते हैं मगर बोलते हैं तो काम का बोलते हैं। लिखित बोलते हैं। यह भी नहीं हुआ। जबकि प्रधानमंत्री के पास मीडिया सलाहकार के रूप में एक अलग से दफ्तर है। क्या ये लोग यह सलाह देते हैं कि सर आप मत बोलिये। अगर सर नहीं बोल रहे हैं तो मीडिया सलाहकार तो बोल ही सकते हैं। कोई चुप रहने की सलाह दे रहा है या कोई न बोलने का आदेश,दावे के साथ कहना मुश्किल है मगर समझना मुश्किल नहीं।
लेकिन यह भी समझना चाहिए कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हमारी आपकी तरह किसी कंपनी की नौकरी नहीं कर रहे। देश के सबसे बड़े पद पर आसीन हैं। उसे छोड़ भी देंगे तो करदाताओं के पैसे से सरकार उन्हें ससम्मान रखेगी। वो एक बार पूरे टर्म प्रधानमंत्री रह चुके हैं। उनकी मजबूरियां समझ नहीं आतीं। कोई वजह नहीं है। तो क्या मान लिया जाए कि उन्हें किसी चीज़ से मतलब नहीं हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में यकीन नहीं है। जो मन करेगा, करेंगे। जो मन करेगा, नहीं बोलेंगे। हठयोग पर हैं मौनी बाबा। इनके गुरु रहे हैं पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव। वो भी नहीं बोलते थे। कल उनका जन्मदिन था। मनमोहन सिंह आंध्र भवन गए थे जहां नरसिम्हा राव की याद में कुछ कार्यक्रम हुआ था। जिस राव को कांग्रेस में कोई पसंद नहीं करता, उससे रिश्ता निभाने का सार्वजनिक प्रदर्शन करने वाले मनमोहन सिंह के बारे में क्या आप कह सकते हैं कि वे दब्बू हैं। लगता नहीं है। उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में विश्वास कम है। शायद इसीलिए वे पिछले साल सितंबर के बाद आज के दिन देश के पांच संपादकों से मिलेंगे। टीवी वालों से नहीं मिला। पिछली बार फरवरी में न्यूज़ चैनलों के संपादकों,संवाददाताओं से मुलाकात की थी। इस बार लंबी चुप्पी के बाद टीवी को पहले चांस नहीं मिला। वो इस डर से भी कि अगर ऐसा हुआ तो टीवी वाले दिन भर बवाल काटेंगे। हर भाव, हर मुद्रा पर चर्चा कर डालेंगे। कुल मिलाकर मनमोहन सिंह की एक कमज़ोर छवि ही निकलेगी। अब अखबार के संपादकों से सवाल तो यही सब पूछे जायेंगे। यही कि क्या मनमोहन सिंह आहत हैं? क्या कहा उन्होंने न बोलने के फैसले पर? क्या वो देश के काम में लगे हैं? अगर दिन रात काम में ही लगे हैं तो देश की हालत ऐसी क्यों हैं? जनता फटीचर हालत में क्यों हैं?
क्या यह शर्मनाक नहीं है कि कांग्रेस की कार्यसमिति में प्रधानमंत्री के सामने उनके सहयोगी राजनेता यह सुझाव दें कि आप बोला कीजिए। आप कम बोलते हैं। या तो आप राष्ट्र के नाम संदेश दे दें या फिर मीडिया से बात कर लें। अभी तक विपक्ष ही बोलता था कि प्रधानमंत्री नहीं बोलते हैं। अब उनकी पार्टी के लोग ही बोलने लगे हैं। हद है ये तो बोलते ही नहीं हैं। तो क्या यह दलील पूरी तरह सही है कि वे पार्टी के दबाव में नहीं बोलते हैं। फिर पार्टी के लोग यह मांग क्यों करते हैं? फिर उनके सहयोगी गृहमंत्री पी चिदंबरम एनडीटीवी की सोनिया वर्मा सिंह के इंटरव्यू में खुलेआम बोलकर जाते हैं कि चुप रहना उनका स्टाइल है मगर मुझे भी लगता है कि प्रधानमंत्री को कुछ ज्यादा संवाद करना चाहिए। थक हार कर जब वे नहीं बोले तो सरकार ने मीडिया से बोलने के लिए पांच मंत्रियों का समूह बना दिया। पिछले रविवार अर्णब गोस्वामी के वर्सेस कार्यक्रम में आउटलुक के संपादक विनोद मेहता ने सलमान खुर्शीद की क्लास ले ली। कह दिया कि इन पांच मंत्रियों ने अन्ना के मामले में जिस तरह से मीडिया को हैंडल किया है वो पब्लिक रिलेशन के कोर्स में डिज़ास्टर के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। ज़ाहिर है प्रधानमंत्री पर दबाव कम है। दबाव की बातों में अतिशयोक्ति है। नहीं बोलने का उनका फैसला अपना है। ज़िद है। वर्ना बोलने को लेकर विवाद इसी महीने से तो नहीं शुरू हुआ न। वो तो कॉमनवेल्थ के समय से ही चल रहा है।
मनमोहन सिंह को लगता ही नहीं कि लोकतंत्र में संवाद ज़रूरी है। इसलिए वो नहीं बोलते हैं। पिछले कुछ महीनों से कई बड़े संपादकों ने शनिचर-एतवार के अपने कॉलमों में इसकी आलोचना की और सुझाव दिये कि कैसी सरकार है। न काम कर पा रही है न बोल पा रही है। सिर्फ चली जा रही है। अटल बिहारी वाजपेयी तो चलते-चलते बात कर लेते थे। अटलजी-अटलजी की आवाज़ आती थी,वो प्रेस की तरफ मुड़ जाते थे। कुछ तंज,कुछ रंज और कुछ व्यंग्य कर के चले जाते थे। वो छोटे-मोटे समारोहों में भी जाते रहते थे। वहां कुछ न कुछ बोल आते थे। हर साल शायद पहली तारीख को उनके विचार आ जाते थे। अटल म्यूज़िंग। कितना बोलें और कब बोलें,यह प्रधानमंत्री का अपना फैसला होना चाहिए। मगर कभी बोलेंगे ही नहीं तो इस पर जनता को फैसला कर लेना चाहिए। पिछले पंद्रह साल के मीडिया कवरेज का इतिहास निकालिये। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हिस्से में सिर्फ तारीफ ही आई है। पिछले पंद्रह महीनों के मीडिया कवरेज का इतिहास निकाल कर देखिये,मनमोहन सिंह के हिस्से में सिर्फ आलोचना ही आई है। हमारा समाज चुप रहने वालों को धीर गंभीर कहता है मगर यहां तो मनमोहन सिंह इतने चुप हो गए कि अब लोग इस चुप्पी को अड़ना समझने लगे हैं।
मैं तो सोच रहा हूं कि आज रात प्राइम टाइम में इस पर बहस ही कर डालूं।
जिस मनमोहन सिंह की मुख्यधारा की मीडिया ने लगातार तारीफ़ की हो अब उन्हीं की आलोचना हो रही है। यूपीए वन में उनकी चुप्पी को लोग खूबी बताया करते थे। कहा करते थे कि ये प्रधानमंत्री भाषण कम देता है। दिन भर काम करता है। देर रात तक काम करता है। यूपीए वन के वक्त लोकसभा में विश्वासमत जीतने के बाद बाहर आकर विक्ट्री साइन भी बनाता है। जीत के उन लम्हों को याद कीजिए,फिर आपको नहीं लगेगा कि मनमोहन सिंह चुप रहने वाले शख्स होंगे। संपादकों की बेचैनी का कोई मतलब नहीं है। उन्हें बेवजह लगता है कि प्रधानमंत्री उनसे बात नहीं करते। इसलिए कई संपादकों ने लिखा कि वे बात क्यों नहीं कर रहे हैं। सवाल यही महत्वपूर्ण है कि कई मौकों पर प्रधानमंत्री देश से संवाद क्यों नहीं करते? अपना लिखित बयान भी जारी नहीं करते। अगर सवाल-जवाब से दिक्कत है तो लिखित बयान भी नियमित रूप से जारी किये जा सकते थे। जनता स्वीकार कर लेती। कहती कि अच्छा है प्रधानमंत्री कम बोलते हैं मगर बोलते हैं तो काम का बोलते हैं। लिखित बोलते हैं। यह भी नहीं हुआ। जबकि प्रधानमंत्री के पास मीडिया सलाहकार के रूप में एक अलग से दफ्तर है। क्या ये लोग यह सलाह देते हैं कि सर आप मत बोलिये। अगर सर नहीं बोल रहे हैं तो मीडिया सलाहकार तो बोल ही सकते हैं। कोई चुप रहने की सलाह दे रहा है या कोई न बोलने का आदेश,दावे के साथ कहना मुश्किल है मगर समझना मुश्किल नहीं।
लेकिन यह भी समझना चाहिए कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हमारी आपकी तरह किसी कंपनी की नौकरी नहीं कर रहे। देश के सबसे बड़े पद पर आसीन हैं। उसे छोड़ भी देंगे तो करदाताओं के पैसे से सरकार उन्हें ससम्मान रखेगी। वो एक बार पूरे टर्म प्रधानमंत्री रह चुके हैं। उनकी मजबूरियां समझ नहीं आतीं। कोई वजह नहीं है। तो क्या मान लिया जाए कि उन्हें किसी चीज़ से मतलब नहीं हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में यकीन नहीं है। जो मन करेगा, करेंगे। जो मन करेगा, नहीं बोलेंगे। हठयोग पर हैं मौनी बाबा। इनके गुरु रहे हैं पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव। वो भी नहीं बोलते थे। कल उनका जन्मदिन था। मनमोहन सिंह आंध्र भवन गए थे जहां नरसिम्हा राव की याद में कुछ कार्यक्रम हुआ था। जिस राव को कांग्रेस में कोई पसंद नहीं करता, उससे रिश्ता निभाने का सार्वजनिक प्रदर्शन करने वाले मनमोहन सिंह के बारे में क्या आप कह सकते हैं कि वे दब्बू हैं। लगता नहीं है। उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में विश्वास कम है। शायद इसीलिए वे पिछले साल सितंबर के बाद आज के दिन देश के पांच संपादकों से मिलेंगे। टीवी वालों से नहीं मिला। पिछली बार फरवरी में न्यूज़ चैनलों के संपादकों,संवाददाताओं से मुलाकात की थी। इस बार लंबी चुप्पी के बाद टीवी को पहले चांस नहीं मिला। वो इस डर से भी कि अगर ऐसा हुआ तो टीवी वाले दिन भर बवाल काटेंगे। हर भाव, हर मुद्रा पर चर्चा कर डालेंगे। कुल मिलाकर मनमोहन सिंह की एक कमज़ोर छवि ही निकलेगी। अब अखबार के संपादकों से सवाल तो यही सब पूछे जायेंगे। यही कि क्या मनमोहन सिंह आहत हैं? क्या कहा उन्होंने न बोलने के फैसले पर? क्या वो देश के काम में लगे हैं? अगर दिन रात काम में ही लगे हैं तो देश की हालत ऐसी क्यों हैं? जनता फटीचर हालत में क्यों हैं?
क्या यह शर्मनाक नहीं है कि कांग्रेस की कार्यसमिति में प्रधानमंत्री के सामने उनके सहयोगी राजनेता यह सुझाव दें कि आप बोला कीजिए। आप कम बोलते हैं। या तो आप राष्ट्र के नाम संदेश दे दें या फिर मीडिया से बात कर लें। अभी तक विपक्ष ही बोलता था कि प्रधानमंत्री नहीं बोलते हैं। अब उनकी पार्टी के लोग ही बोलने लगे हैं। हद है ये तो बोलते ही नहीं हैं। तो क्या यह दलील पूरी तरह सही है कि वे पार्टी के दबाव में नहीं बोलते हैं। फिर पार्टी के लोग यह मांग क्यों करते हैं? फिर उनके सहयोगी गृहमंत्री पी चिदंबरम एनडीटीवी की सोनिया वर्मा सिंह के इंटरव्यू में खुलेआम बोलकर जाते हैं कि चुप रहना उनका स्टाइल है मगर मुझे भी लगता है कि प्रधानमंत्री को कुछ ज्यादा संवाद करना चाहिए। थक हार कर जब वे नहीं बोले तो सरकार ने मीडिया से बोलने के लिए पांच मंत्रियों का समूह बना दिया। पिछले रविवार अर्णब गोस्वामी के वर्सेस कार्यक्रम में आउटलुक के संपादक विनोद मेहता ने सलमान खुर्शीद की क्लास ले ली। कह दिया कि इन पांच मंत्रियों ने अन्ना के मामले में जिस तरह से मीडिया को हैंडल किया है वो पब्लिक रिलेशन के कोर्स में डिज़ास्टर के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। ज़ाहिर है प्रधानमंत्री पर दबाव कम है। दबाव की बातों में अतिशयोक्ति है। नहीं बोलने का उनका फैसला अपना है। ज़िद है। वर्ना बोलने को लेकर विवाद इसी महीने से तो नहीं शुरू हुआ न। वो तो कॉमनवेल्थ के समय से ही चल रहा है।
मनमोहन सिंह को लगता ही नहीं कि लोकतंत्र में संवाद ज़रूरी है। इसलिए वो नहीं बोलते हैं। पिछले कुछ महीनों से कई बड़े संपादकों ने शनिचर-एतवार के अपने कॉलमों में इसकी आलोचना की और सुझाव दिये कि कैसी सरकार है। न काम कर पा रही है न बोल पा रही है। सिर्फ चली जा रही है। अटल बिहारी वाजपेयी तो चलते-चलते बात कर लेते थे। अटलजी-अटलजी की आवाज़ आती थी,वो प्रेस की तरफ मुड़ जाते थे। कुछ तंज,कुछ रंज और कुछ व्यंग्य कर के चले जाते थे। वो छोटे-मोटे समारोहों में भी जाते रहते थे। वहां कुछ न कुछ बोल आते थे। हर साल शायद पहली तारीख को उनके विचार आ जाते थे। अटल म्यूज़िंग। कितना बोलें और कब बोलें,यह प्रधानमंत्री का अपना फैसला होना चाहिए। मगर कभी बोलेंगे ही नहीं तो इस पर जनता को फैसला कर लेना चाहिए। पिछले पंद्रह साल के मीडिया कवरेज का इतिहास निकालिये। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हिस्से में सिर्फ तारीफ ही आई है। पिछले पंद्रह महीनों के मीडिया कवरेज का इतिहास निकाल कर देखिये,मनमोहन सिंह के हिस्से में सिर्फ आलोचना ही आई है। हमारा समाज चुप रहने वालों को धीर गंभीर कहता है मगर यहां तो मनमोहन सिंह इतने चुप हो गए कि अब लोग इस चुप्पी को अड़ना समझने लगे हैं।
मैं तो सोच रहा हूं कि आज रात प्राइम टाइम में इस पर बहस ही कर डालूं।
क्यों कॉमर्स का कट ऑफ ज़्यादा होता है?
क्या यह सही है कि कॉमर्स एक विधा नहीं है? एकेडमिक डिसिप्लिन। सांख्यिकी,अर्थशास्त्र और गणित जैसे कई विषयों को मिला कर वाणिज्य विषय को गढ़ा गया है। इस पर आपके पास जानकारी हो तो ज़रूर शेयर करें लेकिन कुछ लोगों से बात करने पर यही पता चला कि बाहर के मुल्कों में भी ऑनर्स कोर्स में कॉमर्स नाम का विषय नहीं होता है। अगर यह जानकारी ग़लत पाई गई तो मैं अपने लेख में संशोधन कर लूंगा। बहरहाल इस बात पर विचार करना चाहिए कि कॉमर्स के लिए इतनी मारा मारी क्यों हैं?
दिल्ली विश्वविद्लाय में कॉमर्स में दाखिला लेने के लिए कामर्स विषय वालों को प्राथमिकता दी जाती है। उन्हें सीट मिले इसलिए दूसरे विषय यानी साइंस से जब कोई बच्चा कॉमर्स में आता है तो उसे हतोत्साहित करने के लिए अधिक नंबर मांगे जाते हैं ताकि कॉमर्स वालों को पहले एडमिशन मिल जाए। इसी तरह से जब कॉमर्स के बच्चे दूसरे विषयों में दाखिला लेने जाते हैं तो उनके नंबर में दो से तीन परसेंट की कमी कर दी जाती है ताकि उन्हें इतिहास,गणित या अन्य विषयों में आने से रोक सकें। इसके पीछे सोच यही है कि कॉमर्स पढ़ने वालों की ट्रेनिंग अकादमिक नहीं होती। वे इतिहास या राजनीति शास्त्र में आकर अच्छा नहीं कर पाते हैं क्योंकि उन्हें लंबे-लंबे लेख पढ़ने का अभ्यास नहीं होता। दिलचस्पी बनने में काफी वक्त लग जाता है। अपवाद के तौर पर कुछ ही बच्चे कॉमर्स से इतिहास या समाजशास्त्र में आकर बेहतर कर पाते हैं। इसीलिए कॉमर्स कॉलेजों की ज़िम्मेदारी हो जाती है कि वे पहले अपने विषय के बच्चों का दाखिला करें। इसीलिए एसआरसीसी और एलएसआर में कटऑफ ज़्यादा होता है। कॉमर्स के अच्छे कॉलेज कम है और रोज़गारपरक बाज़ारू शिक्षा के नाम पर कम पढ़ने लिखने वाले छात्रों की तादाद ज्यादा। ऐसा विषय हो जो नौकरी भी दे और थोड़ा-थोड़ा सारे विषयों को पढ़ने का अवसर भी दे दे। कॉमर्स से अच्छा कोई विकल्प नहीं है। बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन, मैनेजमेंट और बैंकों की नौकरियों में कामर्स काफी उपयोगी विषय हो गया है।
अब रही बात कि इस साल सौ परसेंट वाला कट ऑफ क्यों गया? वो इसलिए कि सिब्बल साहब और वाइस चांसलर साहब दिल्ली विश्वविद्यालय को कबाड़ करने के अभियान में लगे हुए हैं। सेमेस्टर सिस्टम के अलावा इस बार दाखिले की प्रक्रिया में बदलाव हुआ। पहले क्या होता था? पहले बच्चे फार्म भरते थे। हालांकि इसे लेकर कॉलेज दुकानदारी करने लगे थे। खैर फार्म भरने के बाद अमुक विभाग को अंदाज़ा हो जाता था कि पहले लिस्ट में कितने बच्चों को आने दिया जाए। इस बार यह व्यवस्था खत्म कर दी गई। यह कहा गया कि जो भी कट ऑफ निकलेगा उसमें आने वाले सभी बच्चों को दाखिला देना पड़ेगा। अगर चालीस सीट है और कट ऑफ के बाद सौ बच्चे आ गए तो सौ के सौ को दाखिला देना होगा। अब यहां सुविधाओं और टीचर-छात्र के अनुपात का सवाल गया चूल्हे में। तो किसी भी कॉलेज को इस बार पहले से मालूम नहीं था कि अमुक विषय में कितने कट ऑफ वाले बच्चों ने अप्लाई किया है। इसलिए उन्होंने कट ऑफ को इतना ज्यादा कर दिया कि पहले लिस्ट में उन्हें अंदाज़ा हो सके। सिर्फ इसकी वजह से बच्चों को परेशानियां झेलनी पड़ गईं।
पढ़ाई माइग्रेशन का दूसरा बड़ा कारण है। देश भर के कॉलेज कबाड़ हो गए हैं। अगर नहीं भी हैं तो उन्हें अच्छे विद्यार्थी कबाड़ ही समझने लगे हैं। दिल्ली में पढ़ने के साथ प्रतिष्ठा का भी भाव जुड़ा होता है। राज्यों ज़िलों के कॉलेजों में कुछ अच्छे और प्रयत्नशील शिक्षकों को छोड़ दें तो बाकी सब राम भरोसे आते हैं और राम भरोसे चले जाते हैं। हम इस विषय को लेकर परेशान इसलिए नहीं होते कि फायदा नहीं। उससे पहले ट्रेन का टिकट कटा लेते हैं। मैं भी इसी सिस्टम के तहत रातों रात अपने कमरे से उजाड़ कर दिल्ली भेज दिया गया। राज्यों के अच्छे कालेजों के कट ऑफ पता कर रहा था। कहीं भी सत्तर अस्सी फीसदी से ज्यादा नंबर नहीं जाता। उनके ख़राब कालेजों में औसत विद्यार्थियों की भरमार है। ९८ परसेंट वाले इन कॉलेजों को किसी लायक नहीं समझते। यह चिन्ताजनक हालात है। कपिल सिब्बल दिल्ली के दो कालेज के कट ऑफ पर बयान तो दे देते हैं मगर बाकी कालेजों के लिए वक्त नहीं। पता कीजिए देश का मानव संसाधन मंत्री पिछले कुछ सालों में कितने केंद्रीय विश्वविद्यालयों के दौरे पर गया है। उनके कामकाज की समीक्षा की है। वकील हो जाने से हर मुकदमे के जीत लेने की गारंटी नहीं मिल जाती। दलील बर्तन बजाने से नहीं बजती, उसके आधार भी होने चाहिएं।
दिल्ली विश्वविद्लाय में कॉमर्स में दाखिला लेने के लिए कामर्स विषय वालों को प्राथमिकता दी जाती है। उन्हें सीट मिले इसलिए दूसरे विषय यानी साइंस से जब कोई बच्चा कॉमर्स में आता है तो उसे हतोत्साहित करने के लिए अधिक नंबर मांगे जाते हैं ताकि कॉमर्स वालों को पहले एडमिशन मिल जाए। इसी तरह से जब कॉमर्स के बच्चे दूसरे विषयों में दाखिला लेने जाते हैं तो उनके नंबर में दो से तीन परसेंट की कमी कर दी जाती है ताकि उन्हें इतिहास,गणित या अन्य विषयों में आने से रोक सकें। इसके पीछे सोच यही है कि कॉमर्स पढ़ने वालों की ट्रेनिंग अकादमिक नहीं होती। वे इतिहास या राजनीति शास्त्र में आकर अच्छा नहीं कर पाते हैं क्योंकि उन्हें लंबे-लंबे लेख पढ़ने का अभ्यास नहीं होता। दिलचस्पी बनने में काफी वक्त लग जाता है। अपवाद के तौर पर कुछ ही बच्चे कॉमर्स से इतिहास या समाजशास्त्र में आकर बेहतर कर पाते हैं। इसीलिए कॉमर्स कॉलेजों की ज़िम्मेदारी हो जाती है कि वे पहले अपने विषय के बच्चों का दाखिला करें। इसीलिए एसआरसीसी और एलएसआर में कटऑफ ज़्यादा होता है। कॉमर्स के अच्छे कॉलेज कम है और रोज़गारपरक बाज़ारू शिक्षा के नाम पर कम पढ़ने लिखने वाले छात्रों की तादाद ज्यादा। ऐसा विषय हो जो नौकरी भी दे और थोड़ा-थोड़ा सारे विषयों को पढ़ने का अवसर भी दे दे। कॉमर्स से अच्छा कोई विकल्प नहीं है। बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन, मैनेजमेंट और बैंकों की नौकरियों में कामर्स काफी उपयोगी विषय हो गया है।
अब रही बात कि इस साल सौ परसेंट वाला कट ऑफ क्यों गया? वो इसलिए कि सिब्बल साहब और वाइस चांसलर साहब दिल्ली विश्वविद्यालय को कबाड़ करने के अभियान में लगे हुए हैं। सेमेस्टर सिस्टम के अलावा इस बार दाखिले की प्रक्रिया में बदलाव हुआ। पहले क्या होता था? पहले बच्चे फार्म भरते थे। हालांकि इसे लेकर कॉलेज दुकानदारी करने लगे थे। खैर फार्म भरने के बाद अमुक विभाग को अंदाज़ा हो जाता था कि पहले लिस्ट में कितने बच्चों को आने दिया जाए। इस बार यह व्यवस्था खत्म कर दी गई। यह कहा गया कि जो भी कट ऑफ निकलेगा उसमें आने वाले सभी बच्चों को दाखिला देना पड़ेगा। अगर चालीस सीट है और कट ऑफ के बाद सौ बच्चे आ गए तो सौ के सौ को दाखिला देना होगा। अब यहां सुविधाओं और टीचर-छात्र के अनुपात का सवाल गया चूल्हे में। तो किसी भी कॉलेज को इस बार पहले से मालूम नहीं था कि अमुक विषय में कितने कट ऑफ वाले बच्चों ने अप्लाई किया है। इसलिए उन्होंने कट ऑफ को इतना ज्यादा कर दिया कि पहले लिस्ट में उन्हें अंदाज़ा हो सके। सिर्फ इसकी वजह से बच्चों को परेशानियां झेलनी पड़ गईं।
पढ़ाई माइग्रेशन का दूसरा बड़ा कारण है। देश भर के कॉलेज कबाड़ हो गए हैं। अगर नहीं भी हैं तो उन्हें अच्छे विद्यार्थी कबाड़ ही समझने लगे हैं। दिल्ली में पढ़ने के साथ प्रतिष्ठा का भी भाव जुड़ा होता है। राज्यों ज़िलों के कॉलेजों में कुछ अच्छे और प्रयत्नशील शिक्षकों को छोड़ दें तो बाकी सब राम भरोसे आते हैं और राम भरोसे चले जाते हैं। हम इस विषय को लेकर परेशान इसलिए नहीं होते कि फायदा नहीं। उससे पहले ट्रेन का टिकट कटा लेते हैं। मैं भी इसी सिस्टम के तहत रातों रात अपने कमरे से उजाड़ कर दिल्ली भेज दिया गया। राज्यों के अच्छे कालेजों के कट ऑफ पता कर रहा था। कहीं भी सत्तर अस्सी फीसदी से ज्यादा नंबर नहीं जाता। उनके ख़राब कालेजों में औसत विद्यार्थियों की भरमार है। ९८ परसेंट वाले इन कॉलेजों को किसी लायक नहीं समझते। यह चिन्ताजनक हालात है। कपिल सिब्बल दिल्ली के दो कालेज के कट ऑफ पर बयान तो दे देते हैं मगर बाकी कालेजों के लिए वक्त नहीं। पता कीजिए देश का मानव संसाधन मंत्री पिछले कुछ सालों में कितने केंद्रीय विश्वविद्यालयों के दौरे पर गया है। उनके कामकाज की समीक्षा की है। वकील हो जाने से हर मुकदमे के जीत लेने की गारंटी नहीं मिल जाती। दलील बर्तन बजाने से नहीं बजती, उसके आधार भी होने चाहिएं।
क्या कबीर बग़ावत के सबसे बड़े ब्रांड हैं?
प्रतिरोध की स्थिति में हम सब कबीर को क्यों याद करते हैं? क्या कबीर आज भी हमारे दैनिक जीवन में सामाजिक आर्थिक राजनीतिक प्रतिरोध के सबसे देसी प्रतीक हैं? जब भी संघर्ष पर उतरता है कबीर की तरह लगने या कहलाने लगता है। ऐसी क्या बात रही है कबीर में कि वे आज के पल-पल बदलते प्रेरणास्त्रोंतों आदर्शों के दौर में भी स्थायी भाव से टिके हुए हैं। युवाओं को भी कबीर वैसे ही आकर्षित करते हैं जैसे उन पर शोध करने वालों को। कई बार लगता है कि कबीर को जितना उन्हें जाननेवाले विद्वान नहीं जीते उससे कहीं ज्यादा कबीर को आमजन जीता है। किसी भी घुटन भरे मकान से निकलने के लिए कबीर खिड़की का काम करते हैं। इसीलिए उनकी पहचान जातिधर्म की नहीं है। आंखें बंद कर कबीर की कल्पना कीजिए तो किसी तस्वीर का अहसास नहीं होता बल्कि उनकी बानी सुनाई देती है।
प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल की एक किताब आई है। अकथ कहानी प्रेम की। इस किताब को पढ़ते समय आज का समय ज्यादा दिखाई देने लगता है। पुरुषोत्तम के कबीर भले ही देशज आधुनिकता के प्रतीक हैं मगर आमजन के कबीर उदारीकरण से गढ़े गए आज के समय के आधुनिक हैं। कबीर की मौजूदगी उपभोगी समाज की आधुनिकता पर सवाल हैं। जो समझौतावादी समाज की संरचना कर रहा है उसमें कबीर बगावत के प्रतीक बन जाते हैं। कबीर जैसा होना अपनी आधुनिकता का भारतीयकरण करना है। जब भी आप जन्मजात गैरबराबरी को चुनौती देने लगते हैं कबीर की तरह बनने लगते हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपनी किताब में एक सवाल किया है कि वो कौन सी सामाजिक आर्थिक प्रक्रियाएं थीं जो ब्राह्मणों के तथाकथित शाश्वत वर्चस्व को तोड़ते हुए कबीर को हीरो बनाती थीं। मेरा सवाल है कि वो कौन सी सामाजिक आर्थिक प्रक्रियाएं हैं जो कबीर को शाश्वत बनाती हैं।
जात जुलाहा मति का धीर। वो अपनी सामाजिक हैसियत पर व्यंग्य करते हैं मगर हैसियत पाने की चाहत भी नहीं रखते। एक सामान्य की रचना करते हैं। आज के समय में जब गैरबराबरी के नए-नए ढांचे बन गए हैं कबीर अपने व्यंग्यों के पुराने हथियारों से ही लड़ने में सक्षम बनाते हैं। विद्वान कबीर को जितना ही अजूबा बना लें मगर आम लोगों के बीच कबीर आज भी सहज हैं। इसीलिए हर बागी हर सादा आदमी कबीर-फकीर से तुलना पाता है। कबीर के लिए सब दोस्त हैं। कहत कबीर सुनो भाई साधो। वे सभी जातियों के पाखंड से टकराते हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं कि कबीर ने पंद्रहवी सदी में मानवाधिकार की बात की। इस धारणा को ग़लत साबित किया कि मानवाधिकार का विकास यूरोप से बाहर हुआ ही नहीं।
कबीर कौन है? कबीर एक मानस है। आज के उदारीकरण के दौर में कई बाज़ारू लोग जीवन,आत्मसम्मान और मुक्ति का मार्ग बताने के विशेषज्ञ बने घूमते हैं। उनके पास हर परिस्थितियों के फार्मूले तैयार हैं। वो स्लोगन बेचते हैं। इन्हें मोटिवेशनल स्पीकर कहते हैं। जिन्हें आप हिन्दी में प्रेरक-वाचक कह सकते हैं। जैसे ही आप कबीर को पढ़ना शुरू करते हैं आपको जीवन जीने के मुफ्त में कई फार्मूले मिल जाते हैं। समाज को समझने का नज़रिया तो मिलता ही है,उससे लड़ने का हथियार भी। आज पेशेवर दफ्तरों में एक किस्म का सामंती ढांचा खड़ा किया जा रहा है। जहां आदमी का सबसे ज़्यादा वक्त गुज़रता है। यहां हैसियत के इतने पायदान हैं कि नीचे खड़ा हर व्यक्ति जब तक कबीरबोध का पालन नहीं करता वो अपने आप को संभाल नहीं पाता है। मगर इसे कारोबार में बदलने के लिए प्रेरक-वाचक आपको सकारात्मक सोच के बहाने समझौतावादी बनाने की चतुराई सीखाते हैं। कबीर चतुर नहीं बनाते। बागी बनाते हैं। एक ऐसा बागी जो अपने समय और समाज की बारीक समझ रखता है और विकल्प पेश करता है।
पुरुषोत्तम अग्रवाल कबीर को पश्चिमी आधुनिकता के बरक्स देशज आधुनिकता के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में देखते हैं। कहते हैं कि कबीर अपने विचारों में कॉस्मोपोलिटन थे। इस बेहतरीन किताब को पढ़ने से पहले अपने आस पास के समाज को ठीक से देखिये और फिर उनके बीच बनते-बिगड़ते कबीर को खोजने की कोशिश कीजिए। आज हमारे ज्यादातर रिश्ते व्यापारिक आर्थिक गतिविधियों से तय हो रहे हैं। जाति संबंधों में जड़ता है तो दूसरी तरफ बदलाव भी है। व्यापार पर जाति का वर्चस्व टूट रहा है। हम कपड़ों की तरह शहर बदल रहे हैं। हर दिन आधुनिकता बदल रही है। आधुनिकता पहले से कहीं अस्थायी हो गई है। मार्डन होना अब फैशन नहीं रहा। जीवन को समृद्ध करने वाले मुहावरे,तंज और किंवदंतियां खत्म हो रहे हैं। हमारी मानसिकता शहरी या कस्बाई नहीं बल्कि अपार्टमेंटी और दफ्तरी होने लगी है। फ्लैट और दफ्तर के बीच पड़ने वाले शहर को भी ठीक से नहीं जानते। नई पहचान बन रही है तो ऐसे में आधुनिकता को नए सिरे से पहचानने के लिए सबसे बड़ा सहारा कौन हो सकता है? कबीर?
सवाल यह है कि क्या हमें कबीर चाहिए? एक ऐसा कबीर जो शाश्वत कबीर की तरह हिन्दू मुसलमान के खांचे में फिट न किया जा सके। जो माया और जात के खिलाफ खड़ा हो। जो खापों पर तंज करता हो और संसद की सर्वोच्चता के जड़वत सिद्धांत पर सवाल खड़े करता हो। संसद की सर्वोच्चता अगर शिथिलता का रूप ले ले और सिर्फ बहिष्कार और बहिर्गमन का मंच बन कर रह जाए तो समाज के कबीर क्या करें? क्या उस सिविल सोसायटी की तरफ मुड़े जिसका निर्माण कबीर ने अपने समय में किया था। पुरुषोत्तम अग्रवाल जिसे लोकवृत्त कहते हैं। लोकवृत्त और सिविल सोसायटी की तुलना नहीं की जा सकती मगर कबीर के होने और उनकी ज़रूरत पर किसे संदेह हो सकता है। आज की आधुनिकता अब कई मायनों में भ्रामक लगने लगी है। इसकी सही पहचान और छानबीन के लिए कबीर को फिर से खोजना होगा। क्या यह कम बड़ी बात नहीं कि कबीर को लोग उनकी रचनावलियों को याद रखने से नहीं जानते, संकट के समय बग़ावत के मिज़ाज से ज्यादा जानते हैं। कबीर ने देशज आधुनिकता को गढ़ा तो क्या आज की सेंसेक्स आधुनिकता में कबीर के लिए कोई गुज़ाइश बची है? ज़रूर बची है तभी कबीर हर तरफ दिखाई पड़ जाते हैं। शायद इसीलिए भी कि बाज़ारू ज़ुबान में भी निष्पक्ष बगावत का कबीर से बड़ा कोई ब्रांड नहीं है। जिस बाज़ार को कबीर माया महाठगिनी कहते हैं।
(कबीर पर लिखने की हिम्मत कर बैठा। कुछ मूर्खतापूर्ण बातें कह गया तो माफ कीजिएगा। सचमुच कम जानता हूं कबीर के बारे में। यह लेख आज राजस्थान पत्रिका में छपा है)
प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल की एक किताब आई है। अकथ कहानी प्रेम की। इस किताब को पढ़ते समय आज का समय ज्यादा दिखाई देने लगता है। पुरुषोत्तम के कबीर भले ही देशज आधुनिकता के प्रतीक हैं मगर आमजन के कबीर उदारीकरण से गढ़े गए आज के समय के आधुनिक हैं। कबीर की मौजूदगी उपभोगी समाज की आधुनिकता पर सवाल हैं। जो समझौतावादी समाज की संरचना कर रहा है उसमें कबीर बगावत के प्रतीक बन जाते हैं। कबीर जैसा होना अपनी आधुनिकता का भारतीयकरण करना है। जब भी आप जन्मजात गैरबराबरी को चुनौती देने लगते हैं कबीर की तरह बनने लगते हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपनी किताब में एक सवाल किया है कि वो कौन सी सामाजिक आर्थिक प्रक्रियाएं थीं जो ब्राह्मणों के तथाकथित शाश्वत वर्चस्व को तोड़ते हुए कबीर को हीरो बनाती थीं। मेरा सवाल है कि वो कौन सी सामाजिक आर्थिक प्रक्रियाएं हैं जो कबीर को शाश्वत बनाती हैं।
जात जुलाहा मति का धीर। वो अपनी सामाजिक हैसियत पर व्यंग्य करते हैं मगर हैसियत पाने की चाहत भी नहीं रखते। एक सामान्य की रचना करते हैं। आज के समय में जब गैरबराबरी के नए-नए ढांचे बन गए हैं कबीर अपने व्यंग्यों के पुराने हथियारों से ही लड़ने में सक्षम बनाते हैं। विद्वान कबीर को जितना ही अजूबा बना लें मगर आम लोगों के बीच कबीर आज भी सहज हैं। इसीलिए हर बागी हर सादा आदमी कबीर-फकीर से तुलना पाता है। कबीर के लिए सब दोस्त हैं। कहत कबीर सुनो भाई साधो। वे सभी जातियों के पाखंड से टकराते हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं कि कबीर ने पंद्रहवी सदी में मानवाधिकार की बात की। इस धारणा को ग़लत साबित किया कि मानवाधिकार का विकास यूरोप से बाहर हुआ ही नहीं।
कबीर कौन है? कबीर एक मानस है। आज के उदारीकरण के दौर में कई बाज़ारू लोग जीवन,आत्मसम्मान और मुक्ति का मार्ग बताने के विशेषज्ञ बने घूमते हैं। उनके पास हर परिस्थितियों के फार्मूले तैयार हैं। वो स्लोगन बेचते हैं। इन्हें मोटिवेशनल स्पीकर कहते हैं। जिन्हें आप हिन्दी में प्रेरक-वाचक कह सकते हैं। जैसे ही आप कबीर को पढ़ना शुरू करते हैं आपको जीवन जीने के मुफ्त में कई फार्मूले मिल जाते हैं। समाज को समझने का नज़रिया तो मिलता ही है,उससे लड़ने का हथियार भी। आज पेशेवर दफ्तरों में एक किस्म का सामंती ढांचा खड़ा किया जा रहा है। जहां आदमी का सबसे ज़्यादा वक्त गुज़रता है। यहां हैसियत के इतने पायदान हैं कि नीचे खड़ा हर व्यक्ति जब तक कबीरबोध का पालन नहीं करता वो अपने आप को संभाल नहीं पाता है। मगर इसे कारोबार में बदलने के लिए प्रेरक-वाचक आपको सकारात्मक सोच के बहाने समझौतावादी बनाने की चतुराई सीखाते हैं। कबीर चतुर नहीं बनाते। बागी बनाते हैं। एक ऐसा बागी जो अपने समय और समाज की बारीक समझ रखता है और विकल्प पेश करता है।
पुरुषोत्तम अग्रवाल कबीर को पश्चिमी आधुनिकता के बरक्स देशज आधुनिकता के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में देखते हैं। कहते हैं कि कबीर अपने विचारों में कॉस्मोपोलिटन थे। इस बेहतरीन किताब को पढ़ने से पहले अपने आस पास के समाज को ठीक से देखिये और फिर उनके बीच बनते-बिगड़ते कबीर को खोजने की कोशिश कीजिए। आज हमारे ज्यादातर रिश्ते व्यापारिक आर्थिक गतिविधियों से तय हो रहे हैं। जाति संबंधों में जड़ता है तो दूसरी तरफ बदलाव भी है। व्यापार पर जाति का वर्चस्व टूट रहा है। हम कपड़ों की तरह शहर बदल रहे हैं। हर दिन आधुनिकता बदल रही है। आधुनिकता पहले से कहीं अस्थायी हो गई है। मार्डन होना अब फैशन नहीं रहा। जीवन को समृद्ध करने वाले मुहावरे,तंज और किंवदंतियां खत्म हो रहे हैं। हमारी मानसिकता शहरी या कस्बाई नहीं बल्कि अपार्टमेंटी और दफ्तरी होने लगी है। फ्लैट और दफ्तर के बीच पड़ने वाले शहर को भी ठीक से नहीं जानते। नई पहचान बन रही है तो ऐसे में आधुनिकता को नए सिरे से पहचानने के लिए सबसे बड़ा सहारा कौन हो सकता है? कबीर?
सवाल यह है कि क्या हमें कबीर चाहिए? एक ऐसा कबीर जो शाश्वत कबीर की तरह हिन्दू मुसलमान के खांचे में फिट न किया जा सके। जो माया और जात के खिलाफ खड़ा हो। जो खापों पर तंज करता हो और संसद की सर्वोच्चता के जड़वत सिद्धांत पर सवाल खड़े करता हो। संसद की सर्वोच्चता अगर शिथिलता का रूप ले ले और सिर्फ बहिष्कार और बहिर्गमन का मंच बन कर रह जाए तो समाज के कबीर क्या करें? क्या उस सिविल सोसायटी की तरफ मुड़े जिसका निर्माण कबीर ने अपने समय में किया था। पुरुषोत्तम अग्रवाल जिसे लोकवृत्त कहते हैं। लोकवृत्त और सिविल सोसायटी की तुलना नहीं की जा सकती मगर कबीर के होने और उनकी ज़रूरत पर किसे संदेह हो सकता है। आज की आधुनिकता अब कई मायनों में भ्रामक लगने लगी है। इसकी सही पहचान और छानबीन के लिए कबीर को फिर से खोजना होगा। क्या यह कम बड़ी बात नहीं कि कबीर को लोग उनकी रचनावलियों को याद रखने से नहीं जानते, संकट के समय बग़ावत के मिज़ाज से ज्यादा जानते हैं। कबीर ने देशज आधुनिकता को गढ़ा तो क्या आज की सेंसेक्स आधुनिकता में कबीर के लिए कोई गुज़ाइश बची है? ज़रूर बची है तभी कबीर हर तरफ दिखाई पड़ जाते हैं। शायद इसीलिए भी कि बाज़ारू ज़ुबान में भी निष्पक्ष बगावत का कबीर से बड़ा कोई ब्रांड नहीं है। जिस बाज़ार को कबीर माया महाठगिनी कहते हैं।
(कबीर पर लिखने की हिम्मत कर बैठा। कुछ मूर्खतापूर्ण बातें कह गया तो माफ कीजिएगा। सचमुच कम जानता हूं कबीर के बारे में। यह लेख आज राजस्थान पत्रिका में छपा है)
सेकुलर बनाम सांप्रदायिकता का ट्वेंटी ट्वेंटी
कांग्रेस ने चालाकी से भ्रष्टाचार के मुद्दे को धर्मनिरपेक्ष बनाम सांप्रदायिक में बदल दिया है। रामदेव को मिठाई खिलाने से लेकर पिटाई तक के सफर में कांग्रेस अपनी कमज़ोरी को मर्दाना ताकत की दवाओं से दूर कर देने के लिए बेबस नज़र आई। दिल्ली आने से पहले रामदेव ने कहा था कि मुझे आरएसएस का समर्थन प्राप्त है। कभी नहीं कहा कि मैं आरएसएस से दूर हूं। रामदेव सरकार के दबाव में कहने लगे कि यह मंच राजनीतिक नहीं है। राजनीतिक काम करने वाले संघ को सामाजिक बता कर कब एनजीओ में बदल दिया जाता है ये सब भगवा दल की मर्ज़ी पर निर्भर करता है। साधु सियासत में रंग लगाने आते और भांग घोल कर चले जाते हैं। मंदिर मुद्दे पर लुट-पिट जाने के बाद सत्ता संघर्ष में वापसी के लिए बेचैन सन्यासी दल रामदेव को सहारा बना रहे थे। शनिवार को रामलीला मैदान में मंच से धार्मिक बयान दिये जा रहे थे। भारत महान की भगवा व्याख्या होने लगी। हरिद्वार के भारत माता मंदिर ट्रस्ट के किसी भगवा प्रमुख ने कहा कि वे महाभारत के किस्से तो पढ़ते हैं मगर आज सचमुच के महाभारत में शामिल होने आए हैं। कहीं से इन सबके दिमाग में है कि प्राचीन भारत की जड़ों में सन्यासियों का पसीना है। उनके आशीर्वाद और प्रताप से प्राचीन भारत विश्वविजेता था और अगर ये मिलकर एक मंच पर आ जायें तो भारत फिर से विश्वविजेता हो जाएगा। विश्वविजेता वाली अवधारणा ही कुंठित मनों की बुनियाद पर टिकी है।
रामदेव अगर सिर्फ योग के दम पर सर्वमान्य नेता बनने चले थे तो उन्हें संघ परिवार को लेकर अपनी नीति साफ करनी चाहिए थी। मंच से एक दो मुसलमानों को बुलवा देने से कोई सेकुलर नहीं हो जाता। बोलने के लिए तो एक जैन साधु भी बोल गए। मनोज तिवारी भी गाना गा गए। लेकिन इन सबसे से पहले रामदेव आरएसएस के समर्थन का बयान दे चुके थे। पूरे पंडाल में किसी हिन्दू महासभा का पोस्टर लगा था। आर्य वीर दल का पोस्टर लगा था। केसरिया पगड़ी धारण किये हुए लोग एक धर्म एक रंग का माहौल बना रहे थे। इससे पहले भी भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस के पोस्टर बैनर और नारों से सांप्रदायिक मन को राष्ट्रीय भावना वाला कवच पहनाने की कोशिशें होती रही हैं। यह सही है कि रामदेव ने कभी सांप्रदायिक बयान नहीं दिया। कम से कम मुझे अभी याद नहीं आ रहा है। मगर रामदेव ने स्टैंड क्यों नहीं लिया। वे अब क्यों कह रहे हैं कि उनका बीजेपी से कोई लेना देना नहीं। फिर वे क्यों कहते हैं कि उनका आरएसएस से लेना देना है।
रामलीला मैदान में जब मैं बोल रहा था कि मंच पर धार्मिक प्रतीकों, मुहावरों और प्रसंगों के ज़रिये भारत की व्याख्या की जा रही है। मैंने लाइव प्रसारण में कहना शुरू कर दिया कि भ्रष्टाचार से हर मंच से लड़ा जाना चाहिए लेकिन क्या हमने आमसहमति बना ली है कि हम इस लड़ाई के साथ-साथ भारत की धार्मिक व्याख्या भी करेंगे। अगर ऐसा है तो क्या धर्म के भीतर फैले भ्रष्टाचार से लड़ने की भी कोई पहल होगी? पास में खड़े एक सज्जन भड़क गए और कहने लगे कि धर्म को राष्ट्र से अलग नहीं किया जा सकता। ऐसी फालतू की दलीलें पहले भी सुन चुके हैं जब लोग राम मंदिर के नाम पर सत्ता सुख प्राप्त करने के लिए जुगाड़ कर रहे थे और जनता को गुमराह कर रहे थे। अगर यह दलील इतनी ही शाश्वत है तो फिर नितिन गडकरी क्यों कहते हैं कि राममंदिर बीजेपी का मुद्दा नहीं है। तो किसका था और किसका है। रथ लेकर किसके नेता निकले थे? इसीलिए धर्म से राष्ट्र की व्याख्या नहीं कर सकते। कब कौन किस पुराण की दलील देकर किधर से निकल ले पता नहीं चलता। प्रवेश करने और निकलने का मार्ग खुला रहता है। सरस्वती शिशु मंदिर और गुरुकुल की लड़कियों से हिन्दू राष्ट्र गान गवा कर किसी आंदोलन को आप गैर राजनीतिक नहीं बता सकते। पंडाल में मौजूद कई लोग जो संघ से जुड़े या समर्थन रखते हैं, दूसरे संगठन में काम करते हैं, दिल्ली आई भीड़ के ज़रिये किसी धर्म राष्ट्र का सपना तो देख ही रहे थे।
रही बात सरकार की तो वो अपने अहंकार में इतनी मदमस्त रही कि पहले दिन से लेकर आखिर दिन तक टेटिया ज़बान में बात करती रही। अण्णा हज़ारे के आंदोलन को फर्जी सीडी के ज़रिये ध्वस्त करने की कोशिश की गई। जब एक्सपोज़ हो गई तो लगी कमेटी से गंभीर बात करने। लेकिन इस बार सतर्क थी। रामदेव नहीं थे। सरकार ने रामदेव को फंसा लिया। चिट्ठी लिखवा ली। जिस तरह से चिट्ठी दिखाई जा रही थी उससे बाबा तो एक्सपोज हो ही रहे थे सरकार भी हो रही थी। रामदेव को अपनी ताकत दिखाने के बजाए अण्णा हज़ारे के साथ चलना चाहिए था। संघ और हिन्दू महासभा के लोगों को मंच पर बुलाकर मंच को राजनीतिक नहीं बनाना चाहिए था। बीजेपी भी गैर ज़िम्मेदाराना बर्ताव कर रही थी. अपने प्रोग्राम में जब मैंने राजीव प्रताप रूडी से पूछा कि क्या आप रामदेव के सभी मांगों का समर्थन देते हैं तो सीधा जवाब नहीं दिया। मैंने पूछा कि क्या पांच सौ के नोट खत्म करने और हिन्दी मीडियम शुरू करने की मांग पार्टी की है तो जवाब नहीं दिया। कहा कि पहले भ्रष्टाचार पर तय हो जाए उसके बाद देखेंगे।अब बीजेपी सत्याग्रह कर रही है कि रामदेव पर अत्याचार क्यों हुआ? फिर से जलियांवालां बाग और आपातकाल की यादें आने लगीं। किसी भी सूरत में इसकी तुलना जलियांवालां बाग से नहीं की जा सकती। इसके बावजूद कि कांग्रेस ने लाठी चलवा कर बड़ी ग़लती की है। इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी। वो सिर्फ अपनी सत्ता के अहंकार का प्रदर्शन करना चाह रही थी। पांच हज़ार पुलिस लेकर कूदने की कोई ज़रूरत नहीं थी। तब फिर राहुल गांधी कहां जाकर आंदोलन करेंगे और भट्टा परसौल की तरह मायावती की आलोचना करेंगे कि गांव के लोगों को पुलिस ने पीटा।
रामदेव का अपना मार्केट है। वे मार्केट में खेलने वाले सन्यासी रहे हैं। कई लोग मंच पर ही ग्यारह और बारह लाख का चंदा देने लगे। रांची के राम अग्रवाल ने तो ग्यारह लाख का चेक थमा दिया। दिल्ली के अशोक विहार की सभा में पचास लाख रुपये जमा होने की ख़बर थी। संसाधनों की कोई कमी नहीं रामदेव के पास। भ्रष्टाचार से लड़ने की नीयत पर भी सवाल नहीं खड़े किये जा सकते। मगर समर्थन,साधन और तरीके को लेकर बहस तो हो सकती है। शायद इसी वजह से रामदेव का आंदोलन सर्वमान्य सर्वधर्म नहीं बन सका। रामदेव के सलाहकार ग़लत थे। अब वे अपनी लड़ाई छोड़ आरएसएस और बीजेपी पर सफाई देते फिरेंगे। उन्हें तय करना होगा कि भारत को वैकल्पिक रूप से समृद्ध और खुशहाल करने का रास्ता बचे-खुचे हिन्दू संगठनों से ही जाएगा या कोई दूसरा तरीका भी है। कई बार लगता है कि वे रामलीला मैदान के पंडाल के मोह में फंस गए। जब डील हो ही गई थी तो वापस चले जाना चाहिए था। किसी व्यापारी का ही तो पैसा लगा था,उसे पुण्य तो तभी मिल गया था जब उसने बैंक से पैसे निकाल कर बाबा को दे दिये थे। उसके दुख की क्या चिन्ता।
ज़ाहिर है रामदेव और सरकार दोनों एक दूसरे से खेल रहे थे। लड़ नहीं रहे थे। इस खेल-खेल में कुछ भयंकर किस्म की ग़लतियां हो गईं। यह सरकार अब पब्लिक पर ही ताकत दिखाएगी। लाखों करोड़ों लूट कर चले गए लोगों में से दो चार को जेल भेज कर सत्याग्रही बन रही है। सवाल दो बड़े हैं। क्या किसी सही मुद्दे से लड़ने के लिए सांप्रदायिक शक्तियों का सहारा लिया सकता है और दूसरा क्या सेकुलर बने रहने के लिए किसी सरकार को अहंकारी और घोटालेबाज़ बने रहने दिया जा सकता है? बहरहाल फिर से सेकुलर बनाम सांप्रदायिकता का ट्वेंटी ट्वेंटी शुरू हो गया है।
नोट- वैसे सलवार कमीज़ और दुपट्टे में रामदेव सुसंस्कृत,सुशील,सौम्य और घरेलु लग रहे हैं। यह तस्वीर दुर्लभ है। प्राण देने वाले बाबा ने प्राण बचाने के लिए स्त्री धर्म का जो सम्मान किया है उसका मैं कायल हो गया हूं। हज़ारों की भीड़ ने बाबा को बचाने की कोशिश नहीं की, लड़कियों के छोटे से समूह ने यह जोखिम उठाया। उनका सम्मान किया जाना चाहिए।
रामदेव अगर सिर्फ योग के दम पर सर्वमान्य नेता बनने चले थे तो उन्हें संघ परिवार को लेकर अपनी नीति साफ करनी चाहिए थी। मंच से एक दो मुसलमानों को बुलवा देने से कोई सेकुलर नहीं हो जाता। बोलने के लिए तो एक जैन साधु भी बोल गए। मनोज तिवारी भी गाना गा गए। लेकिन इन सबसे से पहले रामदेव आरएसएस के समर्थन का बयान दे चुके थे। पूरे पंडाल में किसी हिन्दू महासभा का पोस्टर लगा था। आर्य वीर दल का पोस्टर लगा था। केसरिया पगड़ी धारण किये हुए लोग एक धर्म एक रंग का माहौल बना रहे थे। इससे पहले भी भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस के पोस्टर बैनर और नारों से सांप्रदायिक मन को राष्ट्रीय भावना वाला कवच पहनाने की कोशिशें होती रही हैं। यह सही है कि रामदेव ने कभी सांप्रदायिक बयान नहीं दिया। कम से कम मुझे अभी याद नहीं आ रहा है। मगर रामदेव ने स्टैंड क्यों नहीं लिया। वे अब क्यों कह रहे हैं कि उनका बीजेपी से कोई लेना देना नहीं। फिर वे क्यों कहते हैं कि उनका आरएसएस से लेना देना है।
रामलीला मैदान में जब मैं बोल रहा था कि मंच पर धार्मिक प्रतीकों, मुहावरों और प्रसंगों के ज़रिये भारत की व्याख्या की जा रही है। मैंने लाइव प्रसारण में कहना शुरू कर दिया कि भ्रष्टाचार से हर मंच से लड़ा जाना चाहिए लेकिन क्या हमने आमसहमति बना ली है कि हम इस लड़ाई के साथ-साथ भारत की धार्मिक व्याख्या भी करेंगे। अगर ऐसा है तो क्या धर्म के भीतर फैले भ्रष्टाचार से लड़ने की भी कोई पहल होगी? पास में खड़े एक सज्जन भड़क गए और कहने लगे कि धर्म को राष्ट्र से अलग नहीं किया जा सकता। ऐसी फालतू की दलीलें पहले भी सुन चुके हैं जब लोग राम मंदिर के नाम पर सत्ता सुख प्राप्त करने के लिए जुगाड़ कर रहे थे और जनता को गुमराह कर रहे थे। अगर यह दलील इतनी ही शाश्वत है तो फिर नितिन गडकरी क्यों कहते हैं कि राममंदिर बीजेपी का मुद्दा नहीं है। तो किसका था और किसका है। रथ लेकर किसके नेता निकले थे? इसीलिए धर्म से राष्ट्र की व्याख्या नहीं कर सकते। कब कौन किस पुराण की दलील देकर किधर से निकल ले पता नहीं चलता। प्रवेश करने और निकलने का मार्ग खुला रहता है। सरस्वती शिशु मंदिर और गुरुकुल की लड़कियों से हिन्दू राष्ट्र गान गवा कर किसी आंदोलन को आप गैर राजनीतिक नहीं बता सकते। पंडाल में मौजूद कई लोग जो संघ से जुड़े या समर्थन रखते हैं, दूसरे संगठन में काम करते हैं, दिल्ली आई भीड़ के ज़रिये किसी धर्म राष्ट्र का सपना तो देख ही रहे थे।
रही बात सरकार की तो वो अपने अहंकार में इतनी मदमस्त रही कि पहले दिन से लेकर आखिर दिन तक टेटिया ज़बान में बात करती रही। अण्णा हज़ारे के आंदोलन को फर्जी सीडी के ज़रिये ध्वस्त करने की कोशिश की गई। जब एक्सपोज़ हो गई तो लगी कमेटी से गंभीर बात करने। लेकिन इस बार सतर्क थी। रामदेव नहीं थे। सरकार ने रामदेव को फंसा लिया। चिट्ठी लिखवा ली। जिस तरह से चिट्ठी दिखाई जा रही थी उससे बाबा तो एक्सपोज हो ही रहे थे सरकार भी हो रही थी। रामदेव को अपनी ताकत दिखाने के बजाए अण्णा हज़ारे के साथ चलना चाहिए था। संघ और हिन्दू महासभा के लोगों को मंच पर बुलाकर मंच को राजनीतिक नहीं बनाना चाहिए था। बीजेपी भी गैर ज़िम्मेदाराना बर्ताव कर रही थी. अपने प्रोग्राम में जब मैंने राजीव प्रताप रूडी से पूछा कि क्या आप रामदेव के सभी मांगों का समर्थन देते हैं तो सीधा जवाब नहीं दिया। मैंने पूछा कि क्या पांच सौ के नोट खत्म करने और हिन्दी मीडियम शुरू करने की मांग पार्टी की है तो जवाब नहीं दिया। कहा कि पहले भ्रष्टाचार पर तय हो जाए उसके बाद देखेंगे।अब बीजेपी सत्याग्रह कर रही है कि रामदेव पर अत्याचार क्यों हुआ? फिर से जलियांवालां बाग और आपातकाल की यादें आने लगीं। किसी भी सूरत में इसकी तुलना जलियांवालां बाग से नहीं की जा सकती। इसके बावजूद कि कांग्रेस ने लाठी चलवा कर बड़ी ग़लती की है। इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी। वो सिर्फ अपनी सत्ता के अहंकार का प्रदर्शन करना चाह रही थी। पांच हज़ार पुलिस लेकर कूदने की कोई ज़रूरत नहीं थी। तब फिर राहुल गांधी कहां जाकर आंदोलन करेंगे और भट्टा परसौल की तरह मायावती की आलोचना करेंगे कि गांव के लोगों को पुलिस ने पीटा।
रामदेव का अपना मार्केट है। वे मार्केट में खेलने वाले सन्यासी रहे हैं। कई लोग मंच पर ही ग्यारह और बारह लाख का चंदा देने लगे। रांची के राम अग्रवाल ने तो ग्यारह लाख का चेक थमा दिया। दिल्ली के अशोक विहार की सभा में पचास लाख रुपये जमा होने की ख़बर थी। संसाधनों की कोई कमी नहीं रामदेव के पास। भ्रष्टाचार से लड़ने की नीयत पर भी सवाल नहीं खड़े किये जा सकते। मगर समर्थन,साधन और तरीके को लेकर बहस तो हो सकती है। शायद इसी वजह से रामदेव का आंदोलन सर्वमान्य सर्वधर्म नहीं बन सका। रामदेव के सलाहकार ग़लत थे। अब वे अपनी लड़ाई छोड़ आरएसएस और बीजेपी पर सफाई देते फिरेंगे। उन्हें तय करना होगा कि भारत को वैकल्पिक रूप से समृद्ध और खुशहाल करने का रास्ता बचे-खुचे हिन्दू संगठनों से ही जाएगा या कोई दूसरा तरीका भी है। कई बार लगता है कि वे रामलीला मैदान के पंडाल के मोह में फंस गए। जब डील हो ही गई थी तो वापस चले जाना चाहिए था। किसी व्यापारी का ही तो पैसा लगा था,उसे पुण्य तो तभी मिल गया था जब उसने बैंक से पैसे निकाल कर बाबा को दे दिये थे। उसके दुख की क्या चिन्ता।
ज़ाहिर है रामदेव और सरकार दोनों एक दूसरे से खेल रहे थे। लड़ नहीं रहे थे। इस खेल-खेल में कुछ भयंकर किस्म की ग़लतियां हो गईं। यह सरकार अब पब्लिक पर ही ताकत दिखाएगी। लाखों करोड़ों लूट कर चले गए लोगों में से दो चार को जेल भेज कर सत्याग्रही बन रही है। सवाल दो बड़े हैं। क्या किसी सही मुद्दे से लड़ने के लिए सांप्रदायिक शक्तियों का सहारा लिया सकता है और दूसरा क्या सेकुलर बने रहने के लिए किसी सरकार को अहंकारी और घोटालेबाज़ बने रहने दिया जा सकता है? बहरहाल फिर से सेकुलर बनाम सांप्रदायिकता का ट्वेंटी ट्वेंटी शुरू हो गया है।
नोट- वैसे सलवार कमीज़ और दुपट्टे में रामदेव सुसंस्कृत,सुशील,सौम्य और घरेलु लग रहे हैं। यह तस्वीर दुर्लभ है। प्राण देने वाले बाबा ने प्राण बचाने के लिए स्त्री धर्म का जो सम्मान किया है उसका मैं कायल हो गया हूं। हज़ारों की भीड़ ने बाबा को बचाने की कोशिश नहीं की, लड़कियों के छोटे से समूह ने यह जोखिम उठाया। उनका सम्मान किया जाना चाहिए।
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