दोस्तों, आप चाहें तो मुझे जितनी गालियां दे लें, पर ये सच है कि इस बार की रवीश की रिपोर्ट करते वक्त अपने किरदारों की कहानी पर मुझे यकीन नहीं हो रहा था। ये हैरानी तब हो रही थी जब मैं हर हफ्ते ऐसी बस्तियों और लोगों के बीच होता हूं। सहबा फ़ारूक़ी को मैं कई सालों से जानता हूं। वो पिछले तीन महीने से इस बारे में बता रही थीं। कुछ व्यस्तता और कुछ हैरानी की वजह से उनकी बताई कहानी की तरफ नहीं मुड़ सका। हम पत्रकारों का चरित्र वाकई बदल गया है। महंगाई का असर तो हो रहा है इस बात पर यकीन करने में हैरानी बिल्कुल नहीं थी। महंगाई के कारण औरतें अब प्याज़ की जगह ज़ीरे में सब्ज़ी पका रही हैं यह भी मैं जानता था और उनकी तक़लीफ़ को महसूस कर रहा था। मगर कोई दो रुपये के लिए आठ घंटा काम करे,इस पर तभी यकीन हुआ जब जाकर कई ऐसी औरतों से मुलाकात की। दो दिनों तक जब दिल्ली न्यूनतम तापमान की गिरफ्त में थी, मैं दिल्ली की तमाम बस्तियों में इनकी ज़िंदगी के संघर्ष की गर्माहट से कांपता रहा।
पहले गया फिल्मिस्तान के पास के मानकपुरा, फिर गया बादली गांव के पास की जे जे क्लस्टर कालोनी, फिर गया बवाना औद्योगिक क्षेत्र, फिर गया पूर्वी दिल्ली स्थित सोनिया विहार, फिर गया पुरानी दिल्ली के भीतर की गलियों में, कई औरतों से मिला। जो बड़ी-बड़ी कंपनियों का काम कर रही हैं। इनके हर काम की कीमत १४४ पीस के हिसाब से तय होती है। पचीस पैसे से लेकर एक रुपये सत्तर पैसे तक। ये वो औरतें हैं, जिनमें से ज्यादातर महंगाई के बाद मज़दूरी करने के लिए विवश हुई हैं। कहीं कोई साठ किलो रद्दी काग़ज़ से एक किलो गत्ता निकालता है तो साठ पैसे मिलते हैं तो पूनम बारह ज़ुराबों को सीधी करती है तो पचीस पैसे मिलते हैं। एक औरत ने बताया कि सलवार सूट और कूशन कवर पर लगने वाले गोल शीशों की छंटाई से उनकी उंगलियां कट जाती हैं। एक बोरी में दस किलो शीशे होते हैं। पहले उन्हें पांव से तोड़ते हैं, फिर गोल-गोल शीशे छांटते हैं। पांच किलो के पांच रुपये मिलते हैं। अगर सौ ग्राम कम हो गया तो ठेकेदार कोई पैसे नहीं देता।
ये तस्वीर दिल्ली के बवाना की है। यहां गली गली में औरतें चून को डिब्बियों में भरती हैं। दस किलो चूने को डिब्बी में भरने के लिए पूरे दिन लग जाते हैं। एक किलो भरने के बाद एक रुपये सत्तर पैसे मिलते हैं। सर्दी में यह काम करने से चूने से इनके हाथ कट जाते हैं। घाव हो जाते हैं। बहुत सारे मसले हैं जिनके बारे में आप रवीश की रिपोर्ट में देख सकते हैं। इस बार एक निवेदन है, ज़रूर देखियेगा और दोस्तों को ज़रूर बताइये कि वे भी इस रिपोर्ट को देंखें
यह तस्वीर साजिदा के घर की है। उसने चूने से अपने घर को व्हाईट हाउस बना दिया है। बोली कि बस्ती भी गंदी है। चूना हाथ काट लेता है तो क्या हुआ कम से कम सफेद तो है। मैं उसके इस जवाब से हिल गया हूं। पिछले एक साल से दिल्ली और आस-पास की शहरी ज़िंदगी के अंतर्विरोधों में भटक रहा हूं,शायद इसीलिए पत्थर सा हो गया था,लेकिन इस बार भीतर तक हिल गया हूं। ईश्वर की दुआ से सब कुछ है मेरे पास। इनकी कहानी के बाद लगा कि कितना कम है। हम वीकली ऑफ के लिए मरते हैं, वे हर उस पल के लिए मरती हैं जिसमें वो जागती रहें और पचीस पैसे कमाती रहें। समय याद रखिएगा शुक्रवार रात 9:28,शनिवार सुबह 10:28,रात 10:28,रविवार रात 11:28,सोमवार सुबह 11:28