आज हिंदी डे है। कई सरकारी दफ्तरों में बाहर भगवती जागरण की बजाय पखवाड़ा वाला बैनर लगा है। पखवाड़ा। फोर्टनाइट का फखवाड़ा। इस फटीचर कांसेप्ट की आलोचना बड़े बड़े ज्ञानीध्यानी बिना बताये कर गए हैं कि पेटीकोट कैसे पुलिंग है और मूंछ कैसे स्त्रीलिंग है। हर भाषा इस तरह की दुविधाओं के साथ बनी होती है। अब हिंदी के साथ डेटिंग किया जाना चाहिए। डेट विद हिंदी।नवरतन तेल,विको वज्रदंती,डॉलर अंडरवियर और बाक्सर बाइक का उपभोग करने वाला हिंदी का बाज़ार। एक अखबार ने विज्ञापन दिया कि इस दीवाली पर हमारे पाठक पांच लाख वाशिंग मशीन खरीदेंगे। आप विज्ञापन देंगे न। हद है। यही ताकत है हिंदी की। और भाषा की ताकत क्यों हो। भाषा को कातर ही होना चाहिए। रघुवीर सहाय ने क्यों लिखा कि ये दुहाजू(स्पेलिंग सही हो तो) की बीबी है। मुझे तो ये दुहाई हुई गाय लगती है। जिसका अब दिवस नहीं मनना चाहिए। जिसके साथ अब डेटिंग करना चाहिए। चैट करनी चाहिए। चैट स्त्रीलिंग है या पुलिंग। किसने बताया कि क्या है।
देवनागरी में लिखे इंग्लिश मीडियम और साठ दिन में अंग्रेजी सीखा देने के बोर्ड। ६० दिन में हिंदी का रोग मिटा देने वाले और अंग्रेज़ी का भूत भगा देने वाले इंग्लिश बाबाओं के ज़ोर और पुण्य प्रताप से अंग्रेज़ी पहले से कहीं बड़ी भाषा है। चेतन भगत से सब अखबार लिखाना चाहते हैं। हमारे हिंदी के साहित्यकारों को गोष्ठियों ने ऐसा खपा लिया है कि कोई पूछता नहीं। लिखते भी हैं तो संस्मरण छाप। सत्तर के दशक में समाजवादी चिंतनों में धंस गए हैं। लोहिया पर विशेषांक निकालते हैं। हाशिया और विडंबना जैसे घिसे पिटे शब्दों के साथ अपनी चिंताओं की चासनी परोसते हैं।
हिंदी के चिंतकों में जीवन के प्रति उल्लास नहीं है। हमेशा दूसरों की गरीबी और दुख से निराश हैं। जैसे मार्क्स ने ये थ्योरी दी है कि अंग्रेजी बोलने वाले समाज में भिखारी नहीं होते। वहां सब शासक होते है। एक बार मेरे चाचा ने पड़ोस के लड़के से पूछ दिया कि भिन्न कितने प्रकार का होता है। लंगड़ा भिन्न जानते हो तो वो भकुआ गया। मैंने कहा कि ये इंग्लिश मीडियम में पढ़ता है। तो चाचा गुस्सा गए। भाषा जानना कोई योग्यता नहीं है। आप हिंदी या बांग्ला संयोग से जानते हैं। पैदा हो गए और सीख गए। अंग्रेजी के लिए अलग से मेहनत करनी होती है। बस इतने का फर्क है। लंगड़ा भिन्न नहीं आया तो बेकार हैं आप।
उसी दिन से ये लैंग्वेज का पोलिटिक्स साफ हो गया। हिंदी व्याकरण की तीन तीन किताबों को ओखली में कूट के फेंक दिया। कर्म को कहा तू कर्ता से पहले लग और करण को कहा तू भांड में जा। तभी एक गाना कानों में ऐसा धंसा कि निकला ही नहीं।
उल्फत के दुश्मनों ने कोशिश हज़ार की...सोलह बरस की बाली उमर को सलाम। लगा कि वाह क्या कारीगरी है भाषा की।
इसी दौर में एक और गाना अच्छा लग रहा था- तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है। तभी बाबा नागार्जुन की कविता हाथ लग गई। ईंदु जी क्या हुआ है आपको..भूल गईँ अपने बाप को। हिंदी दमदार है भाई। जहां जहां वो लिंग विशेषज्ञों के कब्ज़े में नहीं हैं वहां वहां वो दमदार है। फिर पढ़ गया मैला आंचल तो लगा कि बाप रे क्या यथार्थ है। उसके बाद पढ़ा राग दरबारी तो पहली बार अपनी हिंदी में मुलाकात हुई ज़िंदगी से। भाषा की लंठई से। अब तो पखवाड़ा लिखा देखता हूं तो पखाना जैसा पढ़ा जाता है।
आज के दिन इन सब कमाल के रचनाकारों को सलाम। आज के दिन पखवाड़ा लिखने वालों को दुत्कार। हिंदी दिवस। क्या किसी भाषा का दिवस होना चाहिए। लिंग विशेषज्ञ और हिज्जे संपादकों की हालत का अंदाजा तभी हो गया जब दिल्ली में कृपया,कृप्या लिखा देखा। किशोर कुमार गा रहा था ज़िंदगी का सफर। हमारे अखबार लिख रहे थे जिंदगी। नुक्ता हटाओ और लगाओ का लफड़ा। जीवन लिखो न। ज़िंदगी काहे लिखते हो। ग़लत और सही हिंदी के द्वंद से परेशान हो गया। र में बड़ी ऊ और छोटी ऊ कब लगायें याद करना मुश्किल हो गया। तय किया कि जो मन कहेगा वही लिखूंगा। मन का रेडिया..बजने दे ज़रा। हिमेश रेशमिया का ये गाना कमाल का है। बैंड जब बजे तेरा तू भी साथ गा। क्या दर्शन है। गाओ न भाई। हिंदी का बैंड बज रहा है तो गाओ न। रोना क्यों रोते हो।
इंसान को किसी भी भाषा के प्रति निष्ठावान नहीं होना चाहिए। उसे भाषा में जीना चाहिए। कुछ जोड़ देना चाहिए और पुराने पड़ चुके शब्दों को घटा देना चाहिए। हमारे एक सहयोगी बार बार कहते हैं कि आक्सफोर्ड कि डिक्शनरी निकलती है तो हर साल दो चार सौ हिंदी के शब्द अंग्रेजी की लाइन में लग जाते हैं। हिंदी की कोई डिक्शनरी ही नहीं निकलती। फालतू शब्दों का भंडार बार बार छप रहा है। गोदाम में पड़े भूत की तरह संस्करणों के बहाने निकलता है।
हिंदी को कुछ नहीं हुआ। मर जाएगी तो मर जाएगी। गरीब का बच्चा भी इंग्लिश सीखना चाहता है। जो सीखने से रह गया है वो साठ घंटे में अंग्रेजी न जानने की एनिमिया से मुक्त हो जाना चाहता है। जब तक ये सांस ले रही है इसकी घड़कनों में समा जाइये। गोष्ठियों-सेमिनारों में जाना बंद कीजिए। तीन नंबर का बिस्कुट और चाय पीने।
बहुत बोर हो जाए तो कजरारे कजरारे सुनिये। किसी कवि को पढ़ते हुए आप पर्सनल से सवाल कीजिए। हिंदी में हर तरह के शब्दों को घुसाइये। हर तरह के शब्दों को अपनी तरह से लिखिये। दुकानदारों की साइन बोर्ड से सीखिये। जूस कार्नर। क्या है ये हिंदी या चोरी के शब्दों से हिंदी कहलाने की ठेठगीरी। हिज्जे की दुकानदारी बंद कीजिए। कीजिए या किजिए लिख दीजिए तो कोई फर्क नहीं पड़ता।
हिंदी पखवाड़े का विरोध कीजिए। बांग्ला डे। उर्दू डे भी मने। अब हिंदी हिंदी नहीं रही। यह न जाने कितनी बोलियों को डकार कर दुहाजू की बीबी बन कर अघा रही है। जिस भाषा में स्टेशन का अपना शब्द न हो। वो कैसे अकेले अपना जन्मदिन मना सकती है। इंटरनेट का जबरन अंतरजाल बनाकर फेंटा कसे जा रहे हैं। हिंदी सभी भाषाओं का प्रतिनिधित्व करती है। अकेले हिंदी में घंटा कुछ नहीं है। अस्तु।
बिन पाकेट कमीज़ और पतलून
बस अब पहन लूंगा
बिन पाकेट कमीज़ और पतलून
फेंक दूंगा मोबाइल और क्रेडिट कार्ड
एक चक्कर लगा आऊंगा
पैदल चल कर
कनाट प्लेस से लेकर साउथ एक्सटेंशन तक
तीस फीसदी डिस्काउंट वाली थैलियों में खुद को
ठूंस दूंगा मैं
खरीदने और बेचने के मोलभाव से मुक्त कर लूंगा
फ्री में ही सारा माल की तरह बिक जाऊंगा मैं
दांतों में दबाए हुए क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड
चबाते चबाते खा जाऊंगा सबको
प्लास्टिक का पखाना निकलेगा
उसे समेट कर सेल की थैलियों में
घुमा कर फेंक दूंगा साउथ सिटी मॉल में
हम सब बिकने के लिए अभिशप्त
क्रयशक्ति हमारी सेल पर लगी है
हर दाम के हिसाब से खुद को बेचा
पूरा दाम देकर एक सामान न खरीद सका
हताशा है यह
कमा न पाने की
खुद को बेच कर
वाजिब दाम न पाने की
ऑनलाइन दुकानों में कतारबद्ध हो रहा हूं
बिन पाकेट की कमीज़ और पतलून
पहनने की योजना बना रहा हूं
एक मैनेजर किराये पर दे दो भाई
जो मुझे बेच आए बाज़ार में
बिका हुआ माल वापस न होने की शर्त पर
बस गोदाम खाली कर जाए
मिला हुआ माल दे जाए
मैं घूम सकूं बाकी की ज़िंदगी
पहन कर
बिन पाकेट कमीज़ और पतलून
उन सबकी शोर से बहुत दूर
सेमिनारों में जो करते हैं रात दिन
बाज़ार,बाज़ार और बाज़ार
कोई ऐसी जगह बता दो भाई
जहां बाज़ार न हो और हम बिक भी जायें
बिकने के लिए ही तो निकले हैं सब
बाज़ार को गरियाते रहते हैं
पाकेट वाली पतलून और कमीज़ पहनकर
गोष्ठियों में जाते रहते हैं
मैं नहीं बदलूंगा इस समय को
जिस समय में मैं सड़ा दिया गया
उसे बचाकर रखूंगा
आने वाली पीढ़ियों के सड़ने के लिए
बिकने के लिए
टाइट कमीज़ और टाइट पैंट के लिए
क्रेडिट कार्ड की बिक्री से पलने वाले
एजेंटों के परिवारों के लिए
सब कुछ म्यूचुअल है मेरे भाई
नए फैशन में जीना है
बिन पाकेट पतलून और कमीज़
पहन कर चलना होगा
आंत की मरोड़ों को दबा कर
जीभ की लपलपाहट को शांत करना होगा
मन को मेडिटेशन से बांध कर
तन को योगा से साधना होगा
बकवास करते हो तुम मुझसे
सेल में खरीदने वालों को सांत्वना देते हो
ताकि जब तक घर तक पहुंचे वे सब
रास्ते में ही सेल की थैलियों से पहचान लिये जाए
ये है कमाने वाला
ये है खरीदने वाला
ये है बिकने वाला
पूरा दाम नहीं दे पाता
डिस्काउंट ही इसकी औकात है
छूट चाहिए सबको हर चीज़ में
आदर्शों में भी
मापदंडों में भी
समझौतों में भी
संबंधों में भी
बिन पाकेट पतलून और कमीज़
पहन कर हम सब कम से कम
खाली हाथ तो लौट आयेंगे
तुम लौट सकोगे खाली हाथ
बिना सेल की थैलियों के
ध्यान रखना
न बिका हुआ माल
गोदाम में
सड़ने के लिए रखा होता है
सड़ना चाहोगे तुम
अकड़ना चाहोगे तुम
तो पहन कर घूमो आज से
बिन पाकेट कमीज़ और पतलून
बिन पाकेट कमीज़ और पतलून
फेंक दूंगा मोबाइल और क्रेडिट कार्ड
एक चक्कर लगा आऊंगा
पैदल चल कर
कनाट प्लेस से लेकर साउथ एक्सटेंशन तक
तीस फीसदी डिस्काउंट वाली थैलियों में खुद को
ठूंस दूंगा मैं
खरीदने और बेचने के मोलभाव से मुक्त कर लूंगा
फ्री में ही सारा माल की तरह बिक जाऊंगा मैं
दांतों में दबाए हुए क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड
चबाते चबाते खा जाऊंगा सबको
प्लास्टिक का पखाना निकलेगा
उसे समेट कर सेल की थैलियों में
घुमा कर फेंक दूंगा साउथ सिटी मॉल में
हम सब बिकने के लिए अभिशप्त
क्रयशक्ति हमारी सेल पर लगी है
हर दाम के हिसाब से खुद को बेचा
पूरा दाम देकर एक सामान न खरीद सका
हताशा है यह
कमा न पाने की
खुद को बेच कर
वाजिब दाम न पाने की
ऑनलाइन दुकानों में कतारबद्ध हो रहा हूं
बिन पाकेट की कमीज़ और पतलून
पहनने की योजना बना रहा हूं
एक मैनेजर किराये पर दे दो भाई
जो मुझे बेच आए बाज़ार में
बिका हुआ माल वापस न होने की शर्त पर
बस गोदाम खाली कर जाए
मिला हुआ माल दे जाए
मैं घूम सकूं बाकी की ज़िंदगी
पहन कर
बिन पाकेट कमीज़ और पतलून
उन सबकी शोर से बहुत दूर
सेमिनारों में जो करते हैं रात दिन
बाज़ार,बाज़ार और बाज़ार
कोई ऐसी जगह बता दो भाई
जहां बाज़ार न हो और हम बिक भी जायें
बिकने के लिए ही तो निकले हैं सब
बाज़ार को गरियाते रहते हैं
पाकेट वाली पतलून और कमीज़ पहनकर
गोष्ठियों में जाते रहते हैं
मैं नहीं बदलूंगा इस समय को
जिस समय में मैं सड़ा दिया गया
उसे बचाकर रखूंगा
आने वाली पीढ़ियों के सड़ने के लिए
बिकने के लिए
टाइट कमीज़ और टाइट पैंट के लिए
क्रेडिट कार्ड की बिक्री से पलने वाले
एजेंटों के परिवारों के लिए
सब कुछ म्यूचुअल है मेरे भाई
नए फैशन में जीना है
बिन पाकेट पतलून और कमीज़
पहन कर चलना होगा
आंत की मरोड़ों को दबा कर
जीभ की लपलपाहट को शांत करना होगा
मन को मेडिटेशन से बांध कर
तन को योगा से साधना होगा
बकवास करते हो तुम मुझसे
सेल में खरीदने वालों को सांत्वना देते हो
ताकि जब तक घर तक पहुंचे वे सब
रास्ते में ही सेल की थैलियों से पहचान लिये जाए
ये है कमाने वाला
ये है खरीदने वाला
ये है बिकने वाला
पूरा दाम नहीं दे पाता
डिस्काउंट ही इसकी औकात है
छूट चाहिए सबको हर चीज़ में
आदर्शों में भी
मापदंडों में भी
समझौतों में भी
संबंधों में भी
बिन पाकेट पतलून और कमीज़
पहन कर हम सब कम से कम
खाली हाथ तो लौट आयेंगे
तुम लौट सकोगे खाली हाथ
बिना सेल की थैलियों के
ध्यान रखना
न बिका हुआ माल
गोदाम में
सड़ने के लिए रखा होता है
सड़ना चाहोगे तुम
अकड़ना चाहोगे तुम
तो पहन कर घूमो आज से
बिन पाकेट कमीज़ और पतलून
मोबाइल से शहर को देखो





सभी तस्वीरें नदिरे(नई दिल्ली रेलवे स्टेशन का कैट नेम)के प्लेटफार्म नंबर दस से ली गईं हैं। इन किताबों के रंग और शीर्षक आपको कई टीवी चैनलों पर दिखाई देते होंगे। दुत्कारित साहित्य का ही असर है कि हम सब टीवी वाले ऐसी शीर्षककारिता करते रहते हैं। शीर्षककारिता अब पत्रकारिता का इम्पोर्टेंट सेगमेंट है। कई लोगों ने शीर्षक लगाने में महारत हासिल कर ली है। शीर्षककारिता से पहली टीवी में अनुप्रास पत्रकारिता आई। इसमें एक ही वर्ण से शुरू होने वाले कई शब्दों को ढूंढा जाता है। जैसे पाकिस्तान पर कोई हेडर लगाना हो तो अनुप्रास संपादक सबसे पहले प से शुरू होने वाले तमाम नापाक किस्म के शब्दों को ढूंढता है। जैसे- पस्त हो गया पाकिस्तान। पतली हालत पाकिस्तान की। लेकिन अनुप्रास के अगले स्तर में जब शीर्षककारिता का जन्म हुआ तो इस तरह की शीर्षक आ रहे हैं जो एक तस्वीर में दिखती भी है- १५ बम पाकिस्तान खत्म। हिंदी पत्रकारिता के इस स्वर्गगामी काल में कई प्रयोग हो रहे हैं जो अननोटिस चले जा रहे हैं। हमारे देश में तीन नंबर के कामों को श्रद्धा की नज़र से नहीं देखते। जबकि तीन नंबर के कामों की लोकप्रियता कम नहीं होती।
अगर केशव पंडित,डार्लिंग और मनोज टाइप के लेखक हिंदी पत्रकारिता में संपादक हुए होते तो टीवी चैनलों पर ओरिजनल काम दिखता। क्या फायदा केशव पंडित के नोभल का टाइटल चुराकर टीवी पर चस्पां करने का। शादी करूंगी यमराज से। ये ख्याल क्यों किसी अशोक वाजपेयी या अमिताव घोष को नहीं आता। आज तक समझ में नहीं आया। वो क्या लिखते रहते हैं भाई।
(अनादर का इंटेंशन नहीं है।) खैर सबके अलग अलग रास्ते हैं। हर रास्ता दूसरे को काटना चाहता है। हिंदी न्यूज़ चैनल ने एक नया सोलुशन निकाला है। वो चौराहा नहीं खोजता। गोलंबर खोजता है। एक बार मिल जाता है तो सब उसी के गोल गोल गोल गोल घूमते रहते हैं। मैं भी घूम रहा हूं।
कड़ी कार्रवाई
जब कार्रवाई है ही तो कड़ी कार्रवाई क्यों हैं। इस बात को लेकर बहुत दिनों से परेशान हूं। सोच रहा हूं कि ज़रूर कार्रवाई शब्द की प्रासंगिकता खत्म हो गई होगी तभी सत्ताधारी शब्दतंत्र ने कार्रवाई के आगे कड़ी लगाकर इसकी प्रासंगिकता को बनाए रखने की कोशिश की होगी। तभी तो बीजेपी के अध्यक्ष कड़ी कार्रवाई करने की चेतावनी देते हैं। फिर भी वसुंधरा नहीं मानती है तो कड़ी के आगे एक और कड़ी लगा देते हैं। बयान देते हैं कि अनुशासन तोड़ने वाले नेताओं के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी। कड़ी से कड़ी या सिर्फ कड़ी कार्रवाई शब्द नेता या सत्ताधारी के श्रीमुख से उद्धृत होता है तो उसका चेहरा देखना चाहिए। बिल्कुल अंतिम फ़रमान के माफिक। लेकिन उसे पता नहीं कि कड़ी या कड़ी से कड़ी कार्रवाई का महत्व खत्म हो चुका है। तभी तो कई लोग इसे और प्रासंगिक बनाने की कोशिश करने में लगे रहते हैं। कहते हैं कि अनुशासन तोड़ने में कोई भी शामिल हो,चाहे वो कितना बड़ा नेता क्यों न हो,उसके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होगी। सोचता हूं कि ये दो वेराइटी की कड़ी न होती तो कार्रवाई अकेले क्या कर लेती।
यह एक और कोशिश होती है कार्रवाई शब्द के असर को बरकरार रखने की। विश्वास दिलाया जाता है कि कड़ी से कड़ी कार्रवाई वो होती है जो किसी के खिलाफ भी की जा सकती है। तो यह मतलब निकाले कि कार्रवाई वो होती है जो हर किसी के खिलाफ नहीं की जा सकती। लोअर लेवल के खिलाफ कार्रवाई होती है,मिडिल लेवल के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होती है और अंत जब कुछ नहीं होता तो कड़ी से कड़ी कार्रवाई किसी भी लेवल के खिलाफ यानी अपर लेवल के खिलाफ किये जाने का एलान होता है।
ज़ाहिर है,व्यवस्था तंत्र इस शब्द की महिमा को नहीं बचा सका है। आज ही अखबार में पढ़ा कि गाज़ियाबाद के एसएसपी ने कहा है कि मिलावटी धंधा करने वालों के ख़िलाफ पुलिस अभियान चलाएगी। जो भी पकड़ा जाएगा उसके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी। तो क्या कई लोग जो पकड़े जाते हैं उनके ख़िलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई नहीं होती। कड़ी कार्रवाई के तहत क्या पांच साल की सज़ा होती है और कड़ी से कड़ी कार्रवाई तहत उम्र कैद होती है? क्या किसी के ख़िलाफ़ भी कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने की बात कर प्रशासन अपना महिमामंडन करने की कोशिश करता है। कार्रवाई आश्वासन है या चेतावनी। टोन से दोनों में फर्क नहीं लगता। कभी कभी तो कड़ी से कड़ी कार्रवाई आश्वासन की तरह प्रयुक्त होता है।
क्या कार्रवाई शब्द एक नाकाम शब्द है। फिर इसे सख्त से सख्त या कड़ी से कड़ी लगाकर बचाने की कोशिश क्यों की जाती है? क्यों न इसे गाड़ दिया जाए? मान लिया जाए कि दरअसल जब कार्रवाई ही नहीं हो सकती तो कड़ी से कड़ी कार्रवाई क्यों हो? क्या स्टेप बाइ स्टेप नहीं हो। पहले कार्रवाई कीजिए। जब वो न कर सकें तो कड़ी कार्रवाई कीजिए और जब यह भी फेल हो जाए तो कड़ी से कड़ी कार्रवाई कीजिए। जब तीनों प्रकार की कार्रवाई मिट्टी में मिल जाए तो तब एलान कीजिए कि किसी के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी। यानी अब कोई नहीं बचेगा। हार री कार्रवाई। आपने कभी कड़ी से कड़ी कार्रवाई की है। ज़रा अंतर बताइयेगा।
यह एक और कोशिश होती है कार्रवाई शब्द के असर को बरकरार रखने की। विश्वास दिलाया जाता है कि कड़ी से कड़ी कार्रवाई वो होती है जो किसी के खिलाफ भी की जा सकती है। तो यह मतलब निकाले कि कार्रवाई वो होती है जो हर किसी के खिलाफ नहीं की जा सकती। लोअर लेवल के खिलाफ कार्रवाई होती है,मिडिल लेवल के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होती है और अंत जब कुछ नहीं होता तो कड़ी से कड़ी कार्रवाई किसी भी लेवल के खिलाफ यानी अपर लेवल के खिलाफ किये जाने का एलान होता है।
ज़ाहिर है,व्यवस्था तंत्र इस शब्द की महिमा को नहीं बचा सका है। आज ही अखबार में पढ़ा कि गाज़ियाबाद के एसएसपी ने कहा है कि मिलावटी धंधा करने वालों के ख़िलाफ पुलिस अभियान चलाएगी। जो भी पकड़ा जाएगा उसके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी। तो क्या कई लोग जो पकड़े जाते हैं उनके ख़िलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई नहीं होती। कड़ी कार्रवाई के तहत क्या पांच साल की सज़ा होती है और कड़ी से कड़ी कार्रवाई तहत उम्र कैद होती है? क्या किसी के ख़िलाफ़ भी कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने की बात कर प्रशासन अपना महिमामंडन करने की कोशिश करता है। कार्रवाई आश्वासन है या चेतावनी। टोन से दोनों में फर्क नहीं लगता। कभी कभी तो कड़ी से कड़ी कार्रवाई आश्वासन की तरह प्रयुक्त होता है।
क्या कार्रवाई शब्द एक नाकाम शब्द है। फिर इसे सख्त से सख्त या कड़ी से कड़ी लगाकर बचाने की कोशिश क्यों की जाती है? क्यों न इसे गाड़ दिया जाए? मान लिया जाए कि दरअसल जब कार्रवाई ही नहीं हो सकती तो कड़ी से कड़ी कार्रवाई क्यों हो? क्या स्टेप बाइ स्टेप नहीं हो। पहले कार्रवाई कीजिए। जब वो न कर सकें तो कड़ी कार्रवाई कीजिए और जब यह भी फेल हो जाए तो कड़ी से कड़ी कार्रवाई कीजिए। जब तीनों प्रकार की कार्रवाई मिट्टी में मिल जाए तो तब एलान कीजिए कि किसी के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी। यानी अब कोई नहीं बचेगा। हार री कार्रवाई। आपने कभी कड़ी से कड़ी कार्रवाई की है। ज़रा अंतर बताइयेगा।
जसवंत को निकालना सही कदम- मोहम्मद अली जिन्ना
(ब्लॉगरो,जिन्ना जी बहुत परेशान हैं। उनका एसएमएस आया था। फेसबुक पर भी लिखा है कि जसवंत बेकार आदमी हैं और मुझे पाकिस्तान से निकलवाने की कोशिश कर रहे हैं। मुझसे भी कहा कि मैं ब्लॉग पर लिखकर जिन्ना साहब की पोज़िशन क्लियर कर दूं। सो मैं लिख रहा हूं)
हमने क्यों नहीं सोचा कि इस विवाद पर जिन्ना साहब क्या सोचेंगे? जसवंत सिंह की ही सोचते रहे। बिल्कुल राइट कहा है जिन्ना जी ने मुझे। बोले कि आज अगर ज़िंदा होता तो जसवंत सिंह के खिलाफ मुस्लिम लीग से भी प्रस्ताव पास करा देता कि बीजेपी से निकाले गए इस नेता को कभी भी हमारी पार्टी में नहीं लिया जाएगा। जाने दे इसे अमर सिंह वाली नश्वर पार्टी में। ब्लॉगरों जसवंत सिंह ने जिन्ना को फंसा दिया है। जिस मुल्क को बनाने के एवज़ में वे राष्ट्रपिता कहलाते हैं उसी मुल्क को जसवंत नेहरू और गांधी की ग़लती का नतीजा बता रहे हैं। हे राम। जसवंत की किताब और इससे पैदा विवाद से लगता है कि पाकिस्तान बाई मिस्टेक बन गया। जिन्ना हिंदुस्तान बनवा रहे थे लेकिन बन गया पाकिस्तान। स्पेलिंग मिस्टेक से। इससे तो जिन्ना की अहमियत कम होती है। पाकिस्तान के लोग क्या सोचेंगे कि जिस आदमी को हम पाकिस्तान का बापू समझते रहे वो तो चाहता ही नहीं था कि हम एक मुल्क के रूप में पैदा हों। भला हो गांधी नेहरू की कमज़ोरी और गलती का, जिससे इस्लामी विश्व को एक मुल्क बन गया।
जिन्ना ज़िंदा होते आज पाकिस्तान में जसवंत की किताब को बिकने न देते। मोदी को फोन करते कि तुम भी अपने यहां बैन करो,हम भी अपने यहां बैन करते हैं। चिल्लाने लगते। जसवंत। सुनो। पाकिस्तान मेरा आइडिया था भाई। ओरीजिनल। बिना मोलभाव किये,नेहरू गांधी के साथ दांव चले क्या कोई पाकिस्तान दे देता। अब तुम ऐसे लिख दिये हो जैसे मैं पाकिस्तान नहीं चाहता था। अरे ये सब मत बोलो। पाकिस्तान में लोग मुझे क़ायदे-आज़म के पोस्ट से रीमूव कर देंगे।
जिन्ना भावुक हो जाते। कहते कि हे जसवंत। आज़ादी के आंदोलन के कुरुक्षेत्र में मैं कर्ण की तरह खड़ा रहा। किसी के न अपनाये जाने की ग्रंथि ने मुझे अपने भाइयों के खिलाफ़ ख़ड़ा कर दिया। ठीक लिखा है मेरे बारे में शशि थरूर ने। कितना भी दानी हो जाऊं,कर्ण का पात्र इतिहास का महान किरदार नहीं है। दान देकर कौन अमर हुआ है इतिहास में। वो भी आजकल के टाइम में जब सब चैरिटी करते हैं। मेरी बैरीस्टरी,मेरी दलीलें,मेरी इंग्लिश लाइफ स्टाइल और मेरी हिम्मत। मैंने इस्लाम को एक मुल्क दिया है। अकेला अपने दम पर। कर्ण से कम नहीं था मैं। लेकिन तुम तो मेरे साथ वही कर रहे हो जो कर्ण के साथ हुआ। इतिहास में कभी रांग साइड पर नहीं होना चाहिए। पाकिस्तान बनवाने का ये मेरा अफसोस है लेकिन ज़िंदा होता तो दोस्त आज़ाद भारत में रोज़ पाकिस्तान बन रहा होता। हर चुनाव में मुस्लिम लीग का एजेंडा लेकर लोग दौड़ने लगते। मैंने इंडिया को एक दूसरी आज़ादी है। उस हिसाब से मुझे वहां भी रेसपेक्ट मिलना चाहिए।
जस्सू, अगर मैं अर्जुन के साथ होता तो आज करन-अर्जुन टाइप की फिल्में मेरी मिसाल दे कर बनती। इस युधिष्ठिर के चक्कर में मैं बर्बाद हो गया। जसवंत तुम मुझे अकेला छोड़ दो। मुझसे पाकिस्तान बनाने का क्रेडिट मत छीनो। गांधी-नेहरू को तुम ग़लत साबित करके क्या करोगे? अगर तुमने हिंदुस्तान पाकिस्तान को मिलाने की कोशिश की तो राष्ट्रपिता की कुर्सी चली जाएगी। अगर तुमने पाकिस्तान के लिए गांधी को ज़िम्मेदार बताया तो और प्रॉब्लम हो जाएगा। हमारे यहां लोग तुम्हारे बापू को अपना बापू कहने लगेंगे। कहेंगे कि पाकिस्तान तो गांधी के चलते बना तो तुमको क्यों जिन्ना हम सैल्यूट करें। जस्सू, तुम्हारी पार्टी चुनाव में हारी है तो इस खुंदक में मुझे इतिहास में क्यों हराना चाहते हो। उसे हराओ जिसे तुमने हराया है। सोनिया राहुल से पंगा लो। मुझे छोड़ दो जसवंत।
जिन्ना की इस अपील पर जसवंत जी दिन में ही ड्रिंक कर लेते हैं। वाजपेयी से मिलने जाते हैं। बाहर आकर प्रेस से कहते हैं कि वाजपेयी को भी किताब पसंद नहीं आई। जिन्ना जी ने अटल जी से शिकायत कर दी है। अटल जी ने कहा है कि लाहौर बस यात्रा तभी सफल होगी जब भारत यह लाइन लेगा कि पाकिस्तान एक मुल्क है। उसे गांधी नेहरू ने नहीं जिन्ना ने बनवाया है। ये जिन्ना का एक ड्रीम प्रोजेक्ट था। वाजपेयी जी ने कहा है कि यह मत कहो कि गलती से बन गया। तुम उस मुल्क की बुनियाद पर सवाल खड़े कर भविष्य के रिश्ते नहीं तय कर सकते। जसवंत इस किताब का खंडन कर दो। प्रेस वालों से कह देना कि मेरी किताब को कहा गया बयान समझ कर खंडन मान लिया जाए। पाकिस्तान गलती से नहीं बना। जिन्ना साहब ने बनाया। उनको कुछ बनाना था। इसलिए पाकिस्तान बना दिया। हमको उनसे निभाना है। इसलिए पाकिस्तान को मान लिया है।
इस विवाद से कंफ्यूज़न क्रिएट हो रहा है। मरकरी की तरह जलने लगती है ये भाजपा। देर से। जिन्ना लेटर लिखते हैं। पाकिस्तान के बनने के कांसेप्ट का विरोध कर जसवंत संघ के अखंड भारत के सपने को पूरा करना चाहते हैं। ये तो गांधी और नेहरू से भी खतरनाक है। अब अगर ये जस्सू अमर सिंह की पार्टी में गया तो गज़ब कर देगा। कह देगा कि अगर जिन्ना इंडिया में होते तो यूपी में सरकार मायावती की नहीं,मुस्लिम लीग की होती। फिर पाकिस्तान वाले मुझे क्या कहेंगे। एक मुल्क का पिता या फिर यूपी का सीएम। बहुत टेंशन हो रहा है। अमर सिंह मेरी हालत कांग्रेस वाली कर देंगे। समर्थन की चिट्ठी भी देंगे और पानी पी पी के गाली भी।
इसलिए जसवंत तुमने ठीक नहीं किया। पाकिस्तान मेरा आइडिया था। मैंने बनाया। गांधी को आइडिया पसंद नहीं था। मैं अपनी टीम लेके निकल लिया। जवाहर और पटेल के पास विकल्प क्या थे। उन्होंने तो सिर्फ मेंटेन किया है। जो मिला उसी की तुरपाई करते रहे। मैंने क्रिएट किया है भाई। इतिहास में मैं उनसे ज़्यादा टावरिंग हूं। दोनों विरोध क्यों करते? कभी सोचा तुमने जस्सू? क्या वो मेरे गुलाम थे? जो मेरी हर बात मानते। मेरी हां में हां मिलाते? क्या मैं उनका गुलाम था? नहीं। वो पाकिस्तान का विरोध कर कांग्रेस को मुस्लिम लीग में मिला देते क्या? तुम्हें क्या लगता है कि कांग्रेस जवाहर और पटेल की जेबी संस्था थी? अगर होती तो क्या पटेल को जवाहर अपने मंत्रिमंडल में लेते? मैं पीएम के लिए फाइट कर रहा था? ये लेवल था मेरा? कितने पीएम हो गए इंडिया पाकिस्तान में। डू यू रिमेंबर ऑल ऑफ देम। बट यू रिमेंबर मी एंड गांधी। इसीलिए मैंने राष्ट्रपिता वाला रास्ता ले लिया। इंडिया के दो राष्ट्रपिता होते क्या? गांधी और जिन्ना? पाकिस्तान के हैं और इंडिया के भी।
सवाल तो सोचो जसवंत। जसवंत तुम्हारा कांसेप्ट प्रैक्टिकल नहीं है। पाकिस्तान मैंने बनाया है। पाकिस्तान नहीं बनाता तो क्या भारत में लोग मुझे गांधी की जगह सर पे बिठाते। कत्तई नहीं। जवाहर और गांधी की लेगअसी आज तक चल रही है। मेरी कहां है? गूगल पर सर्वे करा लो। गांधी पोपुलर हैं या मैं? अब ये मत कर देना जसवंत। अब तुम मुझे छोड़ दो। ठीक किया बीजेपी ने तुमको निकाल दिया। तुमने बीजेपी के साथ मेरा भी नाम खराब किया है। मैं चाहता हूं कि पाकिस्तान बनाने का क्रेडिट मुझे मिले न कि जवाहर-गांधी को।
हमने क्यों नहीं सोचा कि इस विवाद पर जिन्ना साहब क्या सोचेंगे? जसवंत सिंह की ही सोचते रहे। बिल्कुल राइट कहा है जिन्ना जी ने मुझे। बोले कि आज अगर ज़िंदा होता तो जसवंत सिंह के खिलाफ मुस्लिम लीग से भी प्रस्ताव पास करा देता कि बीजेपी से निकाले गए इस नेता को कभी भी हमारी पार्टी में नहीं लिया जाएगा। जाने दे इसे अमर सिंह वाली नश्वर पार्टी में। ब्लॉगरों जसवंत सिंह ने जिन्ना को फंसा दिया है। जिस मुल्क को बनाने के एवज़ में वे राष्ट्रपिता कहलाते हैं उसी मुल्क को जसवंत नेहरू और गांधी की ग़लती का नतीजा बता रहे हैं। हे राम। जसवंत की किताब और इससे पैदा विवाद से लगता है कि पाकिस्तान बाई मिस्टेक बन गया। जिन्ना हिंदुस्तान बनवा रहे थे लेकिन बन गया पाकिस्तान। स्पेलिंग मिस्टेक से। इससे तो जिन्ना की अहमियत कम होती है। पाकिस्तान के लोग क्या सोचेंगे कि जिस आदमी को हम पाकिस्तान का बापू समझते रहे वो तो चाहता ही नहीं था कि हम एक मुल्क के रूप में पैदा हों। भला हो गांधी नेहरू की कमज़ोरी और गलती का, जिससे इस्लामी विश्व को एक मुल्क बन गया।
जिन्ना ज़िंदा होते आज पाकिस्तान में जसवंत की किताब को बिकने न देते। मोदी को फोन करते कि तुम भी अपने यहां बैन करो,हम भी अपने यहां बैन करते हैं। चिल्लाने लगते। जसवंत। सुनो। पाकिस्तान मेरा आइडिया था भाई। ओरीजिनल। बिना मोलभाव किये,नेहरू गांधी के साथ दांव चले क्या कोई पाकिस्तान दे देता। अब तुम ऐसे लिख दिये हो जैसे मैं पाकिस्तान नहीं चाहता था। अरे ये सब मत बोलो। पाकिस्तान में लोग मुझे क़ायदे-आज़म के पोस्ट से रीमूव कर देंगे।
जिन्ना भावुक हो जाते। कहते कि हे जसवंत। आज़ादी के आंदोलन के कुरुक्षेत्र में मैं कर्ण की तरह खड़ा रहा। किसी के न अपनाये जाने की ग्रंथि ने मुझे अपने भाइयों के खिलाफ़ ख़ड़ा कर दिया। ठीक लिखा है मेरे बारे में शशि थरूर ने। कितना भी दानी हो जाऊं,कर्ण का पात्र इतिहास का महान किरदार नहीं है। दान देकर कौन अमर हुआ है इतिहास में। वो भी आजकल के टाइम में जब सब चैरिटी करते हैं। मेरी बैरीस्टरी,मेरी दलीलें,मेरी इंग्लिश लाइफ स्टाइल और मेरी हिम्मत। मैंने इस्लाम को एक मुल्क दिया है। अकेला अपने दम पर। कर्ण से कम नहीं था मैं। लेकिन तुम तो मेरे साथ वही कर रहे हो जो कर्ण के साथ हुआ। इतिहास में कभी रांग साइड पर नहीं होना चाहिए। पाकिस्तान बनवाने का ये मेरा अफसोस है लेकिन ज़िंदा होता तो दोस्त आज़ाद भारत में रोज़ पाकिस्तान बन रहा होता। हर चुनाव में मुस्लिम लीग का एजेंडा लेकर लोग दौड़ने लगते। मैंने इंडिया को एक दूसरी आज़ादी है। उस हिसाब से मुझे वहां भी रेसपेक्ट मिलना चाहिए।
जस्सू, अगर मैं अर्जुन के साथ होता तो आज करन-अर्जुन टाइप की फिल्में मेरी मिसाल दे कर बनती। इस युधिष्ठिर के चक्कर में मैं बर्बाद हो गया। जसवंत तुम मुझे अकेला छोड़ दो। मुझसे पाकिस्तान बनाने का क्रेडिट मत छीनो। गांधी-नेहरू को तुम ग़लत साबित करके क्या करोगे? अगर तुमने हिंदुस्तान पाकिस्तान को मिलाने की कोशिश की तो राष्ट्रपिता की कुर्सी चली जाएगी। अगर तुमने पाकिस्तान के लिए गांधी को ज़िम्मेदार बताया तो और प्रॉब्लम हो जाएगा। हमारे यहां लोग तुम्हारे बापू को अपना बापू कहने लगेंगे। कहेंगे कि पाकिस्तान तो गांधी के चलते बना तो तुमको क्यों जिन्ना हम सैल्यूट करें। जस्सू, तुम्हारी पार्टी चुनाव में हारी है तो इस खुंदक में मुझे इतिहास में क्यों हराना चाहते हो। उसे हराओ जिसे तुमने हराया है। सोनिया राहुल से पंगा लो। मुझे छोड़ दो जसवंत।
जिन्ना की इस अपील पर जसवंत जी दिन में ही ड्रिंक कर लेते हैं। वाजपेयी से मिलने जाते हैं। बाहर आकर प्रेस से कहते हैं कि वाजपेयी को भी किताब पसंद नहीं आई। जिन्ना जी ने अटल जी से शिकायत कर दी है। अटल जी ने कहा है कि लाहौर बस यात्रा तभी सफल होगी जब भारत यह लाइन लेगा कि पाकिस्तान एक मुल्क है। उसे गांधी नेहरू ने नहीं जिन्ना ने बनवाया है। ये जिन्ना का एक ड्रीम प्रोजेक्ट था। वाजपेयी जी ने कहा है कि यह मत कहो कि गलती से बन गया। तुम उस मुल्क की बुनियाद पर सवाल खड़े कर भविष्य के रिश्ते नहीं तय कर सकते। जसवंत इस किताब का खंडन कर दो। प्रेस वालों से कह देना कि मेरी किताब को कहा गया बयान समझ कर खंडन मान लिया जाए। पाकिस्तान गलती से नहीं बना। जिन्ना साहब ने बनाया। उनको कुछ बनाना था। इसलिए पाकिस्तान बना दिया। हमको उनसे निभाना है। इसलिए पाकिस्तान को मान लिया है।
इस विवाद से कंफ्यूज़न क्रिएट हो रहा है। मरकरी की तरह जलने लगती है ये भाजपा। देर से। जिन्ना लेटर लिखते हैं। पाकिस्तान के बनने के कांसेप्ट का विरोध कर जसवंत संघ के अखंड भारत के सपने को पूरा करना चाहते हैं। ये तो गांधी और नेहरू से भी खतरनाक है। अब अगर ये जस्सू अमर सिंह की पार्टी में गया तो गज़ब कर देगा। कह देगा कि अगर जिन्ना इंडिया में होते तो यूपी में सरकार मायावती की नहीं,मुस्लिम लीग की होती। फिर पाकिस्तान वाले मुझे क्या कहेंगे। एक मुल्क का पिता या फिर यूपी का सीएम। बहुत टेंशन हो रहा है। अमर सिंह मेरी हालत कांग्रेस वाली कर देंगे। समर्थन की चिट्ठी भी देंगे और पानी पी पी के गाली भी।
इसलिए जसवंत तुमने ठीक नहीं किया। पाकिस्तान मेरा आइडिया था। मैंने बनाया। गांधी को आइडिया पसंद नहीं था। मैं अपनी टीम लेके निकल लिया। जवाहर और पटेल के पास विकल्प क्या थे। उन्होंने तो सिर्फ मेंटेन किया है। जो मिला उसी की तुरपाई करते रहे। मैंने क्रिएट किया है भाई। इतिहास में मैं उनसे ज़्यादा टावरिंग हूं। दोनों विरोध क्यों करते? कभी सोचा तुमने जस्सू? क्या वो मेरे गुलाम थे? जो मेरी हर बात मानते। मेरी हां में हां मिलाते? क्या मैं उनका गुलाम था? नहीं। वो पाकिस्तान का विरोध कर कांग्रेस को मुस्लिम लीग में मिला देते क्या? तुम्हें क्या लगता है कि कांग्रेस जवाहर और पटेल की जेबी संस्था थी? अगर होती तो क्या पटेल को जवाहर अपने मंत्रिमंडल में लेते? मैं पीएम के लिए फाइट कर रहा था? ये लेवल था मेरा? कितने पीएम हो गए इंडिया पाकिस्तान में। डू यू रिमेंबर ऑल ऑफ देम। बट यू रिमेंबर मी एंड गांधी। इसीलिए मैंने राष्ट्रपिता वाला रास्ता ले लिया। इंडिया के दो राष्ट्रपिता होते क्या? गांधी और जिन्ना? पाकिस्तान के हैं और इंडिया के भी।
सवाल तो सोचो जसवंत। जसवंत तुम्हारा कांसेप्ट प्रैक्टिकल नहीं है। पाकिस्तान मैंने बनाया है। पाकिस्तान नहीं बनाता तो क्या भारत में लोग मुझे गांधी की जगह सर पे बिठाते। कत्तई नहीं। जवाहर और गांधी की लेगअसी आज तक चल रही है। मेरी कहां है? गूगल पर सर्वे करा लो। गांधी पोपुलर हैं या मैं? अब ये मत कर देना जसवंत। अब तुम मुझे छोड़ दो। ठीक किया बीजेपी ने तुमको निकाल दिया। तुमने बीजेपी के साथ मेरा भी नाम खराब किया है। मैं चाहता हूं कि पाकिस्तान बनाने का क्रेडिट मुझे मिले न कि जवाहर-गांधी को।
जब हमारे भीतर का कुत्ता बड़ा हो जाएगा

यह कुत्ता हमारे भीतर से निकल कर विशालकाय हो गया है। वेद प्रकाश गुप्ता हम सबके भीतर दुबके कुत्ते को बड़ा कर देना चाहते हैं। दिल्ली के प्रगति मैदान में उनकी यह कलाकृति हम सबके लिए आईना है। बिहार में जन्मे और बड़ौदा स्कूल ऑफ आर्ट से कला में दीक्षित होकर निकले वेद प्रकाश गुप्ता क्षेत्रीय पहचान को भुनाने वालों को भी कुत्ते की तरह देखते हैं। मैंने पूछा कि आपने इतना विशाल कुत्ता क्यों बना दिया। इस युवा कलाकार का जवाब था कि हम सब कुत्ते के सामने बौने हो गए हैं। सफेद और काले रंग के इस डालमेशियन को चुनने का मकसद यही है कि जब हम खुद को सफेद बनाने की कोशिश करते हैं तो काले दाग को ढंक नहीं पाते। दोहरापन नहीं चलेगा। कहते हैं आज हम सब बौने हो गए हैं। लोकतंत्र में सवाल करना भूल गए हैं। सामाजिक बुराई से कौन लड़ेगा। मैं कलाकारों के बीच नहीं रहता। समाज में रहता हूं। बेचैन हूं कि इन बुराइयों से लड़ा जाए। इसलिए मुझे सामाजिक समस्यायें विकराल नज़र आने लगती हैं। कुत्ते की तरह दुम हिलाने या चाटने की आदत के शिकार हो गए हैं। हमें नज़र न आता हो लेकिन हम कुत्ता बन गए हैं। वेद के जवाबों से मेरी बेचैनी बढ़ गई। कला को लेकर मेरी समझ ज़ीरो है। मेरे लिए यह भी ज़रूरी नहीं कि मेरी पहचान इस आधार पर भी बने कि मैं कला को समझता हूं।
लेकिन वेद प्रकाश गुप्ता के जुझारूपन पर फिदा हो गया। जवान सा एक लड़का। इतनी बातें करना चाहता है,इतना कुछ करना चाहता है कि ऐसे लड़कों के लिए स्पेस कहां हैं। तो वो क्या करेगा?अगर कलाकार है तो एक दिन हम सबके भीतर बैठे कुत्ते को खींच कर बाहर निकालेगा,तान तान कर इतना बड़ा कर देगा कि आइने के सामने खड़े होने में डर लगेगा। मुंह पर भौंकने लगेगा कि बताओ तो हम अपने अपने दफ्तरों में लोकतंत्र और समाज की लड़ाई लड़ रहे हैं या इस उस को कम बताकर खुद को महान साबित करने की सेटिंग रच रहे हैं। ये बाबू लोग क्यों नेताओं की चाटने लगते हैं? ये नेता लोग क्यों बाबुओं की चाटने लगते है? कुत्ता बनने की प्रक्रिया हर तरफ है। इस क्षुद्र मानवीय प्रवृत्तियों के सहारे भीतरघात की तमाम कोठरियों में हम सब कुत्ते बन जाते हैं। अखबारों में लेख लिख देते हैं,किसी की समीक्षा कर देते हैं,इस कोशिश के साथ पांच सौ लाइनों में किसी पर सवाल उठा देने से लोकतांत्रिकता का दायित्व पूरा हो जाता है। लेकिन उसी लेखक को आप उसके सामने खड़ा कर दीजिए,जिसके फैसलों को चुनौती देकर लेख लिखा जाता है तो सौ में से निन्यानबे आदमी कुत्ता बन जाते हैं और चाटने लगते हैं। हम लोकतंत्र को भी अधिकार की तरह चाहते हैं। दायित्व की तरह नहीं। स्वाभाव की तरह नहीं। इसीलिए अपनी पसंद का एक डेमोक्रेटिक स्पेस बनाते हैं और उसमें कुत्ता बन कर चाटते रहते हैं। इस डेमेक्रेटिक स्पेस के शीर्ष पर बैठे लोगों की कभी आलोचना नहीं करते,क्योंकि उससे बाहर कर दिये जाने की आशंका की वजह से उस पर और वहीं पर सवाल नहीं करते। परोक्ष रास्ता चुनते हैं। कलाकार कहता है सवाल तभी तक महत्वपूर्ण है जब वो उसी समय और उसी जगह पर किया जाए। जसवंत सिंह की तरह नहीं। पार्टी से निकाल दिये गए तो आडवाणी और वाजपेयी के राज़ उगल रहे हैं। वेद कहते हैं जब तक हमारे भीतर का कुत्ता नहीं निकलेगा,हम सब बिना चाटे खाने का स्वाद ही नहीं ले सकेंगे।
वेद प्रकाश गुप्ता कहते हैं कि मैं हम सबके भीतर बैठे इसी कुत्ते को बाहर निकाल देना चाहता हूं। चार महीने लगा कर यूं ही नहीं बनाया है इस कुत्ते को। जब मैं वेद प्रकाश से बात कर रहा था तो उनकी ऊर्जा मुझे बिजली दे रही थी। वही इस विशालकाय कुत्ते के आसपास गली के कुत्ते बदहवास घूम रहे थे। बौरा गए थे। ये क्या हो गया है। कुत्ते इतने बड़े क्यों होने लगे हैं? कुछ कुत्तों ने इस मूर्ति पर भौंकने की बहुत कोशिश की लेकिन अपनी ही जात के इतने विशालकाय हो जाने पर भौंचक्क होकर भाग भी रहे थे। अजब नज़ारा था। नीचे वेद की एक और कलाकृति है जिसमें कुत्ता आदमी को चाट रहा है। जब आदमी कुत्ते की तरह चाटने लगेगा तो कुत्ता तो वही करेगा न जो करता आया है। आदमी को चाट लेगा।

जसवंत, जिन्ना बनना चाहेंगे- पार्ट वन

जसवंत के जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे। वो जिन्ना का गुणगान कर रहे हैं। कोई रोक भी नहीं सकता। उनकी अपनी कोशिश है। लेकिन इतिहास इकतरफा फ़ैसले के काम नहीं आता है। जसवंत सिंह इतिहास का इस्तमाल करते लगते हैं। सब जानते हैं कि असहयोग आंदोलन तक आते आते जिन्ना पाकिस्तान की सोच को लेकर बहुत साफ नहीं थे। यही वो मोड़ है जहां से जिन्ना कांग्रेस और गांधी की लाइन से अलग होने लगते हैं। जिन्ना का यकीन संविधान और कानून पर चलते हुए ब्रिटिश हुकूमत के तहत स्वराज प्राप्त करना था। गांधी इस लाइन से आगे जा चुके थे। गांधी को आज़ादी चाहिए थी। अपने समय के दोनों ही दमदार नेता रहे। दोनों में खूबियां रहीं। खामियां भी।
जसवंत सिंह की किताब जिन्ना को सर्टिफिकेट देने के लिए लिखी गई है। जब तक आप राष्ट्रवाद की घिसी पिटी अवधारणाओं की नज़र से किसी इतिहास को देखेंगे,तब तक तस्वीर धुंधली नज़र आएगी। यह कहना इतिहास का सरलीकरण है कि नेहरू और पटेल ने जिन्ना को पाकिस्तान दे दिया। ये वो नेता कह रहा है कि जिसकी पार्टी आज तक तय नहीं कर पाई कि मुसलमानों के साथ तुष्टीकरण करने या नहीं करने के मुद्दे से आगे जाकर करना क्या है। जिसके परिवार की एक विचारधारा सभी को हिंदू बताने लगती है। पूर्वज एक होने का एलान करती है। धर्मनिरपेक्ष जिन्ना इसी सोच का विरोध तो करते थे।
पता नहीं जसवंत ने जिन्ना के बहाने संघ का विरोध किया है या कांग्रेस का। समझना मुश्किल है कि जिन्ना की बजाय नेहरू को ज़िम्मेदार बताने के पीछ मकसद क्या है? नेहरू की आलोचना होनी चाहिए लेकिन जिन्ना को एक लाइन का कैरेक्टर सर्टिफिकेट देना कहां तक सही है।
नागपुर अधिवेशन तक कांग्रेस और मुस्लिम लीग के अधिवेशन साथ साथ हो रहे थे। १९२० के इस अधिवेशन में ही साफ हो गया कि आगे चल कर जिन्ना किसी और लाइन की तरफ बढ़ेंगे। इसके पीछे तमाम तरह की स्थितियां थीं। जिसके लिए कई लोग ज़िम्मेदार रहे होंगे। जिन्ना अकेले नेता थे,जो भरी सभा में खड़े होकर असहयोग आंदोलन के गांधी का साथ देने के कांग्रेस के फैसले का विरोध करते हैं। नागपुर में जमकर नारेबाज़ी होती है,फिर भी जिन्ना अपनी बात कहते हैं। जिन्ना गांधी को महात्मा मिस्टर कहते रहते हैं। वीरेंद्र कुमार बरनवाल कहते हैं कि वे जिस स्टाइल के थे,उनके लिए महात्मा की बजाय मिस्टर गांधी कहना ही सूट करता था।
१९३७ में मुस्लिम लीग बुरी तरह हार जाती है। जिन्ना टूट जाते हैं। उससे पहले जिन्ना १९३० से लेकर ३४ तक लंदन रहने चले जाते हैं। अपने पासपोर्ट में स्थायी पता लंदन का ही देते हैं। १९३७ में यूपी में कांग्रेस को बहुमत मिला था। इसी के बाद मिथक गढ़ा गया कि लीग की तरफ से बहुत कोशिश हुई कि कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार मिलाये। क्यों? इसके पीछे भी लंबे चौड़े कारण हैं। जिसका खुलासा पहले लेख में किया गया है। जसवंत सिंह जैसा राजनेता ही इतिहास की इन जटिलताओं को राजनीतिक भाषण में बदल देने की कोशिश करता है। पिछले कई सालों से इस तरह के मिथक कुछ तथ्यों के आधार पर गढ़े गए हैं।
बहरहाल मुस्लिम लीग की हार के बाद जिन्ना आहत थे। वीरेंद्र कुमार बरनवाल लिखते हैं कि १९३७ में जब उत्तर प्रदेश और बम्बई में कांग्रेस के साथ मुस्लिम लीग की सत्ता में भागीदारी का जिन्ना का सपना बुरी तरह छिन्न-भिन्न हो गया था और गांधी इसमें कोई सहायता नहीं कर पाए थे तब से जिन्ना के तेवर दिन-ब-दिन गांधी और कांग्रेस के खिलाफ उग्रतर होने लगे। एक बार गांधी के खिलाफ जिन्ना के किसी कथन की तुर्शी पर जब दुर्गादास ने उनसे कहा था कि इससे गांधी आहत हो सकते हैं तो जिन्ना ने कहा था कि दुर्गा,गांधी यही भाषा समझते हैं।
बरनवाल चौधरी खलीकुज़्ज़मा का हवाला देते हैं। कहते हैं खलीकुज़्ज़मा पाथ वे टु पाकिस्तान में ज़िक्र करते हैं कि जब १९३७ में मुस्लिम लीग ने अपने लखनऊ अधिवेशन में पूरी आजादी के ध्येय को अपने उद्देश्यों में शामिल करने के प्रस्ताव पर विचार करना शुरू किया था तो जिन्ना ने इसका विरोध किया था। जब चौधरी खलीक़ुज़्ज़मा ने उन्हें समझाया कि इसके विरोध का मतलब मुस्लिम लीग के ख़ातमे की पहल होगी तो वे मान गए। पर उन्होंने पूरी आज़ादी की जगह मुक्म्मल आज़ादी जैसे शब्द के प्रयोग पर सहमति जताई थी।( पेज-२३९)। पूरी आज़ादी या पूर्ण स्वराज जैसे शब्द पर उन्हें लगता है, इसलिए आपत्ति थी क्योंकि इसका प्रयोग सन १९२९ के लाहौर कांग्रेस के अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू ने रावी के किनारे पास किए गए अपने प्रस्ताव में किया था।
यहां से जिन्ना को लगने लगा था कि कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष पार्टी नहीं है। वो गांधी को ज़िम्मेदार मानते थे। जिन्ना अपनी बराबरी गांधी से ही करते थे। इसके बाद गांधी ने जिन्ना को लिखा था कि लखनऊ के भाषण में वे जिन्ना के राष्ट्रवादी रूप को नहीं ढूंढ पा रहे थे। गांधी ने आगे पूछा कि क्या वह अब भी वही जिन्ना थे? जिन्ना सफाई नहीं थे।
वीरेंद्र कुमार बरनवाल कहते हैं कि जिन्ना ने इसका करारा जवाब देते हुए लिखा था कि वह उनके( गांधी) के बारे में यह नहीं कहना चाहेंगे कि उनके संबंध में लोग सन १९१५ में क्या कहते थे और अब क्या कहने लगे हैं। अब जिन्ना को अपने को सम्प्रदायवादी कहे जाने पर भी कोई आपत्ति नहीं रह गई थी।
जसवंत सिंह की पूरी दलील उस अवधारणा पर टिकी है कि बाबरी मस्जिद का ध्वंस कांग्रेस के शिलान्यास की गलती के कारण हुआ। जैसे बीजेपी और आरएसएस, कांग्रेस की इस गलती को रोकने की कोशिश कर रहे थे।
जिन्ना की भूमिका की आलोचना और सराहना दोनों होती रही है। इतिहास की प्रक्रियाओं के संबंध में ही उनके व्यक्तित्व के विकास को देखना होगा। जिन्ना और गांधी में ज़मीन आसमान का फर्क है। फिर बरनवाल क्यों लिखते हैं कि १९४० में मौलाना आज़ाद के कांग्रेस अध्यक्ष बनने से जिन्ना बेहद खफा हो गए थे। इसे वह अपने और लीग के मुसलमानों के एकमेव प्रतिनिधित्व के दावे पर कुठाराघात मानते थे।
हमें नहीं भूलना चाहिए कि इसी राष्ट्रीय आंदोलन की परिधि पर १९२५ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी खड़ा हो रहा था। जिस नागपुर से जिन्ना कांग्रेस और गांधी से दूर होने की राह पर चल देते हैं,उसी नागपुर में हिंदू राष्ट्र की कल्पना जन्म ले रही थी। उससे पहले तुर्की में खलीफा प्रथा को खत्म करने के मार्डन मुस्तफा के खिलाफ भारत में कट्टरवादी आंदोलन कर रहे थे। धार्मिक बहसें तेज़ हो रही थीं। हमें यह भी समझना होगा।
जिन्ना एक जटिल व्यक्ति थे। वो एक भारत का सपना नहीं देख रहे थे। उनके भीतर भारत मे ही वो मुसलमानों के लिए अधिक अधिकार और क्षेत्र की सोच काफी साफ साफ दिखाई देती है। भले ही इतिहास के दस्तावेज़ साबित करें कि जिन्ना ने खुल कर पाकिस्तान की मांग नहीं की और जिस पाकिस्तान की मांग की वो हिन्दुस्तान का टुकड़ा नहीं था बल्कि उसी के भीतर एक व्यापक अधिकार क्षेत्र था। तो भी इसकी नियति विभाजन की तरफ ही ले जाती दिखती है। एक ऐसा तनाव जिसे लेकर भारत न जाने कितनी बार टूटने के कगार पर पहुंचता या टूट चुका होता। जिन्ना ने अपनी सोच का त्याग नहीं किया। न तो धर्मनिरपेक्षता के लिए न ही हिंदुस्तान के लिए। वो गांधी की तरह कांग्रेस छोड़ कर नोओखली नहीं गए। फर्ज कीजिए नेहरू गांधी ने जिन्ना की बात मान ली होती तो आज का भारत कैसा होता?
जसवंत सिंह की किताब ६९५ रुपये की है जब इतना खर्च करेंगे तो बरनवाल जी की किताब १५० रुपये में खरीद ही लीजिएगा। राजकमल ने छापी है। साथ में सलील मिश्र की किताब भी खरीदें ताकि एक साथ पढ़ने से बात को नया परिप्रेक्ष्य मिले।
जसवंत, जिन्ना बनना चाहेंगे- पार्ट टू

इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय ओपन विश्वविद्यालय के प्रो सलील मिश्रा कि किताब A Narrative of Communal Politics, Uttar Pradesh 1937-39 पढ़नी चाहिए। सेज प्रकाशन ने यह किताब छापी है। जसवंत सिंह की किताब भी पढ़नी चाहिए।
मैंने अभी नहीं पढ़ी है लेकिन मीडिया में जिस तरह से उनकी किताब के हवाले से १९३७ के चुनाव को लेकर ज़िक्र आया है कि इसी के बाद विभाजन तय हो गया तो मैंने सोचा कि इतिहासकारों की नज़र से भी देखता हूं। उन किताबों को फिर पलटा जिन्हें कभी पढ़ा करता था।
प्रो सलील मिश्रा लिखते हैं कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के साथ आने को लेकर समकालीन नेताओं और आधुनिक इतिहासकारों ने कई नज़र से देखने की कोशिश की है। दलील जी जाती है कि यूपी में १९३७ में जो हुआ उसी के नतीजे में विभाजन हकीकत बना। अगर कांग्रेस और लीग की साझा सरकार बनती तो विभाजन नहीं होता। कई तरह की बातें होती हैं। लीग और कांग्रेस के घोषणा पत्र में विशेष अंतर नहीं था। दोनों में अनौपचारिक समझ बनी थी कि साझा सरकार बनायेंगे। एक प्रमाण बहराइच का दिया जाता है। जब मुस्लिम लीग के कांग्रेस के रफी अहमद किदवई के खिलाफ उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था। किदवई बहराईच में उम्मीदवार थे,जहां उपचुनाव हो रहा था। लेकिन कहा गया कि जीत के बाद कांग्रेस बदल गई।
सलील कहते हैं कि इन दलीलों को काफी तार्कित तरीके से गढ़ा गया। जबकि कोई प्रमाण नहीं मिलते हैं कि कांग्रेस और लीग में चुनाव बाद समझौते की किसी तरह की बातचीत हुई है। सीतापुर रूरल,सुल्तानपुर रूरल और लखनऊ अर्बन मुस्लिम सीट पर कांग्रेस और लीग आमने सामने लड़े। १९३७ के चुनाव में कांग्रेस ने मुस्लिम सीटों पर कम ही चुनाव लड़ा। ४८२ में से सिर्फ ५८ सीटों पर। बाकी सीटें अलग अलग राज्यों की पार्टियों के लिए छोड़ दी।
इस चुनाव में जनसभाओं में नेहरू और जिन्ना के भाषण एक दूसरे के खिलाफ उग्र हुए। नेहरू ने कहा कि भारत में सिर्फ दो पार्टियां हैं। कांग्रेस और ब्रिटिश गर्वमेंट। जिसका जवाब देते हुए जिन्ना ने कहा था कि एक तीसरी पार्टी भी है- मुस्लिम लीग। एक सभा में जिन्ना ने कहा था कि नेहरू मुसलमानों को अकेला छोड़ दें। इसी चुनाव में लीगी कांग्रेस को खुलकर हिंदू संगठन कहने लगे थे। नेहरू और जिन्ना ने दोनों ने कहीं भी १९३७ के चुनाव के बाद गठबंधन की सरकार की बात नहीं की है। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के यूपी के कुछ नेता ज़रुर कहते मिलते हैं। वैसे ही जैसे २००९ के चुनाव के बाद अमर सिंह कांग्रेस की सरकार को समर्थन देना चाहते हैं और कांग्रेस लेना नहीं चाहती तो चिट्ठी राष्ट्रपति को दे आते हैं। ये पोलिटिक्स तब से हो रही है दोस्तों।
सलील मिश्रा बहराईच सीट के मिथक को भी तोड़ देते हैं। अपने प्रमाणों के आधार पर लिखते हैं कि मुस्लीम लीग ने इसलिए किदवई के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारा था कि दोनों में कोई समझौता हुआ था। बल्कि जिन्ना ने एक बयान जारी किया था कि बहराईच से पहले भी मुस्लीम लीग का उम्मीदवार जीत चुका है। इस बार तो कांग्रेस वहां उम्मीदवार देने की गलती भी न करे। लेकिन जब उम्मीदवार तय करने के लिए मुस्लिम लीग की वर्किंग कमेटी की बैठक हुई तो किसी मुसलमान ने अप्लाई ही नहीं किया। एक उम्मीदवार मिला भी तो उसने अपना नाम वापस ले लिया और रफी अहमद किदवई निर्विरोध चुने गए।
सलील बताते हैं कि यह अफवाह इस बात के साथ उड़ी कि कांग्रेस को लीग से समझौता करना चाहिए क्योंकि कांग्रेस एक भी मुस्लिम सीट नहीं जीत पाई है। जबकि यह सही नहीं था। खैर,इसलिए मंत्रिमंडल में मुसलमानों को जगह देने के लिए लीग से समझौता करना चाहिए। ये समझौता कैसे हो सकता था? नेहरू ने घोषणापत्र में लिखा था कि भारतीय लोगों की राष्ट्रवादी मांग है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद का अंत हो और पूर्ण स्वतंत्रता मिले। मुस्लिम लीग के घोषणापत्र में था कि भारत के लिए एक पूर्ण ज़िम्मेदार सरकार हो। आज़ादी की मांग नहीं थी। कांग्रेस को खारिज करना ही करना था।
इसके बाद प्रो सलील मिश्रा इस बात की खोज करते हैं कि कांग्रेस लीग के गठबंधन की बात आई कहां से। कहते हैं कि उस वक्त यूपी का गर्वनर था हैरी हैग। इसने सोचा था कि चुनाव के बाद दोनों मिलकर सरकार बनायेंगे। ये इसकी सोच थी जो बाद में अफवाह उड़ी और उड़ते उड़ते जसवंत सिंह की किताब में धूल बन कर पहुंच गई। जैसे हम सब पत्रकार इस चुनाव के बाद मान कर चल रहे थे और हममें से आज भी कई पत्रकार मानते हैं कि कांग्रेस को लालू,पासवान और मुलायम को साथ लेकर चलना चाहिए। यूपी की पोलिटिक्स को समझो भाई।
सलील बताते हैं कि ये हैग की कल्पना की उपज थी। जैसे आज कल एक्ज़िट पोल वाले सोचा करते हैं। हैग ने सोचा था कि कांग्रेस तो अकेले सरकार बना नहीं सकती।उसे लीग की मदद लेनी ही पड़ेगी।लेकिन रिज़ल्ट आ गया उल्टा। कांग्रेस को बहुमत मिल गया। १९३७ में हालात ऐसे बन गए थे कि जिन्ना और नेहरू या लीग और कांग्रेस एक साथ नहीं आ सकते थे।
बहुत लंबा नहीं लिखूंगा। मन तो कर रहा है। लेकिन इतिहास को दोनों तरफ से देखा जाना चाहिए। आडवाणी और जसवंत इन दोनों को जिन्ना तो नज़र आते हैं मगर नेहरू और गांधी नहीं। खुद कभी पहल नहीं कि मुसलमान बीजेपी की धारा से जुड़े। दो चार सांसद लेकर प्रतीक के तौर पर दिखाते रहते हैं लेकिन जिन्ना को महान बताकर नेहरू को कम बताते हैं। अपने घर में इफ्तार कर लेने से सेक्युलर नहीं हो जाता कोई। गुजरात के दंगों के वक्त दंगाइयों के खिलाफ खड़े होना पड़ता है।
फ फू फू फा ही करती रह गई कमीने, एक बेकार फिल्म है
जो भी सोये हैं ख़बरों में उनको जगाना नहीं...। इस खूबसूरत लाइन को फिल्माने का बेहतर अंदाज़ क्या होना चाहिए था? कहीं ऐसा तो नहीं कि विशाल भारद्वाज जैसा प्रतिभाशाली निर्देशक बहुत अच्छी चीज़ को संभाल नहीं पाता है और मटकी फूट जाती है। मुझे शक था। जब से टीवी पर ढैन टन टनन...देख रहा हूं,लग रहा था कि इस गाने की जगह डिस्को नहीं हो सकती है। इस गाने में जो टपोरीपन और दुनिया से टकराने की जो क्षमता थी वो डिस्को में जाकर दम तोड़ देती है।
उम्मीद कर रहा था कि ढैन टन टन गाना अपने नए शब्दों और थीम को लेकर नए नए लोकेशन की तरफ दौड़ता भागता लगेगा। मगर ये गाना तीन नंबर के डिस्को गाने की तरह हाफ रहा था। इस गाने में रात ही नज़र नहीं आई। शाहिद कपूर का डबल किसी भाड़े के डबल जैसा लग रहा था। प्रियंका किसी मकसद के बिना पर्दे पर उतारी गई हिरोईन की तरह लग रही थी।
फिल्म हॉल में दर्शक बेचैन होने लगे। खत्म होने से पहले सीढ़ियों पर आ गए। फिल्म तीन तीन सेकेंड के फ्रेम में तो अच्छी लग रही थी लेकिन एक बड़ा कोलाज नहीं बन पा रहा था। फिल्म का कोई भी सीन ऐसा नहीं था कि जो सिनेमा हॉल से निकलने के बाद तक दिमाग में नाचता रहता।
गुलज़ार के शब्दों को संगीत के शोर में खत्म कर दिया गया। मेरी आरज़ू कमीनी, जब ये गाना आया तो बहुत बाद में पता चला कि अच्छा ये वो गाना है। संगीत का इतना भयंकर शोर था कि गुलज़ार के शब्द सुनाई ही नहीं दिये। आजा आजा दिल निचोड़े को भी कैसिओ के दुनंबरी संगीत में निचोड़ दिया है। सिर्फ ढैन टन टन मुखड़ा ही सुंदर और क्रियेटिव रहा। चंपक, नंदन और बाजबहादुर का जिक्र ज़बरन लगा।
फिल्म का अंत महाबेकार तरीके से होता है। पांच टाइप के गैंग एक छोटी सी गली में आ जाते हैं। छत पर खड़ी पुलिस गैंगवार में शामिल है या एनकांउटर करने आई है,ये फर्क तुरंत खत्म हो जाता है। किसी वीडियो गेम की तरह लास्ट सीन लगा। खिलौने वाली बंदूकें कब हंसे कब रोये समझ में ही नहीं आया।
फॉट कट से लेकर फैसा तक के अल्फाज़ आज कल के टाइम में चल जाते हैं। लोगों के पास शब्द नहीं हैं। नए शब्द को जीने का अहसास नहीं हैं। तो इस तरह के चालू चल निकलने वाले शब्द पसंद आते हैं। आप फेसबुक पर देखिये। जिसने भी कमीने के बारे में लिखा है- फ फू का इस्तमाल किया है। कभी कभी लगता है कि फिल्म फ को प्रचारित करने के लिए बनी है। ऐसी बहुत सी फिल्में बन चुकी हैं जिसमें इस तरह के एक शब्द वाले अल्फाज़ चल निकले। आउ लॉलिता से लेकर मोगैंबो खुश हुआ तक। हकलाने की समस्या को भी गंभीरता के साथ या ज़ोरदार व्यावसायिकता के साथ रख कर फिल्म को ऊंचाई दी जा सकती थी।
विशाल भारद्वाज ने रात की मटकी दिन में ही फोड़ दी। कई बार बहुत अच्छा निर्देशक भी चूक जाता है। विशाल इस फिल्म में एक कंफ्यूज़ निर्देशक की तरह लगते हैं। मनमोहन देसाई का फार्मूला फूहड़ तरीके से चलाने की कोशिश करते हैं। लगता है कि एक प्रतिभाशाली फिल्म के फॉरमेट को तोड़ना चाहता है लेकिन अंत में उसी में उलझ जाता है। उसका ढैन टन टन हो जाता है।
कम से कम फिल्म मनोरंजन तो करती। फैसा फर्बाद हो गया। फिशाल फारद्वाज को कोई बताओ कि उनसे अच्छी चीजे संभल नहीं पाती। फ फू करने से नहीं चलता। वो तो हम टीवी वाले करते हैं। टीआरपी के लिए यहां वहां से कट पेस्ट कर कुछ बना देते हैं। दर्शक मिल जाते हैं। काम हो जाता है।
कोई है जो तारीफो में सोये विशाल को जगा सकता है। जगाओ भाई। वो एक काबिल निर्देशक है। रात में मटकी फोड़ने का बहुत दम है उसमें।
उम्मीद कर रहा था कि ढैन टन टन गाना अपने नए शब्दों और थीम को लेकर नए नए लोकेशन की तरफ दौड़ता भागता लगेगा। मगर ये गाना तीन नंबर के डिस्को गाने की तरह हाफ रहा था। इस गाने में रात ही नज़र नहीं आई। शाहिद कपूर का डबल किसी भाड़े के डबल जैसा लग रहा था। प्रियंका किसी मकसद के बिना पर्दे पर उतारी गई हिरोईन की तरह लग रही थी।
फिल्म हॉल में दर्शक बेचैन होने लगे। खत्म होने से पहले सीढ़ियों पर आ गए। फिल्म तीन तीन सेकेंड के फ्रेम में तो अच्छी लग रही थी लेकिन एक बड़ा कोलाज नहीं बन पा रहा था। फिल्म का कोई भी सीन ऐसा नहीं था कि जो सिनेमा हॉल से निकलने के बाद तक दिमाग में नाचता रहता।
गुलज़ार के शब्दों को संगीत के शोर में खत्म कर दिया गया। मेरी आरज़ू कमीनी, जब ये गाना आया तो बहुत बाद में पता चला कि अच्छा ये वो गाना है। संगीत का इतना भयंकर शोर था कि गुलज़ार के शब्द सुनाई ही नहीं दिये। आजा आजा दिल निचोड़े को भी कैसिओ के दुनंबरी संगीत में निचोड़ दिया है। सिर्फ ढैन टन टन मुखड़ा ही सुंदर और क्रियेटिव रहा। चंपक, नंदन और बाजबहादुर का जिक्र ज़बरन लगा।
फिल्म का अंत महाबेकार तरीके से होता है। पांच टाइप के गैंग एक छोटी सी गली में आ जाते हैं। छत पर खड़ी पुलिस गैंगवार में शामिल है या एनकांउटर करने आई है,ये फर्क तुरंत खत्म हो जाता है। किसी वीडियो गेम की तरह लास्ट सीन लगा। खिलौने वाली बंदूकें कब हंसे कब रोये समझ में ही नहीं आया।
फॉट कट से लेकर फैसा तक के अल्फाज़ आज कल के टाइम में चल जाते हैं। लोगों के पास शब्द नहीं हैं। नए शब्द को जीने का अहसास नहीं हैं। तो इस तरह के चालू चल निकलने वाले शब्द पसंद आते हैं। आप फेसबुक पर देखिये। जिसने भी कमीने के बारे में लिखा है- फ फू का इस्तमाल किया है। कभी कभी लगता है कि फिल्म फ को प्रचारित करने के लिए बनी है। ऐसी बहुत सी फिल्में बन चुकी हैं जिसमें इस तरह के एक शब्द वाले अल्फाज़ चल निकले। आउ लॉलिता से लेकर मोगैंबो खुश हुआ तक। हकलाने की समस्या को भी गंभीरता के साथ या ज़ोरदार व्यावसायिकता के साथ रख कर फिल्म को ऊंचाई दी जा सकती थी।
विशाल भारद्वाज ने रात की मटकी दिन में ही फोड़ दी। कई बार बहुत अच्छा निर्देशक भी चूक जाता है। विशाल इस फिल्म में एक कंफ्यूज़ निर्देशक की तरह लगते हैं। मनमोहन देसाई का फार्मूला फूहड़ तरीके से चलाने की कोशिश करते हैं। लगता है कि एक प्रतिभाशाली फिल्म के फॉरमेट को तोड़ना चाहता है लेकिन अंत में उसी में उलझ जाता है। उसका ढैन टन टन हो जाता है।
कम से कम फिल्म मनोरंजन तो करती। फैसा फर्बाद हो गया। फिशाल फारद्वाज को कोई बताओ कि उनसे अच्छी चीजे संभल नहीं पाती। फ फू करने से नहीं चलता। वो तो हम टीवी वाले करते हैं। टीआरपी के लिए यहां वहां से कट पेस्ट कर कुछ बना देते हैं। दर्शक मिल जाते हैं। काम हो जाता है।
कोई है जो तारीफो में सोये विशाल को जगा सकता है। जगाओ भाई। वो एक काबिल निर्देशक है। रात में मटकी फोड़ने का बहुत दम है उसमें।
वो जो बांबे हैं...जिसकी जान....शिखा त्रिवेदी की नज़र से देखिये

शिखा त्रिवेदी पिछले कई दिनों से बांबे पर काम कर रही हैं। बांबे में पढ़ी लिखी हैं तो उस शहर को अपने भीतर ढोते चलती हैं।
रहती दिल्ली में हैं लेकिन बात बांबे की करती हैं। वैसे शिखा का कोई एक शहर ही नहीं हैं। जयपुर,बनारस,बरेली,अहमदाबाद न जाने कितने शहरों को वो अपना शहर कहती हैं। शिखा त्रिवेदी की आपने डॉक्यूमेंट्री देखी होगी। पहले एनडीटीवी इंडिया के लिए भी बनाती थी लेकिन अब उनका काम अन्य वजहों से एनडीटीवी 24x7 तक ही सिमट कर रह गया है। लगन में कोई कमी नहीं आई है। इस बार वो अपने हिस्से का एक शहर बांबे लेकर आ रही हैं।
पिछले साल रीगल सिनेमा पचहत्तर साल का हो गया। चर्चगेट का इरोस भी सत्तर का हो गया है। इस साल लिबर्टी अपने साठवें साल में प्रवेश कर रहा है। एक विशिष्ठ कला शैली में बनी ये इमारतें सिर्फ बांबे की कंक्रीट पहचान नहीं हैं बल्कि ये बांबे वालों के भीतर किसी इमेज की तरह बनी हुई हैं। १९३० के दशक में पश्चिम से आई कला शैली के प्रभाव में ढली इन इमारतों ने बांबे को बांबे बनाया। ये वो टाइम था जब बांबे में ग्लैमर,मनोरंजन के नए रूप, बॉलरूम डांसिंग, जाज़, कैबरे और घुड़दौड़ सब आपस में घुलमिल रहे थे। एक शहर को शहर बना रहे थे। एक शहर का रोमांस पैदा हो रहा था। जो आने वाले कई सालों के लिए दूर दूर तक पसर कर फैलने वाला था।
शिखा कहती हैं कि धीरे धीरे यह कला(डेको)पूरे देश में फैलती है। यहां तक आज़ादी की पूर्व संध्या पर नेहरू स्वीसफ्रेंच वास्तुकार
Le Corbusier को आधुनिक भारत की बुनियाद रखने के लिए बुलाते हैं। यह भी ख्याल रखा जाता है कि पारंपरिक स्वरूप पर कोई असर न पड़े। नेहरू चाहते थे कि पूरे देश की इमारतों का एक सा चरित्र बने। बस यहीं से शुरूआत होती है डेको कला के अंत की। एक ऐसा आंदोलन था ये जो वास्तुकार राहुल मल्होत्रा के अनुसार मुंबई के आधुनिक जीवन शैली में सबसे पहले आया। लेकिन बाद में ये इमारतें मुंबई के विस्तार की बलि चढ़ती चली जाती हैं। लेकिन आज भी जब इनके करीब से गुज़रिये तो बांबे का रोमांस पैदा होने लगता है। लगता है कि बांबे में हैं।
शिखा इसी बांबे के अहसास को दिखाने की कोशिश कर रही हैं। आप इसे पंद्रह अगस्त के दिन NDTV 24X7 पर दोपहर तीन बजे और सोलह अगस्त को दोपहर एक बजे देख सकते हैं। थोड़ा वक्त निकालियेगा। मजा आयेगा। एक घंटे की इस डाक्यूमेंट्री का दूसरा हिस्सा दलित स्थापत्य और माया महात्म्य पर भी प्रस्तुति है।
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