अधूरी उदास नज़्में- सस्ती शायरी

१. सारे रिश्ते बदल रहे हैं
जो साथ थे मुकर रहे हैं
कल कुछ और नये बन जायेंगे
अफसोस नहीं,बस याद आयेंगे

२.दो टके की शायरी है मेरी
चार आने की दाद मिलती है

३.लौटा दूंगा तुम्हारी आंखों का काजल
एक शर्त है, अपनी नज़रों का पता बता दो

४.तुम्हारी आंखों के नीचे जो झुर्रियां हैं
सिलबटों में उनकी दिल का दरखास्त छिपा है

५. तुम्हारे लिए एक गुलदस्ता खरीदा है
कहो तो मैं फूल भी खरीद लाऊं

६.कितने कंजूस हो तुम, किस चीज़ की कमी है
एक मुफ्त का सामान है,मुझे पास रख लो

७. ये जर्नलिस्ट बड़े फटीचर हैं
न आशिक हैं न शायर हैं

८. मैं तुमको इक दिन चाय पे बुलाने वाला हूं
कप प्लेट की तरह संभाल कर रखा है दिल

९. आज ही तुमसे दिल की बात कह देता
तुम्हारे कॉलर ट्यून की धुनों में खो गया

१०. मैंने तो सिर्फ तुमसे पता पूछा था
जाने क्यों तुम अपना हाल बताने लगे

११. तुम्हारा सारा एसएमएस डिलिट कर देता हूं
दो चार शब्दों से मेरा काम नहीं चलता

सबसे अच्छा होता, हमारे सपनों का मर जाना

कल रात पाश मेरे सपने में आया था
मरे हुए सपनों की अर्थियां सजा रहा था
बीच बीच में फूलों को रखते हुए और
बांस के फट्टे से मुर्दा सपनों को बांधते हुए
बुदबुदाता जा रहा था,लतियाते हुए मुझको
सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना
उससे भी ख़तरनाक होता है उनकी अर्थियां न उठाना
न जलाना उनको,न पहुंचाना शमशान में जिनको
ढोते रहना लाश को,काम पर आते जाते रहना
चुपचाप देखते रहा मैं अपने तमाम मरे हुए सपनों के बीच
आग पैदा कर देने वाले उस कवि को
जो हांफने लगा अचानक, बंद हो गई उसकी धौंकनी
मुर्दा सपनों के बीच एक अधमरा सपना देख कर
फिर बुदबुदाने लगा पाश, लतियाना बंद कर दिया मुझको
गा रहा था...चीख रहा था और जल्दी जल्दी लिख रहा था
सबसे ख़तरनाक होता है, हमारे सपनों में सांसों का बच जाना
न मरना एकदम से, न उनका जिंदा कहलाना
बचे हुए के नाम पर, चंद उम्मीदों का रह जाना
सबसे ख़तरनाक होता है,मरने से पहले आखिरी सांसों का आना जाना
डाक्टर को बुलाना, जीवन बीमा को भंजाना और रिश्तेदारों को फोन करना
सबसे ख़तरनाक होता है, मरे हुए सपनों को लेकर किसी कवि को सुनना
उससे आंखें मिलाना और उसकी कविता से लजाना
राशन की दुकानों से दफ्तर की अटेंडेंस सूची में बकायेदार की तरह
हर दिन अपने नाम को पढ़ना, हर दिन किराया देना
क्या क्या खतरनाक नहीं होता पाश, लेकिन इन सबमें
सबसे खतरनाक होता है,हमारे चंद सपनों का बचे रह जाना
सबसे अच्छा होता, हमारे सपनों का मर जाना

ये पप्पू पास हो गया, आपका क्या होगा जनाबेआली..

( हिंदी न्यूज़ चैनलों के फटीचर काल में कम ही पत्रकार ऐसे हुए हैं जो अपना ढिंढोरा नहीं पीटते। फटीचर होने का न सबसे बेहतर होने का। किसी तरह इस किस्म के लोग न्यूज़ रूम की धक्का मुक्की में बचे रह जाते हैं। याद दिलाने के लिए कि फटीचर काल से ऊब के वक्त इनसे भी काम चलाया जा सकता है। प्रभात शुंगलू IBN-7 में संपादक हैं। अपने बारे में कम हांकते हैं और हर आती जाती चीज़ों पर मुस्कुरा देते हैं। आजकल लिखने लगे हैं तो मान लेना चाहिए कि शांत स्वभाव वाला यह लेखक फिलहाल एक वोटर बन कर अपनी बेचैनियों को सामने रखना चाहता है। श्रेष्ठता की हिंसक दावेदारियां जताने के हमारे पेशे के इस दौर में प्रभात शुंगलू के इस लेख को पढ़िये। यह लेख आज नई दुनिया में भी है।)

आडवाणी जी,
आप नहीं समझेंगे कंधमाल का खौफ। आप नहीं समझेंगे कैथलिक स्कूल में पढ़े सेक्यूलर कल्चर में पले बढ़े नवीन पटनायक का दर्द। हांलाकि आप भी उसी कैथोलिक स्कूल के प्रोडक्ट हैं। फर्क ये है कि आप ग्रैजुएशन करने हेडगेवार और गुरू गोलवाल्कर की यूनिवर्सिटि में चले गये। इसलिये आप गुजरात दंगे में मारे गये सैंकड़ो मुसलमानों का दर्द नहीं समझ पाये। आप समझते तो आप इंडिया शाइनिंग का स्लोगन नहीं देते। वाजपेयी जी ने समझना चाहा मगर फिर हकीकत से मुंह मोड़ लिया। मोदी को छोटी सी फटकार लगायी कि राजधर्म निभाओ। सोचा ये कहने भर से एनडीए की सेक्यूलर इमेज कायम रहेगी। मगर जनता ने वाजपेयी की शाइन गायब कर दी।

आज आप नवीन पटनायक को कोस रहे कि उसने धोखा किया। ग्यारह साल पुराने रिश्ते पर हैंड ब्रेक लगा दिया। लेकिन नवीन ऐसा क्यों नहीं करते। आपने उनकी सेक्यूलर पॉलिटिक्स के लिये सस्पेस ही कब छोड़ी थी। कंधमाल में जो हुया उसके लिये आपकी पार्टी नेताओं ने, संघ परिवार के फेवरिट सन बीएचपी ने उन्हे कितना कोसा। उन्होने बताया कि वहां हिन्दुत्व के ही कायदे कानून चलेंगे। जो उनके टाइप का हिन्दु है वही रहेगा। वही काम जो आपके येदुरप्पा अब कर्नाटक में कर रहे। अपने कनिष्ट भ्राता मुथालिक के सर पर हाथ रख कर।

आप क्यों नहीं समझ पा रहे इंडिया की असलियत। इंडिया का सेक्यूलर इतिहास। उसकी सर्वधर्म सम्भाव की विलक्षण क्षमता। उसकी पहचान। आप फिरकापरस्त ताकतों को मोबालाइज करके 2 से 180 तो पहुंच सकते हैं पर इससे आगे बढ़ना टेढ़ी खीर है। क्योंकि ये देश किसी भी तरह के एक्सट्रीमीज्म को नकारता आया है। इस देश नें सनातन हिंदुत्व को भी जगह दी। मगर बुद्ध का मिडिल पाथ जब निर्वाण की नई ऊर्जा ले कर आया तो उसे गले से लगा लिया। इस देश ने औंरगजेब को सहा मगर मोहम्मद जलालउद्दीन को अकबर की उपाधि से नवाजा। डकैत गज़नी को धिक्कारा, आलिम दारा को पुचकारा। जिन्नाह को तड़ी पार किया। नेहरू को आशीर्वाद दिया। आरएसएस और मुस्लिम लीगी पॉलिटिक्स को टिकने नहीं दिया। नक्सलिज्म को पसरने नहीं दिया। और यही भारत दैट इज इंडिया आतंकवाद से भी लड़ रहा। मगर भारत ने किसी तरह की चरमपंथी, डिस्ट्र्क्टिस सोच को न कभी सींचा और न ही उसे फलने फूलने दिया।

अगर इंडिया ने आप सरीखी पॉलिटिक्स को स्पेस दी भी जैसा कि 1998 में हुया तो वो भी शर्तों के साथ कि मजहबी उन्माद नहीं फैलाओगे। लेकिन आपकी पेरन्ट बॉडी के टिड्डी दल ये कहां मानने वाले थे। वो तो गुजरात में एन्टी हिन्दु चांदमारी बना रहे थे। और 28 फरवरी 2002 को उन्होने इस चांदमारी का फौरी तौर पर उदघाटन भी कर दिया। बस तभी आप को समझ जाना था कि अब लुटिया डूबी। क्योंकि पब्लिक आपका हिडेन एजेंडा समझ चुकी थी। लेकिन आप तो सत्ता के खुमार में ऐसे औंधे पड़े थे कि बुरे वक्त की आहट नहीं सुन पाये।

नवीन ने एक गलती की। जैसी गलती इंडिया ने 1998 में की। नवीन ने आप पर भरोसा किया। आरएसएस के टिड्डी दल ने सोचा कैथोलिक स्कूल का पढ़ा, अंग्रेजी बोलने वाला, पेज थ्री और फैशन के गलियारों में घूमने वाला पप्पू ( नवीन की फैमिली में उन्हे इसी नाम से पुकारा जाता है ) गाड़ी चलायेगा। आप बैकसीट ड्राइविंग करेंगे। बुद्ध के सबसे बड़े शिष्य की धरती पर बजरंगी हिंदुत्व की ब्रांच खोलेंगे। इसके लिये आपके परिवार के टिड्डी दलों ने दारा सिंह जैसे लुम्पेन को हिंदुत्व की दीक्षा दी। और उसकी पोस्टिंग मयूरभंज की। वहां जाकर उसने मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उसके बेटे को जिंदा जलाकर आपके टिडड़ी दलों के फलसफे का परचम लहराया। आपने फिर वही खेल कंधमाल में रिपीट करना चाहा। मगर नवीन अब जवान हो चुका था। आपकी पॉलिटिक्स के आशियाने तले उसका दम घुट रहा था। वो इससे बाहर निकलने के लिये फड़फड़ा रहा था। अकेले कुछ करने के लिये दिल कुलांचे मार रहा था। बड़े भाई, मां-बाप के साये से दूर अपनी पहचान बनाने के लिये मचल रहा था। और फिर उसने दिल की सुनी और आपको छोड़ गया। बैरम खां बन कर आपने इतने सालों अपनी खूब मनमानी की। अब नवीन ने कहा टाटा। तुम भी हज जाने की तैयारी करो।


देखिये, उड़ीसा की कहानी से कहीं बिहार न इंस्पायर हो जाये। वो भी आपका पुराना साथी है। मगर यंग है। वो भी आपके साथ दस सालों से कदमताल कर रहा। कैथोलिक स्कूल में नहीं पढ़ा। प्योर देसी स्कूल में पढ़ा। वहीं जहां आपके कई नेता पढ़े हैं। मगर वो इन्क्लूसिव पॉलिटिक्स पर जोर दे रहा। बिहार को टर्नअराउंड का सपना बुन रहा। आपकी सुन जरूर रहा मगर अपने मन की कर रहा। देख लीजिये कहीं बिहार में भी बीजेडी के उड़ीसा के बीज तो नहीं बोये जा रहे।

आपको लगता है वक्त आपकी तकदीर पर एक बार दस्तक दे रहा। खुश रहने को ये ख्याल अच्छा है ग़ालिब। इंडिया बदल रहा। जिन्नाह को सेक्यूलर कहने भर से इंडिया आपको सेक्यूलर मान लेगा ये दूर की कौड़ी लगती है। अयोध्या में मंदिर गिरा कर संसद में घडि़याली आंसू बहाने से वोटर नहीं पिघलेगा। फेसबुक पर प्रोफाइल डालने से यंग इंडिया आपको समझेगा ये विशफुल थिंकिंग से ज्यादा कुछ नहीं। जो साथ थे, वो पास नहीं। जो साथ हैं वो साथ छोड़ने का मौका तलाश रहे। वो कहते हैं न यू कैन नॉट फूल ऑल द पीपिल ऑल द टाइम।

मुशर्रफ की तरह ये मत कहियेगा पीछे की बातें भूल जाओ। आगे की देखो। हिस्ट्री को भूलने का पाप इस देश ने जब जब किया उसे पछताना पड़ा। मुशर्रफ का झूठ पकड़ा जा चुका है। वैसे भी नया इतिहास रचने का मौका देश ने एक नहीं दो दो बार आपकी पार्टी को भी दिया। मगर गोधरा, बेस्ट बेकरी, नरोडा पाटिया, गुलबर्गा सोसाइटी में दंगो को अंजाम देकर आपके मोदीजी ने फिर देश को स्टोन एज की दहलीज पर खड़ा कर दिया। वो पप्पू तो पास हो गया मगर आप भारत दैट इज़ इंडिया को कैसे समझायेंगे कि आप ही देश के सर्वश्रेष्ठ मंत्रीपद पद के उपयुक्त दावेदार हैं। आप ही क्यों मोदी जी भी 2014 का ख्वाब देख रहे। पहले 16 मई को अपना रिपोर्ट कार्ड तो देख लीजिये।

एक भारतीय वोटर

अधूरी उदास नज़्में- सस्ती शायरी

१. क्यूं मुझे देखकर तुम लाल हो गए
मेरी हथेली का रंग तो पीला है

२ चांद पूनम का कितना अकेला है
चांदनी में इसके तारे खो गए हैं

३. रंग लेना आज तुम खुद ही
मैं सब रंगों में खो गया हूं

4. मेरी पीठ के पीछे अक्सर वो शिकायत करते हैं
समझदार है काफी,सामने का अंजाम पता है

५. तुम मुझ पर हंसते रहोगे कब तक
मुझे इस बात पर रोना आता है

६. घर में बैठ कर विचारक हो गया हूं
पत्रकार था,वरिष्ठ लेखक हो गया हूं

७. वो हर बात में कहते हैं मुझसे बड़ा कोई नहीं
ये खुदा का इंसाफ है,वर्ना उन्हें भी लंबा बनाता

८. हर लंबू को लगता है उसे आसमान दिखता है
ये खुदा का इंसाफ है,ज़मीन को नीचे बनाया

९. अबे साले तू, किस गली की मूली है
सलाद में कटती है,पराठे में भुनती है

१०. ये नज़्म दस नंबरी है दोस्तों
शायर थोड़ा कम है, दो नंबरी है

अधूरी उदास नज़्में- सस्ती शायरी

जाती जाती सर्दी है
आती आती गर्मी है
डालो न हम पे
पानी रे

इक दिन तो आया है
सब दिन कैसे बदरंग रे
रंग ले लो, संग ले लो
डालो न हम पे
पानी रे

उड़ती उड़ती ए हवा
होश उड़े हैं चिलमन से
उड़ने दो इनको आज यहां
डालो न इन पे
पानी रे

जो छुपा है वही खिला है
गहरा है कितना रंग रे
मल मल दे तू आज सखी
हर अंग तू गुलाल रे

सस्ता है हर रंग यहां
चढ़ता है पर जतन से
लाल,पीला,हरा, नीला
रंग दो न मुझको
रंग से

कब आएगी अबकी होली
एक बरस में आई है
आने से इसके सब खिले है
मुझको भी खिल जाने दे
डालो ने मुझ पे
पानी रे

अधूरी उदास नज़्में- सस्ती शायरी

1.
तुम्हारे घर झूठ का बस्ता छोड़ आया हूं
खोलना मत मेरे सारे वादे निकल आएंगे
2.
तुम्हारी आंखों में जब से देखा है अपना चेहरा
सच से भागता मारा मारा फिर रहा हूं मैं
३.
ख़बरों में दिल नहीं लगता है शायर हो गया हूं
कलम की मौत के बाद कीबोर्ड से मोहब्बत है
४.
जब से मेरी सैलरी दुगनी हो गई है दोस्तों
घर में कूड़े का सामान बहुत आ गया है
५.
कितने कितने पद हो गए हैं पत्रकारों के अब
बस बड़े बाबू की तरह फोटो अटेस्ट नहीं कर पाते
६.
जब से उसके पास विजिटिंग कार्ड आया है
ख़बर नहीं पूछता, कार्ड बढ़ा देता है
७.
सज धज कर आते हैं दफ्तर में फैशन परेड की तरह
पसीने की बदबू की भनक लगे कितने साल हो गए
८.
अपनी आंखों की झुर्रियों को छुपा रहे थे जतन से
बड़े बड़े एंकर,ख़बरों के बिना भी हसीन लगते हैं
९.
आपको देखा है,जाने किस टीवी पर,
इतना ही याद रहा अब देखने वालों को
१०.
नेता ने ठीक ही कहा ये उनका स्वर्ण काल है
दफ्तर में बैठा पत्रकार हो रहा माला माल है
११.
तुम मुझे व्याकरण और लिंग से मत डराओ
व्याकरण की किताब भाषा के जन्म के बाद छपी है

अधूरी उदास नज़्में- सस्ती शायरी

कुछ रंग मेरे लिए बचाकर रखना होली में
सादा कुर्ता सिलने में दर्ज़ी ने देर कर दी है

सियासत का मौसम है बदल न जाना होली में
तुम्हारे रंग का जोड़ा ढूंढने में देर हो रही है

रास्ता देखते रहना तुम मेरा भी होली में
बच के बचा कर आने में देर हो रही है

अधूरी उदास नज़्में- सस्ती शायरी

कुछ रंग मेरे लिए बचाकर रखना होली में
सादा कुर्ता सिलने में दर्ज़ी ने देर कर दी है

सियासत का मौसम है बदल न जाना होली में
तुम्हारे रंग का जोड़ा ढूंढने में देर हो रही है

रास्ता देखते रहना तुम मेरा भी होली में
बच के बचा कर आने में देर हो रही है

अधूरी उदास नज़्में- सस्ती शायरी

१.

पुराने रिश्तों पर पैबंद चढ़ा कर आया हूं।
दोस्तों मैं अपने गांव जाकर आया हूं ।।

२.
आज ही तो तुमसे वादा किया है ।
निभाने के लिए वक्त तो दे दो।।

३.
तुम्हारे हाथ क्यूं लरज़ते हैं मेरे कंधों पर
मुझको छूकर कहीं दिल तो नहीं धड़कता

४.

याद करो जब बहुत इश्क था मुझसे
तुम बेचैन भी रहे और चैन से भी

५.

मेरे कितने मकान हैं इस जहान में
हर मकान पर किरायेदार का कब्ज़ा है

६.

मेरी शक्ल उस राजकुमार से मिलती है
जो सपनों में तुम्हें परी बुलाता था

रेडियो भैया



















आप कभी भी देखिये, मिलिये अपने बिजेंद्र भैया इसी मुद्रा में मिलेंगे। हाथ में रेडियो लिये। सोते जागते वे कभी भी रेडियो से दूर नहीं होते हैं। वे रेडियो के अलावा किसी और के नहीं हो सके हैं। इनके हाथ में जो रेडियो दिख रहा है वो फिलिप्स का फिलेट मॉडल है। तीस साल पहले २०० रुपये में ख़रीदा था। अब यह मॉडल बंद हो गया है। खराब होने पर पार्ट्स की चिंता न हो इसलिए बिजेंद्र भैया ने आस पास के लोगों से फिलेट मॉडल के पांच सेट खरीद कर रख लिये हैं। कुछ लोगों ने उनकी दीवानगी को देखते हुए फिलेट मॉडल दान भी कर दिये हैं। वे तीस साल से एक ही रेडियो के साथ हैं। दूसरा मॉडल ही नहीं खरीदा। पत्नी से भी ज्यादा रेडिया का साथ निभा दिया।

बीबीसी को बिजेंद्र भैया के पास जाना चाहिए। वे हर दिन बीबीसी सुनते हैं। दुनिया की हर खबर सुनते हैं। वे बीबीसी के उन श्रोताओं में होंगे जिसने हर दिन बीबीसी का हर समाचार सुना होगा। मैं जब छह सात साल का था तब से बिजेंद्र भैया को रेडियो के साथ देखा है। हम जब गंडक नदी में नहाने जाते थे तब भी उनका रेडियो किनारे पर बजता रहता था। वो किसी से बात नहीं करते। चुपचाप रेडियो सुनते रहते हैं। कोई साथ चलता भी है तो वो भी रेडियो सुनने लगता है। क्रिकेट का स्कोर हो या पाकिस्तान में हमला। बिजेंद्र भैया सारी ख़बरों के सोर्स हैं।

जितवारपुर के लोग कहते हैं रेडियो के शौक ने इन्हें नकारा कर दिया। वर्ना वे काफी अच्छे विद्यार्थी थे। मुझे लगता है कि रेडियो के शौक ने बिजेंद्र भैया की दुनिया देखने की जिज्ञासा को शांत कर दिया। प्रवासी मज़दूर या प्रवासी अफसर होकर गांव छोड़ने से अच्छा था रेडियो का साथ पकड़ों और दुनिया को अपनी बांहों में समेटे रहो। इनके पिता जी गांव के मुखिया हुआ करते थे। ज़मीन जायदाद भी ठीक ठाक है। चाहते तो टाटा स्काई लगाकर गांव में टीवी ला सकते थे। मगर रेडियो से इतनी मोहब्बत कि वे टीवी के लिए बेवफाई नहीं कर सके। काफी अच्छे आदमी है मगर रेडियो के बिना ये आदमी ही नहीं हैं। इसलिए मैंने इनका नाम रे़डियो भैया रख दिया है।

मेरे गांव में आज भी लोग रेडियो से ही समाचार सुनते हैं। अच्छा है टीवी नहीं आया है। गांव में अब अख़बार आ जाता है। हिंदुस्तान सुबह नौ बजे तक आ जाता है। कम लोग खरीदते हैं मगर पेपर पढ़ना भी रेडियो सुनने जैसा ही है। एक पन्ने को पचास लोग पढ़ डालते हैं। वे एक्ज़िट पोल पर चर्चा कर रहे थे। इन सबके बीच रेडियो बचा हुआ है। रेडियो के एंटना को लेकर अजीब किस्म का संघर्ष दिखाई दिया। एंटना में एक्स्ट्रा तार जोड़ कर पेड़ तक पहुंचा देते हैं। साफ आवाज़ की कोशिश में एंटना से काफी छेड़छाड़ की जाती है। गांव की बोरियत भरी ज़िंदगी में रेडियो से आती हुई हर आवाज़ तरंग पैदा करती है।