हे दुखभंजन मारुतिनंदन...जय हनुमान

कल्याण (गीता प्रेस) का एक अंक है हनुमान। इस अंक में हनुमान कथा की विस्तृत जानकारी है। हनुमान में मेरी दिलचस्पी इसलिए भी हुई है कि वाक् पत्रिका में अभय कुमार दूबे ने हनुमान पूजा पर ग़ज़ब का एक लेख लिखा है। जानकारी से भरपूर। तब से मैं और अधिक जानकारी चाहता हूं। हनुमान जी के बारे में। कल्याण में कुछ पंक्तियां मिलीं जो मैं यहां आपके सामने रखना चाहता हूं।

हनुमान और रावण के राक्षसों के बीच संवाद हो रहा है। उसी प्रसंग पर यह संवाद हनुमान विशेषांक में छपित है। यानी छपा हुआ है।

हनुमान- याद रखो, मैं वासुदेव का पुत्र होने के कारण उतनी ही बलवान भी हूं।
राक्षस- अजी, और कहीं यह डींग हांको, पता भी है- यह रावण की लंका है, जिसमें सभी देव-दानव-मानव थर्राते हैं?
हनुमान- होगी, हमें इसकी चिंता नहीं है। एक क्या हज़ारों रावण भी अकेले मेरे सामने नहीं टिक सकते।
राक्षस- रावण के पास तोप, टैंक, मशीनगन एटमबम. हाइड्रोजन बम, राकेट आदि हैं, तुम्हारे पास तो कुछ नहीं।
हनुमान- ये सब के सब धरे रह जाएंगे। जब मैं पर्वतों, पर्वत शिलाओं, वृक्षों.महावृक्षों से प्रहार करने लगूंगा तो सृष्टि उलट-पलट हो जायेगी।

रोचक संवाद है। कल्याण के अंक में यह नहीं लिखा है कि कब का छपा है। खैर किस तरह से भक्ति मानस में आधुनिक चीज़ें चली आ रही हैं। शुक्र है इस संवाद में हनुमान जी कुछ भी ऐसा नहीं बोल रहे। वो अपने समय की क्षमता की ही घोषणा कर रहे हैं। मगर ये राक्षस तो....क्या कहें...मशीनगन और हाइड्रोजन बम?

खैर इसी विशेषांक में कई रोगों के उपचार भी दिए गए हैं। इन मंत्रों के जाप से दूर हो सकते हैं। मैंने कोशिश नहीं की है। आप चाहें तो कर सकतें हैं। मगर वैध से पूछ लीजिएगा। कहीं रिएक्शन न हो जाए।

१- नेत्ररोग- शमन के लिए
मंत्र-- ओम नमो वने विआई बानरी जहां जहां हनुवन्त आंखि पीड़ा कषावरि गिहिया थनै लाइ चरिउ जाई भस्मन्तन गुरु की शक्ति मेरी भक्ति फुरो मंत्र इश्वरो वाचा।।

- कहा गया है कि आंख पर हाथ फेरते हुए सात बार मंत्र पढ़कर फूंके। व्यथा दूर हो जाएगी।

२- टीवी पर भूत प्रते का आतंक है। भूत प्रेत कवर करने वाले रिपोर्टरों के लिए यह मंत्र लाभदायक हो सकता है। फ्री में दे रहा हूं। हनुमान विशेषांक की मदद से।

मंत्र-
(बांधो भूत जहां तु उपजो छाड़ों गिरे पर्वत चढ़ाई सर्ग दुहेली तुजभि झिलिमिलाहि हुंकारे हनुवन्त पचारइ भीमा जरि जारि-जारि भस्क करे जौं तापें सींउ)

कितनी बार जाप करना है यह नहीं लिखा है। लगता है एक बार जाप करना ही काफी होगा। भूत भाग जाएंगे।

नोट- मैंने अपनी तरफ से कुछ नहीं कहा है। आस्था का मामला है। गीता प्रेस की जानकारी पर कोई सवाल नहीं खड़े कर सकता।

न्यू भगवान शनि

शनि महाराज कहे जाते थे। इनकी वक्र दृष्टि से भय खाये लोग महाराज कह कर बुलाया करते थे। देव की श्रेणी में नहीं माने जाते थे इसलिए इन्हें महाराज कहकर काम चलाते रहे। मगर ज़माना बदला है। बल्कि कहें कि शनि का ज़माना आया है। शनि महाराज से भगवान हो गए हैं। हमारी धार्मिक आस्था
परंपरा में शनि की कभी स्वतंत्र हैसियत नहीं रही। उनकी नाराज़गी का बटन हनुमान के हाथ में माना जाता रहा। मसलन शनि खराब हैं...या शनि ढैया या साढ़े साती नुमा कोई चाल रहा है तो हनुमान जी की शरण में जाओ। शनि से कोई बचा सकता है तो सिर्फ हनुमान ही। मगर शनि हनुमान के बराबर हो रहे हैं। वो लोकप्रिय हो रहे हैं।

शनि अमावस्या नया त्योहार बन रहा है। लोग उस दिन व्रत रख रहे हैं। दिल्ली के शनिधाम में शनि पूजा की अलग विधि है। वहां के कार्यकर्ता ने बताया कि चूंकि लोग नए भक्त बने हैं इसलिए पूजा कैसे और कहां करनी है उसे बताने के लिए जनसंपर्क अधिकारी रखा गया है। कार्यकर्ता ने कहा कि लोग पहचाने भी नहीं कि शनि की मूर्ति या तस्वीर कैसी होती है। लिहाज़ा प्रसाद कहीं और चढ़ा देते हैं। शनि के भक्त काले लिबास में घूमते नजर आते हैं। वो समझा रहे हैं कि शनि शत्रु नहीं है। वो तो दोस्त है। उससे भागो मत उसके पास जाओ। एक कैंपेन यानी अभियान चल रहा है कि शनि के प्रति नज़रिया बदलने का।

हमने दिल्ली के शनिधाम के संस्थापक पंडित मदन लाल राजस्थानी से पूछा कि शनि की पूजा होने लगेगी तो हनुमान जी का क्या होगा। वैसे हनुमान की पूजा कई कारणों से होती है। मगर एक बड़ा कारण तो शनि भी है। अक्सर ज्योतिष भय दिखाते रहे हैं कि शनि नाराज़ है, हनुमान की पूजा करो। अब कहा जा रहा है कि शनि नाराज़ है तो शनि की ही पूजा करो। राजस्थानी जी से हमारा सवाल यही था। उनका जवाब साफ नहीं था। उन्होंने कहा कि भई मेरे शनिधाम में हनुमान की पांच प्रतिमाएं हैं। दोनों साथ साथ रह सकते हैं। दरअसल ठीक ही कर रहे होंगे। याद कीजिए उन फिल्मी दृश्यों को जिसमें रावण एक कोठरी में शनि को बांध कर रखता था। शनि की वक्र दृष्टि के कारण ही उसका नाश हो गया। डर की व्याख्या यहीं से शुरू होती है। तो क्या शनि ने हनुमान जी का काम आसान कर दिया? रावण की ग्रह दशा खराब कर। तभी राजस्थानी जी कहते हैं कि शनि और हनुमान में टकराव नहीं है। वो एक दूसरे की मदद करते हैं।

हमारी आस्था संसार रचना में करोड़ों देवी देवताओं के लिए जगह है। भक्त सारे भगवानों से बना कर रखता है। उसका दिल बड़ा है। इसलिए शनि जैसे नए देव को हनुमान का कंपटीटर नहीं समझा जाना चाहिए। राजस्थानी जी ज़ोर देते हैं। वैसे भी टीवी पर काले लिबास में शनि के प्रवक्ता के रूप में राजस्थानी जी ही दिखते हैं। कोई दस साल से वो शनि को दोस्त बनाने के लिए अभियान चला रहे हैं।

शनि के नए भक्त कहते हैं शनि इफेक्टिव है। असरदार हैं। दिल्ली के एक करोड़पति व्यावसायी ने बताया कि शनि से अच्छा कोई भगवान नहीं। वो सबसे अच्छा है। दोस्त है। वो सारे भगवानों की छुट्टी कर देगा। वो शनि फ्रेड्स के नाम से एक वेबसाईट बनाने की योजना बना रहे हैं। मैंने स्पेशल रिपोर्ट के सिलसिले में इन भक्तों से बात की थी। जो हाल के दिनों में शनि की पूजा करने लगे हैं।

एक विद्वान ने कहा कि शनि का भय दिखा कर उसे लोकप्रिय किया जा रहा है। शनि की पूजा तो होती रही है। दान दिया जाता रहा है। हमने भी शनिधाम में एक निरतंर घोषणा सुनी। शनि अगर प्रसन्न हो जाए तो रंक को राजा बना देता है। शनि अगर प्रतिकूल हो जाए तो राजा को रंक बना देता है। भला बताइये कौन जोखिम लेगा। एक तो शेयर बाज़ार का ठिकाना नहीं ऊपर से शनि को और दुश्मन बना लो। भक्ति करेंगे कि नहीं। लेकिन शनि पुजारी की दलील भी कम दिलचस्प नहीं। वो कहते हैं ज्योतिष भी तो शनि का भय दिखाता है। साढ़े साती आ गई तो नाश हो जाएगा। यानी सब एक दूसरे के भय का दोहन कर रहे होंगे।

अब कारोबार भी हो रहा है। हर तरफ शनि मंदिर खुल रहे हैं। करोलबाग के एक मंदिर प्रबंधक ने बनाया कि हाल के दिनों में बाकी भगवानों के लिए मंदिर में आने वाले भक्तों की संख्या कम हुई है। भक्त मांग कर रहे थे कि शनि मंदिर बनाओ वर्ना वो दूर के दूसरे मंदिर में जाने लगेंगे। प्रबंधक के कहा कि अपने मंदिर की लोकप्रियता को बनाए रखने के लिए अलग से शनि का कमरा बनवाना पड़ा। लेकिन बना मंदिर के दरवाजे के बाहर। भीतर नहीं जहां दुर्गीजी, गणेश जी और शिवजी की प्रतिमाएं हैं। इसीलिए अब शनि के नए मंदिर बन रहे हैं। जहां आने वाले भक्तों की भीड़ हनुमानजी के भक्तों से अधिक होती जा रही है।

शनि जागरण जागरण संस्कृति में नया आइटम है। शनि के कैसेट चालीसा सब निकल रहे हैं। राजौरी गार्डन के एक आयोजन ने बहुत अच्छी व्याख्या दी। पहले हमारे देश में लकड़ी का इस्तमाल होता था। लकड़ी की बैलगाड़ी, रथ, दरवाज़े। अब लोहे का इस्तमाल होता है। मकान, पुल, कार, दरवाजे सब लोहे के बने होते हैं। और लोहे का संबंध शनि से है। इसलिए भी लोग शनि के भक्त हो रहे हैं। मनमोहन की उदार आर्थिक नीतियों का कमाल होगा कि शनि को जगह मिल रही है।


एक ज़माना था जब प्रशासन हनुमान जी से ड़रा करता था। हनुमान शत्रुनाशक देव के रूप में भी प्रतिष्ठत हैं। दफ्तरों में शत्रु ही शत्रु होते हैं। लिहाज़ा दफ्तर जाने वालों में हनुमान के प्रति असीम भक्ति देखी जा सकती है। कई लोग भगवान के ज़रिये शत्रुओं को निपटाने की अभिलाषा रखते हैं। दिल्ली के पुष्प विहार में एक हनुमान का मंदिर है। दिल्ली नगर निगम वाले जब तक अतिक्रमण के नाम पर तोड़ देते थे। मंदिर के पुजारी ने बताया कि बनवाते बनवाते परेशान हो गया। बस बगल में शनि का मंदिर बनवा दिया। नतीजा नगर निगम वालों ने रास्ता बदल लिया। ध्यान कीजिए कि हाल के दिनों में कई शहरों में सड़क चौराहे से हनुमान मंदिर गिरा दिया जाता है। अफसर हनुमान से कम डरते हैं। लगता है कि वर्षो की भक्ति के बाद दफ्तरों में शत्रु उत्पादन में कमीं नहीं आई। लेकिन शनि मंदिर के पास फटकने की किसी की हिम्मत नहीं होती। पुष्प विहार के मंदिर में अब हनुमान को शनि का सहारा मिल गया है। भक्तों की संख्या बढ़ने लगी है।

सामाजिक धार्मिक राजनीतिक प्रक्रियाओं में समय समय पर भगवानों का ज़ोर बढ़ा है। लेकिन शनि का उदय इन सबमें अलग है। जो तिरस्कृत था वो आज समादरित है। अब दो ही बात होने जा रही है। आने वाले दस साल में। शनि के भक्तों की संख्या बढ़ेगी। शत्रुनाशक हनुमान की कम होगी। शनि शत्रुनाशक के रूप में प्रतिष्ठित किये जा रहे हैं। लाखों लोग अब शनि की पूजा करने लगे हैं। यह भी ठीक है। शत्रुओं का विनाश करने के लिए साप्ताहिक, दैनिक और स्थायी देव तो हनुमान ही हैं। एक हनुमान जी पर कितना दबाव रहता होगा। अब शत्रुविनाशक के रूप में शनि के आ जाने पर दो दो भगवान हो जाएंगे।
यानी दुनिया भर के दुश्मन सावधान हो जाएं। उनके नाश के लिए शनि और हनुमान दो दो भगवान आ चुके हैँ। हमारी भक्ति की कोई सीमा नहीं। इसी खूबी के कारण देर से ही सही शनि प्रतिष्ठित हो रहे हैं। बस आप शनि को शत्रु न समझें। उसके करीब जाइये। आस्तिक है तो ठीक। नास्तिक हैं तो कोई बात नहीं।

नोट पर अंबेडकर

दिल्ली विश्वविद्यालय का एक कालेज है हिंदू कालेज। वहां इतिहास के एक लेक्चरर हैं रतन लाल। मेरे मित्र भी। रतन दलित आत्मविश्वास और सवर्ण समझ के बीच पुल बनाने का काम कर रहे हैं।

रतन का एक प्रस्ताव पर मैं चौंक गया। उनका कहना है कि भारतीय नोट पर महात्मा गांधी के अलावा अंबेडकर की भी तस्वीर होनी चाहिए। उनकी दलील है कि जब अंबेडकर की तस्वीर होगी तो हम सब उनका सम्मान करेंगे। मूर्तियां तो तोड़ी जा सकेंगी मगर नोट कोई नहीं फाड़ेगा। अंबेडकर हर किसी की जेब और पर्स में रहेंगे। लोग संभाल कर अपने ऊपर की जेब में रखेंगे। अंबेडकर को करीब और महत्व से रखने की यह आदत हर तबके में होगी। उनकी प्रतिमा का अनावरण बंद होना चाहिए और नोट पर तस्वीर छाप कर उनकी मौजूदगी घर घर और हर जेब में बढ़ानी चाहिए। ऐसा हो सकता है क्योंकि एक रुपये से लेकर एक हज़ार तक के नोट में आधे या वैकल्पिक तौर पर अंबेडकर की तस्वीर छप सकती है।

रतन लाल का कहना है कि शादी या धार्मिक कर्मकांड में जब पंडित दक्षिणा या चढ़ावे के लिए नोट मांगेगा तो जजमान गर्व से पंडित के हाथ में अंबेडकर की तस्वीर वाले नोट को थमा देगा। उसकी हिचक खत्म हो जाएगी। अंबेडकर की स्वीकार्यता कर्मकांडों से लेकर बचत योजनाओं तक में होगी। लोग अपने आप अंबेडकर का सम्मान करना सीख जाएंगे। या फिर अंबेडकर से सामान्य हो जाएंगे।

एक सवाल स्वाभाविक है कि क्या गांधी की तस्वीर होने से उनकी स्वीकार्यता बढ़ी है? उनका सम्मान बढ़ा है? तो जवाब में यही कहा जा सकता है कि गांधी और अंबेडकर में फर्क है। गांधी की स्वीकार्यता को लेकर कोई विवाद नहीं। यह भी ठीक है कि लोग गांधी के आदर्श को भूल चुके हैं। लेकिन अंबेडकर की स्वीकार्यता खासकर सामाजिक नहीं बनी है। किसी सवर्ण के घर में अंबेडकर की तस्वीर देखी है? अब तो कोई किसी की तस्वीर नहीं रखता मगर जब रखते थे क्या तब रखते थे? अंबेडकर राजनीतिक रूप से अपरिहार्य हैं। उनकी राजनीतिक सोच आंदोलन है। फार्मूला भी। तो क्या ब्राह्मण दलित गठबंधन की तरह अंबेडकर को भी स्वीकार्य नहीं बनाना चाहिए? क्या यह कदम सांकेतिक तौर पर मदद नहीं करेगा?

क्या उनका सोचना ठीक है? गुरुवार को दिल्ली में रतन एक प्रेस कांफ्रेस कर इसकी जानकारी देने वाले हैं। कई सांसदों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। आप ब्लाग पाठकों का क्या कहना है? रतन उन दलित चिंतकों में से हैं जो यह मानते हैं कि मायावती भ्रष्टाचार के ज़रिये दलित उत्कर्ष का प्रतीक नहीं बन सकती। मायावती का योगदान सराहनीय है मगर दलित आंदोलन कभी इतना खोखला नहीं रहा कि वो भ्रष्टाचार से कमाए पैसे से धनवान बनी एक नेता का सम्मान करे। रतन दलित आंदोलन को नए नज़रिये से समझने की कोशिश कर रहे हैं।

उनका एक प्रस्ताव यह भी है कि जिस तरह से टैक्स छूट में महिलाओं को रियायत दी गई है उसी तरह से दलितों को भी विशेष छूट मिलनी चाहिए। उनका कहना है कि इसका लाभ सवर्ण समाज को होगा। सरकारी नौकरी कम होने से दलितों के पास नौकरी के अवसर कम हैं। लिहाज़ा उनके परिवारों में पूंजी निर्माण नहीं हो रहा। टैक्स छूट मामूली रूप से पूंजी निर्माण में मदद करेगा। दलित का आर्थिक आत्मविश्वास बढ़ेगा और बड़े समाज के साथ आर्थिक संवाद भी।

क्या आपको लगता है कि रतन ठीक सोच रहे हैं? क्या नोट पर अंबेडकर की तस्वीर होनी चाहिए? कई बार सांकेतिक बदलाव भी महत्वपूर्ण होते हैं? तो क्या इससे सांकेतिक तौर पर ही सही कोई फर्क पड़ेगा? क्या टैक्स छूट से दलितों को विशेष आर्थिक लाभ होगा?

प्रेमी पागल का प्रेमालाप

प्रेमी- मैं पागल हो रहा हूं।
प्रेमिका- होश में आ जाओ।
प्रेमी- नहीं पागल रहने दो।
प्रेमिका- फिर बातें कैसी होंगी।
प्रेमी- क्या करना है बातों का।
प्रेमिका- और वादों का?
प्रेमी- टूट जाते हैं। सुना नहीं तुमने।
प्रेमिका- किससे?
प्रेमी- ज़माने से।
प्रेमिका-तुम पागल हो।
प्रेमी- तो रहने दो।
प्रेमिका- नहीं। होश में आओ।
प्रेमी- दुनिया का डर है।
प्रेमिका- पागल को डर भी लगता है।
प्रेमी- हां। दुनिया पागल है।
प्रेमिका- मैं पागल से डरती हूं।
प्रेमी- मैं तुमसे डरता हूं।
प्रेमिका- मुझसे?
प्रेमी- तुम पागल नहीं हो।
प्रेमिका- मैं क्यों पागल बनूं?
प्रेमी- तो फिर प्रेम कैसे करोगी?
प्रेमिका- मुझे दुनिया का डर नहीं
प्रेमी- और पागल से डरती हो
प्रेमिका- क्योंकि पागल दुनिया से डरता है।

संस्मरण

चंद्रशेखर एक महान नेता थे।

एक दुख का विमोचन

मुझे एक दुख हो रहा है। दो दिन पहले तक इस दुख का नाम भी नहीं सुना था। अब पता चला है। इसका नाम है- विमोचन का दुख। मैंने कोई किताब नहीं लिखी। विषय का चुनाव नहीं हो पाया या प्रकाशक का प्रस्ताव नहीं आया, दोनों के जवाब नहीं हैं। ज़ाहिर है विमोचन के अभाव से ग्रस्त हूं। लेकिन अब मैं लिखना चाहता हूं। किताब। रविवार को हमारे वरिष्ठ सहयोगी प्रियदर्शन जी की कहानी का विमोचन था। उसी में गया तो यह दुख के लेकर लौटा हूं।

इससे पहले अभिरंजन की पुस्तक का भी विमोचन था। दिल्ली में नहीं होने के कारण नहीं जा सका। जाता तो अब तक विमोचन का दुख चार महीने पुराना हो चुका होता। अभिरंजन की पुस्तक पहले छप चुकी थी। अभिरंजन और प्रियदर्शन दोनों साहित्य जगत के नाम हैं। मैं बड़ा छोटा नहीं मानता। ये दोनों भी नहीं मानते हैं। क्योंकि दोनों ही सहयोगी बहुत पहले से साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठापित हैं। पहली नज़र में किताब की महक, उसके विषय से ज़्यादा मोहक लगी। कवर का रंग देखकर खरीद लिया। कहानी की विषय वस्तु नहीं देखी। किताब का नाम- उसके हिस्से का जादू। विमोचन समारोह में बड़े पत्रकारों और साहित्यकारों को देख विमोचन युक्त हीनभावना का शिकार हो गया। विमोचन के बाद संक्षिप्त तालीवादन के बाद चर्चा शुरू हुई। यह मेरी पहली विमोचन यात्रा थी।

विमोचन से पहले चाय और चिप्स के साथ बड़े साहित्यकारों पत्रकारों से मिलना। चंद विषयों पर सरसरी टिप्पणी के साथ बार बार बुलाये जाने के बाद कुर्सी पर बैठना। किसी को खुद जाकर नमस्कार करना तो अपने किए गए नमस्कार के जवाब का इंतज़ार करना। अनजाने लोग को देख हल्का मुस्करा देना। पहचाने लोग से ऐसे मिलना जैसे आज ही पहली बार मिले हैं। क्या माहौल बंध रहा था।

जो लोग विमोचन के लिए बुलाये गए शायद वो पढ़ कर आए थे। या फिर लेखक के बारे में पहले से भी जानते रहे होंगे। प्रियदर्शन नया नाम तो नहीं है। पहले से जाने और पढ़े जाते रहे हैं। मिडनाइट्स चिल्ड्रन का हिंदी में अनुवाद कर चुक हैं। यह जानकारी उनके साथ काम करते हुए नहीं थी। पता चला किताब के आखिरी पन्ने पर छपे संक्षिप्त परिचय से। संक्षिप्त में ही इतनी बड़ी जानकारी। खैर उनकी किताब की चर्ची सुनकर खुद का हौसला बढ़ने लगा। उसके हिस्से का जादू मेरे हिस्से आ चुका था।

काश हम भी एक किताब लिखते। संक्षिप्त परिचय छपता। किसी को समर्पित करते। यही सब सोचता हुआ घर के लिए निकल पड़ा। कम से कम लेखक तो होते यार। वरिष्ठ न सही युवा ही। युवा न सही उदयीमान ही। सिर्फ टीवी में चेहरा दिखाने से क्या होता है? चेहरे बदल जाते हैं। किताब नहीं बदलती है। कापीराइट के साथ छपती है। आप लेखक कहलाते हैं।

विमोचन कोई मामूली समारोह नहीं होता। लेखक का दिल भी धड़कता होगा। उसका लिखा हुआ कितनों के घर जाएगा। लोग पढ़ेंगे। पता नहीं वैसा समझेंगे या नहीं जैसा विमोचन के वक्त कहा गया है।प्रियदर्शन से तुरंता विषयों पर रोज़ बात हो जाती है। उनका लिखा मशहूर है। मगर किताब देखकर मेरी नज़र बदल गई। पहले भी बेहतर थी और बाद में और बेहतर हो गई। साक्षात लेखक के रूप में देखने का अनुभव अच्छा लगा। तभी अहसास हुआ बाबू तुम भी लेखक होते। कोई तुम्हें भी लेखक समझता। किताब आती। विमोचन होता। कोई आता या न आता, प्रियदर्शन और अभिरंजन तो आते ही। कुछ अच्छी बातें तो कह ही जाते। तब से विमोचन समारोह के दुख से मरा जा रहा हूं। जल्दी ही किताब लिखूंगा। तब तक विमोचन युक्त हीनभावना का शिकार होते हुए सारे किताबों को नई नज़र से देखूंगा। खुद को सज़ा दूंगा। काश मैंने भी लेखकों को गंभीरता से लिया होता। किताब लिखी होती। तो मंच पर मेरी भी एक कुर्सी लगती। किताब का नाम होता- मेरी पहली रचना यात्रा। या पहला विमोचन। नाम तो समझ में आ गया विषय का सुझाव कौन देगा?

नोट- उसके हिस्से का जादू, राधाकृष्ण प्रकाशन से आई है। कीमत एक सौ पचास रु है। कहानी बहुत अच्छी है। पूरी नहीं पढ़ी। मगर पढ़ रहा हूं।

वेतन का सच और सवाल

पिता- कितना मिलता है?
पुत्र- काम चल जाता है।
पिता- कितना?
पुत्र- खर्चा इतना कि बचता नहीं।
पिता- कितना?
पुत्र- स्कूल, दवा और किराया।
पिता- कितना?
पुत्र- साल भर से नया कपड़ा नहीं खरीदे।
पिता- कितना?
पुत्र- बैंक में एक रुपया नहीं।
पिता- कितना?
पुत्र- दिल्ली में रहना महंगा है।
पिता- कितना?
पुत्र- टैक्स भी भरना है।
पिता- कितना?
पुत्र- आपके पास कुछ है?
पिता- है। चाहिए।
पुत्र- कितना?
पिता- उतना तो नहीं।
पुत्र- कितना?
पिता- रिटायरमेंट के बाद मकान में लग गया।
पुत्र- कितना?
पिता-चुप...
पुत्र- चुप

नोट-( कहानी ख़त्म नहीं हुई। खत्म नहीं हो सकती। चलती रहेगी। बस आप बता दीजिए। किस किस घर में इस सवाल का जवाब बाप और बेटे ने ईमानदारी से दिया है)

भाई-भाई का झगड़ा- लघु कहानी

कौन। मैं। मैं कौन। तू कौन। खोल दरवाज़ा। बाप का घर है। क्यों? तेरे बाप का है? हां है। अभी यह घर बंटा नही है। भारत पाकिस्तान बंट गए घर क्यों नहीं बंटा। वसीयत है मेरे पास। तेरे पास क्या है? मेरे पास स्टे आर्डर है। सड़क पर भाई भाई लड़ेंगे? अंदर आने दे। तो क्या भीतर आकर लड़ेगा? हां वर्ना पिताजी की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी। उससे पहले घर को मिट्टी में मिला दूंगा। बड़े भाई से तमीज़ से बात कर। छोटे भाई से बात करना सीख। मैंने तेरे लिए बहुत कुछ किया है। मैंने भी हर बात मानी है। तो अब मान। अब नहीं। क्यों नहीं। बात हक की है। ओहदे की नहीं। तू लड़ेगा मुझसे। हां मैं लड़ूंगा। तू नहीं तेरी बीबी बोल रही है। मैं नहीं बोलता अगर तुम्हारी बीबी न बोलती। अच्छा भाभी अब बीबी हो गई। जब मेरी पत्नी बीबी हो सकती है तो भाभी भी बीबी कही जा सकती है। लाशें गिरेंगी। किसलिए। घर के लिए। रहेगा कौन। जो बच जाएगा। दोनों मर गए तो। घर बच जाएगा। खोल दरवाज़ा। नहीं खोलता। खोल। नहीं। खोल। नहीं।

गोत्र का स्रोत-2

मैंने सिर्फ बहस की गुज़ारिश की थी। प्रतिक्रिया में बुद्धिजीवियों को गरियाने से क्या फायदा? मेरा मकसद परंपरा बनाम विज्ञान के बीच बहस नहीं छेड़ना बल्कि दोनों पैमानों से समझना है। पश्चिम में इतना तो हुआ ही है कि वहां की पारंपरिक मान्यताओं के खिलाफ वैज्ञानिक धारणाएं बनाईं गई हैं। परंपराओं को परखा गया है। जो नहीं परख पाए वो क्रिसमस या धार्मिक त्योहारों के रूप में मनाते रहते हैं। मगर वैज्ञानिक आधार और सोच किसी मूर्ख की कल्पना में नहीं बने हैं । वे भी इसी समाज के बीच बहस मुबाहिसों से बनते हैं।

एक पाठक मित्र के अनुसार विज्ञान ने कहा है कि जीन से बीमारियां एक पीढीं से दूसरी पीढ़ी में चली आती हैं। तो क्या इशारा गोत्र की तरफ है? डीएनए या जीन की बात क्या गोत्र की बात है? मुसलमानों में गोत्र की शर्त नहीं होती? तो क्या हर मुसलमान बीमार होता है? स्वस्थ्य नहीं होता? उसी तरह से ईसाई धर्म के लोग भी गोत्र नहीं मानते। बौद्ध धर्म के लोग मानते हैं या नहीं, मैं नहीं जानता।

एक और उदाहरण देना चाहूंगा। मेरी एक दोस्त हैं। उनके माता पिता ने अंतर्राज्यीय और अंतर्जातीय विवाह किए। उनसे सिर्फ एक लड़की हुई। वही जो मेरी दोस्त हैं। अब आप कह सकते हैं कि जो पिता का गोत्र है वही बेटी का होगा। ठीक मान लिया। लेकिन उस लड़की ने दूसरे धर्म के पुरुष से शादी की। अब उसकी एक बेटी है। इस मामले में गोत्र कहां गया? गायब हो गया क्या? कोई मेरी दोस्त की बेटी का गोत्र बता सकता है?

मैं इस बहस में पड़ना चाहता हूं। सबके अनुभवों और जानकारी के आधार से कुछ सीखने में हर्ज नहीं। हो सकता है गोत्र के व्यावहारिक पक्ष हों मगर इसे लाठी के बल पर तो साबित नहीं किया जा सकता। परंपरा के नाम पर हम कई वाहियात चीज़े ढोते रहे हैं। और पश्चिम को गरियाने के नाम पर बेतुकी बातें करते रहते हैं। जैसे पश्चिम के प्रभाव ने सीखाया कि जाति गलत है। औरतों को आज़ादी मिलनी चाहिए। तो क्या पश्चिम का गान नहीं करेंगे। कौन सा आपका साठ साल पुराना राष्ट्रीय स्वाभिमान आहत हो जाता है। अब आप एक दो ऋषि मुनियों की पत्नियों या उन्हें चुनौति देने वाली महिला विद्वानों की मिसाल दे कर यह न बतायें कि भारतवर्ष में महिलाओं का आदर था। विधवा विवाह का समर्थन और बाल विवाह की आलोचना पश्चिम की मान्यताओं ने सीखाईं हैं। पश्चिम की बहुत सारी मान्यताओं का हमने गलत इस्तमाल भी किया है। गोत्र से हिंदू धर्म के नागरिकों ने क्या हासिल किया है? इसका लाठीगत विरोध करें या तर्कसंगत। सिर्फ नारेबाज़ी नहीं, कहीं से कुछ पढ़ने को मिले यानी शोध वाली बात हो तो बताइये। साझा कीजिए।

गोत्र का स्रोत

करनाल में समगोत्री विवाह को लेकर हत्या हुई है। इससे पहले हरियाणा के ही झज्जर के असांदा गांव में यही कांड हुआ था। एक ही गोत्र में शादी के कारण बिरादरी वाले आ गए। फरमान सुनाया कि शादी खारिज की जाती है और दंपति अब से भाई बहन होंगे। पंचायत ने उनके बच्चे के बारे में क्या कहा नहीं मालूम। लेकिन इस फैसले के खिलाफ मानवाधिकार आयोग में शिकायत की गई थी। कुछ हुआ या नहीं वही जानते होंगे। इसी से पंचायतों के फरमान सुनाने की परंपरा और अधिकार का सवाल भी जुड़ा है। सरकार भी इस सवाल को जानती है मगर करती नहीं। हर बार पंचायतें बैठती हैं, फैसला होता है और फिर हत्या कर दी जाती है या शादी का जोड़ा फरार होने पर मजबूर हो जाता है।

सवाल बड़ा है? गोत्र का सवाल। क्या गोत्र के भीतर शादी हो सकती है? होनी चाहिए? गोत्र के भीतर के सब स्त्री पुरुष एक ही रिश्ते से बंधे होते हैं भाई और बहन। कैसे?


गोत्र क्या है? इतिहासकार डी एन झा लिखते हैं कि जब आर्य भारत आए तो वो घुमंतू भी थे और पशुचारण भी कर रहे थे। पशुचारण और खेती उनकी आर्थिक गतिविधियां थीं। सबसे अहम गतिविधि थी गाय पालन। गायों की संख्या से हैसियत तय होती थी। गाय पर आधिपत्य को लेकर लड़ाई भी होती थी। इसका मतलब यह नहीं कि हम गाय नहीं खाते थे। गाय और बैल के मांस खाने के प्रमाण हैं। ब्राह्मण ही खाते थे। धीरे धीरे कम हो गई। आज भी कई हिंदू परिवार गौ मांस खाते हैं। शौक से। लेकिन वो स्वीकार नहीं करते। विरोध के डर से।

बहरहाल इस बवाल को छोड़ते हुए कि खाते थे या नहीं खाते थे आगे बढ़ते हैं। गोत्र पर। गाय पालन आर्यों के सामाजिक जीवन का अहम हिस्सा होता जा रहा था। धीरे धीरे गायों के आस पास सामाजिक ढांचा बनने लगा। गोत्र का संबंध उस बाड़े से हो गया जहां एक समूह विशेष की गायें बांधी जाती थीं। वह समूह वंश में बदलता गया। चूंकि एक गोत्र और दूसरे गोत्र के बीच गायों को लेकर युद्ध होता था इसलिए अलायंस यानी सैन्य गठबंधन बनने की प्रक्रिया शुरू हुई। शायद इसी ज़रूरत की वजह से एक गोत्र के भीतर विवाह को निषेध किया गया। दूसरे गोत्र यानी बाड़े के समूह के किसी परिवार की संतान से शादी करने पर एक गठबंधन बन जाता था। इसलिए अगर आपके गोत्र का कोई दूसरा गांव होगा वहां आपका कोई रिश्तेदार नहीं मिलेगा। गोत्रों की परंपरा वर्ण या जाति व्यवस्था के साथ साथ मज़बूत होती गई। हर जाति के लोग गोत्र नियम मानते हैं। एक गोत्र के लोग एक ऋषि के संतान कहे जाते हैं। गोत्र ब्राह्मणों ने शुरू किया मगर हर जाति ने अपनाया। कुछ ऋषियों के संतानों ने अपना अलग गोत्र चलाने का प्रयास किया। मध्यकाल में क्षत्रियों ने गोत्र परंपरा को और मजबूत किया होगा। युद्ध के वक्त नए घरानों की ज़रूरत होती होगी। इसलिए शादी अपने गोत्र से बाहर कर एक और एक राजपरिवार आपस में रिश्तेदार हो जाते थे। उनके बीच युद्ध नहीं होता था। या इसकी संभावना कम हो जाती होगी।

फिर औरतों का क्या गोत्र होता है? शुरू में प्रमाण मिलते हैं कि विवाह के बाद बहू का गोत्र वही होता है जो उसके पिता का हुआ करता था। बाद में पितृसत्तात्मक मूल्यों के मज़बूत होने से बहू के नाम और गोत्र भी पति से तय होने लगे। पुरुष का गोत्र नहीं बदलता मगर स्त्री का बदलता है।

मैंने जो लिखा है वो गोत्र पर संक्षिप्त ऐतिहासिक जानकारी है। लेकिन बहस समकालीन होनी चाहिए। क्या गोत्र संभव है? कुछ लोग डीएनए के ज़रिये इसे साबित करने की कोशिश कर रहे हैं? फिर भी इसका जैविक आधार क्या है?
महानगरों में या एनआरआई जगत में जब अंतर्जातीय विवाह होता होगा तो गोत्र की परवाह करते होंगे? क्या अंतर्जातीय विवाह की भी शर्त गोत्र है? एक वक्त की ज़रूरत में बने इस व्यवस्था को आज इतनी सख्ती से लागू किया जा सकता है कि किसी जोड़े को मार दिया जाए। क्या कानून में विवाह की शर्तों में गोत्र को जोड़ा गया है? क्या गोत्र स्थायी है? अपरिवर्तनशील है? एक ही ऋषि के संतान अलग अलग जाति वाले कैसे हो सकते हैं? यह कैसे हो सकता कि एक ही गोत्र के ब्राह्मण, कायस्थ और क्षत्रिय हो सकते हैं? क्या ऋषियों ने हर जाति के संतान पैदा किये? बहस शुरू होती है अब।