प्रतिभा पाटिल को जानते हैं ?

महाराष्ट्र के जलगांव में वकालत। १९६२ में विधायक। राज्य में कई बार मंत्री। कालेज में टेबिल टेनिस की चैंपियन, महाराष्ट्र कांग्रेस की पहली महिला कांग्रेस अध्यक्ष, राजस्थान की पहली महिला राज्यपाल। जाति से कुनबी मराठा। विवाह सीकर के शेखावट से। भारत वर्ष की पहली महिला राष्ट्रपति अगर चुन ली गईं तो। जिसकी संभावना अधिक है।

मज़ाक है गठबंधन की मजबूरी और प्रथम महिला होने के नाम पर ऐसे महान उम्मीदवार का चयन। राजनेताओं ने राजनेता उम्मीदवार चुनने के लिए कितना वक्त बर्बाद किया। गैर राजनीतिक कलाम के विकल्प के रूप में राजनीतिक प्रतिभा का यह सुंदर उदाहरण है। नेता सिर्फ सत्ता का खेल खेलता है और इस खेल के लिए उसे सिर्फ मोहरे की ज़रूरत होती है। हमारे देश में महिला के नाम पर प्रतिभा पाटिल बचीं थीं। उनका चुना जाना सिर्फ किसी ज्योतिष को समझ आ सकता है। जो ग्रहों की चाल देखकर किसी की ज़िंदगी में राजयोग आने का एलान करता है।

भारत में महिलाओं ने कई मुकाम हासिल कर लिए हैं। भारत के आज़ाद होने के बाद और आज़ाद होने से बहुत पहले ही। लेकिन प्रथम होने के इस लिम्का और गिनीज बुकीय रिकार्ड के दौर में ऐसी उम्मीदवार पेश की जाएगी, इसी की
उम्मीद थी।हमारी राजनीति प्रतिभा को नहीं ढूंढती। वह नाम की प्रतिभा में यकीन करती है।कब आपने प्रतिभा पाटिल की राजनीतिक चतुराई की मिसाल महाराष्ट्र या देश की राजनीति में देखी हो। मैं प्रतिभा पाटिल जी का मान मर्दन नहीं कर रहा। पुरुष विकल्प के रूप में शिवराज पाटिल भी इसी श्रेणी के थे। वो भी रबर स्टांप ही थे। साईं बाबा और गांधी परिवार की कृपा से उनका जीवन चलता आया है। अच्छा हुआ नहीं चुने गए। सुशील कुमार शिंदे व्यक्तिगत ज़िंदगी में गरीबी से सत्ता के शिखर पर पहुंचने के उदाहरण हैं मगर दलित होने के नाम पर कलंक। महाराष्ट्र के बाहर देश का एक भी दलित खुद को इस नाम से नहीं जोड़ता होगा। प्रणब मुखर्जी भले ही कांग्रेस का कामकाज देखते हों और इंदिरा राजीव दौर के रबर स्टांप नेता के रूप में अहमियत रखते हों। लेकिन इनकी उम्मीदवारी पर भी देश को कितना गर्व होता, कहना मुश्किल है। इसीलिए जिन नामों को खारिज किया गया है उन पर सोचें तो हमारे राजनीतिक दल व्यावहारिक और दूरदर्शी साथ ही पेशेवर भी नज़र आते हैं। लेकिन प्रतिभा पाटिल? हमारे देश में वाकई इस पद के लिए लायक उम्मीदवार नहीं बचे हैं।

चलिए स्वागत करते हैं। हमने राष्ट्रपति के नाम पर पहले भी कई प्रतिभाओं का स्वागत किया है। देश में मध्यमार्गी मनमोहनों और प्रतिभाओं को ही मौके मिलते रहेंगे। प्रतिभा जी आपने राजनीति में क्या किया है आप जानती होंगी। शुक्र है कि आप राजा भैया या पप्पू यादव की तरह नहीं है। निरपराध जीवन आपकी पूंजी रही होगी। गांधी परिवार के आशीर्वाद और विश्वास से आपको इतिहास में अमर होने का मौका मिला है। इतिहास आपको याद रखेगा और हम भी विरोध के लेख के बाद भी इस सवाल का जवाब तो देंगे ही कि भारत की पहली महिला राष्ट्रपति का नाम क्या है? प्रतिभा पाटिल।

गर्मी पत्रकारिता

तापमान से सावधान करती गर्मी पत्रकारिता के क्या कहने। मौसम बेईमान और गर्मी मेहमान। जाने का नाम ही नहीं लेती। मुंह ढंके लोग और पेड़ से चिपके लोग। एसी में सुस्ताते जन और मॉल में भटकता मन। बुरा न मानो गर्मी है।
टीवी या अखबार सब गर्मी से बेहाल। तापमानों का ग्राफ है तो कहीं लू से मरने वालों की सूची। हर साल आने वाली गर्मी, गर्मी में घूमने वाले पत्रकारों को परेशान करती है। कैमरे गरम हो जाते हैं। स्टीक माइक बमक जाती है। छूने से करंट मारती है। जला देती है। टीवी खोलिये तो तापमान और बढ़ जाता है।
अभी तक आपको यही लगता होगा कि कमरे में गर्मी है मगर चंडीगढ़ में तापमान प्रवचन सुनकर दिल्ली के कमरे का भी तापमान बढ़ जाता है। मौसम खबर है। और खबर मौसम की तरह गरम।

गर्मी अब ऐसे आती है जैसे पहले आती नहीं थी। ४५ डिग्री तापमान के इस दौर में गर्मी खूब सता रही है। हर कोई गर्मी की चर्चा कर रहा है। डिग्री सेल्सियस थर्मामीटर की तरह घर घर में आम हो गया है। मौसम विभाग की भविष्यवाणी झूठी फिर भी ज्योतिष के मारे लोगों का भरोसा मजबूत ही होता जा रहा है। आज कैसा तापमान रहेगा? मौसम वाली लड़की क्या कहेगी? अरे सुनो। सर्दी में उसका मेक अप ही देखते रहे कम से कम गर्मी में तो सुन लो। वो क्या कह रही है? क्या पता? आज भी तापप्रेचर यानी टेंपप्रेचर ४६ डिग्री से ऊपर जायेगा क्या? मर गए। गुप्ता जी पानी पीते रहियेगा। पड़ोस वाले शर्मा जी ने हिदायत डे डाली। शर्मा जी को भी गुप्ता जी से रिटर्न अडवाइस मिल गई। भई आप तो आज छुट्टी ले लीजिए। इस गर्मी का कोई भरोसा नहीं।

चैनल वाले बताते ही नहीं कि गर्मी कब जाएगी। भूल गए क्या अक्तूबर तक गर्मी होती है। और काटिये पेड़। एसी लगाइये। कार्बन का धुंआ निकालिये। गर्मी की खबरों के बीच पर्यावरण एक्टिविस्ट झुंझला रहा था। उसे लगा कि इस बार तो लोग उसकी बातों को सुनेंगे ही । खतरा आसन्न है। लोग बेचैन। कुछ होगा। नीतियां बनेंगी और नियम से चलेंगे।

लेकिन वही ढाक के तीन पात। टीवी दिखाने लगता है मानसून रागा। वाह। बारिश आने वाली है। आर डी बर्मन के गाने बज रहे हैं। बारिश वाले गाने। कहीं बाढ़ से निपटने की तैयारी पर खबर है तो कहीं बारिश के पानी से नाली को बचाने की खबर है। इस बीच गर्मी की खबर आती है। लोग परेशान है। प्यासे हैं। बिजली नहीं है। एसी है। बल्ब नहीं है। लालटेन है। सर्दी नहीं है। गर्मी है।

व्यवस्था बदलाव

इसकी बहुत कोशिशें होती हैं। कई बार व्यवस्था बदल जाती है। पुरानी की जगह नई हो जाती है। फिर उस नई व्यवस्था को बदलने की कोशिश होने लगती है। क्या व्यवस्था का बदलाव एक निरतंर प्रक्रिया है? फिर क्यों इतिहास काल से व्यवस्था बदलने वाले को क्रांतिकारियों से कम अहमियत दी जाती है? क्रांतिकारी बदलाव व्यवस्था बदलाव से बड़ा होता है। आज कल व्यवस्था बदलाव को ही क्रांतिकारी बदलाव कहने लगे हैं। क्योंकि क्रांतिकारी बदलाव हो ही नहीं रहा है। न कोई क्रांतिकारी काम कर रहा है। सिर्फ बात कर देने से उसे क्रांतिकारी कहा जाने लगा है।

इसीलिए व्यवस्था बदलाव के बाद भी कुछ नहीं होता। तब भी कुछ लोग होते हैं जो बदली हुई व्यवस्था के बदल जाने का इंतज़ार करते रहते हैं। नया नेतृत्व नए असंतोष पैदा करता है। नए सवाल खड़े करता है। नई बेचैनियों से उकताए हुए लोगों को व्यवस्था बदलने के सपने देता रहता है। क्यों हर वक्त कुछ लोग व्यवस्था बदलने की आस लिए रहते हैं? क्या इसके बदलने से सब कुछ उन्हें ही मिलता है?

अब तो व्यवस्थापक के बदल देने को व्यवस्था में बदलाव कहते हैं। सिस्टम वही रहता है। उसकी आशा निराशाएं वहीं रहती हैं। फिर बदलता क्या है? मुझे लगता है कि कुछ नहीं बदलना चाहिए। अब ज़माना बदलने का नहीं रहा। फैलने का रहा है। बाज़ार का कोई ब्रांड शहर से गांव तक फैल जाए तो उसे ज़माने में आए बदलाव के एक मानक के रूप में देखा जाता है। तो क्या हम भी बदलने के नाम पर फैल कर खुश हो जाते हैं? क्यों इंतज़ार करते हैं कि व्यवस्था बदले? क्या यह ठीक नहीं रहेगा कि आप फैल जाएं? क्या फैलने के बाद आप बदले हुए महसूस नहीं करेंगे?

क्या बदलाव कि इस चाहत का संबंध सिर्फ महत्वकांक्षा से है? महत्वकांक्षा का फैलना यानी नई जगह पाना क्या बदलाव हो सकता है? या यही बदलाव है। पहले जहां जगह नहीं मिलती थी अब मिलने लगी है। सब कुछ आपके हिसाब से ही हो क्या यही तड़प व्यवस्था बदलाव की ज़रूरत पैदा करती है? या बदलने वाले के मन में वाकई कोई बड़ा भारी विकल्प होता है? कभी आपने सोचा है कि इसकी चाहत और ख्वाब में मौजूदा वक्त कितना बर्बाद होता है। दुनिया में हर चीज़ फैल रही है। बदल नहीं रही है। पतली सड़क चौड़ी हो रही है। पुल फ्लाई ओवर हो रहे हैं। कोक मैनहैटन से मोतिहारी आ रहा है। मोबाईल दिल्ली से गांव गांव पहुंच रहा है। फिर बदल क्या रहा है? फैल ही तो रहा है। पसरने को बदलना क्यों कहते हैं? व्यवस्था की निरंतरता क्यों बनी रहती है? क्यों व्यवस्था व्यवस्थापक के बदलने के बाद भी नहीं बदलती? सिर्फ पहले से ज़्यादा फैलने लगती है। क्या फैलने की चाह ही बदलाव है? व्यवस्था का।

जब भी मुझे अकेले में डर लगता है

जब भी मुझे अकेले में डर लगता है
भीड़ में खो जाने का मन करता है

अक्सर मेरा मन चुप सा हो जाता है
अपनी ही बातों पर बोर सा हो जाता है

हर वक्त किसी का इंतज़ार सा रहता है
कैसा अकेलापन है जो बेचैन सा रहता है

जब भी मुझे अकेले में डर लगता है
भीड़ में खो जाने का मन करता है

लौटने की चाह में घर जल्दी भागता है
भीड़ से घबराता है तो अकेला हो जाता है

तबीयत और शख्सियत का हाल पूछता है
जितना मज़बूत है उतना ही थरथराता है

जब भी मुझे अकेले में डर लगता है
भीड़ में खो जाने का मन करता है

सूने मकानों में कुछ शोर किया जाए

सूने मकानों में कुछ शोर किया जाए
शोर को ज़रा और पुरज़ोर किया जाए

सन्नाटों के शहर में कुछ किया जाए
खिड़की खोल कर टीवी चलाया जाए

सबकी नींद खुल जाएगी जगाया जाए
अब शहर को जीता जागता बनाया जाए

सूने मकानों में कुछ शोर किया जाए
शोर को ज़रा और पुरज़ोर किया जाए

कोई आता नहीं है सबको बुलाया जाए
आने वाले को अपना पता बताया जाए

सूने मकानों में कुछ शोर किया जाए
शोर को ज़रा और पुरज़ोर किया जाए

जाति बनाम जनजाति

तलवार, फरसा, गंड़ासा, लाठी और लोहे की छड़। बंदूक नहीं। बंदूक होनी चाहिए थी। खैर। जातिगत उग्रता के पुरातन और मध्यकालीन हथियार खुद जनजाति साबित करने और नहीं करने देने के लिए काम में लाए जा रहे थे। मीणा जनजाति के नेता अचानक अपने आप को जंगलों में रहने वाला बताने लगे। पहले कभी रहते होंगे। मीणा समाज का नेतृत्व कर रहे एक संयासी जातिवादी गेरुआ धारण किये हुए था। हम पहुंचे तो उसने अकेले तस्वीर लेने से मना किया। बीस हज़ार के मोबाइल फोन से फोन किया। कोई पांच मिनट में नौवीं दसवीं में पढ़ने और न पढ़ सकने वाले लड़कों का जमावड़ा हो गया। सबने संयासी के पांव छूकर मीनेश भगवान की जय के नारे लगाए। संयासी से पूछा कि अजीब अजीब किस्म के हथियार क्यों? जवाब था हम जंगलों में रहते हैं और वहां बाघ और शेर आ जाते हैं। जंगल कहां? सवाईमाधोपुर, दौसा में। लेकिन सरकार तो कहती है यहां नाममात्र के जंगल हैं और बाध शेर की कमी हो गई है। संयासी गुस्से में आ गया। बोला कि सरकार क्या जानती शेर और बाघ कब निकल आते हैं। इन लड़कों से पूछो। मैंने लड़कों से पूछा कि कहां रहते हो। तो जवाब मिला दौसा में। फिर सवाल किया दौसा में कहां। तो कई जवाब मिले। बस स्टैंड, टीवी टावर के पास। और हथियार कब उठाया तो जवाब मिला..कल।

इसका विश्लेषण जाति पर अध्ययन करने वाले समाजशास्त्री कैसे करेंगे पता नहीं। मगर अपनी पहचान के लिए कब अतीत में चले जाते हैं पता नहीं। और बातें करते करते खुद अतीत की वर्चुअल रिएलिटी में रहने लगते हैं। जिसमें जंगल में घर होता है। शेर आता है और फरसे से शेर का शिकार हो जाता है। वैसे शिकार करने की जितनी भी तस्वीरें हमने किताबों में देखी हैं उनमें या तो बंदूक, भाले या तीर कमान का ही इस्तमाल दिखा है। फरसा या कुल्हाड़ी का नहीं। गेरूआ स्वामी रामेश्वरानंद ने कहा कि मीन सेना आदिकाल से है। कभी सुना नहीं कि किसी जनजाति की कोई सेना आज भी मौजूद है। मीणा जाति सरकार से मिलने वाली आरक्षण की ठेकेदार हो गई। कहा कि हम किसी को नहीं लेने देंगे। मगर क्या आरक्षण उसका है? क्या मीणा कहेंगे कि सरकार जांच ले कि वो जनजाति है या नहीं। गुर्जर यह लड़ाई चाहते थे। राजस्थान में ओबीसी से लेकर जनजाति तक सब मीणा के जनजाति होने पर सवाल उठाते हैं। जवाहर लाल नेहरू के समय भील मेणा को आरक्षण मिला था। लेकिन कहते हैं कि भील और मेणा के बीच अर्ध विराम लग गया। और अंग्रेजी के कारण मेणा मीणा हो गया। और मीणा जाति जनजाति हो गई। इसकी जांच नहीं होनी चाहिए? क्या सरकार या राज्य को ठग कर संख्या बल पर कोई जाति आरक्षण के लिए मजबूर कर सकती है? गुर्जर जनजाति की मांग नहीं करते। उन्हें लगता है कि हर चीज़ में वो मीणा जैसे हैं। दोनों अपने अपने भगवानों की जयकार लगा रहे थे। गुर्जर देवनारायण भगवान की जय बोलते तो मीणा मीनेश भगवान की जय बोलते थे। दोनों ही भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। इनका इस्तमाल दोनों ओर से जोश भरने में किया जाता था। एक ही भगवान के दो अलग अलग अवतारों की संताने एक दूसरे को खत्म करने पर तुली हई थीं। एक जनजाति हो सकता है तो दूसरा क्यों नहीं? मीणा जाति ने आरक्षण में हिस्सेदारी नहीं देने का फैसला उसी तरह किया जैसे मंडल आयोग के समय सवर्ण कर रहे थे। फर्क सिर्फ इतना है इस बार आरक्षण के दायरे में आने वाली दो जातियां आपस में लड़ रही थीं।

क्यों? उन्हें ओबीसी के तहत नौकरी में आरक्षण तो मिलता है मगर राजनीति में नहीं। विधानसभा, लोक सभा, पार्षद, और पंचायत की सीटें ओबीसी के लिए आरक्षित नहीं होती । वो सिर्फ अनुसूचित जाति औऱ जनजाति के लिए होती हैं। पांच साल में राजस्थान पब्लिक सर्विस कमीशन की नौकरियां नहीं निकलती होंगी उससे कहीं ज़्यादा हज़ारों की संख्या में पंचायत से लेकर लोक सभा तक की सीटें हर पांच साल के भीतर निकलती हैं। दौसा गुर्जर बहुल क्षेत्र है। लेकिन नई परिसीमन के कारण दौसा सीट जनजाति के लिए आरक्षित हो जाएगी। नतीजा गुर्जरों को नेतृत्व के लिए किसी मीणा के पास ही जाना होगा। अगर वो जनजाति हो जाते हैं तो गुर्जर बहुल क्षेत्र उनके हाथ से नहीं निकलेंगे। वर्ना नौकरी की तरह राजनीति में भी उन्हें मजबूरन मीणाओं का प्रभुत्व स्वीकार करना होगा।

मैं बात हिंसक चरित्र की कर रहा था। मीणा और गुर्जर दोनों ने तलवारें निकाल लीं। हिंसा के लिए लोगों को उकसाया गया ताकि दोनों पक्ष जयपुर में अपनी दावेदारी को मजबूत कर सके। दोनों पक्षों ने अपनी हैसियत बताने के लिए विधानसभावार अपने वोटों की संख्या तैयार की थी। सबके नेता अपनी पार्टी के भीतर नेतृत्व को धमका रहे थे। पहले राजनीतिक पार्टियां वोट के लिए जाति के नाम पर जाति को बांटती थीं। इस बार जाति ने तय कर लिया कि राजनीति को एक होना पड़ेगा। तभी आरक्षण मिलेगा। इसलिए कांग्रेस पार्टी के सांसद सचिन पायलट बीजेपी अध्यक्ष से मिल रहे थे। तो मीणा विधायकों की बैठक में कांग्रेस और बीजेपी दोनों के मीणा विधायक शामिल हो रहे थे। राजनीतिक दल फंस गए थें। पहली बार जाति के नाम पर बना वोट बैंक राजनीतिक दल का इस्तमाल अपने हक में कर रहा था। इतनी लड़ाई क्या कभी शहर या गांव के अस्पतालों में डाक्टर से लेकर जांच तक की बदहाली के खिलाफ हुई है? आरक्षण अलग चीज़ है। सरकार के पास अब देने के लिए बहुत कम हैं और लेने के लिए दावेदार ज़्यादा। आरक्षण की लड़ाई होने लगती है।

मुझे लगता है कि आरक्षण का मसला अब नहीं दिए जाने के विरोध में नहीं फंसा है। बल्कि दिये जाने वालों की पात्रता में फंसा है। क्रीमी लेयर का विवाद इसी की कड़ी है। आरक्षण से क्रीमी लेयर तैयार हुआ है। और इस क्रीमी लेयर की कीमत पर जाति जनजाति विशेष के एक बड़े वर्ग को पीछड़ा रहना पड़ रहा है। जातियों में इसे लेकर असंतोष शुरू हो गया है। आज दो जातियां टकराईं हैं बल्कि आने वाले दिनों में जाति के भीतर पैदा हुए दो वर्गों के बीच लड़ाई होने जा रही है। क्रीमी लेयर और साधारण लेयर के बीच। कम नौकरी और घोर महत्वकांक्षा। टकराव को कौन रोक सकता है।

सुमित्रानंदन की तरह मैं कूड़ा नहीं लिखूंगा

मैं एक दिन सबसे अच्छी कविता लिखूंगा
सुमित्रानंदन की तरह मैं कूड़ा नहीं लिखूंगा
जो भी लिखूंगा सारा का सारा बेहतर लिखूंगा
पंत की तरह आधा बेहतर आधा कूड़ा नहीं लिखूंगा।

मैं एक दिन सबसे अच्छी कविता लिखूंगा
सारे विषय और सारे विश्लेषण पर लिखूंगा
प्रेमचंद, प्रभा खेतान के लिए कुछ नहीं छोडूंगा
इतना लिखूंगा कि आलोचक को भी कहना पड़ेगा
तुमने भी जो कुछ भी लिखा अच्छा लिखा है
कम से कम पंत की तरह कूड़ा नहीं लिखा है।

मैं हिंदी का सबसे नामवर कवि बनने वाला हूं
नामवर मेरी कविता का पाठक बनने वाले हैं
मैं नामवर को जान कर कविता लिखने वाला हूं
अपने लिखे के आस पास कूड़ेदान नहीं रखने वाला हूं
दुनिया मेरे साहित्य को धरोहर कहती रहेगी
मैं अपने लिखे के कूड़े को सोना समझता रहूंगा
बात नामवर की हो या कहें उसे वाजपेयी
मैं एक दिन सबसे अच्छी कविता लिखूंगा।

बारिश तुम आती हो तो....

बारिश तुम आती हो
तो अच्छा लगता है
तुम्हारी हल्की फुहारें ही
भीतर तक हल्का कर देती हैं
मन की गहराई भी भर जाती है
खालीपन के ऊपर बूंदे छलकने लगती है
बारिश तुम्हारे तेज हो जाते ही
ज़िंदगी बेकाबू रफ्तार लगती है
बारिश तुम आती हो
तो अच्छा लगता है

साथ आना तुम्हारे
समंदर की हवाओं का
पहाड़ों से उठकर
हल्की सर्दियों का
और फिर इन सबका
ठंडी हवाओं में बिखेरना
छोटी छोटी बूंदों में तुम्हारी
आसमान में दबी बेसब्री का पिघलना
जिनके खारे पानी पर अक्सर
अपने नंगे बदन किसानों का नाचना
बारिश तुम आती हो
तो अच्छा लगता है

हमारी खिड़की से धीरे धीरे सरकना
छतों की सीलन से धीरे धीरे टपकना
टीन के कनस्तरों में उन बूंदों को उठाना
कभी पांवों को भींगाना फिर बिस्तर पर सूखाना
अचानक ज़िंदगी में कितना कुछ होने लगता है
बारिश तुम आती हो
तो अच्छा लगता है

मगर अच्छा लगना सब पुरानी बाते हैं
तुम्हारा आना सिर्फ इतज़ार की राते हैं
आती ही नहीं हो तुम बारिश
आकर भी बिना भींगाए चली जाती हो तुम
सूखे खेतों और बेकरार किसानों को छोड़ कर
राह देखती मेरी छत की सीलन
और छेद वाले टीन के कनस्तर
तुम्हारी फुहारें मन को भारी कर देती हैं
मन की गहराई और गहरी हो जाती है
कि तुम इतना कम कम क्यों आती हो
बारिश तुम आती हो
तो अच्छा लगता है

मैं बहुत सीधा हूं

मैं बहुत सीधा हूं
सिर्फ समझना मत
कि मैं बहुत सीधा हूं
सीधा हूं सिर्फ अपने काम से
कोई हाथ डाले तो गया काम से
हद की सीमा के भीतर तक ही
मैं बहुत सीधा हूं

सीधा होने की सीमा के बाद
हम सबका टेढ़ा शुरू होता है
हमारे भीतर टेढ़ेपन की तमाम संभावनाएं भी
कितनी जतन से बचाकर रखी होती हैं
अक्सर हद से गुज़र जाने के बाद
सीधेपन के बचाव में टेढ़ापन निकल आता है
तिस पर से कह भी देते हैं अक्सर
देखों मैं बहुत सीधा हूं

सीधा होना कहीं सुविधा तो नहीं
सीधेपन के बहाने चुप रहने का मौका तो नहीं
संबंधों को तौल माप कर भांपने का मौका तो नहीं
जब सब कुछ हद से गुज़र जाए
तभी क्यों टूटती है हमारे सीधेपन की सब्र
फिर हम क्यों कहते हैं
देखो, अब भी संभल जाओ
बहुत हो गया
मैं वैसा भी सीधा नहीं हूं

दुनिया के सारे सीधे लोगों से सवाल है
वो क्यों आखिरी वक्त तक सीधेपन की आड़ नहीं लेते
क्या सीधा होना वाकई एक कमज़ोरी है
कि जो सीधा है उसी से सीनाजोरी है
सीनाजोरी जब हद से गुजर जाए
तो कह देने भर का बयान कि
देखो मैं बहुत सीधा तो हूं
मगर एक शर्त भी है इस सीधेपन में
कि सिर्फ समझना मत कि
मैं बहुत सीधा हूं

सेक्सट्रो या फिर मेट्रो

फिल्म मेट्रो देखी। ढाई घंटे में हर पल हर संबंध एक दूसरे को छलते रहे। शायद यह हकीकत भी हो। पर सारे छल प्रपंच किसी के साथ सिर्फ सोने को लेकर हो अजीब लगते हैं। फिल्मकार यही कहना चाहता था कि संबंध बदल रहे हैं क्योंकि शहर बदल रहा है। और बदलते शहर में सपने पूरे करने का एकमात्र ज़रिया सेक्स संबंध और उसके छलावे हैं। पर इस एक बात को कहने के लिए इतने सारे किरदार क्यों चुने गए? यह बात समझ नहीं आई।

हर कोई किसी नए को ढूंढ रहा है। जिन्हें नहीं मिली है या नहीं मिला है वो भी ढूंढ रहे हैं। संबंध बनाने या उसकी नाकामी से निकलने की छटपटाहट कम लगती है । सोने की जल्दी ज्यादा। और ढेरों बदलती करवटों के बीच तीन झुरमुट बाल वालों का गाना। महानगर के ये सूत्रधार कुछ गा देते हैं। जिंदगी के अतर्विरोध को सामने रख देते हैं। मगर कोई उनके गाने से सबक नहीं सीख रहा है। सुन भी नहीं रहा है। सब एक दूसरे को पकड़ रहे हैं किसी अनजान कोठरी में ले जाकर सेक्स पूर्ति के लिए। सेक्स से प्रमोशन है। वेतन है। और पूरा शहर। फिर इरफान की शानदार एक्टिंग। इरफान इस फिल्म की जान हैं। वो भागते संबंधों को रोकने की कोशिश करते हैं और अंत में खुद घोड़ी दौड़ा कर भाग निकलते हैं । उस लड़की के पीछे जो उन्हें आखिरी वक्त पर बेहतर जीवन साथी नज़र आती है। फिर वो भी भागती है जो अब तक राजी खुशी अपने बॉस के साथ सोती है।

के के मेनन बॉस के रूप में किसी हकीकत को बयां ही कर रहे होंगे जो आजकल के दफ्तरों में होने की अफवाहों पर आधारित है। कुछ प्रतिशत को शत प्रतिशत के रूप में दिखाया गया है। जब वो अपनी पत्नी के सामने स्वीकार करते हैं तो चेहरे का भावहीन बयान बेहतर लगता है। अफसोस न सबक। कह देते हैं कि दो साल से एक लड़की है ज़िंदगी में। जबकि हकीकत में वो लड़की सिर्फ बिस्तर में ही होती है। मेनन कई बार उस लड़की से कहते हैं कि नो इमोशन। सिर्फ सेक्सेशन। वो जिंदगी में कहां होती है। मगर मेनन कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे। शिल्पा भी कह देती हैं कि छह महीने से उनकी ज़िंदगी में एक लड़का है। मगर के के मेनन को लगता है कि लड़का शिल्पा की ज़िंदगी में नहीं उनके बेडरूम में है। और वो शिल्पा को छोड़ देते हैं।

इन सबके बीच दो बूढे लोग प्रेम पात्र के ज़रिये एक रूपक बनते हैं। कि नए नए संबंधों के पीछे मत भागो। फायदा नहीं है। पछताओगे। मगर देर हो जाती है।

मेट्रो की कहानी सेक्सट्रो लगती है। जिसमें सिर्फ सेक्स की तलाश है। उसका फायदा है। नुकसान नहीं। फ्लैट वाले को भी नहीं। उसे भी अफसोस नहीं कि जिसे वो चाहता है वह लड़की उसके खुशी खुशी अपने बॉस के साथ सोती है। वो उसे अपना लेता है। अच्छा लड़का है।

फिल्म में सब कुछ सामान्य है। हो सकता है मेट्रो शहरों में भी यह सामान्य हो गया हो। होगा तभी दिखाया होगा। इरफान न आते तो न जाने फिल्म कैसी लगती । कोंकना सेन ने शानदार अभिनय किया है। मेट्रो देख आइये। संबंधों का पोस्ट मार्डन आपरेशन किया गया है। हद है अभी तक दक्षिणपंथी ताकतों ने क्यों नहीं देखी। या समझ में नहीं आई। मां बेटी और बाप..सब के सब। बाप रे बाप। देख आइये मेट्रो अच्छी फिल्म है भाई।