बोलती बंद कर देती है बोल।

मारना जुर्म है तो पैदा करना जुर्म क्यों नहीं है? बोल फिल्म का यह सवाल उठता तो एक मुल्क़,मज़हब विशेष में मगर हो जाता है कई मुल्क़ों,मज़हबों का। जिन्होंने शोएब मंसूर की खुदा के लिए देखी होगी वो इस फिल्म के ज़रिये निर्देशक के मन में चल रही कहानियों और बेचैनियों को महसूस कर सकते हैं। बोल में कथाओं का इतना संगम और टकराव है कि आप एक साथ कई तरह के समय और सवालों में उलझते चले जाते हैं। टेक्नॉलजी और एडिटिंग के दम पर यह फिल्म फिल्म नहीं बनती बल्कि अपनी कथाओं के सहारे फिल्म बनती चली जाती है। लाहौर की सड़कें,छतें और गलियों से निकलती कहानियां हिन्दुस्तान के सिनेमाघर में देखते हुए अपने शहरों की लगने लगती है। यह फिल्म एक हिन्दुस्तानी को जो पाकिस्तान कभी नहीं गया, उसके समाज से परिचय कराती है। वर्ना मीडिया से जो पाकिस्तान हमें विरासत में मिला है उसमें सिर्फ हुक्मरानों,फौजियों,आतंकवादियों,क्रिकेटरों,गायकों की तस्वीरें हैं। घर और समाज नहीं है। बोल पाकिस्तान को लेकर हमारी चुप्पी को भी तोड़ देती है। यह फिल्म सहजता से ऐसे मुश्किल सवालों को अपने मुल्क के सामाजिक परिवेश में उठा देती है जिसकी आवाज़ हमें किसी और चैनल से इस तरफ नहीं सुनाई पड़ती। सच कहूं तो पहली बार किसी फिल्म को देखकर लगा कि इधर के हों या उधर के,मसले दोनों के एक हैं।

कहानी में हिन्दुस्तान का बंटवारा है तो दिल्ली से आया हकीम साहब का ख़ानदान। आधुनिक डाक्टरी के दौर में हकीम का पेशा छूटता जा रहा है और परिवार की आबादी बढ़ती जा रही है। जल्दी ही यह फिल्म इस्लामिक समाज में औरतों के बग़ावत की बुनियाद डालने का काम करने लगती है। पितृसत्तात्मक समाज के वालिद बने हकीम साहब सुन्नत के ठेकेदार के रूप में बेबस नज़र आते हैं। उनकी हवेली और उनमें हर साल पैदा होने वाली लड़कियां। लड़कियों का बढ़ना और एक भाई के रूप में सैफ़ी का घर आना। कहानी अपने ग्रैड नैरेटिव को छोड़ कर एक ट्रांस जेंडर बच्चे की परवरिश और उसके प्रति बहनों और बाप के नज़रिये से टकराने लगती है। सैफी का प्रसंग बहुत रूलाता है। ज़ार-ज़ार कर देता है। लगता है छाती पीट पीट कर दहाड़ने लगे। निर्देशक अपना धीरज नहीं खोता। कोई फास्ट कट नहीं है। सैफी अपनी रफ्तार से बड़ा होता है। ज़ैनब के सहारे दुनिया को देखने की कोशिश में उन हरकतों का शिकार होता है जिसके शिकार हमारे घरों में बच्चे रिश्तेदारों के हाथ होते रहे हैं। हिजड़ों की नज़र से बचाकर बहनों का उसे मर्द बनाना और मर्द न होने पर अपने बाप हकीम साहब से बचाना कहानी का ऐसा मोड़ है तो कलेजा फाड़ देता है। सैफी के साथ बलात्कार और फिर बाप के हाथों उसकी मौत। बलात्कार के बाद घर लौटना और उसकी मां का अपने बच्चे को गोद में लेकर रोना, निर्देशक मंसूर अपने दिलेर कैमरे से देखनेवालों की आंखों में आंखें मिलाकर पूछने लगता है। सैफ़ी को उसका बाप मार देता है और कहानी अपनी ग्रैंड नैरेटिव पर लौट आती है। बल्कि कहानियां ऐसी बुनी गईं कि कोई भी कहानी कभी भी किसी को नहीं छोड़ती। सब उलझती-सुलझती चलती हैं।

हकीम साहब की बेटियां बड़ी हो रही हैं। बेटियां मां के प्रति हमदर्द होने लगती हैं। उनमें साहस पैदा हो रहा है ज़ैनब के ज़रिये। दुनिया को औरतों की नज़र से देखने और बनाने का। हकीम साहब अहले सुन्नत के दरवाज़े पर खड़े वो पहरेदार हैं जिनकी दाढ़ी उस वक्त खिजाब से रंग जाती है जब वो हत्या के जुर्म से बचने के लिए कंजर समुदाय के हाथों बिक जाते हैं। मस्जिक की रकम चुकाने के लिए कंजर जाति की मीना से निकाह करते हैं। साथ ही साथ अपनी बेटी को पड़ोसी दोस्त के बेटे के हाथ देने से मना कर देते हैं क्योंकि वो शिया हैं। कहानी मज़हब का इम्तहान लेती है। बेटियां दुनियादारी के सवालों से मज़हबी ढकोसलनेपन को चुनौती देने लगती हैं। हकीम साहब बेटियां पैदा करने की मशीन बने मीना के साथ रात गुज़ारने लगते हैं। अहले सुन्नत की चौकीदारी छोड़ कंजरों के बच्चों को कुरान पढ़ाने लगते हैं। मगर उनके लिए अपना घर और बेटियां वो आखिरी मोर्चा हैं जिसकी सरहद पर खड़े होकर वो अपने पितृसत्तात्मक अहं की हिफ़ाज़त करने में जुटे रह जाते हैं। तब तक जब एक रात मीना अपनी बेटी उनकी चौखट पर नहीं छो़ड़ जाती है। घर में कोहराम मचता है और हकीम के भीतर का मज़हबी मर्द फिर वहशी होता है और वो एक तवायफ़ बीबी से पैदा हुई बेटी का गला घोंटने लगते हैं। ज़ैनब इस बार अपनी बेबसी तोड़ देती है और बाप को मार देती है। बेटियां यहां अपनी ज़ात के सवालों को नहीं छोड़तीं। वो बाप के क़त्ल के बीच मीना की उस बेटी को भी बचा लेती हैं जिसके होने की बात सामने आने पर हकीम साहब के मौत का संदर्भ बनता है। फिल्म बहुत मज़बूती से औरतों के हक़ और सवालों पर टिकी रहती है।

यह एक ह्रदयविदारक प्रसंग है। फिल्म कई बार क्लाईमैक्स पर चढ़ती है और उतरती है। तभी तो हकीम साहब का क्रिकेट प्रेम भी सामने आता है और बेटियों के तेंदुलकर प्रेम और भारत की हार से गुस्सा होकर रेडियो भी तोड़ देते हैं। फिल्म शुरू होती है जेल के दृश्य से। ज़ैनब अपनी बहनों के बुर्के को उखाड़ फेंकती है। कहती है अभी से फेंको इनको। फिर मां और बहनों से घिर कर रोने लगती है। फांसी के तख्ते तक ले जाए जाने से पहले का यह दृश्य साफ कर देता है कि इस फिल्म की दुनिया में औरतों ने एक दूसरे को नहीं छोड़ा है। ये औरतें सतायी हुई वो जमात है जो अपने घर में,अपने बाप से लड़ने का साहस हासिल करती हुईं मज़हबी दकियानूसी ख़्यालातों से लोहा लेती हैं। जवान और अनपढ़ लड़कियां अपनी दुनिया रचने की छोटी-छोटी कोशिशें करती रहती हैं। शुरू से लेकर अंत के पहले तक यह फिल्म हकीकत के सौ फीसदी करीब है। आखिरी पांच मिनट में सिनेमाई क्लपनालोक की तरह कामायाबी का मंज़र बनाना इसकी मजबूरी बन जाती है। बल्कि मंसूर बहुत सलीके से हर दर्दनाक हकीकत के क्लाईमैक्स पर पहुंचते ही कहानी में हल्के प्रसंग ले आते हैं ताकि आप एक साथ इस्लाम, समाज और मुल्क के कई सवालों से टकराते रहे हैं और भावुक होकर ज़िंदगी और मज़हब की जंग को देखते रहे। तभी यह फिल्म सिर्फ पाकिस्तान की नहीं रह जाती। हिन्दुस्तान की भी हो जाती है। हमारे समाजों में ग़रीबी और आबादी एक मज़हब का मसला नहीं है। सभी का है। यह फिल्म एक दिलेर फिल्म है बल्कि इतनी दिलेर की बोलती बंद कर देती है। देखने के लिए टिकट का पैसा नहीं बल्कि मज़बूत कलेजा चाहिए।

25 comments:

रवि कुमार, रावतभाटा said...

हमारे समाजों में ग़रीबी और आबादी एक मज़हब का मसला नहीं है...
एक बेहतर समीक्षा...

RAJESH KUMAR said...

SARHADON KE SEEMANKAN AUR NAMANKAN SE SAMAJ KA HAQIQAT THODE HI BADAL JATA.SAMAJ CHAHE HINDUSTAN KA HO YA PAKISTAN KA.
AAPKE SAMIKSHA SE TO AISA HI LAGATA HAI KI BOLTI BAND KAR degi BOL.

संतोष कुमार said...

यह फिल्म एक दिलेर फिल्म है बल्कि इतनी दिलेर की बोलती बंद कर देती है। देखने के लिए टिकट का पैसा नहीं बल्कि मज़बूत कलेजा चाहिए। बिलकुल सही कहा आपने रवीश जी....

प्रवीण पाण्डेय said...

अब तो देखनी पड़ेगी यह फिल्म।

जयंत श्रीवास्तव said...

फिल्म देखने की तीव्र इच्छा पैदा कर दी आपकी समीक्षा ने...बेशक आपकी शैली का जवाब नहीं ....साधुवाद ...!

प्रज्ञा पांडेय said...

kal hi film dekhi .film kayi jwalant muddon ko ubhaarane men poori tarah se qaamyaab hai .. betiyan janane ke liye purush hi jimmedaar hai .. yah bhi aur aur bhi bahut kuchh

डॉ. मोनिका शर्मा said...

आपकी उम्दा समीक्षा पढ़ी...
फिर फिल्म देखी और अब कमेन्ट कर रही हूँ...... सच में यह फिल्म बोलती बंद कर देती है.....

Gyan Darpan said...

बढ़िया लगी फिल्म की समीक्षा

parmaal mehra said...

awashya dekhenge....

अशोक सलूजा said...

आप की फिल्म के बारे में, समीक्षा ने सब की बोलती बंद कर दी ...जरूर देखेंगें !
आभार !

Dr. Priyamvad said...

ek bahut hi umda samikshsa ke liye dhanyavad. lekin samasya ye hai ki abhi tak maine ye film dekhi nahi hai aur ab jab bhi is film ko dekhunga aapki samiksha se bahar aakar ise dekhna ek chunauti hogi.

जन सुनवाई @legalheal said...
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Riya Sharma said...

देखने के लिए टिकट का पैसा नहीं बल्कि मज़बूत कलेजा चाहिए।....correct ...

aapkee sameeksha hee theek hai ..saar to samajh aa gaya...film dekhna to itna asssan nahee lagta ....at least not for me :) shukriya share karne ka .

Anupam Singh said...

"BOL" ne aapko itna kuchh bolne ko majboor kiya hai!!
Yahi kaafi hai is movie ki tareef mein.. Zaroor dekhunga.

Dr.Vimala said...

कोमल वर्ग के प्रति इतनी संवेदना वाला व्यक्ति ही कह सकता है बोल के बारे में इस गहराई से ...साहस जुटा कर देखेंगे ज़रूर !

Amrita Tanmay said...

उत्कृष्ट समीक्षा |

ghughutibasuti said...

विषय ऐसा है कि अवसर मिलने पर देखूँगी.समीक्षा के लिए आभार.
घुघूती बासूती

Anonymous said...
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Anonymous said...

It was like riding a roller coaster.

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

फिल्म तो नहीं देखी है, पर समीक्षा पढकर ऐसा लगा कि फिल्म देखकर बाहर आ रहा हूं।

saurabh bhatt said...

kya rasdaar shaili mein aapane film ka maujoo aur itani saari baaten kaeh di..shukriyaa

abhi said...

सही समीक्षा है...मैंने भी देखी है फिल्म और सच में गज़ब की फिल्म है!!

कुमार राधारमण said...

अफसोस कि अपने देश में फिल्मों का वह दौर अब समाप्त हो गया है जिसमें औरतें अपनी ज़मीनी हक़ीक़त के साथ दिखती थीं। अब हमारी फिल्मों की औरतें उन असली मुद्दों से दूर हैं,जिनसे औरतों का रोज़ का साबका है।

Electrica said...

Truely said: "dekhne ke liye paisa nahi kaleja chahiye"

Abrar ahmad said...

मैंने अब तक यह फिल्म नहीं देखी। रवीश जी जिस शिद्दत से आपने फिल्म का रेखांकन किया है, पढकर फिल्म देखने की जरूरत महसूस नहीं हो रही। आपकी निगाहों से ही मैंने फिल्म देख ली। कमाल का लिखा है।