कस्बा qasba
कहने का मन करता है...
बंगाल में अदल-बदल
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ठीक है कि हम दंगों की आग में नहीं जले। लेकिन पेट की आग भी बड़ी चीज़ होती है। बंगाल के मुसलमानों की हालत ख़राब है। अपनी बात कहते हुए अलीमुद्द...
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अनशन पर अंटशंट
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क्या किसी को भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए अब कांग्रेस,बीजेपी या समाजवादी पार्टी में शामिल होना होगा? क्या संविधान से अपने लिए जीने का हक मांगन...
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राष्ट्रवाद का पल्प फिक्शन-क्रिकेट
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(दोस्तों, यह लेख भारत-पाक मैच के तत्वाधान में लिखा गया था। जो कि अमर उजाला के ज़िंदगी लाइव पेज पर प्रकाशित हुआ। दिन रविवार का था। साभार अमर ...
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एक कमज़ोर क्रिकेटप्रेमी की आत्मकथा।
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मैं एक कमज़ोर प्रधान इंसान हूं। घबराहट से ओत-प्रोत। अपनी इसी ख़ूबी और मैच फिक्सिंग से आहत होने के कारण क्रिकेट देखना छोड़ दिया। बचपना में टी...
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रैव्स रिया की प्रेम कथा वाया मोहाली
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मोहाली के मैच के दिन मेरे दिमाग़ में एक प्रेम कथा भुकभुकाने लगी। फेसबुक स्टेटस में वर्ण कैरेक्टर की सीमा में लिखी गई इस कथा को क्रमवार पढ़े।...
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लोकसभा टीवी का लोकरूप
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लोकसभा टीवी को देखना ऐसा लगता है जैसे अचानक शहरी भीड़-भाड़ से निकल कर किसी जैविक फार्म हाउस में आ गया हूं। जहां कुछ भी खाना स्वास्थ्यवर्धक ल...
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चलने का अधिकार
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क्या आपको नहीं लगता कि चलने का भी अधिकार होना चाहिए? क्या कभी हमने सोचा है कि ग़रीबी रेखा से नीचे के लोगों की गतिशीलता का माध्यम क्या होगा? ...
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लघु प्रेम कथा-लप्रेक (फेसबुक फिक्शन)
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फेसबुक के सीमित स्पेस और दिल्ली के असीमित स्पेस में प्रेम कथाओं का मतलब कई मोहल्लों से होकर गुज़रना है। हर दिन फैल जाने वाली दिल्ली में प्रे...
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ग़ज़ल-तहसीन मुनव्वर
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फिर वही भूली कहानी है क्या फिर मैरी आँख में पानी है क्या फिर मुझे उसने बुलाया क्यों है फिर कोई बात सुनानी है क्या ज़िन्दगी हो गयी सुनते सुनत...
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सोसायटी के सिटीजन
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दक्षिण पश्चिम दिल्ली में योजना स्वरूप पैदा किया गया एक नगर है द्वारका। उसी के साउथ दिल्ली हाउसिंग सोसायटी में इस आइसक्रीम कार्ट पर नज़र पड़ ...
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