कस्‍बा qasba

कहने का मन करता है...

नज़फगढ़ नेशनलिज्म !

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दौड़ेगा नज़फगढ़ बदलेगा नज़फगढ़ । आज के दैनिक भास्कर में इस विज्ञापन को देखा तो लगा कि दिल्ली महानगर के भीतर इलाकाई अस्मिता के बीज अंकुरित हो...
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बेवफ़ा इस्तीफ़ा

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प्रिय इस्तीफ़ा, तुम कहाँ हो प्यारे । लोग तुम्हें पुकार रहे हैं और तुम आ ही नहीं रहे हो । अनसुना कर दे रहे हो । आख़िर कब तक ऐसा होगा । कब तुम...
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यस वी कैन वाले ओबामा जी

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आदरणीय ओबामा जी, हिन्दी का पत्रकार अंतर्राष्ट्रीय नहीं हो सकता लेकिन मेरठ से सोनीपत के ब्रह्मांड की रपट लिखते लिखते थोड़ा ग्लोबल हो जाता है ...
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राम की गंगा

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पिछले साल जिम कार्बेट से ऊपर राम की गंगा गया था । शायद यह रिसार्ट का ही नाम है । एक तरफ़ घने पहाड़, उसके नीचे ये रिसार्ट, स्वींमिंग पुल, साम...
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नैतिकता के आगे कोई नहीं टिकता

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राजनीति कमज़ोर स्मृतियों का खूब लाभ उठाती है। इनदिनों अध्यादेश की राजनीति चरम पर है। ऐसा ही साल २००२ में था। सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश दिया क...
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भागा भागा फेंकू भागा

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दिल्ली में नरेंद्र मोदी की रैली के दूसरे दिन यानी आज कई अख़बारों के साथ ये ' पुलआउट' आया है । इसमें जा़री करने वाले का नाम कहीं भी न...
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कुर्ता

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बहुत दिनों बाद आज कुर्ता पहना । सफ़ेद । ऐसे तो बहुत हैं मगर पहने से पहले उन पर हाथ फेर कर वापस रख देता हूँ । सालों से तह किये कुर्ते अकड़ से...
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अलबर्ट पिंटो को ग़ुस्सा क्यों आता है

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आदरणीय राहुल गांधी जी, चूँकि पहले ख़त का जवाब नहीं आया इसलिए ये वाला थोड़ा छोटा लिख रहा हूँ । इसे फाड़ना मना है । क्योंकि ये अध्यादेश नहीं ख...
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वीर तुम बने रहो !

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आदरणीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी, विदित हो कि मैं इनदिनों बड़े लोगों को ख़त लिखता हूँ । आज आपको लिखने का ख़्याल आया । आप इस वक्त मीरका ( म...
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स्वर्ण युग का भस्मासुर

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राजनीति आपकी कमज़ोर स्मृतियों के सहारे ऐसे मिथक की रचना करती है जिसका कोई व्यावहारिक आधार नहीं होता है। हम हर पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी...
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