कस्बा qasba
कहने का मन करता है...
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पहला उपन्यास
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पहला उपन्यास
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आश्रम जाम का राष्ट्रवाद-7
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(दोस्तों,आश्राम जाम पर मेरा यह ब्लाग धारावाहिक अब रवानगी में लौट रहा है। आप पाठक ही बतायेंगे कि कहानी आगे बढ़ रही है या नहीं। मैं किसी छप चु...
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आश्रम जाम की सत्या कथा
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मास्कों पोस्टिंग के बाद जब वह दिल्ली आया तो इस शहर को देख कर बौरा गया। अपनापन ढूंढने की चाह में इस शहर की गंदी चीज़ भी उसे हीरे की तरह चमकती...
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आश्रम जाम का आध्यात्म- पांच
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आश्रम में फंसे हुए दो घंटे हो चुके थे। घर फोन कर पत्नी को बता दिया था कि आने में देर होगी। दफ्तर भी फोन कर चुका था। रेडियो जॉकी की बातें अब ...
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आश्रम जाम का रोमांस- मुलाक़ात रागदरबारी से
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सड़क के कोरिडोर बनने के इस नए दौर में आश्रम फ्लाईओवर से उतरते हुए बेचैनी बढ़ती जा रही थी। जाम के इस साझा सामूहिक दर्द को अब क्यारियों में बा...
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आश्रम जाम का एकांत- तीन
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घर पहुंचना नहीं चाहता था। दफ्तर रूकना नहीं चाहता था। वो कहीं और रूकना चाहता था। लेकिन दिल्ली के तमाम रास्ते रूके पड़े थे। देर से घर पहुंचने ...
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आश्रम जाम पर उपन्यास- पार्ट टू
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क़ातिल रफ्तार के लिए बदनाम ब्लू लाइन भी जाम में धंस गई थी।ड्राइवर अपनी भुजाओं को फैला अंगड़ाई लिये जा रहा था। सामने बोनट पर बैठी महिला पास आ...
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आश्रम जाम में रोमांस- पार्ट वन
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(अविनाश की ख्वाहिश पूरी करने का इरादा कर लिया है। ट्रैफिक जाम पर अपने अनुभवों को उपन्यास में बदलने की कोशिश कर रहा हूं। पहली कड़ी हाज़िर है।...
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आश्रम पर उपन्यास
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बाहर की दुनिया को धीरे धीरे सरकता हुआ देख कर अंदर एक शख्स ठहरा हुआ सा बैठा है पीठ टेढ़ी हो गई है गर्दन टेढी हो गई है कमर सिकुड़ गई है आंखें ...
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