बहुमत जनता पार्टी यानी बीजेपी ?

बीजेपी ने 272  का नारा देकर अपनी अकेले की दावेदारी पेश की है या सियासी हक़ीक़त के ख़िलाफ़  बड़ा दाँव चला है ? इस तरह के सवाल जब भी आते हैं कांग्रेस और बीजेपी दोनों अतीत के गड्ढे खोदने लगते हैं । मानो हर नया चुनाव पहले हो चुके चुनाव की तरह ही होता है । एक कहती है सपने देखेंगे तभी साकार भी करेंगे दूसरी कहती है पिछले पचीस सालों में आजतक हुआ नहीं कि किसी एक को साधारण बहुमत मिला हो । जब राज्यों में जनता किसी एक दल को साफ़ साफ़ वोट दे रही है तो वैसा ही रुझान दिल्ली को लेकर क्यों नहीं बन सकता । जानकार से लेकर राजनेता राजनीतिक हक़ीक़त की पुरानी व्यावहारिकताओं में फँसे हैं । कोई इस बात का ठोस जवाब नहीं देता कि अगर देश में कांग्रेस विरोधी लहर चल रही है तो क्या यह लहर कांग्रेस की सहयोगी दलों के ख़िलाफ़ नहीं होगी ? जो कांग्रेस को वोट नहीं देगा वो किसे देगा । वापस क्षेत्रीय दलों को ?


दूसरी सूरत यह हो सकती है कि कांग्रेस पार्टी के नेताओं के अलावा राजनीतिक जानकार भी यह कहें कि कांग्रेस के ख़िलाफ़ कोई लहर नहीं है । कर्नाटक और हिमाचल की मिसाल देकर । लेकिन अगर यह लहर कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के ख़िलाफ़ है तो यह सवाल होना चाहिए कि विरोधी लहर के लाभार्थी कौन हैं । इसका लाभ बीजेपी को या दूसरे क्षेत्रीय दलों में किसे मिल रहा है । यह चुनाव राष्ट्रीय धरातल पर होगा या क्षेत्रीय विविधताओं पर । आंकड़ें यही कहते हैं कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों दस साल में घटे हैं । लगता है बीजेपी यह सोच रही है कि वह अपनी जीतने की स्ट्राइक रेट बेहतर करेगी । जैसे उसने बिहार विधान सभा में किया था लेकिन उसमें नीतीश के वोट बैंक का भी हाथ ज़रूर रहा होगा । बीजेपी को लगता है कि मोदी के पक्ष में माहौल बन गया है जिसका सीधा परीक्षण चुनाव में ही होगा तो क्यों न टारगेट भी बड़ा कर दिया जाए । लेकिन हमें इस पर बात करनी चाहिए कि कांग्रेस का कौन सा सहयोगी या संभावित सहयोगी है जो मज़बूत हो रहा है । नीतीश लालू बीजेपी से घिरे हैं । यूपी में ज्यादातर सीटों के दावेदार मुला़यम मायावती हैं । अगर कांग्रेस विरोधी लहर है तो क्या जनता कांग्रेस की सहयोगियों को सजा नहीं देगी । लेकिन अन्ना आंदोलन के दौर में विधान सभा में यूपी की जनता ने कांग्रेस के राहुल गांधी को ठुकरा कर अखिलेश को जनादेश दिया था बीजेपी को नहीं । क्या वैसे ही मायावती को चालीस सीटें आ जायें और बाक़ी बची सीटों में बीजेपी बीस तक टच कर रह जाये । अगर यूपी का समीकरण नहीं बदला यानी मायावती या मुलायम मजबूत हुए तो बीजेपी फिर ट्विटर ही करती रह जाएगी । एक बात और । यूपीए वन और यूपीए टू यूपी के कारण नहीं बनी थी । मुलायम और मायावती समर्थन की चिट्ठी आप ही देते रहे हैं ।  ये बात और है कि आखिर में आकर सरकार यूपी पर ही टिकी हुई है । तो हम यही क्यों मान ले कि सरकार जब भी बनेगी यूपी से बनेगी । 

अब सवाल आता है कि कैसे मान लिया जाए कि कांग्रेस से पलट कर हवा बीजेपी की दिशा में बह रही है । क्या इसका जवाब पिछले चुनाव से मिल सकता है ? 2009 के चुनाव में कांग्रेस को 206 सीटें देने वाला मतदाता कौन था । क्या वो अपने चरित्र में राष्ट्रीय नहीं था । यूँ कहे कि क्या वो अपने चरित्र मे क्षेत्रीय दलों के ख़िलाफ़ नहीं था । अगर वो कांग्रेस को 206 सीेटें दे सकता है तो बीजेपी को क्यों नहीं । यह सवाल हो सकता है कि इस मतदाता ने दो बार बीजेपी को रिजेक्ट किया है तो इस बार क्यों स्वीकार करेगा । फिर यह देखना होगा कि कांग्रेस 206 से घट कर 130(सर्वेनुसार) पर आती है तो 76 सीटें किसके पास जा रही हैं । अगर ये सभी बीजेपी को पास गईं तो क्या उसकी संख्या 192 नहीं होती है । क्या पिछले चुनाव से राष्ट्रीय दल के मज़बूत होने की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है ?

ये सही है कि सारा हिसाब किताब काग़ज़ी है लेकिन उन्हीं आँकड़ों से है जिनसे बीजेपी को दिल्ली से दूर बताया जा रहा है 2009 में  कांग्रेस को वोट करने वाले मतदाताओं ने क्या यह संदेश देने का प्रयास नहीं किया था कि गठबंधन का वजूद रहेगा मगर उसका प्रभाव कम होगा । तो क्या आपने देखा नहीं कि यूपीए टू में कांग्रेस ने कैसे सहयोगियों को उनकी सीमा में रखा । क्या यूपीए वन की तरह लेफ़्ट की तरह किसी ने ऐसी बग़ावत की जिससे सरकार को विश्वास मत का सामना करना पड़े । डीएमके गई तो गई लेकिन सरकार तो टिकी रही । पांच साल के पार्ट टू सरकार में किस घटक दल ने अपनी पहचान बनाई है । 

फिर किस तर्क से इस बार क्षेत्रीय दल दिल्ली के लिए मज़बूत होंगे । यह सही है कि राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने खुद को बदला है । इनका चरित्र नब्बे के दशक वाले क्षेत्रीय दलों की तरह नहीं है । ये अब परिपक्व रूप से सत्ताधारी दल है । अगर राज्यों में बीजेपी कांग्रेस की सरकारें लौटती हैं तो मुलायम मायावती, नीतीश,नवीन, जयललिता और करुणानिधि की भी लौटती हैं । राज्यों में  इनका आधार राष्ट्रीय दलों जैसा हो गया है । बसपा सपा जदयू सबने अपने अपने पारंपरिक वोट के बाहर के वोट का जुगाड़ किया है । ये क्षेत्रीय दल सिर्फ पिछड़ी या दलित जातियों के दल नहीं रहे । लेकिन इनके आधार में आ रहे बदलाव के इसी दौर में ही दिल्ली में इनका दंगल कम हुआ है । 

शायद नरेंद्र मोदी को इस प्रक्रिया को तेज़ करना चाहते हैं । तभी वे आगामी चुनावों में 272 प्लस के नारे के साथ निकलना चाहते हैं । आडवाणी के एनडीए प्लस के नारे के साथ नहीं । इस चक्कर में वे नीतीश के पसमांदा मुसलमानों की रणनीति चुरा रहे हैं तो अखिलेश यादव का नारा भी कि मत नहीं बहुमत दीजिए । राजनीति में ये सब चलता है । ये पोलिटिक्स का गूगल दौर है । सब कट पेस्ट कर रहे हैं । यस वी कैन । वो इसलिए कि अब चोरी करने के लिए किसी के मोहल्ले में नहीं जाना पड़ता । गूगल से ही ओबामा आ जाते हैं और गूगल से ही नीतीश । 

फिर भी यह दुस्साहस ही है कि बीजेपी ने बीजेपी वन 272 प्लस का नारा अपने कार्यकर्ताओं को दिया है । इसके लिए चैंपियन गाइड की तरह बीजेपी चालीसा बनाई गई है । मगर है बेकार और अंतर्विरोधों से भरा हुआ । आप उसमें यह बता रहे हैं कि ट्विटर पर मोदी को 21 लाख फौलो करते हैं और बीजेपी को एक लाख ! 272 सीट जीतने का दावा करने वाली किसी पार्टी को ट्विटर पर सिर्फ एक लाख ही फौलो करते हैं । इसका मतलब यह तो नहीं कि बीजेपी में उसे भी विश्वास नहीं जो मोदी को फौलो करता है । अब या तो मोदी राष्ट्रीय हो गए हैं और बीजेपी नहीं या ऐसा भी होगा कि लोग मोदी को फौलो करते हैं लेकिन उनके नाम पर वोट लेने वाले बीजेपी में उम्मीदवार नहीं हैं । मुझे लगता है कि बीजेपी को अपना ट्विटर अकाउंट बंद कर मोदी के खाते में विलय कर लेना चाहिए । 21 लाख के सामने एक लाख ठीक नहीं लगता !

आख़िर बीजेपी किस दलील से ट्विटर ट्विटर कर रही है । जबकि उसी 'बीजेपी वन' गुटका में लिखा है कि 2009 में आठ करोड़ मत मिले थे । इसमें ट्विटर के 22 लाख जोड़ देंगे तो बीजेपी को एक सीट का भी लाभ नहीं मिलता है । क्या पार्टी यह कह रही है कि जब ट्विटर के 22 लाख नहीं थे तो आठ करोड़ वोट मिले और अब जब ट्विटर वाले आ गए हैं तो कांग्रेस को मिले ग्यारह करोड़ वोट से आगे निकल जायेंगे ! अमिताभ बच्चन को साठ लाख फोलो करते हैं उनकी एक भी फ़िल्म सौ करोड़ के क्लब में नहीं है । दो ही बातें हो सकती हैं । बीजेपी अकेले बहुमत ला रही है या चुनाव के बाद मोदी चुनाव प्रचार समिति के चेयरमैन पद से इस्तीफ़ा देकर गठबंधन खोजीं दस्ता के चेयरमैन बन जायेंगे । 

मोदी जी फ़ेसबुक ट्विटर के भरोसे आप भरमा सकते हैं भारत नहीं पा सकते । इस ट्विटर जगत से एक अन्ना और अरविंद आंदोलन तो टिक कर चला नहीं और आप हैं कि इन पर जान लुटा रहे हैं । इस हकीकत को अरविंद केजरीवाल ने वक्त रहते जान लिया । अब वो मिस्ड काल का नारा नहीं देते बल्कि सुबह शाम झाड़ू लेकर सड़कों पर निकलने लगे हैं । सड़क की राजनीति करते हैं । जिन्हें टीवी और ट्विटर तो नहीं देख रहा होगा मगर  पब्लिक देख ही रही होगा । मैदान आज भी वही है । 




22 comments:

  1. ravish ji , bahut khub, jitni gahri pakad apki politics me hai, usi tarah apse indian economy ka jo crisis chal raha hai, us par bhi kooch aisa hi likhne ki apeksha ki jati hai jaisa politics ke issues par aap likhte hai , to sir ji dil khush ho jayega,

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  2. "अमिताभ बच्चन को साठ लाख फोलो करते हैं उनकी एक भी फ़िल्म सौ करोड़ के क्लब में नहीं है । " हाहा। वैसे ये बात सही है। अच्छा ऑब्जर किया आपने। लेख में प्रश्न ही प्रश्न हैं, जिनका उत्तर २०१४ ( या '१३ ? ) में ही मिल पायेगा। पर भाजपा के ट्विटर -प्रेम (या कहें दीवानगी ), का चुनाव पर क्या असर रहेगा, यह देखना रोचक रहेगा। मुझे राजनीतिक जोड़-घटाव की ज्यादा समझ नहीं, पर लगता है भाजपा समर्थकों के एक बड़े गुट का आईटी सेल पर इतना भरोसा, कहीं मंहगा न पड़े। क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभावों को भी कमतर कर देखना, कितना उचित है पता नहीं। सरकार की ऐसी खस्ता हालत होने पर भी, मुख्य विपक्षी दल ये कहने की स्तिथि में नहीं, की कांग्रेस का घाटा , भाजपा का फ़ायदा है।

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  3. jo partiyan ek-ek saal ke liye sarkar mein saamil ho jati hain vo kya 5 saal satta se door reh payengi. yadi BJP single-largest party bankar ubhregi to ayese kai dal hain (AIADMK,TDP, BJD,TMC,RLD aur saayad JDU bhi) jo julus mein saamil ho jayenge.

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  4. २०१३ के विधानसभा चुनाव के बाद समीकरण पूरी तरह से चेंज होंगे, आगे -२ देखीये होता है किया...

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  5. bahoot ulajhan hai aur desh ka bhabisya kaiya hoga.lagta hai desh rasatal ki aur n chala jaiye.

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  6. Mai rajneeti me bhut ruchi rakta hu aur rajneeti sirf rajneeti krne ke liye hi nahi apitu aap ke kataksh ko shahnawaj hussain sarikhe jabab dene ke liye bi bani hai,jitna mehnat ispar krte hai utna aj ke show par kiya hota to jarur accha hoga.
    Mere vichar jarur padhe
    @ aaapkablog.blogspot.com

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  7. sahi likha hia sir aapne, accha laga padh ke aur aapka prime time dekh ke..... shayad enko abhi ek aur party se samna karna pade aur es party ka naam hoga 'AAP"

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  8. आज से कई शताब्दी पूर्व इसीलिए सुकरात और अरस्तू ने "कॉमन गुड " तथा दार्शनिक सदस्यों को ही राजनीति में योग्य मानने का सुझाव दिया था । आज कभी भी दूध शराब से अधिक लोकप्रिय नहीं हो सकता । १००० करोड़ क्लब के बाद भी शाहरुख़ अमिताभ से तुल्य नहीं है
    sanjay Mishra

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  9. AAJ JO BHI HAAL HAI HUMARE ECONOMY POORNESS AND DEREGULATION KA ESKE LIYE TO BJP AND CONGRESS HI RESPONSIBLE HAI...SIR AAJ KE HALAT KO DEKH KE RONA AA JAATA HAI SAB JAGAH ANDHKAR CHHAYA HUA HIA KAHI SE ROSHNI KI KOI KIRAN NHI DIKHTI, YE POLITICIAN LOG TO AAM AADMI KI KYA AB TO MEDIA KI AAWAZ BHI ANSUNA KARNE LAGE HAI...PATA NHI KAHA JJA RAHA HAI HUMARA DESH....BAHUT DUKHI HU ES AARAJAKTA KO DEKH KE? KRIPYA KUCCH KARE DESH KE LIYE..AB TO BAS AAP JAISE HI NISPAKSH LOGO SE UMMED BACHI HAI...?

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  10. lajawab write up. abhi 2014 door hai, pata nahi pyaaj ka ya naye kargil ka chatkar ho gaya. ye public hai survey mein kuch aur, voting booth mein kuch aur karti hai.

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  11. UPA ko to jana hee hoga aur NDA ko aana hee hoga. UPA-3 hua to service jayegee aur sabje bhaji ke dukan kholnee padagee.

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  12. Namaskar Ravish Sir,watched August 19 Prime-time show. sir, I marked Dubeji speaking of some survey done by them which indicates today youth is equally inclined towards Congress and BJP, is totaly a BIASED statement. We ppl see it in everyday life, "in offices while sharing our launch" "in trains while as unknown passengers", "while at tea in a group of known and unknown faces", everywhere i can see youth talking against the corruption, law lawlessness, Dollar etc and debating the credentials of BJP(precisely MODI) while disqualifying the leadership quality and governance of many NETAS of the ruling party.
    YES this may be true that this youth which I am talking of may not turn to vote But They don't have the same inclination.
    sir i would request you to either be active on twitter or participate here by giving your valued responses so that we can reach u easily.
    Thank you!

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  13. एक आदमी जिसका मेनेजमेंट अच्छा है उनको एक बार मौका जरुर मिलना चाहिए

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  14. हम क्या जाने राजनीति की घातें और प्रतिघातें।

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  15. टीवी पे आपको देखने से ज्यादा बेहतर आपको पढ़ना लगता है. बिलकुल हम लोग की तरह बस अंतर इतना की आप उन भाव को शब्दों में पिरो देते है. ट्विटर पे आपसे कभी-कभी गुफ्तगू हो जाती थी। प्रधान मंत्री जी के नाम ख़त अचछा लगा, बी ए पास लेख भी ठीक था . लिखते रहिये ....इसका कोई दायरा नहीं ..न ही सीमाए है. बस ये सोंधी सी महक मत जाने दिजियेग.

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  16. lekin hume ek baar modi ko mauka deke dekhna chaiye. gujarat ke development ka bahut naam suna hai, agar thoda sa bhi chamatkaar desh ke liye kar de toh apni haalat kuch toh sudhergi. abhi ka haal dekhiye economy worst hai. corruption itna jyada hai, roj ek naya aur bada ghotala saamne aa raha hai.ab toh man aajij ho gaya hai is congress se.

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  17. kyon nahi indian goverment cheen ki neeti apnaye jaise ek byke par do aadmi kam ho tab se aur ek car me 4 aadmi se kam ho to chalaan kia jay jis se petrol ka import kam karne me thodi madad mil sake aur economy me kuch to sudhaar aaye

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  18. kyon nahi indian goverment cheen ki neeti apnaye jaise ek byke par do aadmi kam ho tab se aur ek car me 4 aadmi se kam ho to chalaan kia jay jis se petrol ka import kam karne me thodi madad mil sake aur economy me kuch to sudhaar aaye

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  19. Leadership is all about looking beyond the horizon and not wasting time on past.The elections are a result of multifactor and a good leader is able to strike a chord with the public of all caste and creed at strategic points.The election results will prove whether Narendra Modi was able to do so or not;everything else is conjectures by his opponents and followers.
    The extrapolations of past results are never correct,this has been proven time and again.
    Vikram Singh Saigal

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