निर्देशों का शहर




दिल्ली के सरायकाले खां से जब आप आश्रम की तरफ जा रहे होते हैं तो डीएनडी आने से पहले बाईं तरफ़ ये होर्डिंग मिलेगी। बहुत दिनों से दिख रही थी। इसे देखकर मैं परेशान हो रहा था। इस तरह के निर्देश कैसे हो सकते हैं। पता चला कि वहां कोई मंदिर है जो कुछ बीमारियों को दूर करने का दावा करता है। लगता है कि यह बोर्ड अधूरा है। फिर भी अगर यह न मालूम हो कि यहां कोई औघड़ बाबा बैठे हैं तो अजीब लगता है। नींद में पेशाब करना। मत करना।

12 comments:

  1. बहुत बढ़िया!

    सब चीजों का जाल फैलता जा रहा है और साथ साथ बिमारियों का जाल भी...बच्चों में नींद में पिशाब करना सनातन सत्य की तरह सदा रहा है...जब जनता कम थी तब किसी भी शहर में सब एक दूसरे को जानते थे...पान की दुकान वाला सूचना केंद्र का काम करता था - लोग सीधे वहां जाते थे और पान के साथ साथ आवश्यक जानकारी भी हासिल (प्राप्त) कर लेते थे...अब दांया हाथ भी बांये हाथ पर शक करता है अज्ञानता वश...इस कारण थोड़े से शब्द में बाबा लोग भी आधुनिक उपाय अपनाते प्रतीत होते हैं...कृष्ण भी गीता में कह गए की आपको जो चाहिए में किसी न किसी के माध्यम से उपलब्ध कराऊंगा क्यूंकि सब के भीतर मैं ही विराजमान हूँ - किन्तु आप मुझ तक नहीं पहुँच पाओगे जब तक आप मुझ में आत्मसमर्पण न करें :)

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  2. बढिया सौट पकडा आपने कैमरे में ! हा-हा-हा ... मैं भी उस राह से गुजरते इसे देखता हूँ कभी वहा पर कील मुहासों के निदान का भे बोर्ड लगा होता है !

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  3. कोई बाबा... खानदानी वैध होगा टायर के पिछे..

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  4. हम तो निर्देशों के मारे परेशान हैं। अदालत में निर्देश टंगा है कि किसी कर्मचारी को काम के लिए पैसा-रुपया न दें, कोई मांगे तो अदालत को शिकायत करें। ठीक निर्देश के नीचे बैठा रीडर दिन चुपचाप लोगों से पैसे ले कर मनचाही पेशियाँ देता रहता है।

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  5. पता रवीशजी हमारे प्यारे हिंदुस्तान में दो चीजें कभी खत्म नहीं हो सकतीं एक - निर्देश और दूसरा - जांच।

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  6. सच आपकी नजरों की दाद देनी पडेगी।

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  7. इस तरह के ढोंगी डॉक्टर बाबा दिल्ली जैसे शहरों में भी मिलते हैं.
    यही तो देश का दुर्भाग्य है.
    अच्छा पकडा है.

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  8. डॉक्टर दराल जैसे महा पुरुष से ब्लॉग के माध्यम से मिल कर ख़ुशी हुई! उनकी टिपण्णी पढ़ मुझे उनसे, यदि वो बुरा न माने तो, यह पूछने का दिल किया कि Jesus Christ कौनसे कॉलेज से मेडीसिन में डिग्री प्राप्त किये थे? और यदि नहीं तो वो भी 'ढोंगी बाबा' जैसे ही हुवे न? फिर वो कैसे अंधे और कोडियों को केवल चूने मात्र से रोगमुक्त कर दिए?...ऐसे कई उदाहरण प्राचीन भारत में भी आम तौर पर दर्शाए जाते हैं, जिनका आज के युग में कोई वैज्ञानिक साक्ष अभी नहीं मिल पाया है. और हम सब जानते हैं कि विज्ञान को अभी कई वर्ष लगेंगे अपनी चरम सीमा पर पहुँचने में...और दूसरी ओर टीवी चैनल २४ x ७ २०१२ का जाप कर रहे हैं...

    आम आदमी जानता है कि जब 'दिल्ली' आने वाली होती है तो रेल के सारे यात्री बिस्तर बांधना शुरू कर देते हैं और 'दिल्ली' में उन्हें क्या करना है उसकी सोचने लगते हैं, न कि उन्होंने 'मुंबई' में क्या किया - मेरे ढाई साल का धोता भी "उल्टा/ सीधा" कह अपने ब्लाक फ़ेंक देता है, 'खेल ख़तम, पैसा हजम' कहावत जैसे :)

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  9. भैया..एक बात बताईये....आप अपने गाड़ी से उतर कर इन तश्वीरों को उतारते (खींचते) हैं क्या???

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  10. भैया..एक बात बताईये....आप अपने गाड़ी से उतर कर इन तश्वीरों को उतारते (खींचते) हैं क्या???

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  11. यही मैं भी कहता हूँ कि आज किसी के पास समय, यानि 'टाइम', नहीं है पढने के लिए. नहीं तो ऐसा, मिश्र जी जैसा, प्रश्न कोई नहीं करता क्यूंकि रवीशजी पहले भी कहीं लिख चुके हैं कि वो कैसे अपने टेलीफोन के कैमरे से तस्वीर उतारना अधिक सरल पाते हैं :0

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