पत्रकारिता का स्वर्ग काल

मोबाइल की घंटी बज रही थी। लेकिन नंबर फ्लैश नहीं हो रहा था। उधेड़बुन के बाद हरा बटन दबा ही दिया। काल ले लिया। मैं द्रौपदी बोल रही हूं। द्रौपदी। रवीश कुमार जी बोल रहे हैं। हां हां बोल रहा हूं। आय एम वाइफ ऑफ पांडवाज़। सेम द्रौपदी। डोंट जोक विद मी। तभी द्रौपदी ने कहा कि कोई मज़ाक नहीं। स्वर्ग में बीएसएनएल पहुंच गया है इसलिए फोन कर पा रही हूं। तो बोलते रहिए न। मुझे क्यों याद किया। मेरे बोलते ही द्रौपदी नाराज़ हो गई। बोली कि तुम आउटडेटेड हो गए हो। कुछ पता ही नहीं। तुम्हें मालूम है कि एक टीवी चैनल मेरे सबसे बड़े पति के स्वर्ग पहुंचने के रास्ते पर पहुंच गया है। मुझे डर लग रहा है।

द्रौपदी को डर लग रहा है। पर क्यों मैम। टीवी चैनल तो कहीं भी पहुंच जाते हैं। वो बात नहीं है रवीश। तो क्या बात है? आप टीवी चैनल को गरियाना चाहती है तो सॉरी। हिंदी टीवी वाले एक तो नए ज़माने के साथ चल रहे हैं और आप उन्हें गरिया कर पुरातनपंथी बनाना चाहती है। मुझे नहीं सुननी।

प्लीज़। लिसन टू मी। टीवी का रिपोर्टर पहुंच गया। इसीलिए डर रही हूं। क्यों डर रही हैं? क्योंकि उसे युधिष्ठिर का कुत्ता मिल गया है। अब लोग तो यही जानते हैं कि धर्मराज कुत्ते और सभी भाईयों के साथ स्वर्ग चले गए। हां यही जानते हैं। उसके बाद लोगों ने उनके स्वर्ग जाने के रास्ते में इंटरेस्ट खो दिया। लोग बद्रीनाथ केदारनाथ तो गए मगर स्वर्ग की सीढ़ी तक नहीं गए। लेकिन द्रौपदी जी। हमने एक और सीढ़ी की बात सुनी थी कि रावण भी स्वर्ग तक जाने की कोई सीढ़ी बना रहा है मगर राम ने प्लान फेल कर दिया। रावण को शूट कर। तब से ये आइडिया ड्रॉप कर दिया गया था। लेकिन क्या है कि हिंदी टीवी के रिपोर्टर को कम मत समझिए। वैसे भी बेचारे परेशान से हैं। आज कल हर कोई हिंदी पत्रकारिता के नरक में जाने का एलान कर रहा है। मातमपुर्सी हो रही है। ऐसे में किसी ने पत्रकारिता को स्वर्ग की सीढ़ी तक पहुंचा दिया तो कुछ ग़लत नहीं। मेरे हिसाब से हौसला बढ़ाना चाहिए। और आप द्रौपदी जी डरने की बजाए उसे रास्ता बताने में मदद कीजिए। कम से कम उसने सीढ़ी तो खुद खोजी न। मुझे तो बड़ा गर्व हो रहा है कि हिंदी पत्रकारिता ने स्वर्ग खोज लिया। वो भी इसी कलयुग में। वो भी उस समय में जब उसके नरक में चले जाने की घोषणा कर दी गई हो।

द्रौपदी बोली- अरे भाई परेशानी तो उन कुत्तों को लेकर हैं। लोग यह जान जाएंगे कि धर्मराज उन्हें छोड़ गए। तब से हिंदुस्तान के सारे कुत्ते धर्मराज को खोज रहे हैं। इसीलिए वो घरों में नहीं रहते। गलियों में रात बिरात घूमते रहते हैं। और ये तीन कुत्ते यहीं इंतज़ार कर रहे हैं कि अगर धर्मराज सीढ़ी से नीचे उतरे तो यहीं काट खायेंगे। हां हा..मैंने भी टीवी पर देखा ये सीन। द्रौपदी यू आर राइट। ग्रेट यार। वैरी क्यूट डॉगीज़। टेल मी। स्वर्ग में क्या ख़बर है इस ख़बर पर। द्रौपदी कांपने लगी। अगर मुझे अधिकारिक रूप से कोट न करो तो बता सकती हूं। मैंने भी कहा ऑफ द रिकार्ड चलेगा। द्रौपदी ने कहा कि सारे अभी तक आराम कर रहे थे। मौज कर रहे थे। लेकिन जैसे ही स्वर्ग की सीढ़ी तक किसी रिपोर्टर के पहुंचने की खबर आई है हलचल है। लोगों को लग रहा है कि कहीं यहां भी स्टिंग न होने लगे। खुलासा हो जाएगा तो गड़बड़ हो जाएगी। ये बेचारे धरती पर यह तो बता कर आ गए कि मर गए हैं। ज़िंदगी खत्म हो गई है। मगर यहां तो भाई लोग रॉक कर रहे हैं। रवीश सुन रहे हो न। हां हां द्रौप.. बोल न। तो मैं कह रही थी कि धर्मराज तो अब मुझे भूल ही गए हैं। गांधी जी को भी देखा मैंने। उन्होंने तो यहां गोड्से को माफ ही कर दिया है। कहते हैं कि हिंसा तभी खत्म होगी जब हिंसा करने वाले को माफ किया जाए। अरे बाप रे। नेहरू अब खुलकर माउंटबेटन की लुगाई के साथ घूम रहे हैं। चारों तरफ अप्सरायें हैं। मर्द तो वहीं अड्डा जमाए बैठते हैं। तो द्रौप..ये खबर छाप दूं। नो नो...तुमने वादा किया है। ये सब ऑफ द रिकार्ड है।

ठीक है मैं नहीं छापूंगा। लेकिन क्या मैं स्वर्ग के सूत्रों के हवाले से यह खबर ब्रेक कर फोन इन कर सकता हूं। द्रौपदी बोली...कर सकते हो। लेकिन तुम मुझे एक डिश टीवी गिफ्ट कर दो। मुझे तुम्हारे चैनल्स देखने हैं। मैंने कहा कि दे दूंगा लेकिन एक वादा करना होगा। द्रौपदी ने तुरंत हां कर दी। बोली क्या वादा करना है। तुम सिर्फ हिंदी टीवी चैनल देखोगी। क्योंकि अंग्रेजी वाले बदमाश हैं। उनके रिपोर्टर ने तो स्वर्ग की सीढ़ी खोजी नहीं। न ही उसे अंग्रेज़ी में दिखाया। वो मान्यताओ में यकीन नहीं करते। हमारे काबिल ऋषि मुनियों को याद भी नहीं करते। इसकी खोज तो हिंदी वाले ने की है। रिपोर्टर के साथ दो कैमरामैन भी है। जो नरक की ज़िंदगी छोड़ स्वर्ग खोजने गए। उम्मीद है कि उनके वेतन खूब बढ़ गए होंगे कि वो धरती पर जब तक हैं तब तक स्वर्ग का मजा ले सकें। आखिर रूट टू हैवन खोजने का इतना इनाम तो मिला ही होगा।

वैसे द्रौपदी एक बात है। कार्यक्रम बेजोड़ था। मैं रेणुका चौधरी से कहने वाला हूं कि वहां पर्यटन का विकास करें। विज़ुअल आकर्षक थे। कम से कम एक अनजान जगह पर कैमरा पहुंचा तो। अब लोग लोग स्वर्ग की सीढ़ी भी देखने आएंगे। मुझे लगता है बाकी पत्रकारों को भी धरती पर नरक खोजने की बजाए स्वर्ग की खोज में लग जाना चाहिए। कब तक नरक की कहानियां बना बना कर दिखाते रहेंगे। दुनिया बदल गई है। मेरे जैसे लोग इस दुनिया में आउटडेटेड हो गए हैं। स्वर्ग के मेरे सूत्र बता रहे हैं कि वहां कई खबरें हैं। स्वर्ग की अप्सराएं बार बालाओं से लुभाने का नुस्खा सीख रही हैं। कई बार रात को वो मुंबई के धारावी में चुप चाप जाकर डांस देखती हैं। पुण्यात्माओं को बोरियत हो रही है इसलिए वो चोरी छुपे रेन डांस भी कर लेते हैं। हाय हाय। उनके नाती पोते यहां धरती पर देख लें तो शर्म से मर जाएं।

स्वर्ग की सीढ़ी कार्यक्रम की एडिटिंग देख लगा कि सिनेमा देख रहे हैं। क्या ग़ज़ब का कार्यक्रम था। मैं तो अभी से तैयार हूं। बछेंद्रीपाल को को-ट्रैवलर बना कर स्वर्ग की सीढ़ी चढ़ने के लिए। कितना मजा आएगा। स्वर्ग के गेट पर टोल टैक्स वसूलता रहूंगा। डीएनडी प्लाइओवर बनवा दूंगा। बीस साल के टीवी के जीवन में यह एक ऐतिहासिक मौका है। इस ऐतिहासिक मौके का मैं भी साझी हुआ हूं। टीवी इन दिनों इतिहास भी बना रहा है। अपने बीस साल के इतिहास में पहली बार। इतिहास एक खोज है। टीवी चैनल पर निर्माण कार्य। आप कब किसी ऐतिहासिक कार्यक्रम के विटनेस बन जाएं पता नहीं। इतिहास का हिस्सा बनने पर मुझे बहुत खुशी हुई।

( यह एक औपचारिक व्यंग्य से ज़्यादा कुछ नहीं। कई बार लोग व्यंग्य से भी नाराज़ हो जाते हैं और भविष्य में नौकरी न देने का एलान कर देते हैं। लेकिन अपनी बात कहने का अलग ही आनंद है। सो कह दी। इसके नाम, पात्र और कथ्य सब काल्पनिक है। हकीकत में किसी से नहीं मिलते। सिर्फ लेखक ओरिजनल हैं।)

29 comments:

  1. बहुत बेहतर लिखा रवीश जी आपने. मैं तो आजित आ गया था महाभारत सुन और देख कर . चलो अब पता तो चला कि स्वर्ग की सीढ़ी है. हां 7 की तो नहीं जानता पर टोल टैक्स बैरियर में मुझे भी अपने साथ रख लीजीएगा. एक आदमी की आवश्यकता होगी जांच पड़ताल और गेट बंद करने के लिये. वहां पता चला है सब आटोमैटिक नहीं है. गेट बंदकरने के लिये आदमी लगते हैं. एक बात और पता चली है कि बहुत जल्दी उस बैरियर का भी ठेका होने वाला है. कई लोग जुगाड़ में लगे हैं. ...

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  2. vaki sir. isse bada majak kya hoga ki swarg ki seedhi mil gayi hai. pata nahi media ko kya hota ja raha hai. bhala aisi khabron se wo kya jahir karna chahte hain. swarg ki seedhiyan aur bhoot preton ki khabar se kewal us tabke ko apni or kheencha ja sakta hai jise sirf manoranjan se matlab hai na ki soochna se. aise mein choutha stambh hone ka dawa kaise kar sakte hain kya yahi hai jimmedari aur samaj ko sahi rah dikhana.

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  3. Mariye ! wahan sab koi SHOR machataa hai ! aap bewajah usako TAWAJJO de rahe hain ! they don't find any merit to be mentioned on NAI SADAK !

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  4. बहुत अच्छी आफ़ द रिकार्ड बातचीत है।

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  5. अब तो आपको पता चल ही गया होगा की टीवी पत्रकारिता को लोग क्यों गरिया रहे हैं? जितना बेहूदा दिखाना है जल्दी दिखा लो, बिल आने वाला है. दाशमुन्शी जी डंडा कर देंगे उसके बाद

    अगर ये किसी को थोड़ा Harsh लगता है समझ लीजिये मैंने सही लिखा है, मैं थोड़ा Harsh ही लिखना चाह रहा था

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  6. मैंने आपकी इस रचना को विस्तार देने की कोशिश की है। फुर्सत हो तो नज़र मार लीजिएगा।

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  7. Bahut Sahi Likha sir aapne..Wo bhi ki aise likhne par ya kahne par naukari dene se log mna kar dete hai. Isi wajah se aaj naye log jo is field me aa rahe hai chaplusi karte dikhte hai aur tazzub ki bat hai naukari bhi pa lete hai..

    Mai khud is field me aane k liye struggle kar raha hu...lekin aap,punya prasunn vajpayi jaise logo k bare me jankar lagta hai ki pahle field me struggle karke samajh le ki patrakarita kya hai tab tv par chehra khood chamkega...aise nahi ki swarg ki sidhi dikha diya ....
    Bandar k kartab,Bhooto ka special programme,sangeet k liye harek tv channel spl programme bna dete hai..In sabko dekh kar ji karta hai ki broadcast bill aana chahiye aur faltu chizo par pabandi laga deni chahiye....

    Maine Ek Script likhi to IBN7 me kam karne wale ek bande ne kaha ki iski jagah sirf ndtv me hai baki log tumhe puchhenge bhi nahi denge......usne kaha ki aanewale dino me ya to ndtv top pe pahunch jayega ya fir namonishan mit jayega....
    Lekin Sir Aakhir kyun log aisa karte chale ja rahe hai????naye log jo aa rahe hai wo bhi khabro ko aise padhne ki koshis karte hai jaise malum nahi kya ho gaya hai...

    Khair aapne Jo likha hai wo hum jaise kuchh logo ko himmat deti hai ki koi to sunega draupadi ki pukar aur swarg ko chhod jamin ki bat karega yeha k logo ki bat karega..aur humari bat sunega aur kahega

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  9. बहुत बढिया लगा व्यंग्य. नाराज वही होते है जो चुटकले को सीरियस कहानी समझ के पढते है
    http://qatraqatra.blogspot.com

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  10. रवीश भाई
    नमस्कार
    आपका ब्लोग पढना अच्छ। लगता है। टीवी पर आपकी स्क्रिप्ट भी लाज़वाब होती है। लेकिन वोट डलवाने के मामले में आप लगता है टीवी से कम नहीं। ओप्शन के साथ एक कॉलम भी दीजिए, ताकि हम अपने मन की बात कह सकें। वैसे हमारा भी एक कच्चा ब्लोग है। देखेंगे तो अच्छ। लगेगा। www.aajkasudharak.blogspot.com


    आपका
    सुनील

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  11. Ravish,
    Congratulation u have said everything.The people showing the stair to the heaven will soon reach to the heaven soon,if this trend continues on Hindi Channel.
    I don't know what is news in a fight between wife and husband and why they r being aired.Why ghost r being shown on the T V?
    Ravish can u tell whether Sanjay Dutt was returnning home from Kargil or he was going to Kargil via VAISHNO DEVI,was that the reason behind giving him a wide coverage.Had not this coverage in Media influenced in his bail?Kya chandrasakher jee ne Sanjay or Salman se des ki kam sewa ki thi?
    Hindi chl is spreading rumour in the society,it is insighting people for violence.
    Ndtv has mtd a little standard but not at par with doordarshan,pls follow the DOORDARSHAN NEWS.News chls r showing their views pls show news not your views
    Ravish I was under impression that u r a good speaker only but was delighted to see that u r a profficient writter too.I had seen your coverage when Nitish kumar becames CM from his paternal house that i remember today also.I had seen your DALIT APARTMENT PROGRAM.I had seen your so many program,so many reporting which was really worthy.
    I know u r from Bihar,can u tell u r from which place in Bihar.
    I am from Samastipur

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  12. सर बधाई
    महाभारत काल में न ते आप थे न मैं इसलिए यह तो पता नहीं चल सकता कि सीढिया वही हैं कि नहीं पर आपने द्रोपदी के फोन का सहारा लेकर अदभुत व्‍यंग्‍य लिखा है। इससे पता चलता है कि अगर आप प्रिंट में भी होते तो भी हम अच्‍छा पढने कि उम्‍मीद कर सकते थे।
    खुशी कि एक और बात यह कि अपने दो पत्रकार मित्र तो कम से कम स्‍वर्ग पहुंच ही जाएंगे सीढी, जो खोज ली है!

    पत्रकारिता के शैशव काल में हैं
    आपसे प्रेरित होकर ब्‍लॉग लेखन में हमने भी टांग फंसा दी है, अभी तो निजी जीवन के बारे में ही लिखा है, उम्‍मीद है एक नजर मारकर प्रेरणास्‍वरूप कुछ बताएंगे

    राजीव जैन
    http://shuruwat.blogspot.com/

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  13. बहुत खूब कहा आपने.... आप ता परसाई बनने के रास्ते में हैं.

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  14. DUSHMANI JAM KAR KARO LEKIN YE GUNJAISH BAKI RAHE.
    JAB HUM DOST HO JAYEIN TO NAZAREIN NA BACHAIEN..
    RAVISHJI ,SAMANDAR MEIN RAHKAR MAGARMACHCHON SE ITNI DUSHMANI THEEK NAHI...

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  15. आपका लेख पढ़ा और स्वर्ग की सीढ़ी चढ़ता गया ... धर्मराज को तो स्वर्ग मिल गया था लेकिन हम जैसे पापियों को कहां नसीब होंगी अप्सराएं और सोमरस ... सो मैंने कार्यक्रम सिर्फ अच्छे विजुएल्स के लिए देख लिया ... खैर ये कार्यक्रम शायद इतनी स्याही डिजर्व नहीं करता था जितनी आपने बहा दी ... चिंता इस बात की होती है कि लाला की दुकानों में दुकानदारी करते हुए हमने सवाल पूछना छोड़ दिया है ... सवाल करो तो वरिष्ठों से एक ही जवाब मिलता है ...
    साले ... तुम अब हमें न्यूज सेंस बताओगे
    इसलिए स्तर अभी और गिरने वाला है ...
    स्याही संभाल कर रखिएगा !!!

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  16. marne ke sabke aage 'Sawargiya' likha jata hai, chahe wah kitna bhi ghatiya aadmi kyun na ho. jo sidhe sidhe narak me jane ke adhikari hai we apne lie shirhi ki talash kar rahe hai? dikha rahe hai. sahyad abhi se taiyari pukta kar rahae hai. Bhagwan unko jald hi........................................................................................
    Rajesh Paswan

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  17. आप सब लोग बहुत ही ठलुए हैं । सचमुच आपलोगों से इर्ष्या होती है कि कितना वक्त है आपलोगों के पास । अरे खुद बेहतर करिए । दूसरों की आलोचना बहुत ही आसान है । किसी भी लकीर को अगर आप छोटा करना चाहते हैं तो आपलोग उसके साथ एक बड़ी लकीर खीचिए । बेवजह मजाक बनाकर आपलोग अपना उथलापन ही जाहिर करते हैं । व्यंग्य की शैली में लिखा आपका लेख बेहद लचर और कमजोर है । आप एक बेहतरीन पत्रकार हैं । आप अपनी उर्जा बेहतर पत्रकारिता में लगाएं देश को आपसे बड़ी आशाएं हैं ।

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  21. ठलुआगिरी नहीं है भाई। अपना काम भी किया जा रहा है। जो हो रहा है उसपर लिखने बोलने की आजादी है। प्रतिक्रिया बिना पत्रकारिता कैसी। और आप हर वक्त महानता की दुकान तो नहीं खोले रख सकते न। कभी कभी आस पास की चीज़ों पर लिखना तो पड़ेगा ही। अगर बोल नहीं सकते हैं तो।
    जहां तक लकीर खींचने की बात है कितनी लकीर खींचयेगा। अधोपतन की आलोचना भी लकीर खींतना है। वैसे आपकी बात सही है। अब इतना अधिक होने लगा है कि कितना लिखे आदमी। बेहतर है छोड़ ही दे। क्योंकि लिखने से क्या होता है जैसी और जितनी जिसकी समझ है वो तो वही कर सकता है। लेकिन हद से गुजरे तब बोलने से मना मत कीजिए। नौटंकी की दुकान खुल गई है चारो तरफ।

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  22. रवीश जी
    नमस्कार
    आपका ब्लॉग पढ़ना अच्छा लगता है। टीवी पर आपकी स्क्रिप्ट भी लाज़वाब होती है। वैसे हमारा भी एक ब्लॉग है। आप देखेंगे तो अच्छा लगेगा। http://www.naradsandesh.blogspot.com/

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  23. बहुत बढ़िया रवीश जी IBN7 पर अच्छा व्यंग्य किया है.. अरे भाई आपको तो पता ही होगा कि चार राष्ट्रीय न्यूज चैनलों में भूत-प्रेत और नाग-नागिन का बसेरा हो गया है.यानि पूरी तरह TRP में उलझे हें..हम और आप तो सिफर् तमाशा देखिए......

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  24. Bhai ! zara Draupadi ji se kah deejiyega ki apni sari ka pallu smhal ke rakhein...SriKrishn ji ki dee huyee lambi sari ka lamba pallu kahin ghalti se latak ke seedhee tak aa gaya to is baar Tv Ptrkaron se bachane Srikrishn bhi nahin aa payenge...

    Vo gujrat mein busy hain...aur is baar cheer haran mein unhein koi interest bhi nahin hai..
    hOta to sab channel band ho gaye hote..:-)

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  25. रवीश जी,

    मान गया आप असली पत्रकार हैं। दूसरे की लाइन छोटी करने से आप की लाइन लंबी कभी नहीं होगी। हिंदी पत्रकारों की पुरानी आदत है सिर्फ और सिर्फ अपनी हांकना। खुद को बड़ा पत्रकार मानना और दुनिया मैं खुद को सबसे महान साबित करने की कोशिश करना। आप तो फीचर एडिटर है न इस जन्म तो क्या अगले जन्म में भी ऐसी स्टोरी आपने कर ली तो आपका धरती पर आना सार्थक हो जाएगा। हिम्मत तो क्या, ऐसी स्टोरी के लिए सोच भी नहीं सकते। ब्लॉग पर उलूल जुलूल बात गांजकर लोगों को बरगलाने से अच्छा है कभी किसी की हिम्मत की तारीफ भी करना सीखें। दूरदर्शन की मानसिकता से निकलिए रवीश जी। सिर्फ खबरों में गल्प करके खबरें नहीं बनतीं। आपके पत्रकार को चुनौती है हिम्मत है तो एक स्टोरी ऐसी कर लें। मान जाएंगे गुरु। मैं जानता हूं--दूसरे का मजाक उड़ाना, ज्ञान बघारना आसान है दूसरे की तारीफ करना बहुत कठिन। नेताओं के पिछलग्गू बनकर, बयानबाजी को तीन वीओ बाइट में ढालकर खबर दिखाना अगर टीवी पत्रकारिता है--आपके यहां के तमाम तथाकथित बड़े रिपोर्टर करें। पब्लिक के ठेकेदार आप क्यों बन रहे हैं ? जिसे पसंद आएगा स्वर्ग की सीढ़ी देखेगा, नहीं आएगा आपके चैनल पर चला जाएगा। और हां, द्रौपदी से ज्यादा बात न करें। कहीं नौबत वैसी ही न आ जाए। संभव है मेरे इस संदेश को आप ज्यादा न पचा पाएं। जल्दी ही हटा भी सकते हैं। यकीन मानिए वो भी आपके पत्रकार होने के दावे को सही ठहराएगा।

    धन्यवाद

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  26. राहुल भाई

    इतना काबिल नहीं हूं कि आपकी चुनौती स्वीकार करूं। हिम्मत भी होनी चाहिए। स्वर्ग की सीढ़ी तक जाने के लिए। पांच लोग दो तीन दिन तक आराम से शूट करते रहे तो जरूर जोखिम भरा काम होगा। शायद इससे पहले इस देश में किसी ने इतनी जोखिम वाली स्टोरी न की हो।

    वैसे मैंने सिर्फ व्यंग्य किया था। स्टोरी के एक पहलु की तारीफ भी। कि उन अनजाने जगहों को दिखाने के इरादे से कहानी बनती तो बेहतर थी। देखने के लिए भी था।

    आप क्या चाहते हैं कि कहूं कि स्वर्ग की सीढी एक महान खोज है। आप मुझसे क्यों चाहते हैं। मेरी निजी प्रतिक्रिया है जिसे मैंने व्यंग्य के लिए लिखा है। मैं कोई प्रमाणपत्र पत्रकारिता नहीं करता। जितना सक्षम हूं उतना कर लेता हूं। बाकी दूसरों से सीखने में शर्म नहीं। अपनी आलोचना बर्दाश्त करने से परहेज़ नहीं। लेकिन आप लोग इतना क्यों उखड़ गए। कोई फतवा थोड़ी दिया है। व्यंग्य और आलोचना तो हर अच्छी बुरी चीज़ की हो सकती है।

    हद है यार। डंडा क्यों भांज रहे हो। रही बात हिम्मत की । क्या करेंगे आप मेरा अगर मैं कमजोर ही हूं तो। मार देंगे क्या। बस कीजिए। आप स्वर्ग खोजते रहिए। आपकी चुनौती स्वीकार नहीं है। ब्लाग लिखता हूं अपने लिए। आप इसे न पढ़े। औऱ पढ़े तो बिल्कुल यह न समझे कि किसी महान पत्रकार ने लिखा है। और फिर किसी को महान ध्यान बताकर उसे गरियाकर अपनी हताशा क्यों सामने लाते हैं। हमने ऐसा दावा कभी नहीं किया। जोश में कभी किसी पत्रकार को चुनौती मत दीजिए। आज कल हर कोई बड़ी खबर करके बैठा है। अब किसकी खबर सबसे बड़ी है इसका पैमाना मेरा पास नहीं है।
    अपने बारे में जानता हूं। आज तक अगर ऐसी कोई बडी खबर या स्वर्ग की सीढी खोज ली होती तो आपको मालूम नहीं होता क्या। नहीं की तभी तो आप चुनौती दे रहे हैं। जिसे अस्वीकार कर रहा हूं। इतना व्यक्तिगत रूप से लेने की जरूरत भी नहीं।

    क्या यार हद है। दोस्ता यार मजाक करते हैं कि नहीं। तो क्या करते हैं आप । गोली चला देते हैं। हद हो गई। प्लीज मेरे ब्लाग को न पढ़े। यह कोई सार्वजनिक मंच नहीं है। स्वांतसुखाय रचना है।

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  27. अरे यार रविश बाबू आप तो हत्थे से उखड़ गए । कोई बात नहीं सबको अपनी बात कहने का हक है कह लेने दीजिए । आपने ही एक ब्लागर के जवाब में कहा है कि बिना प्रतिक्रिया कैसी पत्रकारिता । कहने दीजिए लोगों को अपनी बातें । चुनौती भी मिलेगी । उसे दिल से न लगाइये । आप जिस संस्थान में हैं वहां की छवि लोगों के मन पर बहुत ही अच्छी है । लेकिन मेरा मानना है कि संस्थान से व्यक्ति को जोड़कर देखना गलत है । आपकी एक स्वतंत्र और गंभीर पत्रकार की छवि है । आप क्यों इस तरह से रिएक्ट कर जाते हैं । धैर्य रखिए

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  28. आपकी कई बातों से सहमत हूं। पत्रिकारिता विशेषकर टीवी की हिंदी पत्रिकारिकता काे लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। किसी हद तक सही भी हैं। हर खबर, हर मुद्दे, हर बात काे जिस तरह पेश किया जा रहा है, उससे क्या साबित करने पऱ पऱयास िकया जा रहा है, यह अपने में एक यक्ष सवाल बनता जा रहा है। आपने अपने बात से किसी तरह आम हिंदी पत्रकार की मानसिकता सामने लाई है। सवाल यह है िक वह हीन भावना का शिकार क्यूं है? क्या इसके िलए समाज जिम्मेदार हैं यां वह खुद? वह हर बार अपने तुलना अंगऱेजी के पत्रकार से क्यूं करता है, उससे कुढ़ता क्यूं है। एेसा क्यूं है िक संपन परिवार के बच्चे अंगरेजी अखबार में काम करना चाहते हैं?
    क्या हिंदी अपना मुकाम नहीं बनाई पाई या हीन भावना का शिकार रही। अकसर कहा जाता है कि साधु काे संपन भी हाेना चाहिए। क्या जब तक संपन परिवार के बच्चे हिंदी पत्रिकारिता में नहीं आएंगे इसकी यही सि्थती बनी रहेगी? मुझे उम्मीद है आप जवाब देंगे

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  29. janab, aap ab tak swarg ki sidhi pe atke hain? logon ne raam ko khoj nikala, ram set to chchod dijiye! zara is par bhi apni kimti raay zahir karein janaab!

    rohit

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