पागलनामा पार्ट इलेभन

कांग्रेस बीजेपी जब एक दूसरे के भीतरी सत्य को छेड़ते हैं तो सत्य का कूड़ा हो जाता है । दोनों तरफ़ के नेता और सोशल समर्थक इनके उनके तथ्य और दलीलें गढ़ने में लग जाते हैं । दोनों पहले से मान लेते हैं कि सामने वाला ही ग़लत है । विचित्र स्थिति है । कुछ सोशल समर्थक कांग्रेस बीजेपी का सिपाही बनकर हर सवाल और जवाब को उसी नज़र से देखते रहते हैं । बीजेपी से ज़्यादा पूछ दो तो कांग्रेस के प्रवक्ता और कांग्रेस से पूछ दो तो बीजेपी का । इसी का फ़ायदा उठा कर दोनों खेमों के नेता जब फँसते हैं तो खेल को भंडोल( मतलब बिखेर देना ) करने में लग जाते हैं । ऐसी बेतुकी दलीलों पर आ जाते हैं जिनका ओर छोर नहीं होता । पर दोनों के बीच और दोनों से पार इस देश में ऐसा विशाल स्पेस अब भी बचा है जो इस तमाशे को देख रहा है । इस स्पेस की राजनीतिक संभावना तो क्षीण है पर देख तो रहा ही होगा । समझ रहा होगा और समझने के बाद भी इन्हीं दोनों में भरोसा करता होगा । अलग अलग आस्थाओं को कारण से राजनीतिक निष्ठा बनती है । इशरत जहाँ का मामला भी फँस कर रह जाएगा । बेहतर है अदालत पर छोड़ दिया जाए । राजनीति और सोशल मीडिया के इस 'गलथेथर काल' में थेथराॅलजी ही सच है । झांव झांव कर दो कि सारे सवाल उड़ जायें । मूल सवाल का यही जवाब है कि पचासों एनकाउंटर हुए हैं उन पर बात नहीं,इन पर क्यों नहीं । ये क्या दलील है । महाराष्ट्र के दया नायकों का हाल आप देख चुके हैं । किसी एनकाउंटर मामले की चुप्पी का मतलब ये है कि जिस पर बोला जा रहा है उस पर भी चुप्पी ? एक कंपाउंडर ने दो सौ करोड़ कमा लिये उस पर चर्चा कम ही हुई बनिस्बत के एक मंत्री का भांजा दो या दस करोड़ कमाने के फ़िराक़ में था । तो क्या यह दलील दी जाए कि मंत्री क्यों कंपाउंडर क्यों नहीं । हद है । मंत्री ही क्यों नहीं । क्या इस दलील के सहारे मंत्री को ढाल दी जा रही है । छह छह आईपीएस अफ़सर फ़र्ज़ी एनकाउंटर में फँसे हैं । किसी नेता का नाम नहीं आया है । फिर भी बौखलाहट ऐसी है कि नेता का ही नाम आने वाला है । फर्ज़ी एनकाउंटर हुए हैं यह बात तीन तीन रिपोर्ट में आ चुकी है ।  राजनीतिक पार्टी इस बात का श्रेय क्यों नहीं लेती कि गुजरात पुलिस के अफ़सर रजनीश राय जैसों की जाँच से पुलिस महानिदेशक डी जी वंझारा जेल में हैं । राज्य पुलिस के पचीस पुलिस अधिकारी जेल में हैं । ज़मानत तक नहीं मिल पा रही है । पी पी पांडे जी भागे भागे लुकाये फिर रहे हैं । कमाल है न । एक अन्य आई पी एस जी एल सिंघला टूट चुके हैं । गवाह बन गए । उनके एकमात्र बेटे ने किन्हीं कारणों से आत्महत्या कर ली है । ये सब पुलिस वाले हैं । जिनके लिए किसी को फ़र्ज़ी मामलों में फँसाना मुश्किल नहीं । आज छह आई पी एस और दो दर्जन से ज़्यादा राज्य पुलिस के अधिकारी अलग अलग फ़र्ज़ी एनकाउंटर में फँसे हैं । महाराष्ट्र में किसी बड़े अफ़सर का नाम तो नहीं आया है मगर वहाँ भी यही तादाद है । पंजाब में भी आरोप लगा कि गिल ने फ़र्ज़ी एनकाउंटर कराये । न तो वहाँ की पुलिस न वहाँ की सरकार ने कभी इसका ठोस जवाब दिया । जब पुलिस अपने अफ़सरों को फँसा सकती है ( अगर गुजरात में यही हुआ है तो ) तो आम आदमी की हालत सोच लीजिये । कांग्रेस बीजेपी कूदे पड़े हैं । 
बात अफ़सरों की है तब भी ये कांग्रेस बीजेपी कर रहे हैं । क्यों ? आप इस मसले पर चुप ही रहिये । वर्ना इन दोनों दलों के सोशल समर्थक या कार्यकर्ता तमाम दलीलें ले आयेंगे जिनसे अगला ग़लत लगेगा और पिछला सही और आप दोनों में से किसी के प्रवक्ता । दोनों तरफ़ लाजवाब नाइंसाफियों की इतनी दास्तानें भरी पड़ी हैं कि चुन चुन कर निकालेंगे और एक दूसरे पर फेकेंगे । भगदड़ मची हुई है । दिलचस्प मामला है । चलने दीजिये । इशरत तो मर चुकी है । इसके नाम पर राजनीतिक दलों के दलीलकर्ताओं को रोज़ मरते मारते देखिये । दलाल दूसरे को दलाल कह रहे हैं । जो पूछ रहे हैं उनसे कहा जाता है कि आपने उनसे पूछा जो हमसे पूछ रहे हैं । ग़लत को सही कह रहे हैं । कितना गूगल करेंगे । जात और धर्म की निष्ठा इतनी बड़ी है कि नया विकल्प,नई विचारधारा और नई राजनीति की जगह कम बची है । सत्ता का हिंसक चरित्र राजनीतिक दलों को अपने क़ब्ज़े में ले चुका है । दोनों में कोई अंतर तो है नहीं । इसलिए पैराग्राफ़ मत बदलिये । चलते रहिये । सोशल मीडिया पर छोटी सी सेना बना लीजिये । पाँच सौ आईडी खोल लीजिये । कमरे में बैठकर धावा बोल कीजिये । ठेके पर । गलथेथरई करते रहिए । कांग्रेस बीजेपी करते रहिए । मैनेज होकर दूसरे को मैनेज बताते रहिए । क़व्वाली चल रही है पोलिटिक्स में । सत्ता की भूख इतनी है कि उसे अभी और रक्त चाहिए । हमारी समझ इतनी ही है कि हम इस कांव कांव में पड़ जाते हैं । श्राद्ध में बना आटे का गोला खाते हैं । सारे धमाके की थ्योरी पलट गई है । आतंक को इस्लाम कहो भगवा मत कहो । मत कहो पर आतंक को आतंक तो कहो । कौन हैं जो मालेगांव से लेकर समझौता तक में धमाके कर रहे थे । आरोप पत्र ही घूमता रह जाएगा या साबित भी होगा । लेकिन इस पर बात मत करो वर्ना दूसरा क़व्वाली गाने लगेगा । जूता चप्पल चलने लगेगा । सारी दलीलों का रास्ता प्रधानमंत्री के पद तक जा रहा है । जो बैठा है उसके अपने झूठ और जो बैठना चाहता है उसके अपने झूठ । 

20 comments:

  1. क़व्वाली चल रही है पोलिटिक्स में ।

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  2. aap ye to bata dete hain ke sab kuch disturb hain is desh me, lekin vikalp nahi batate, hume zarurat hain vikalp talashne ki , kab tak paaganama likhte rahenge . . .

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  3. Hote hain jahan har roz tamashe
    Hasne ki gunjaish kahan hai..

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  4. भिण्डी की सब्जी खायेंगे क्या?????

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  5. आज के भ्रष्ट्राचार से मीडिया भी अछुता नहीं है , आपने भले ही आज जनसंचार में PH.D कियों न कर राखी हो लेकिन आज का मीडिया तो उसी फ्रेशर को नौकरी देता है जिसने जनसंचार में डिप्लोमा इनके द्वारा चालए जा रहे संसथान से कर रखा हो .. ऐसे में आप जनसंचार में PH.D करके भले ही कितने resume इनके ऑफिस में जमा कर दीजिये लेकिन आपका resume तो इनके द्वारा कूड़ेदान में ही जायेगा क्यों की आपने इनके संस्थान से जनसंचार में डिप्लोमा जो नहीं किया है ..आखिर मीडिया क्यों दे बाहर वालों को नौकरी ? क्योंकि इन्हें तो आपनी जनसंचार की दुकान खोल कर पैसा जो कमाना है .आज यही कारण है की देश के इलेक्ट्रोनिक मीडिया में योग्य पत्रकारों की कमी है .. केवल चेहरा देकर ही ऐसी -ऐसी महिला न्यूज़ रीडर बैठा दी जाती है जिन्हें हमारे देश के उपराष्ट्रपति के बारे में ये तक नहीं मालूम होता की उस पद के लिए देश में चुनाव कैसे होता है ..? आज इलेक्ट्रोनिक मीडिया के गिरते हुए स्तर पैर प्रेस कौसिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष भी काफी कुछ कह चुके है लेकिन ये इलेक्ट्रोनिक मीडिया की सुधरने का नाम ही नहीं लेता ….इलेक्ट्रोनिक मीडिया तो पैसों से खेलने वाला वो बिगड़ा बच्चा बन चुका है जो पैसों के लिए कुछ भी कर सकता है .
    धन्यवाद .

    राहुल वैश्य ( रैंक अवार्ड विजेता),
    एम. ए. जनसंचार
    एवम
    भारतीय सिविल सेवा के लिए प्रयासरत
    I need reply by raveesh ji

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  6. सत्य पर बहस इतनी हो जाती है कि सत्य का फिचुकर निकल जाता है।

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  7. Raat k 2 baj rahe hain.. Apne 5 inch (bhaiya Micromax ka h, show off nhi kar raha) k mobile phone ko takiye aur chadar se chhupa raha hun. Taki paas me soye pitaji ko ye pata na chal jaye ki beta ab tk jaag raha hai.

    Waise maine ye wala blog nahi padha, par pichle 5 ya 6 ghanton se lagataar aapke purane blogs padhta chala gaya. Jaise jaise blogs purane hote gaye, Nostalgic hota gaya. Saare purane din yaad aa gye. Aap soch rahe honge ki 'mera blog koi 50 baras purana thodi na h.' Bhaiya hum Facebook Twitter wale hain, thode me khush ho jate hain.

    My name is khan ka review bhi padha, achha laga.
    Ra. One ki realease par aapse twitter par Shahrukh k sandarbh me thodi si kahasuni ho gyi thi jiske liye maaf kar dijiyega.. Aap samajh gye honge Shahrukh ka fan h.

    Jb bhi tym milta h Prime time zarur dekhta hun. Kaash aap jaisa likh pata.. Thank you.. Maza aa gaya padhkar. Likhye rahiyega.

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  8. raves ji mere article ka reply dijiye ki jis channel me aap kaam kar rahe hai wo channel kitna democratic hai.. ye news channel kisi bhaar ke freser student ko job nahi deta. paisa kamane ke liye apni journalism study ki dukaan khole baita hai. agar aapko yogya patkaron ki itni hi jaroorat hai to job ke liye national level per exam kiyon nahi karte ?
    jisme talent ho ga wo aapke yaha naukari karega aisi dukaan kholne se kiya faiyda hai? mera bhi slection aapki journalism ki dukaan me ho gaya tha lekin mujh per 2 lakh rupyaa nahi sirf talent hai .. aap mujhe reply jaroor dena agar khud ko aap democratic citizen mante hai to....dhanyabad

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  10. Ravish bhai, baat to aap sahi kah rahe hain par rajneeti me yahi to hota raha hai....koi langatai par tika to baaki thethrai par.....Humlog ke yahaan ek kaahawat hai...nanga se ganga haraan.....aur aap bhi jante hi honge ki langatai aur thethrai ka koi jawab nahi hota hai....

    Raajneeti ki galiyoon me
    har baat badal jate hain...
    Bhor se pahle
    saanjh ke jajbaat badal jate hain...

    Inke dalil subah se shaam tam math math ke alag alag samy par ghum ghum ke badlenge aur breaking news bante rahenge jo channel wale dawa karenge ki wo sabse pahle janta ke samne laye....
    Bus bhaisahab enjoy kijeye ....

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  11. Ravish Ji aap ko rahul ka reply karna chahiye ... kya aap krenge

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  12. रूदालीनामा भी लिखने वाले है क्या रवीश जी ।खूब टेसुए बहाये जा रहे है इशरत जहाँ पर,आजकल मिडिया मे।विशेषकर एन डी टी वी पर

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  13. व्यवस्था और लेखन में तिरस्कार डेवलप हो गया है व्यक्तियों या विचारों के लिये सहनशीलता घट रही है स्व हावी होता जा रहा है

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  14. Hmmmm....dekhte rahiye sir aur likhte rahiye paagalnaama....

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  15. कोई रास्ता निकालना पड़ेगा......

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  16. कोई रास्ता निकालना पड़ेगा......

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  17. Ravishji sach itna sasta nahi hota na hi kisi chai ki dukaano pe mailta hai na hi kisi channel par ... Har cheej ki keemat chukani padti hai aur sachai badi keemat hai par ek baar sach bolna sheek lene par ye bada aasan ho jati hai ... Faisla hone se pahle faisla mat sunaye ... Kahi par bhi baithe ho yaad rakhe sacchai to bolti hai bas logo ko jhoot bolne aur sunne ki itni aadat pad chuki hai ki woh sunai nahi deti... Din me aakhein band kar lene se suraj apni rosni band nahi kar deta ha albatta agar dekhna chaahte ho to aakhein kholni padti hai

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  18. Waise Ishrat ka Sach to ana hi chahiye public ke samne aur is encounter ki bhi sath hi jo bhi 4 let ke sadasya the unka bhi sach

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  19. ravish ji...

    mere ek dost ne apke is blog ke bare me bataya tha...main apke baudhik paripakwata ki sarahna karta hu par ap samsyao ko baicharik dhang se behtar samjhte hai ...aur apki lekhan aur gyan aseemta ki gahrai par hai ..par kya samsyayo ko naye tareeke se katachh ya naye tareeke se virodh karna hi same paragraph par chalna hai..main apke vicharo se sahmat hu magar shayad main apke baudhik chhamtao ka upyog dhudh raha tha na ki prayog...

    Dhanyawad
    Tariq

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