ग़रीबी दूर करने का जादू

मेरे प्यारे ग़रीबों

जो तुम हो वो मैं नहीं हूँ । इस स्वीकृति के बाद जो तुम हो वो तुम ही हो सकते हो । तुम्हारा होना ही किसी और का कहीं होना है । किसी और का होना तुम्हारा होना नहीं है । बचपन में दीवारों पर एक नारा लिखा देखा था । ग़रीबी दूर करने का एक ही जादू- कड़ी मेहनत, पक्का इरादा । तब से तुम जादू का खेल देख रहे हों । नेता तुम्हारी कान में सिक्का डालता है और पीछे कनस्तर लगाकर निकाल लेता है । लोग खूब तालियाँ बजाते हैं और तुम ग़रीब के ग़रीब रह जाते हो । जादू का खेल ऐसा ही होता है । आस्तीन से कबूतर निकाल कर रूमाल बनाना और उस रूमाल को ग़ायब कर देना । यह सिलसिला आज तक तुम्हारे साथ चला आ रहा है । तुम जादू का खेल खूब पसंद करते हो । कोई पाँच रुपये का पचास हज़ार बनाने का जादू दिखाता है । तुम अपना सब दे देते हो । जादूगर भाग जाता है । फिर दूसरा जादूगर आता है जो तुम्हारे लिए मुआवज़े की लड़ाई लड़ता है । दरअसल वो लड़ाई नहीं लड़ता तुमको जादू दिखा रहा होता है । तुमको जितना दूर किया गया उतना ही क़रीब आ गए । गाँव में दूर नहीं हुए तो दूर होने के लिए दिल्ली आ गए । जिन हज़ारों कालोनियों में बस गए उनका पहला नाम अवैध-अनियमित कालोनी पड़ा । फिर इनके नियमित करने के लिए जादूगर आए । तुम्हारी कालोनियों को वैध करने लगे । तुम्हें लगा कि तुम अब दूर हो जाओगे मगर जादूगर ने पानी बिजली सड़क का इंतज़ाम नहीं किया । राशन का क़ार्ड नहीं बना और स्कूल खुला तो अच्छा वाला मास्टर नहीं आया । तुम्हारे बच्चे भी दूर होने वाले उत्पाद में बदलते रहे । तुम दूर होते होते क़रीब आ गए हो । इतने क़रीब कि दिखने लगे हो । भारत के ग़रीबों को शहर में ही रहना चाहिए ताकि वे दिखे । अब तुम दिखने लगे हो तो तुम्हें दूर करने के प्रयास भी दिखने ही चाहिए । भारत की केंद्र सरकार और देश की कई राज्य सरकारें तुमको खाना खिलायेंगी । क्योंकि तुम कुपोषण के शिकार हो । जीडीपी ग्रोथ वाले मर्दाना भारत में कमज़ोर शरीर वाले ग़रीब ठीक नहीं लगते हैं । कांग्रेस बीजेपी अकाली अन्ना द्रमुक सब तुमको खिला रहे हैं । खुद ही बता रहे हैं कि उनकी योजना में अस्सी फ़ीसदी आबादी है तो इनकी में पैंसठ । अब तो तुम्हें पता चल ही गया होगा कि तुम कितने हों । इन योजनाओं ने तुम्हें दूर करने के एजेंट नियुक्त किये हैं । ये एजेंट नेताओं के कार्यकर्ता हैं । भात और रोटी खिलाते हैं । इतना ही कि तुम खा लो मगर दूर न हो सको । बीमार पड़ो तो अस्पताल जाने के रास्ते में ही दम तोड़ दो । ग्रोथ रेट वाले नेताओं से पूछो कि जब पाँच से ग्यारह का रेट चल रहा है तो हमारी ग़रीबी कैसे बढ़ रही है । मूर्खों तुम्हारी ग़रीबी नहीं बढ़ेगी तो ग्यारह प्रतिशत का ग्रोथ रेट कैसे मिलेगा । कोई तुम्हें दूर नहीं करना चाहता है । तुम्हीं बहुसंख्यक हो । तुम्हीं लोकतंत्र हो । तुम्हीं वोट हो । तुम्हीं हिन्दू मुसलमान हो । तुम्हीं राहुल नरेंद्र हो । तुम्हीं गारंटी योजना हो । क्योंकि तुम इनका दिया खा कर इनके लिए सत्ता हगते हो । फिर ये तुमको मारते हैं । उजाड़ते हैं । ट्रेन से भगा देते हैं । ताकि तुम दूर न हो सको । तुम जितना बढ़ोगे उतना ही हगोगे । राजनीतिक दलों के लिए सत्ता हगोगे । ये सब आयेंगे । तुमको दूर करने का जादू बतायेंगे । मगर तुम दूर मत होना । कान में सिक्का डलवा कर पीछे से निकलवा देना । फिर जब तुम फैक्ट्री में काम करने जाओगे ये तुमको लतियायेंगे । हिन्दू मुस्लिम बनाकर भिड़ा देंगे । गुड़गाँव में मारुति की फैक्ट्री है । पूरे इलाक़े में प्रदर्शन करने की मनाही है । वहां राहुल नरेंद्र कोई नहीं जाता है । कोई उनके बीच जाकर सपने नहीं बेचता है । दोनों तुम्हारी जात का पता लगवा रहे हैं । ट्विटर पर सबको लड़ा रहे हैं । मेरे प्यारे ग़रीबों तुम्हीं भारत हो । तुम्हीं शासित हो । तुम्हीं शापित हो । तुम न रहोगे तो ये नेता किसे दूर करेगा । तुम सूरत मुंबई और दिल्ली की बस्तियों में इसलिए ठेले जाते हो कि तुम दूर न रह सको । तुम एक जगह रह सको । तुम भारत की वो योजना हो जिसे हर दल के नेता बनाते हैं । व्याकरण भाषा का चीरहरण है । पैराग्राफ़ मत बदलो । ग़रीबों तुम्हारी ग़रीबी सवा लाख की । खुल गई जो मुट्ठी तो किस काम की । तुम टीवी पर ज्योतिष के प्रोग्राम देखो । अपना गुडलक निकालो । हगो हगो कि तुमने योजनायें खाईं हैं । वोट हगो वोट । नरेंद्र राहुल के लिए । अख़बार पढ़ के उसी से पोंछ देना । राहुल नरेंद्र के फिक्स डिपाज़िट तुम नहीं बढ़ोगे तो और कौन बढ़ेगा । 

तुम्हारा
रवीश कुमार
लुग्दी पत्रकारिता का अभिन्न सहचर । 

15 comments:

  1. तुम्हीं हो बंधु , सखा तुम्हीं हो ! (केवल चुनाव के लिए)

    ReplyDelete
  2. राजनीति की शतशत आशायें केन्द्रित हैं तुमपर, सब तुम्हारा मर्म समझने को व्याकुल हैं और उसके लिये कुछ भी सौप देने को आतुर हैं। सीधा और सधा संदेश...पर यदि इण्टरनेट पर यह संदेश पढ़ लिये तो गरीबी रेखा से ऊपर आ जायेंगे।

    ReplyDelete
  3. रविश जी आपके एक बहुत ही पुराने पोस्ट का एक अंश याद आ रहा है मुझे .
    "अमीरी और ग़रीबी पर जितना लिखा गया है,उसकी रद्दी बेच दी जाए तो लाखों लोगों की ग़रीबी दूर हो जाए ।"

    ReplyDelete
  4. Ravish bhai...Garib to bharat ka dharohar har...Har pryayog ka laboratory hai....Inhi ke bal par to dawa hota hai, ki kiski sarkar ki kya uplabhdhatta hai....Koi isse khana de raha hai to koi laptop..koi cycle chadwa raha hai to koi inhe helicopter se vippatti se nikal de raha....Koi inke muh me mike laga de raha aur breaking news bana raha hai...koi inka kalpana kar 2 desh bana diya hai..Ye ab India ke nagrik bhi nahi rahe hain...Bahut buddhijivi inhe apne AC kamre me baith kar koi bharat ka nagrik bana diye hain...
    Satrangi jhandoon ke baad ab inhe rang birangi card bhi pakda diya gaya hai...Saari duniya rangeen hai bus thaamo rahiye...Aur garib bhai jyade chi chiaayee nahi, jaha muh se aawaz nikala khat se ban jaayega breaking news....

    ReplyDelete
  5. Sir jo yeh hamara garib bhai hai normally cow belt ka hi hai bada hi sehanseel hai europe ki tarah nahi hai jaha berojgari bhatta band hote hi danga hota hai gujratiyo ki tarah nahi hai jo train ki reserve seat par waiting wale ko baithne nahi deta south indians ki tarah nahi hai jo kisi hero ke marne par suicide karne lagte hai. lekin vidambna yeh hai ki har koi inke naam par apna ullu seedha karne me lage hai. Nara dete hai garibi hatao lekin garibo ko hi hatate hai.

    ReplyDelete
  6. गरीब,राजनीति,योजनायें,विकास,और हमारे नेता सबके सम्बन्ध परस्पर पहिये की भांति घूम रहे हैं ज्यादातर परिवर्तन का वाहक माध्यम वर्ग होता है और हमें ही अपने बल पर गरीबोँ को शिक्षा के द्वारा शिक्षित करना होगा |

    ReplyDelete
  7. GNP badta jai, jeb khali ki khali, isi ka naam to economics hai, jisse samajhne ke liye oonchi taleem chahiye...

    ReplyDelete
  8. Hazaron saalon se garib garib hi rha h .. Wohi marta hai , wohi shoshit kiya jata h . sab badal sakta ... siwaay garib ki garibi ke .

    ReplyDelete
  9. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  10. sabhi bhare baithe hain yahan...kuch badalne wala nahi hai

    ReplyDelete
  11. Sab ye jante hai, samajhte hai jo likh rahe hai, padh rahe hai aur cmmnt kar rahe hai..kyun ki aap apna bharas likh kar nikal rahe hai aur hm padh kar, to kha se kuch hoga..

    ReplyDelete
  12. Ravish ji Pranam. Bahut accha laga padh ke. Garibi ke baare me isse achha lekh pehle nahi padha. Aapne desh ki sachayi ko bahut ache tarikey se likha hai.

    ReplyDelete
  13. well said Ravish ji but ek baat pateye ki bharat kabhi bhi es garibi se dur ho sakta hai aise rajneeto main.

    ReplyDelete