मां और मीडिया

यह किसी फिल्म का नाम नहीं है।एक हकीकत है।अनिता रावत और अनुराधा भट्टाचार्या। अनिता का बेटा अनिरुद्ध और
अनुराधा की बेटी सीमा कपूर। २५ फरवरी २००८ की एक रात महंगी स्कोडा कार से लौट रहे थे। दोनों पीछे की सीट पर बैठे गाड़ी चला रहे अपने दोस्त सत्यजीत से कह रहे थे कि धीरे चलाओ। मस्ती में सत्यजीत १८० किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चला रहा था। बगल की सीट पर इंटीरियर डिज़ायनर गौरव बैठा था। सबकी उम्र इक्कीस से बाईस साल थी। स्कोडा पलट गई और पीछे की सीट पर बैठे अनिरुद्ध और सीमा की मौत हो गई। सामने की सीट पर बैठे दोनो शख्स बच गए। घटना दिल्ली की है।

घटना के तुरंत बाद सभी चैनलों ( सभी भाषा के चैनल) और अगली सुबह प्रिट मीडिया ने ख़बर दी कि ये अमीर बाप के आवारा बच्चे थे। किसी पार्टी से शराब के नशे में लौट रहे थे और मारे गए। डीसीपी आनंद मोहन का बयान था कि ये बच्चे शराब के नशे में थे। चार महीने बाद ऑटोप्सी की रिपोर्ट आई और पता चला कि अनिरुद्ध और सीमा ने शराब नहीं पी थी। लेकिन तब तक दुनिया भर में यह बात फैल गई थी कि ये आवारा शराबी बच्चे अपनी गलती के कारण मारे गए हैं।

मीडिया को नहीं मालूम था। मीडिया के पास मालूम करने का तरीका पुराना पड़ता जा रहा है। दोनों मां को मालूम था कि उनके बच्चे शराब नहीं पीते थे। उन्हें लगता है कि मौत के बाद उनके बच्चों की छवि बिगाड़ी गई। मीडिया ने घटना के तुरंत बाद खबरे ऐसे दिखाईं जैसे उन्हें इस बात से कोई सहानुभूति ही न हो कि किसी की मौत हुई है। वो शराबी और रफ्तार पर इतना ज़ोर दे रहे थे मानो यह कहना चाह रहे हों कि ठीक हुआ है। अनिता और अनुराधा टूट गई हैं। दोनों प्रेस वाले को देख कर रोने लगती हैं। कहती है वो अपने बच्चे की छवि बहाल करने के लिए लड़ना चाहती है। अदालत के दरवाज़े से लेकर संपादक के कैबिन तक। अनुराधा कहती हैं कि मेरी बेटी कभी बिगड़ैल नहीं थी। न ही पार्टीबाज़ और शराबी। वो एक सामान्य लड़की की तरह थी। लेकिन मीडिया ने मरने के बाद उसकी छवि खराब कर दी और समाज में बच गए हम अभागे मां बाप की भी।

दोनों मां को इंसाफ चाहिए। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या करें? कैसे इस बात को ठीक किया जाए कि मेरे बच्चे शरीफ थे। बहुत प्यारे थे। पढ़ने लिखने वाले थे। क्या ये स्टोरी फिर से चल सकती है। क्या खंडन छपने से काम चल सकता है? क्या धरना देने से ठीक हो सकता है? दोनों मां बोलते बोलते रोने लगती हैं। खंडन या माफी उस ज़ोर से नहीं चलती कि सीमा और अनिरुद्ध को सम्मान मिल सके। मीडिया कह सकता है कि अपवाद है। मां को कौन समझाए। वो तो इस अपवाद को नियम की तरह भोग रही है। कैसे एक मां अपवाद स्वरुप मान ले कि उसकी बेटी शराबी थी। उसका बेटा अमीर आवारा था।

मैं सामना नहीं कर सका। उनके सवालो को अधूरा छोड़ रात भर जागता रहा। मनमोहन सिंह की सरकार और मायावती के प्रधानमंत्री बनने की कवायद के बीच दोनों मां के आंसू मुझे जगाने लगते थे। मीडिया के लोगों ने जाने ऐसी कितनी मांओं को तड़पने के लिए छोड़ दिया होगा। शुक्र है अनिता और अनुराधा के पास हिम्मत है। घेर कर पूछने की। बताओ इंसाफ कैसे मिलेगा। कहती हैं हम हार नहीं मानेंगे। मीडिया अब उनका मकसद है। आप चाहें तो अनिता रावत से 09811616459 और अनुराधा भट्टाचार्य से 09310392999 पर बात कर सकते हैं।

30 comments:

  1. एक अच्छी रिपोर्ट के लिये बधाई शब्द उपयुक्त नहीं लग रहा पर दूसरा कुछ सूझ नहीं रहा. आपके ब्लाग पर आने पर, ब्लाग एक मजबूत वैकल्पिक मिडिया तो लगता ही है.

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  2. संवेदनाएं कभी नहीं मरतीं...
    संवेदनाएं कभी नहीं मरेंगीं...

    आप भी मीडिया का हिस्सा हैं
    और आप इस पर इतनी
    गंभीरता और भावुकता से विचार कर रहे हैं
    तो आशा बंधाने के लिए यही काफी है...

    दोनों माआंे को फोन जरूर करूंगा...
    सिर्फ इसलिए कि तसल्ली हो कि ब्लाग भी एक मीडिया ही है और उस पर ये बात सामने आ चुकी है कि उनके बेटे/बेटी कोई अपराधी नहीं थे।

    अंगूठा छाप

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  3. रवीश जी अगर मीडिया से इतने ही निराश हैं और अगर मीडिया इतनी ही बुरा है यहाँ अगर कोई नैतिकता नही बची है और जैसा कि आपकी इस पोस्ट औऱ पिछली पोस्टों को भी पढने से प्रतीत होता है कि आपके सिवा यहाँ हर कोई पतितकारिता कर रहा है और ये सब देख कर आप हताशा औऱ निराशा के सागर में गोते लगा रहे हैं तो फिर इस प्रदूषित दुनिया में क्यों स्वच्छ ऑक्सीजन के लिए परेशान हो रहे हैं छोड़ क्यों नही देते इस भटके हुए समाज को ........ये पोस्ट लिखते हुए ऐसा लगता है कि जैसे आप कहना चाहते है कि सिर्फ मैं ही उद्देश्य परक पत्रकारिता कर रहा हूँ और बाकी लोग तो इस पेशे की लंगोट उतारने में लगे हुए है .........आपके लिए
    .....ऐ खुदा किसी को इतनी खुदाई न दे
    .....कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे....

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  4. मीडिया द्वारा TRP बढ़ाने के लिये गलत रिपोर्टिंग एक तरह का भ्रष्टाचार ही है। यदि मेरे साथ ऐसा होता तो मैं कोर्ट में ज़रूर जाता।

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  5. ravish ji ,laga ki blog hi asal mass media hai jaha eak maa ka dard baya hata hai bina yae dakhe ki yae story bikegi ya nahi.yani maa aur media nahi "maa ka media" kaho...... aur ha dono matao ko kahnae kae liyae mare pas koi shabd nahi, yahi aa kar pata chalta hai ki kai bar bhasha kaise bhavano ka sath chod deti hai

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  6. समय आ गया है कि उस इज्जत की हम परवाह ही न करें जिसे मीडिया आसानी से ऐसे तार तार करता है जैसे वह कोई मलमल का कपड़ा हो और मीडिया उसे धोबी पछाड़ रहा हो। जब भी ऐसे समाचार आएँ जिसमें कयास लगाकर किसी की इज्जत उतारी जा रही हो तो बदल दिया जाए उस चैनल को। और यदि सभी यह दिखा रहे हों तो फिर कार्टून चैनल लगा लिया जाए। शराब पीकर गाड़ी चलाना गलत है परन्तु पीछे की सीट पर बैठकर मरना बिल्कुल भी नहीं। सो यदि उन्होंने पी भी होती तो कोई लज्जा की बात नहीं।
    घुघूती बासूती

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  7. टीवी पर न्यूज़ देखना बहुत पहले छोड़ दिया था... शायद ऐसी बातें भी कारण थी... हर ख़बर सनसनी और ख़ुद ही हालात का फैसला लेकर मनगढ़ंत खबरें.

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  8. Thanks to share this truth. Thanks again

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  9. Every news channel want great TRP renting, isliye unhe koei fark nahi padta ki unlogo ki vajah se samaj k eak izzatdar pariwar ke shok, dukh ki. Hame dusre logo ko easi khabro par eahtbar na karne ki vajah batani hogi. Media ab nirnkush sa ho gaya hai.

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  10. Every news channel want great TRP renting, isliye unhe koei fark nahi padta ki unlogo ki vajah se samaj k eak izzatdar pariwar ke shok, dukh ki. Hame dusre logo ko easi khabro par eahtbar na karne ki vajah batani hogi. Media ab nirnkush sa ho gaya hai.

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  11. बहुत डिस्टर्ब करने वाली पोस्ट भाई रवीश! विजय गौड़ सही कह रहे हैं कि जिस वैकल्पिक मीडिया का य़ूटोपिया हम सब का ख़्वाब है कम से कम उस के प्रारम्भिक बीज आप रोपते दिखाई दे रहे हैं. बने रहें और और भी बेहतर कामों की आपसे अपेक्षा बढ़ गई है.

    शुक्रिया!

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  12. मिडिया दारु पीकर ही ३६० की स्पीड में ख़बर बनाती है ,चलाती है .तेज स्पीड वाली केवल गाड़ी ही नही एक्सीडेंट करती ,तेज स्पीड वाली ख़बर भी कई एक्सीडेंट कर चुकी है .

    अनीता जी और अनुराधा जी आपका क्लेम बनता है . एक बार कोर्ट में आना जरूरी है ,अगर ख़बरों की रफ़्तार को कम करना है तो .हो सके तो आरुशी की माँ को भी साथ में ले लें .

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  13. Raftar bhari khabro ke chakkar mein yeh kya kya dikha dalte hai.. dil se kahta hu na jane kyon lekin news channelo se bahut dukhi ho aajkal

    Rohit Tripathi
    http://rohittripathi.blogspot.com

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  14. I need your emailid. Sometimes I have news that need media attention. I can forward them to you and if you find them appropriate then you can send them further.

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  16. सफलताके शीखर पर बैठनेके बावाजुद आप मै सहानुभुति फुट-फुट कर भरी है ये जानकर अच्छा लगा(खासकर जब आपभी उसी जमातके है). हम ये पढके इतने व्यथीत है तो आप समना करके कितने होंगे ये समजा जा सकता है. और रात भर नींद नही आना लाझ्मी है.

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  17. रवीश कुमार के चमचों कुछ तो शर्म करो....थोड़ा सा लिखना पढ़ना आ गया तो उसका इस्तेमाल चाटुकारिता के बजाए कहीं और करो...समाज में चेतना जगाने के लिए कई विषय हैं..केवल रवीश कुमार के चुराए खबरों पर अपनी लफबाजियां मत भेजो...
    विथ रिगार्डस.
    आशुतोष मिश्रा

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  18. पोस्ट पढ़ कर तो कुछ नया नहीं लगा क्योंकि यह दंश हम काफी पहले से भोग रहे हैं लेकिन एक चीज न समझ में आई कि जब हमने आइने में लोगों को अपनी ही सूरत दिखाई तो क्रोध क्यों आया. मैं अभी न तो चाटुकारिता कर रहा न ही महान बनने की कोशिश कर रहा लेकिन यह सत्य है कि मीडिया में आज कुछ ऐसे लोग आ गये हैं जो अपनी नासमझी की वजह से मिथ्या खबर तो दे देते हैं साथ ही उस खबर के असर से उसके परिजनों को दुःखों का पहाड़ भी खड़ा कर देते हैं. हालांकि ऐसे मीडिया कर्मियों की संख्या बहुत कम है लेकिन बदनाम तो पूरा मीडिया होता है. हमने तो यहां तक देखा है कि कुछ अपने साथी अपने हिसाब से स्टोरी तैयार करवाते हैं फिर मसाले से उसकी प्रस्तुति तय करते हैं.
    रवीश जी अच्छा लगा. हकीकत को स्वीकार करना चाहिये. यह हमारी कमी है और एक दिन हमें भी इसका नुकसान उठाना पड़ेगा यदि हम समय रहते न सुधरे.

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  19. yah delhi ki ek ma ka dard tho jo samne aa gaya.halanki sacchai yah bhi hai ki ma to ma hoti hai.uski mamta ki koi bhogolik seemay nai hai.phir bhi kuch na kuch hai jisne delhi ki mao samet jeevan k sab pahluo ko alag dang se baki hindustan k samne sampreshit kiya hai.kya hai uske liye shabd mai philhal nai nikal pa rai.ek baat aur jo apko lekar man mai uthti hai ki kya vastav mai ravesh ji vaisa hi hai jaisa vo likhte hai ya uske pass b so called tathakathit nishpach,imandar patrkaro k tarah kai chahre hai.

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  20. मेरे यहा एक कहावत है की गेहू के साथ घुन भी पिसा जाता है. दरअसल घुन को गेहू से अलग कर के पिसने की जो जिम्मेदारी है उसको कुछ लोग नही निभाते . नतीजा हिंसा के साथ हीं स्वस्थ के लिय खतरा पैदा हो जाता है . उसी तरह की गलती आज हमारी मीडिया बिरादरी कर रही है टी र प के चक्कर और ब्रेकिकंग न्यूज़ के चक्कर में . और नतीजा अनीता रावत और अनुराधा जैसी कई माँ भुगत रही है . शुक्र है की अपने इस तरह की घटनावो को दिखा कर हमारे तेज़ पत्रकारों की आंखे खोल दी वरना न जाने कीतने माँ कितनी बहने किनते बाप मीडिया के इन काले कर्तूतात के सजा भुगत रहे होंगे

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  21. रविश जी ऐसा सोचने के लिए धन्यवाद,अन्यथा अब हमारे सोचने से उन मॉओ के बच्चे नही लौटने वाले।ख़बरों की जल्दबाजी के लिए ये माधयम सोचता नही कि ख़बर का असर कितना गहरा हो सकता हैं।आपके अन्दर जो भावना है भगवान इसको सदैव बनायें रखें।इन मुर्दों की दुनिया में कोई तो जीवित हैं।
    सचिन,

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  22. Yahi nishkarsh antatah Aarushi kand me bhi samne aayega.Agar kabhi us rahasya par se parda uth saka to.Media Trial par gambhir bahas honi chahiye.Ravish bhi vibhinn manchon par is sandarbh me kisi sarkari hastakshep ko dumghontu maan kar nakarte rahe hain lekin sawaal yahi hai ki Rajat Sharma ji ki kalpanaon ki udaan par lagaam lagayee jaye to kaise.Sabse bada niyantran ho sakta hai darshkon ka.Lekin darshak to unke sath hai aur unka channel Sabse Tez channel ko tezi se pacharta hua no.1 ho gaya hai.Darasal ye Hindusatni madhyavarg ki khokli mansikta ka dyotak hai ki kathni aur karnee me zameen aasmaan ka antar dikhta hai.

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  23. आरुषि हत्याकांड मे भी तो यही हुआ था । बिना सोचे समझे , तथ्यों के बगैर आरुषि के पिता को मीडिया ने कटखरे मे खडा कर दिया । मीडिया का रुख सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी टी आर पी रेटिग को बढाने और विज्ञापन को खसीटने भर की ही है ।

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  24. sharm karo, agar koi sach kahne ki himmat kar raha hai, to uska sath do, nahin to bakwas to mat karo

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  25. Swastik ji,
    Aisa nahin hai ki sab-kuch TRP hi hai. Sare news channels aisa nahin kar rahein hain. English news channel apne audience ka samman kartein hain aur Hindi news channels apne audience ka apman karetain hain. unhone manmane dhang se khud taya kar liya hai ki Hindi wale aise hotein hain par sach ye hai ki aab agar 'elite' mentality se bhi dekhein to English 'elite' ke comparison mein Hindi elite ka size bahut bada hair aur iska intellectual level bhi wo nahin jo Hindi channel wale samjhatein hain. Main khud English se huin par is sach ko janati huin kyonki Hindi heartland ko main thoda-bahut janti huin. Mera parivar Hindi wala hai aur we jo soochte hain mere liye wahi Hindi heartland ki soch hai.
    Sharda

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  26. Plz go through this link also
    http://www.milligazette.com/dailyupdate/2007/200707303_Six_hours_2_Gujarat_UP_village.htm

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  27. aise kitne hi riste hai jo apna astitva ess trp ki khel mein kho dete hai.baat jab badh mein samne aate hai toh khoya hua kuch bhi wapas nahi milta. jo jana hota hai woh pehle hi ja chuka hota hai.media ko khabarein parosne se pehle uss jaach lene chahiye. khabar pehle dekhne se jada jaruri hai sahi khabar dekhana.ess tarah ki ghatnae media ki chavi girane ka kaam karte hai usse gair jimedar batate hai.

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  28. Ravishji pahle to aapko dhanyawad ki aapne logo ko sachchai se parichay karaya.aaj kal media ka star kudedan ke barabar ho gaya hai.chanals logo ko bitha kar parivarik jhagade suljha rahe hai,comedy shows chala rahe hai,bhoot or alians ke peeche pade hai. aise me sach pat akarne ki or satyapit karne ki mehnat koun kare.jo saamne dikh use dikha diya.

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  29. Honourable,sir!this is my first time(your blog)but I feal you.
    with regards yours
    Maneesh Chandra
    Dalit Dunia@ Lucknow

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