अस्पताल के बाहर

यह बात पूरे चंडीगढ़ को मालूम है मगर यह शहर अपनी किसी छवि में क़ैद होकर रह गया । कई लोग कहते मिल जायेंगे कि पी जी आई जाकर देखिये वहाँ क्या हालत है । कोई सात महीने से किडनी ट्रांसप्लांट के लिए इंतज़ार कर रहा है तो कोई पाँच महीने । किसी के पैसे ख्त्म हो गए हैं तो कोई किराये का कमरा छोड़ फुटपाथ पर सोने लगा है । शहर के लोग भी इस क़तार को देखते देखते कुंद हो गए हैं । 


डेढ़ सौ मीटर लंबी क़तार तो होगी ही । इस क़तार में भी लोग आधे घंटे से धूप में खड़े थे । कोई कश्मीर से था तो कोई बिहार से । सोचिये । क़तार में खड़े लोगों की पार्टी भक्ति क्या होगी । हिन्दू मुसलमान की राजनीति को लेकर समझ क्या होगी । लेकिन ये अपनी तकलीफ़ों की भूख बर्दाश्त करना जान गए हैं । इस रास्ते से तेज़ी से मेरी कार गुज़री थी । पल भर में समझ गया कि सबने इसे देखा होगा । शहर के लिए नई बात नहीं है । मैं वापस आ गया । हम जो देख चुके होते हैं उसके प्रति भी ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे कभी देखा न हो । 


पंचकुला या कालका के कोई सेठ साहब हैं जो ये लंगर लगाते हैं । रोज़ । खाना एकदम बेहतरीन । ढक्कन हटाकर देखा तो चावल की क्वालिटी बेहतरीन थी । छोले भी अच्छे थे । आप आराम से खा सकते थे । खाना भी पर्याप्त मात्रा में । खाने वालों को प्लेट भी । मैं सोच रहा हूँ यह सेठ कितना अच्छा होगा । ग़लत सही पैसा तो सब कमाते हैं मगर इस सच्चे मन से सेवा कम लोग करते हैं । पता नहीं सेठ साहब किस तरह के सेठ हैं मगर उनका यह काम तो शानदार है भाई । इस तकलीफ़ में जब लोगों को पास दवा के पैसे नहीं हैं कोई खाना खिला जाता है । चुपचाप । 


आपमें से जो नमो फ़ैन्स हैं या रागा फ़ैन्स है किसी एक दिन इस क़तार में लगकर महसूस कीजियेगा और अपने अपने नेताओं से सवाल कीजियेगा कि क्या वे इस सूरत में कोई बदलाव ला सकते हैं ? लाया हो तो उसकी तस्वीर दिखायें और सोच रहे हों तो प्लान बतायें । इस अस्पताल की भीड़ बता रही है कि स्वास्थ्य सेवाओं के मसले पर बात ज़रूरी है । हम सबको जल्दी इस विषय पर अपनी जानकारी बढ़ानी चाहिए ताकि अपने नेताओं से सवाल कर सके । 

छते छते झंडे भिन्ना

अगर आप छतों पर चढ़ कर सर्वे करना चाहते हैं तो मेरठ के गाँव किनानगर जाना चाहिए । इस गाँव में सभी जातियों ने अपनी अपनी पसंद की पार्टियों के झंडे छतों पर टाँग दिये हैं । आप इन झंडों को गिनकर बता सकते हैं कि बसपा को कितने वोट आयेंगे और भाजपा सपा को कितने । छतों पर लहरातें ये रंगीन झंडे बता रहे हैं कि किसी एक पार्टी के पक्ष में लहर नहीं है । 

इस गाँव में आबादी के हिसाब से सभी जातियाँ हैं मगर बहुलता के हिसाब से जाटव समाज पहले नंबर पर है । यहाँ जाटवों के छह हज़ार वोट हैं । जाटव बसपा के समर्थक माने जाते हैं और उत्तर प्रदेश में दलित बिरादरी का सत्तर फ़ीसदी हिस्सा जाटव का ही है । गाँव में घुसते ही जाटवों का मोहल्ला पड़ता है । सबकी छतों पर बसपा का नीला झंडा लगा हुआ है । जाटवों के मोहल्ले में किसी दूसरी पार्टी का झंडा है ही नहीं । यहीं के लोगों का कहना है कि वे सिर्फ बसपा को वोट करते हैं । मगर उन्हें इस बात का दुख भी है कि दूसरी पार्टी के उम्मीदवार औपचारिकता निभाने के लिए भी वोट माँगने नहीं आते । आते तो एक वोट तो मिलता । 

ये हमने भी देखा । उस गाँव में सपा उम्मीदवार की छोटी सभा थी । बाल्मीकि बस्ती में । उम्मीदवार का क़ाफ़िला छह हज़ार के वोट वाले मोहल्ले की तरफ़ रूका भी नहीं । सीधा मात्र साढ़े तीन सौ वोट वाले बाल्मीकि बस्ती में चला गया । जाटव समाज के लोगों ने कहा कि बीजेपी के उम्मीदवार भी बिना वोट माँगे चले गए । ज़ाहिर है सब पार्टी का अपना वोट बैंक है । जिसकी संख्या कम है और जिसकी अपनी कोई पार्टी नहीं है उसी को लेकर सारी पार्टियों में मारा मारी है ।

खैर मैं जब जाटवों के मोहल्ले से निकलकर सवर्णों की तरफ़ गया तो उनकी छतों पर सिर्फ बीजेपी के झंडे लहरा रहे थे । ठाकुरों और ब्राह्मणों के घरों पर बीजेपी का झंडा । साफ़ साफ़ दिख रहा था कि बीजेपी की तरफ़ किस जाति का झुकाव है । जैसे ही हम वहाँ से निकलकर मुसलमानों के मोहल्ले में गए उनकी छतों पर सिर्फ समाजवादी पार्टी के झंडे लहरा रहे थे । 

यानी इन झंडों को गिनकर आप बता सकते हैं कि इस गाँव में किस पार्टी के साथ कौन जाति है और कितना वोट है । जाति सम्बंध बेहतर तो हुए हैं मगर राजनीतिक संबंधों में अभी भी बदलाव नहीं है । क्रिकेट पर जान लुटाने वाले ठाकुरों को इस बात का गर्व भी नहीं कि उनके गाँव का कोई दलित क्रिकेट की गेंद बनाता है और दूसरी तरफ़ शोषित जाटव समाज बाल्मीकि समुदाय को अपने से कम समझता है । इस चुनाव में किसी दल ने जात पात के ख़िलाफ़ संघर्ष नहीं किया । जिन दलों और नेताओं ने बात भी की वे जाति के हिसाब से उम्मीदवार उतारने लगे और जाति के वोट के लिए दलों से समझौता करने लगे । 


पहली मुलाक़ात

ठीक ठीक तो नहीं बता सकता मगर एस पी सिंह से पिछले चौदह साल से बात तो हो ही रही है । एस पी सिंह पश्चिम उत्तर प्रदेश बीजेपी के मीडिया प्रभारी हैं । मुझे नहीं पता था कि एस पी सिंह सिख हैं । मुझे नहीं पता था कि एस पी सिंह दिखते कैसे हैं । मुझे नहीं पता था कि एस पी सिंह जीवन में और क्या क्या करते हैं । लेकिन एस पी सिंह से चौदह साल से फ़ोन पर बात हो रही थी । 

पश्चिम उत्तर प्रदेश के मीडिया प्रभारी होने के नाते इस दौरान कई बार सिंह साहब से बात भी हुई । नेताओं के कार्यक्रम से लेकर स्टोरी तक की बात । मगर मिलने का मौक़ा नहीं मिला । ग़ाज़ियाबाद के इंदिरापुरम में नरेंद्र मोदी की सभा के पास के लिए जब मैंने अपने वरिष्ठ सहयोगी अखिलेश शर्मा को फ़ोन किया तो उन्होंने एस पी सिंह का नंबर दे दिया । अखिलेश ने कहा कि चले जाओ तुम्हें दिक्क्त नहीं होगी । फिर भी मैंने कहा कि प्लीज़ आप बात कर दीजिये पास के लिए । देर रात को अखिलेश का एस एम एस आया जिसमें एक नंबर था । जब मैंने अखिलेश के दिये नम्बर पर फ़ोन किया तो एस पी सिंह का नाम फ़्लैश होने लगा । अरे ये तो एस पी सिंह है । अभी तक बीजेपी में यही काम कर रहे हैं । उन्हें लेकर उत्सुकता बढ़ने लगी ।  मैं किसी का नंबर नहीं मिटाता । सबका रखता हूँ । आज से नहीं कई सालों से । कई लोग हैं जिनसे दस दस साल  से बात कर रहा हूँ मगर मुलाक़ात नहीं । 

खैर जब सभा स्थल पर पहुँचा तो एक अति विनम्र और हँसमुख सरदार जी गेट पर ही मेरा इंतज़ार कर रहे थे । बाद में पता चला कि मेरे रिंग करते ही वे गेट की तरफ़ दौड़ पड़े थे । मुझे खुद अंदर ले जाना चाहते थे । ये हमारी पहली मुलाक़ात थी । सिंह साहब ने तो टीवी पर मुझे कई बार देखा होगा मगर मैं पहली बार मिल रहा था । मैं उनसे लिपट गया । उन्होंने भी मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और हाथ पकड़ कर भीड़ से रास्ता बनाते हुए प्रेस दीर्घा की तरफ़ ले गए । 

मैं अपनी खुशी छिपा नहीं पा रहा था । हमारे पेशे में जो रिश्ते बनते हैं वो कोई समझ नहीं सकता । ये आज का फ़ैशन हो गया है कि पत्रकार को मोदी समर्थक या विरोधी में बाँट कर गाली देना । मगर इस वहशीपन में भी कुछ लोग रिपोर्टर और पार्टी के कार्यकर्ता के रिश्तों को सामान्य तरीके से देखते हैं । निभाते चले जाते हैं ।  एस पी सिंह ने भी अपने मोबाइल में दिखाया कि देखिये मेरा नंबर सेव है । मैंने भी दिखा दिया । आपका भी सेव है ।

चौदह साल का रिश्ता और मुलाक़ात पहली । आप नहीं समझेंगे । ये तस्वीरें सिंह साहब ने व्हाट्स अप पर भेजी हैं जो मैं लगा रहा हूँ । सिंह साहब बीजेपी में जिस पद पर चौदह साल पहले थे उसी पर आज भी हैं । कोई शिकायत नहीं । कोई मलाल नहीं । मैं उन चौदह सालों में कहाँ से कहाँ आ गया, इसकी खुशी भी उन्हीं के चेहरे से ज़्यादा झलक रही थी । सिंह साहब प्यार से कभी पानी ला रहे थे तो कभी बैठने की जगह दे रहे थे । हमारी ये पहली मुलाक़ात याद रहेगी । 

आपसे मिलकर अच्छा लगा एस पी सिंह जी । आपके सफल राजनीतिक जीवन के लिए मेरी सभी शुभकामनायें । 



अल जज़ीरा नहीं है

बसपा रैली की तस्वीरें

मायावती ने बिजनौर के बाद मुज़फ़्फ़रनगर से अपनी चुनावी सभाओं की शुरूआत कर रही हैं । इस चुनाव में यूपी में दूसरी रैली है । यहाँ की भीड़ किसी अन्य नेताओं की रैली से ज़्यादा और व्यवस्थित है । टीवी इस भीड़ को नहीं दिखायेगा मगर यहाँ का जोश बता रहा है कि यूपी का चुनाव अभी हुआ नहीं है । सर्वे में भले हो गया हो । वैसे मुज़फ़्फ़रनगर बीएसपी के लिए एक मज़बूत सीट है । एक सीट से सारी सीटों का अनुमान नहीं हो सकता मगर नरेंद्र मोदी की छह महीने की सघन रैली के बाद भी मायावती का असर कम नहीं हुआ है । भीड़ इतनी थी कि रैली के बाद एक घंटे तक लोग सड़कों पर झुंड में लौटते नज़र आए । 








पत्रकारों की लिखावट

ग़ाज़ियाबाद में नरेंद्र मोदी की रैली हो रही थी । वहाँ मौजूद पत्रकार उनके भाषण का नोट्स ले रहे थे । अचानक मेरी नज़र उनकी लिखावट पर पड़ गई । लगा कि फ़्रेंच में लिखा गया है मगर पत्रकारों ने कहा कि एक एक शब्द पढ़ लेते हैं । इसी बहाने यह भी बताना चाहता हूँ कि टीवी के पत्रकार तो नोट्स भी नहीं लेते । कुछ के पास अच्छे फ़ोन है तो उसी से साथ का साथ दफ़्तर ईमेल करते रहते हैं । कुछ तो वह भी नहीं । प्रिंट के सारे पत्रकार लिख रहे थे जबकि उनके दफ़्तर में कोई टीवी या बीजेपी की साइट पर मोदी के लाइव भाषण को लिख सकता है । पर अपना लिखा हुआ ही अपना होता है । खुद लिखने से बातों पर ध्यान रहता है ।


मज़दूर बस्तियों का हाल

आज नोएडा में था । नया गाँव । यह गाँव आस पास की फैक्ट्रियों में काम करने वाले मज़दूरों का ठिकाना है । सौ कमरे का ऐसा बेतरतीब मकान देखा कि बता नहीं सकता । सीढ़ियाँ एक दूसरे पर चढ़ती हुईं ऐसे चली गईं हैं कि कोई वास्तुशास्त्री भी हैरान हो जाए । सस्ते कमरे ऐसे ही अंधेरे और ख़तरनाक होते हैं । इन अंधेरे बंद कमरों में रहने वालों के स्वास्थ्य का सर्वे होना चाहिए ।


ऐसी उदास जगहों से निकल मज़दूर चमकदार कारख़ानों में जीडीपी बढ़ाने जाते हैं । आख़िर ऐसा क्यों हैं कि गुजरात से लेकर उत्तर प्रदेश तक में इनके रहने की स्थिति एक सी बदतर है । सस्ते श्रम के शोषण से ही मुनाफ़े का संसार फैलता है । एक मज़दूर तो ऐसा भी मिला जिसने छह हज़ार की मज़दूरी छोड़ पान की दुकान खोल ली है । बाक़ी नहीं छोड़ सकते इसलिए काम कर रहे हैं । ठेकेदारी प्रथा ने मज़दूरों को न्यूनतम मज़दूरी के नीचे धकेल दिया है । इस पर न तो मोदी बोलेंगे न राहुल । कोई बोल कर देख ले कि सरकार बनते ही ठेकेदारी प्रथा बंद कर देंगे । बनने से पहले ही कारपोरेट हरवा देगा ।


इस गाँव में बिजली कम आती होगी । इसलिए फ़ोन ऐसे बिक रहे हैं जिनकी बैटरी महीने भर चलने वाली है । दुनिया भर में जहाँ फ़ोन साइज़ ज़ीरो के हो रहे हैं  हिन्दुस्तान के बिन बिजली वाले गाँवों में फ़ोन मोटे हो रहे हैं । बिल्कुल पुराने हैंड सेट की तरह । पाँच हज़ार का यह फ़ोन विचित्र है । ढाई तीन सौ ग्राम का ।


बैटरी इतनी मोटी है कि कार चल जाये । एक बार चार्ज होने पर बैटरी बीस दिन चलती है । दो दो प्रकार के चार्जर से चार्ज होने के लिए पिन लगे हैं । स्पीकर बड़े हैं । रेडियो का भी विकल्प । पाँच हज़ार का यह फ़ोन चीन से आया है । चीन हमारे बाज़ार को कितनी अच्छी तरह समझता है । बिजली नहीं है तो ऐसे उत्पाद बना देता है जो बिना बिजली के चल जाए । दो हज़ार तक में टच स्क्रीन फ़ोन बनाकर बेच रहा है ।


इस दुकान पर एक और ज्ञान प्राप्त हुआ । पाँच छह हज़ार महीने का कमाने वाले ये मज़दूर जब गाँव जाते हैं तब अपने फ़ोन बेच जाते हैं । उनके पास पैसे नहीं होते हैं घर जाने के लिए । 


फ़्लेक्स शायरी