कस्बा qasba
कहने का मन करता है...
मिस्र से आ रही तस्वीरों को देख कर ग़ज़ल- तहसीन मुनव्वर
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अब तुझ से बेज़ार हैं लोग ख़ुद अपनी सरकार हैं लोग अब अनदेखी मत करना मरने को तय्यार हैं लोग ज़ालिम रेत का टीला है लोहे की दीवार हैं लोग खून है सब...
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हिन्दी शहर जयपुर
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दीवारबंद जयपुर ऐसी दुनिया है जहां लगभग हर दुकान का नाम हिन्दी में लिखा गया है। नामकरण की ऐसी तरतीब हिन्दुस्तान में कम दिखती है। दिल्ली में क...
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हमरी न मानो..रंगरेज़वा से पूछो...
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२६५ साल से हमारे ख़ानदान में सभी रंगरेज़ ही होते रहे हैं। आज तक किसी ने कोई दूसरा काम नहीं किया है। जयपुर बसा था तब हमारे पूर्वजों को दिल्ली...
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भागलपुर की जीप
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देश के कई हिस्सों में गाड़ियों का मानवीकरण एक दिलचस्प प्रक्रिया के रूप में नज़र आती है। सभी अपने अपने हिसाब से गाड़ी को सजा कर रखते है। गाड़...
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आशंकित मनों से दूर जयपुर
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साहित्य से भी शहर को पहचान मिलती है। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल शहरीकरण से बोझ से दब रहे और पसर रहे जयपुर को नई पहचान दे रहा है। दिल्ली को यह पह...
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किरण-ओरहान को देखने के लिए
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जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में लेखकों के प्रति लोगों की दीवानगी देखते बनी। सुनने वालों की एकाग्रता भी हैरान कर रही थी। हर बैठक में कोई न कोई किस...
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मैंने विनोद कुमार शुक्ल को देखा
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मैं दृश्य में सोचता हूं। जब भाषा नहीं बनी होगी तब इंसान कैसे सोचता होगा। मेरे ख़्याल में दृश्य में सोचता होगा। मैं अपनी चुप्पी को बचाने के ल...
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मुझे सिकंदर चाहिए, दिल्ली नहीं
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पता है मुझे मेट्रो पसंद नहीं है। मेट्रो सिर्फ भागती है। धड़कती नहीं है। सिकंदर उखड़ा हुआ था बेवजह। ख़ुद को पकड़ नहीं पाता है तो हर भागने वाल...
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दस रुपये का चार सिनेमा
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सचमुच मन गदगद हो गया। ज़माने से आम लोगों के मनोरंजन के तौर-तरीके और अधिकार पर रिपोर्ट कर रहा हूं। मल्टीप्लेक्स ने ऐसा धकियाया कि आम आदमी पान...
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....और गई गेंद चौधरी के खेत में
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पश्चिम उत्तर प्रदेश के गढ़ मेले को कवर करने के रास्ते में गन्ने के खेत में हो रहे क्रिकेट टूर्नामेंट पर नज़र पड़ गई। जिस शिद्दत से मैच का आय...
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